“कुणी घर देता का, घर!”

सार्वजनिक जीवन में किसानों के मुद्दे से लेकर सेना के सम्मान तक, नाना पाटेकर ने हमेशा अपनी राय को बिना किसी पॉलिटिकल करेक्टनेस में पड़े सबके सामने खुलकर रखा

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नाना पाटेकर (1951-2026)

मिहिर पंड्या

परिन्दा के अन्ना सेठ से लगाकर नटसम्राट के अप्पा साहेब के किरदार तक, नाना पाटेकर ने अपने हर किरदार को उसकी पूरी तरंग के साथ जिया. अन्ना की सुर्ख हिंसा महानगर की क्रूरता है, अप्पा साहेब का निपट अकेलापन महानगर का निर्वात. खासकर मराठी फिल्म नटसम्राट में नाना पाटेकर के आवेगभरे अभिनय को आज भी भुला पाना मुश्किल है.

वे मराठी रंगमंच की दुनिया से बंबई की सिनेमाई दुनिया में आए थे. अद्भुत संयोग है कि अस्सी के दशक में रंगमंच पर प्रसिद्धि हासिल करने वाले नाना ने आगे जाकर सिनेमाई पर्दे पर भी रंगमंच के रास्ते ही अपने अभिनय का शिखर छुआ.

कालजयी मराठी लेखक विष्णु वामन शिरवाडकर ‘कुसुमाग्रज’ के लिखे नटसम्राट नाटक के सिनेमाई अडैप्टेशन में उन्होंने शीर्षक भूमिका निभाई. अतीत में मराठी रंगमंच के दिग्गज श्रीराम लागू जिस भूमिका को निभाकर अमरता हासिल कर चुके हों, उसे नाना ने बखूबी अपना बनाया. पर्दे पर उनका बोला संवाद “कुणी घर देता का, घर!” आज भी सुननेवाले के रोंगटे खड़े कर देता है.

सार्वजनिक जीवन में किसानों के मुद्दे से लेकर सेना के सम्मान तक, नाना पाटेकर ने हमेशा अपनी राय को बिना किसी पॉलिटिकल करेक्टनेस में पड़े सबके सामने खुलकर रखा. हां, यहां ‘मी टू’ आंदोलन के दौरान उन पर लगे सेक्सुअल हरेसमेंट के आरोपों को भी याद रखा जाना चाहिए, जिसने उनके उजले अभिनय करिअर पर बदनुमा धब्बा लगाया.

इससे पहले नब्बे के दशक में बड़ी हो रही हमारी पीढ़ी ने नाना पाटेकर का एक भिन्न ही रूप देखा था. मेहुल कुमार की तिरंगा और क्रांतिवीर जैसी फिल्मों ने अचानक उन्हें वीडियो पाइरेसी और केबल टीवी क्रांति की दोहरी मार झेल रही संकटग्रस्त दोराहे पर खड़ी सिनेमा इंडस्ट्री का सबसे लोकप्रिय और बिकाऊ अभिनेता बना दिया था.

और उन्होंने मुख्यधारा का सिनेमाई हीरो बनने की परिभाषा को सिरे से बदल दिया. वे तयशुदा सांचों से अलग थे. वे चेहरे से नहीं, अपनी पूरी काया से अभिनय करते थे. भिन्न होने के बावजूद दर्शक को यहां उनके गुस्से की आंच सच्ची लगी. उनके अभिनय का बीहड़पन उन्हें भा गया. भ्रष्ट सिस्टम से लड़ते नायक ने जैसे एक पूरी बैचेन युवा पीढ़ी के आक्रोश को वाणी दे दी थी. 

नाना पाटेकर का यह व्यवस्था विरोधी, तीखा, हिंसक लेकिन चलताऊ फिल्मी मुहावरों और डायलॉगबाजी से भरा नायकीय अवतार भड़काऊ तो था लेकिन अपने दौर के दूसरे चॉकलेटी स्टार पुत्रों के सामने वे पर्दे पर लोकप्रिय नायकत्व की नई इबारत लिख रहे थे.

नाना पाटेकर ने जो पगडंडी बनाई, उसी पर आगे मनोज बाजपेयी, इरफान खान, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, राजकुमार राव जैसे भिन्न सांचों में ढले लेकिन विलक्षण अभिनेता चले हैं और इंडस्ट्री को उन्हें शीर्षक भूमिकाएं देने पर मजबूर कर पाए हैं.

इसी दौर में उन्होंने संजय लीला भंसाली की खामोशीः द म्यूजिकल में एक मूक-बधिर पिता की भूमिका गजब की भावप्रवणता के साथ निभाई. जिस संवाद अदायगी ने उन्हें अपार लोकप्रियता दिलाई, नाना ने साबित कर दिया कि यह कथित डायलॉगबाजी उनका हथियार भर है, उनके अभिनय की बैसाखी नहीं.

फिर नब्बे के दशक में जितनी कुशलता से वे लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा के ‘ओवर द टॉप’ नायक का किरदार निभा रहे थे, नई सदी में उतनी ही कारीगरी से उन्होंने खुद उन्हीं किरदारों को कैरीकैचर बनाकर पर्दे पर जिंदा किया. ब्लफमास्टर के अंडरवर्ल्ड डॉन चंद्रू से लेकर वेलकम के भाई उदय शेट्टी तक उनकी कॉमिक टाइमिंग देखने लायक रही.

बतौर निर्देशक उनकी फिल्म प्रहार की याद अविस्मरणीय है. मेरे लिए यह फिल्म इसका बेहतरीन उदाहरण है कि एक समस्यामूलक विचार को भी अगर पूरी तन्मयता से कहा जाए तो वह एक यादगार कलाकृति का रूप ले सकता है.

अपने मूल में यह फिल्म लोकतंत्र को नहीं बल्कि सैन्य अनुशासन को समाज के समक्ष मौजूद सबसे उच्च आदर्श के बतौर पेश करती है, लेकिन फिर भी इसके भीतर ऐसा कुछ बहुत कोमल, बहुत पवित्र है जिसके असमय नष्ट हो जाने की टीस आपको देर तक सालती रहती है.

इससे आगे अमोल पालेकर की प्रयोगात्मक फिल्म थोड़ा सा रूमानी हो जाएं  में उन्हें देखें. फिल्म के मध्यभाग में उनके किरदार ‘धृष्टद्युम्न पद्मनाभ प्रजापति नीलकंठ धूमकेतु बारिशकर’ का आगमन इस कविता की भाषा में लिखी गई उदास फिल्म का सबसे उजला सिरा है.

वे निर्देशकों के लिए मुश्किल अभिनेता माने जाते रहे पर विधु विनोद चोपड़ा से लेकर गुलजार और अमोल पालेकर से लेकर पा रंजीत तक कई उम्दा निर्देशकों ने अपने सबसे नाजुक किरदारों को निभाने के लिए नाना पाटेकर का चुनाव किया. इसी विरोधाभासी लेकिन व्यापक रेंज को जोड़कर नाना पाटेकर की विरासत निर्मित होती है.

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