आखिरी योद्धा

फिल्म निर्माता थेजा रियो ने दुनियाभर से जुटाई अपनी बेहतरीन टीम के साथ मिलकर 1960 के दशक के नगालैंड की पृष्ठभूमि पर फिल्म अंग का निर्माण किया है. पारिवारिक ड्रामा में पुरानी दुनिया के मिटने और नई दुनिया के आकार लेने के संघर्ष का बेहद सजीव चित्रण

अंग फिल्म का एक दृश्य

फिल्म निर्माता थेजा रियो ने 20 सितंबर को नगालैंड को गर्व के साथ दुनिया के नक्शे पर ला दिया. उनकी पहली फीचर फिल्म अंग ने टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (टीआइएफएफ) में प्लेटफॉर्म सेक्शन का शीर्ष सम्मान अपने नाम किया.

यह एक मूल निवासी मुखिया की कहानी है जो गांव वालों के ईसाई धर्म और आधुनिकता अपनाने के बावजूद निडर होकर अपने पारंपरिक विश्वास को थामे रहता है. पुरस्कार लेते हुए 31 वर्षीय रियो ने कहा, “मैं भारत के पूर्वोत्तर के एक छोटे से कस्बे का हूं, जहां सपने अक्सर पूरे नहीं होते. मैं यह पुरस्कार अपने घर के लोगों को समर्पित करता हूं...यह तो बस एक शुरुआत है.”

यह बात इसलिए बेहद खास है क्योंकि यह मुकाम हासिल करने वाली फिल्म अंग कोन्याक भाषा (जो ज्यादातर भारतीयों के लिए अनजान है) में बनी है और जिसे कोहिमा और दीमापुर के बीच अनजाने से गांव घास्पानी में 16एमएम में फिल्माया गया है.

पुरस्कार एक बड़ी उपलब्धि लेकर आया. नगालैंड की पहली फिल्म बन गई जिसने ऑस्कर के सर्वश्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय फीचर फिल्म वर्ग के लिए पात्रता हासिल की. टीआइएफएफ के फेस्टिवल डायरेक्टर कैमरन बेली ने 1960 के दशक पर आधारित ड्रामा की जमकर तारीफ करते हुए इसे “एक शानदार और अनूठी रचना” बताया, जिसे दिखाने का सौभाग्य फेस्टिवल को पहले कभी नहीं मिला था.

11 अन्य गैर-अंग्रेजी फिल्मों को पीछे छोड़कर इसे चुनने वाली जूरी ने कहा कि अंग “असली दुनिया का बेहद गहरा चित्रण” करती है. वहीं, रियो के “नजरिये और साहस” की भी जमकर सराहना की.

एक कठिन शुरुआत

नगालैंड की राजधानी कोहिमा में जन्मे और पले-बढ़े रियो ने शुरुआत रैप के बोल लिखने के साथ की थी, जिसके बाद उन्होंने छोटी कहानियां गढ़ना शुरू किया. दिल्ली यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी लिटरेचर की पढ़ाई के दौरान रियो ने फिल्म निर्माता नैन्सी निसा बेसो, जिन्हें वह बचपन से जानते थे, को स्क्रीनराइटर बनने की अपनी इच्छा के बारे में बताया. नैन्सी ने उनका हौसला तो बढ़ाया, मगर इस क्षेत्र की कड़वी सच्चाई भी सामने रखी.

एक जमींदार और उसके पड़ोसियों के बीच अनबन पर आधारित है द फेबल और एक अस्पताल में अपने जीवनसाथियों के कोमा में चले जाने के बाद एक बुजुर्ग पुरुष और एक युवा महिला के बीच बने अनोखे रिश्ते पर केंद्रित वेटिंग जैसी स्वतंत्र फिल्मों का निर्माण कर चुकीं नैन्सी कहती हैं, “इंडस्ट्री स्वागत तो करती है, पर इसमें अपनी जगह बनाना मुश्किल होता है. फिल्म निर्माण करियर में असफलताएं और अनिश्चितताएं जुड़ी होती हैं, जिसके लिए दृढ़ आत्मविश्वास बेहद जरूरी है.” रियो के पास इसकी कोई कमी नहीं थी.

2015 में उनका चयन सिसिली के एक स्क्रीनराइटिंग प्रोग्राम के लिए हुआ. चार साल बाद उन्होंने अंग का एक लघु फिल्म संस्करण बनाया. फिल्म उत्सवों में इसकी काफी सराहना हुई, जिससे इसे पूरी फीचर फिल्म में बदलने का उनका विचार और पक्का हो गया.

इस वजह से ही उन्हें यूके के प्रतिष्ठित नेशनल फिल्म ऐंड टेलीविजन स्कूल (एनएफटीएस) में निर्देशन के मास्टर कोर्स में दाखिला मिला. रियो और नैन्सी ने पहली बार अदे (एक रविवार) नामक शॉर्ट फिल्म पर साथ काम किया, जो दो दोस्तों की कहानी थी जो स्कूल बंक करते हैं और उनका साबका बाहरी दुनिया की मुश्किलों से पड़ता है.

फिल्म ने रोटरडैम जैसे नामी फिल्म समारोहों का सफर तय किया. नैन्सी कहती हैं, “रियो की अलग सोच और ढांचा है, वे जानते हैं कि उन्हें कहानी कैसे सुनानी है. वक्त के साथ उनकी दृष्टि और विश्वास और मजबूत हुआ है.”

अपनी जड़ों की ओर

इसका विचार रियो के निजी अनुभवों और आत्ममंथन का नतीजा है. अंग में मकान मालिक के दुविधा में उलझे किशोर बेटे की तरह कभी वे भी खुद को अपनी संस्कृति और जड़ों से दूर महसूस करते थे. वे बताते हैं, “हम मुख्यधारा के मीडिया में खुद को नहीं देखते थे.

मुझे कभी नहीं लगा कि हमारी कहानियां बड़े पर्दे के लिए बनी हैं.” मगर विश्व सिनेमा के संपर्क में आने और एनएफटीएस में पढ़ाई ने उनके इरादों को पक्का किया. वे कहते हैं, “आप घर से जितनी दूर जाते हैं, अपनी जड़ों से उतना ही जुड़ाव महसूस करते हैं. नगा संस्कृति में रची-बसी कहानियां लिखने से पहले यह मेरे लिए एक लंबा सफर था.”

रियो अब उन कहानियों को लेकर और उत्साहित हैं जो वे दुनिया को सुनाना चाहते हैं. वे कहते हैं, “मुझे उन विषयों पर फिल्में बनाना पसंद है जिनको लेकर मेरे मन में द्वंद्व हो.”

यह अनिश्चितता बतौर निर्देशक उनके दृष्टिकोण में कहीं नहीं झलकती, क्योंकि अंग में एक मंझे हुए कलाकार की छाप है. रियो ने ईसाई मिशनरियों को गलत ठहराए बिना या किसी भी कोन्याक पात्र को कठघरे में खड़ा किए बिना, गांव की सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान मिटने की प्रक्रिया को संयम और बारीकी से दिखाया है.

उन्होंने एक दबंग पिता और बोलने में असमर्थ उसके बेटे के बिगड़ते रिश्तों के जरिए बेचैनी, मजबूरी, मानवीय उत्सुकता और अतीत से चिपके रहने की भावना को कुशलता से परोसा है. रियो कहते हैं, “मैंने जितना संभव हो निष्पक्ष रहने की कोशिश की क्योंकि मैं चाहता था कि मेरे सभी पात्रों और संघर्षों में गहराई हो. इससे फिल्म महज एक दुष्प्रचार या हिडन एजेंडे वाली फिल्म बनकर नहीं रह जाती.”

एक गांव की दास्तान

इस फिल्म (अंग) के निर्माण की कहानी खुद में एक डॉक्यूमेंट्री बनने लायक है. स्थानीय नगा फिल्म उद्योग अभी शुरुआती दौर में है, इसलिए रियो और उनके कास्टिंग डायरेक्टर बेंडैंग वालिंग के लिए कलाकारों को खोजना बड़ी चुनौती थी. ऑडिशन के लिए बहुत कम लोग आते थे, और जब मोन जिले में कोन्याक कलाकारों को ढूंढने की बात आई तो विकल्प और सिमट गए.

आखिर में रियो ने यूट्यूब का सहारा लिया और स्टैंडअप कॉमेडियन्स की तलाश की, जहां उन्हें अंगलोंग के रूप में मुख्य किरदार मिला. रियो बताते हैं, “वे मेरी पसंद की लिहाज से उम्र में छोटे थे, मगर उनकी मौजूदगी, टाइमिंग और हाव-भाव ने मुझे तुरंत प्रभावित कर लिया.” उनके बेटे के किरदार के लिए रियो ने अपने घर के पास रहने वाले किशोर सोबिनो रेंगमा को चुना.

रियो बताते हैं, “वह बहुत ही शर्मीला और शांत लड़का है, लेकिन बेहद समझदार है.” इसमें ‘व्हाइट घोस्ट’ या अमेरिकी मिशनरी की भूमिका निभाने वाले अमेरिकी अभिनेता डगलस हेंशाल को छोड़कर, कास्ट के किसी भी सदस्य ने इससे पहले कभी फिल्म सेट पर कदम भी नहीं रखा था.

फिल्म का विजुअल टोन निखारने के लिए रियो ने एनएफटीएस के अपने दो सहपाठियों को जोड़ा. पुर्तगाली प्रोडक्शन डिजाइनर मार्गरीडा कैटानो डायस ने दो बार नगालैंड का दौरा किया और मोन जिले के गांवों व घरों को देखा. आज के गांव 1960 के दशक के परिवेश से काफी बदल चुके थे, इसलिए उन्होंने कोन्याक समुदाय की मदद से पुराने उजाड़ गांव का सेट तैयार किया.

सिनेमेटोग्राफी एनएफटीएस के पूर्व छात्र एडम पिएटकेविज ने संभाली. उन्होंने 16एमएम फिल्म पर शूटिंग की, जो 20वीं सदी की शुरुआती समय के आर्काइव फुटेज और अमेरिकी मिशनरियों व कोन्याक लोगों की पुरानी तस्वीरों जैसा लुक देने के लिए सबसे सही तरीका था.

रियो ने शोध के अलावा पटकथा लेखन के वक्त से ही कोन्याक लिटरेचर बोर्ड और कोन्याक यूनियन को इसका हिस्सा बनाना जरूरी समझा. वे कहते हैं, “ये संस्कृतियां इतनी सूक्ष्म व जटिल हैं कि सिर्फ किताबों में पढ़ना काफी नहीं. उनके सहयोग के बिना हम कुछ नहीं कर पाते.”

जैसे-जैसे अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों से आमंत्रण आ रहे हैं और ऑस्कर अभियान गति पकड़ रहा, नैन्सी और रियो भारत में इसके प्रदर्शन और खासकर नगालैंड के लोगों के साथ इसे साझा करने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं.

उन्हें पता है कि दीमापुर में सिर्फ दो सिनेमाघर होने के कारण यह राह आसान नहीं. नैन्सी कहती हैं, “यह फिर से उन पुराने दिनों जैसा होगा जब एक आदमी साइकिल पर प्रोजेक्टर और साउंड सिस्टम लेकर कस्बों-गांवों में जाता था. नगालैंड के कोने-कोने में जाकर फिल्म को अपने समुदाय के साथ साझा करना हमारे लिए बहुत जरूरी है.”

सबसे बढ़कर नैन्सी को उम्मीद है कि रियो को विश्व स्तर पर देखकर अन्य लोग भी प्रेरित होंगे. नैन्सी कहती हैं, “नए फिल्म निर्माताओं से मैं कहूंगी कि आप कहां से आते हैं, इससे डरे नहीं. आप हमारे जैसे किसी छोटे राज्य से हो सकते हैं, मगर आप दुनिया के सबसे बड़े मंच तक पहुंच सकते हैं.” और क्या पता, यह राह आपको ऑस्कर तक भी ले जाए.

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