सुनहरे सपने पर निगाहें
आइची-नगोया पहुंच रहे ज्यादातर भारतीय एथलीट पदक और शोहरत को लेकर उम्मीदों से लबरेज. मौजूदा फॉर्म के आधार पर हम उन सात की चर्चा कर रहे जिनके पदक लाने की संभावना

ईशा सिंह, निशानेबाजी
आइची-नगोया 2026 कई लिहाज से महत्वपूर्ण है. यह न सिर्फ भारतीय एथलीटों को शोहरत हासिल करने का मौका मुहैया करेगा बल्कि वहां भारत का प्रदर्शन अच्छा रहा तो 2036 में अपने यहां पहली बार ओलंपिक और 2038 में अपनी धरती पर तीसरा एशियाई खेल आयोजित करने का उसका दावा मजबूत होगा.
इस बार के एशियाई खेलों के मंच पर भारत की प्रतिस्पर्धा अभी दो महीने से भी कम समय पहले हुए राष्ट्रमंडल खेलों से कठिन नहीं बल्कि उसी की बराबरी पर होने की उम्मीद है. खासकर बैडमिंटन, टेबलटेनिस, कुश्ती, निशानेबाजी, जूडो, तीरंदाजी, मुक्केबाजी, ईस्पोर्ट्स और भारोत्तोलन में.
इन खेलों में दुनिया के कुछ चुनिंदा एथलीट मोर्चे पर उतरने वाले हैं. खासकर निशानेबाजी और कुश्ती के लंबे-चौड़े लवाजमे पर ज्यादा ही उम्मीद लगी हुई है. नौकायन से भी कुछेक पदक आने की आशा है.
भारत की ओर से 36 खेलों में 503 एथलीट मैदान में उतरने वाले हैं. टीम स्पर्धाओं में कबड्डी में पुरुषों और महिलाओं दोनों की टीमें दावेदार मानी जा रही हैं. वे अपने खिताब बचाने उतरेंगी. हालांकि ईरान उन्हें तगड़ी चुनौती देने वाला है.
अपनी पुरानी नीली जर्सी में लौटीं पुरुष और महिला हॉकी टीमों को पता है कि स्वर्ण पदक जीतने पर उन्हें 2028 के लॉस एंजेलिस ओलंपिक में प्रवेश मिल जाएगा. नजर तो पुरुष वॉलीबॉल और महिला रग्बी टीमों पर भी होगी.
दोनों के लिए इसमें पोडियम पर खड़े होने का ऐतिहासिक मौका हो सकता है. बैडमिंटन में 2024 के युगल स्वर्णपदक विजेता चिराग शेट्टी और सात्विकसाईराज रैंकीरेड्डी को युगल के साथ ही टीम स्पर्धाओं में भी संभावनाएं बनानी होंगी.
जेन ज़ी भी मैदान में है. एशियाई खेलों में पहली बार हो रही सर्फिंग में भारत के कमली मूर्ति (16), शिवराज बाबू (23), किशोर कुमार (18) और शुगर शांति बनारसे (21) अकबने लांग बीच पर स्पर्धा में होंगे.
15 गेमर दुनिया के कुछ उम्दा ईस्पोर्ट्स एथलीट्स से चार खेलों में मुकाबले में होंगे—पोकेमॉन यूनाइट, ईफुटबॉल, लीग ऑफ लीजेंड्स और पुयो पुयो चैंपियंस. जूनियर विश्व स्क्वैश चैंपियन अनाहत सिंह पिछली बार के कांस्य का रंग बदलना चाहेंगी.
अगले पन्नों पर पदक की दृष्टि से भारत के कुछ सर्वाधिक संभावनाशील खिलाड़ियों के प्रोफाइल हैं. पदक तालिका में शीर्ष तीन में पहुंचने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य के लिए इन खिलाड़ियों का प्रदर्शन निर्णायक होगा.
अगली बड़ी सनसनी
ईशा सिंह, 21 वर्ष
खेल: निशानेबाजी
स्पर्धाः 10 मीटर पिस्टल और 25 मीटर रैपिड फायर पिस्टल
क्यों दावा मजबूत: 2026 में हांगझोऊ आइएसएसएफ विश्व कप में 25 मीटर का स्वर्ण, और म्यूनिख में विश्व रिकॉर्ड. नई दिल्ली में एशियाई चैंपियनशिप में 10 मीटर का स्वर्ण
एशियाई खेलों में भाग लेने के लिए जितने भी भारतीय खिलाड़ी जा रहे हैं, उनमें अपेक्षाओं का बोझ ईशा सिंह से ज्यादा शायद ही किसी पर हो. उन्हें पदक की पक्की दावेदार के रूप में देखा जा रहा है.
इसकी वजह साफ है. उनकी विश्व रैंकिंग देखिए जरा! वे 25 मीटर रैपिड फायर में दुनिया की नंबर एक और 10 मीटर पिस्टल में नंबर दो खिलाड़ी हैं. 2025-26 में वे कमाल की फॉर्म में रही हैं. इस दौरान उन्होंने कई विश्व कप स्वर्णपदक हासिल किए हैं. और राय सुनने के बाद हम इसकी वजह भी समझ सकते हैं.
ईशा कहती हैं, “मैं जैसी योजना बनाकर अभ्यास कर रही हूं, प्रतियोगिताओं में भी उसे ठीक वैसे ही अमल में ला पा रही हूं.” पेरिस ओलंपिक 2024 में दो कांस्य जीतने वाली मनु भाकर की तरह ईशा ने भी दो स्पर्धाओं में अपनी राह बनाई है और दोनों के लिए एशियाई खेलों की टीम में जगह पाई है.
निशानेबाजी में इस समय भारत के पास प्रतिभाओं की लंबी कतार है लेकिन ईशा के अप्रोच और एटीट्यूड में जो सहजता है उसकी वजह से वे दूसरों से साफ तौर पर अलग दिखती हैं. एक तरह से इस खेल की पहचान से जुड़े सख्त तेवर उनमें नहीं दिखते, फिर भी रेंज पर उनका प्रदर्शन शानदार रहता है.
वे कहती हैं, “हमेशा गर्दन झुकाकर रहने वाला तरीका मैं नहीं अपनाती. मैं आसानी से खुद को ऑन-ऑफ कर लेती हूं और जरूरत के मुताबिक एकाग्र हो जाती हूं.” रेंज से बाहर उन्हें लजीज खाना बनाने, स्केचिंग और पढ़ने का शौक है.
वे दोस्तों और परिवार के साथ समय बिताना भी पसंद करती हैं. ईशा का निशानेबाजी से लगाव इसलिए शुरू हुआ क्योंकि उन्हें यह आसान लगा था. हैदराबाद की ईशा कहती हैं, “यह सोचना मेरी बेवकूफी ही थी कि इसमें कुछ नहीं करना होता, बस खड़े होकर गोली चलानी होती है.”
ईशा ने अपने सबसे बड़े सबक कामयाबी से नहीं बल्कि मुश्किल दौर से सीखे हैं. पेरिस में उनके पहले ओलंपिक ने उन्हें कड़वा अनुभव दिया. उसे याद करते हुए वे कहती हैं, “प्रदर्शन बहुत खराब या औसत नहीं था लेकिन जो चाहा था उसे पाए बिना लौटना आपको भीतर से तोड़ देता है. अब मैं अपने खेल में ज्यादा परिपक्व हो गई हूं.”
एशियाई खेलों में निशानेबाजी से भारत को सबसे ज्यादा पदकों की उम्मीद है. ईशा भी खुश हैं कि इस खेल को अब ज्यादा पहचान मिल रही है. वे कहती हैं, “लोग हमसे कहते हैं, ‘आप लोगों की वजह से यह खेल इतना आसान दिखने लगता है’, लेकिन इसे आसान दिखाने के लिए हम बहुत मेहनत करते हैं.” एशियाई खेलों में चीनी और दक्षिण कोरियाई निशानेबाजों का सामना करते हुए ईशा और भारतीय टीम पदकों का सिलसिला जारी रखना चाहेंगी.
हालांकि वेन्नम ने सपना तैराक बनने का देखा था लेकिन तीरंदाजी ने उन्हें एशियाड में तिहरे स्वर्णपदक और अर्जुन अवार्ड दिलाए. उनके शब्दों मेंः ‘‘नगोया में कई अवार्ड आने को हैं.’’ उसके बाद शायद खेल रत्न भी मिल जाए.
कामयाबी के तीर
ज्योति सुरेखा वेन्नम, 30 वर्ष
खेलः तीरंदाजी
स्पर्धाः तीरंदाजी (कंपाउंड)
क्यों दावा मजबूतः 90 से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय पदकों के साथ भारत की सबसे कामयाब महिला कंपाउंड तीरंदाज. एशियाई खेल 2023 में ऐतिहासिक तिहरे स्वर्ण पदक. विश्व रैंकिंग में चौथा स्थान
नगोया में एशियाई खेलों में चौथी बार शामिल हो रही हैं ज्योति सुरेखा वेन्नम. इन खेलों में उनके नाम पांच पदक हैं. उनकी कहानी सिर्फ लगातार कामयाबी को आसान बना देने की काबिलियत की वजह से नहीं, बल्कि उनकी शुरुआत की वजह से भी खास है.
कभी वे तैराक बनना चाहती थीं. तीन साल की उम्र में तैराकी शुरू की और कई उपलब्धियां हासिल कीं. इनमें कृष्णा नदी को तीन घंटे 20 मिनट में तीन बार आर-पार करने का लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में नाम दर्ज होना भी शामिल है.
वे 11 साल की उम्र में तीरंदाजी में आईं. झींगा पालन करने वाले उनके पिता विजयवाड़ा में तैराकी की खराब सुविधाओं से निराश थे. ज्योति कहती हैं, “मैं माता-पिता की इकलौती संतान हूं. उनकी एक ही इच्छा है कि मैं विश्व मंच पर खेलों में नाम रोशन करूं.”
खेल में आगे बढ़ने का वेन्नम परिवार का सपना आंध्र प्रदेश में कुछ अलग ही था. वहां ज्यादातर माता-पिता और बच्चे आइआइटी, आइआइएम तथा कॉर्पोरेट जगत में बड़े करिअर का लक्ष्य रखते हैं लेकिन ज्योति ने तीरंदाजी को आसानी से अपना लिया.
15 साल की उम्र तक वे राष्ट्रीय सीनियर टीम में पहुंच गईं. तेहरान में 17वीं एशियाई तीरंदाजी चैंपियनशिप में हिस्सा लिया और टीम स्पर्धा में कांस्य पदक जीतकर अपनी अलग पहचान बनाई. विश्व स्तर की उपलब्धियों के लिए उन्हें 2017 में अर्जुन पुरस्कार मिला.
निशाने पर लगातार 10 अंक साधने वाली सुरेखा ने पढ़ाई में भी अच्छे ग्रेड का लक्ष्य रखा. उन्होंने विजयवाड़ा की केएल यूनिवर्सिटी से 2017 में कंप्यूटर साइंस में बीटेक और 2019 में एमबीए किया.
इन दिनों वे हरियाणा के सोनीपत स्थित साई केंद्र में रोज छह घंटे निशाने का अभ्यास करती हैं. वे कहती हैं, “मेरा लक्ष्य एशियाई खेलों में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना और व्यक्तिगत तथा टीम स्पर्धाओं में ज्यादा से ज्यादा पदक जीतना है.”
एक दशक से ज्यादा की लगातार सफलताओं के बावजूद वेन्नम परिवार को एक मलाल है. पिछले एशियाई खेलों में तीन स्वर्ण जीतने के बाद भी ज्योति को खेल रत्न नहीं मिला. नगोया में वैसा ही प्रदर्शन शायद उन्हें यह पुरस्कार दिला दे. —प्रसाद निचेनमेटला
मैट पर मजबूती से
सुजीत कलकल, 23 वर्ष
खेलः कुश्ती
स्पर्धाः 65 किलो वर्ग में फ्रीस्टाइल
क्यों दावा मजबूतः 2026 की एशियन चैंपियनशिप और 2025 की अंडर-23 वर्ल्ड चैंपियनशिप में स्वर्ण
अजीब-सी उलझन में थे सुजीत कलकल 2023 में. यह जानते हुए भी वे एशियाई खेलों के ट्रायल की तैयारी कर रहे थे कि उसका कोई अर्थ है नहीं. 65 किलो वर्ग के फ्रीस्टाइल के लिए तोक्यो ओलंपिक पदक विजेता बजरंग पूनिया को बिना लड़ाए ही चुना जा चुका था.
कलकल कोर्ट गए और ट्रेनिंग भी जारी रखी लेकिन अनिश्चितता ने उनके प्रयासों को बेपटरी कर दिया. उनकी याचिका खारिज हो गई, वे ट्रायल से भी बाहर हो गए और एशियाई खेल फिर टीवी पर देखे.
वे कहते हैं, ‘‘एक पहलवान और एक व्यक्ति के तौर पर भी अब मैं परिपक्व हो गया हूं. मैं उन्हीं चीजों पर ध्यान देता हूं जिस पर मेरा बस है. बाकी सब कुछ मैं ऊपरवाले पर छोड़ देता हूं.’’
उसके बाद कलकल 2024 की अंडर-23 वर्ल्ड चैंपियनशिप में कांस्य और फिर स्वर्ण जीत चुके हैं. पेरिस ओलंपिक के लिए वे मामूली अंतर से बाहर हुए थे पर इसी साल अप्रैल में उन्होंने करिअर का सबसे बड़ा खिताब एशियन चैंपियनशिप का स्वर्ण जीता.
वहां उन्होंने दो विश्व चैंपियन पदक विजेता रहे कजाखस्तान के अब्दुलमाजिद कुदिएव और उज्बेकिस्तान के उमीदियॉन जलोलोव को आत्मविश्वास के साथ पटका. इस बार अपने सबसे तगड़े प्रतिद्वंद्वी, ईरान के रहमान मूसा अमजदखलीली की गैरमौजूदगी में वे सशक्त दावेदार हैं.
उन्हीं के शब्दों में, ‘‘अभी कुछेक साल पहले तक कंपीटिशन के दौरान एक तरह का डर नसों में घुसा जाता था. अब मुझे पता होता है कि मैट पर करना क्या है.’’—शैल देसाई
बुलंद हौसले के साथ घुड़सवारी
आशीष लिमये, 32 वर्ष
खेल: घुड़सवारी
स्पर्धाः इवेंटिंग
क्यों दावा मजबूतः एशियन इक्वेस्ट्रियन चैंपियनशिप, 2025 में स्वर्ण पदक
जब कोई घुड़सवार अपने घोड़ों के बारे में बात करता है तो उसमें एक मां-बाप और किसी प्रिय पालतू जानवर के मालिक जैसा मिला-जुला भाव झलकता है. जब आशीष लिमये पोलैंड के सोपोट में एक प्रतियोगिता के लिए अपने घोड़े विली बी डन के साथ गाड़ी से जा रहे थे, तभी इंडिया टुडे ने उनसे उस घोड़े के बारे में पूछा जिसे उन्होंने पहली बार इंस्टाग्राम पर देखा था.
सोपोट में विली का प्रदर्शन एशियाई व वर्ल्ड स्पोर्ट्स दोनों के लिए क्वालीफाइ करने में लिमये की मदद करने वाला था. लिमये जर्मनी में मौजूद सात घोड़ों की देखभाल करते हैं, जो उनका ट्रेनिंग बेस है.
14 साल के विली के बारे में वे कहते हैं, “उसे संभालना हर किसी के बस की बात नहीं है, क्योंकि वह काफी नखरीला है और आसपास के लोगों पर हावी होने की कोशिश करता है. लेकिन मेरे साथ उसका पहले ही दिन से एक खास जुड़ाव बना हुआ है.”
वे कहते हैं, “यहां हमें खासी मेहनत वाले काम करने पड़ते हैं, जैसे अस्तबल की सफाई करना, घोड़ों को चारा देना, उन्हें मैदान में ले जाना...और फिर सवारी करना.” इसी की बदौलत ही वे शो जंपिंग के विशेषज्ञ से बढ़कर इवेंटिंग में निखर पाए—जो घुड़सवारी की सबसे बेहतरीन विधा मानी जाती है और जिसमें ड्रेसेज तथा क्रॉस-कंट्री भी शामिल हैं.
लिमये को बेंगलूरू के एम्बेसी इंटरनेशनल राइडिंग स्कूल का समर्थन हासिल है, जहां वे पहले एक ट्रेनर थे. वे बताते हैं, “भारत में मैंने दो साल तक सब कुछ जीता और एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया था जहां आगे बढ़ने का रास्ता नहीं दिख रहा था, तभी एम्बेसी ने स्पॉन्सरशिप का प्रस्ताव दिया.” पुणे में डॉक्टरों के परिवार में जन्मे लिमये एक मैकेनिकल इंजीनियर हैं. वे कहते हैं, “परिवार के सहयोग को लेकर कभी कोई समस्या नहीं रही.”
एशियाई खेल 2026 लिमये के लिए खुद को साबित करने और पुरानी भूल सुधारने का मौका होंगे. पिछले खेलों में उनके साथ एक अजीब सी घटना घटी थी, जब ड्रेसेज के दौरान वे एक जंप चूक गए थे और इस वजह से पदक उनके हाथ से निकल गया था.
वे कहते हैं, “ऐसा न तो उससे पहले कभी हुआ था और न ही उसके बाद.” लिमये हर बाधा शानदार अंदाज में पार करने के लिए विली के साथ अपने बेहतरीन तालमेल पर भरोसा कर रहे हैं.—सुहानी सिंह
“यहां (जर्मनी में) हमें खासी मेहनत वाले काम करने पड़ते हैं, जैसे अस्तबल की सफाई करना, घोड़ों को चारा देना, उन्हें मैदान में ले जाना...और फिर सवारी करना.” — आशीष लिमये
बिजली-सी रफ्तार
गुरिंदरवीर सिंह, 25 वर्ष
खेल: एथलेटिक्स
स्पर्धाः 100 मीटर की दौड़
क्यों दावा मजबूत: 100 मीटर के मौजूदा राष्ट्रीय रिकॉर्ड धारक
गुरिंदरवीर सिंह के लिए यह साल खासा उतार-चढ़ाव भरा रहा. फेडरेशन कप में इस धावक ने 100 मीटर का राष्ट्रीय रिकॉर्ड दो बार तोड़ा—सेमीफाइनल में 10.17 सेकंड और फाइनल में 10.09 सेकंड लेकिन राष्ट्रमंडल खेलों में वे सेमीफाइनल तक भी नहीं पहुंच सके.
शायद भारत के सबसे तेज धावक होने के दबाव ने उनके प्रदर्शन को प्रभावित किया. फिर भी वे बेफिक्र हैं क्योंकि जानते हैं कि उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन आना अभी बाकी है.
गुरिंदरवीर एक तरह से देर से निखरने वाले एथलीट हैं. 2008 के बीजिंग ओलंपिक में उसैन बोल्ट का दम-खम वाला प्रदर्शन देखकर वे तेज दौड़ की ओर आकर्षित हुए. खुद वॉलीबॉल खिलाड़ी रह चुके उनके पिता कमलजीत पहले कोच बने और उन्होंने ही गुरिंदरवीर को एक एथलीट के जीवन से परिचित कराया. 2017 में एक जूनियर के रूप में भी उन्होंने 11 सेकंड से कम समय निकाला और घरेलू प्रतिस्पर्धाओं में लगातार पदक जीतते रहे.
लेकिन पेट की तकलीफ ने उन्हें सुस्त कर दिया, जिसकी वजह से वे ठीक से ट्रेनिंग नहीं कर पा रहे थे. रिलायंस फाउंडेशन के एथलीट गुरिंदरवीर बताते हैं, “हालत इतनी खराब हो गई थी कि मेरे पिता ने मुझसे दौड़ छोड़कर कुछ और कुछ और करने को कह दिया था.”
उस मुश्किल से उबरना काफी थकाऊ और कठिन था. लेकिन गुरिंदरवीर ने 2024 की इंडियन चैंपियनशिप में 10.32 सेकंड के समय के साथ स्वर्ण पदक अपने नाम किया. वे कहते हैं, ‘‘नए सिस्टम और नए कोच की देखरेख में ट्रेनिंग में ढलने में थोड़ा समय लगा. चोटें भी थीं. किसी-किसी दिन तो शरीर जैसे साथ ही नहीं देता था. पर मैं काम करता रहा. और इस साल जो मैं हासिल कर पाया हूं वह मेरी लगातार मेहनत का नतीजा है.’’
ट्रेनिंग के उनके साथियों में 200 मीटर के राष्ट्रीय रिकॉर्डधारी अनिमेष कुजूर और 100 मीटर में पूर्व राष्ट्रीय रिकॉर्डधारी मणिकांत होबलीधर और अम्लान बोरगोहैन शामिल रहे हैं.
राष्ट्रीय रिकॉर्ड अपने नाम करने से उनके आत्मविश्वास को बहुत बल मिला. इस साल उन्होंने एशिया का छठा श्रेष्ठतम समय निकाला है, जिससे एथलेटिक्स में वे पदक के तगड़े दावेदार बन गए हैं. एथलेटिक्स में उनके अलावा लंबी कूद में एंसी सोजन और मुरली श्रीशंकर और लंबी दौड़ के धावक गुलवीर सिंह भी पदक के दावेदार हैं.
राष्ट्रमंडल खेल की नाकामी को परे झटककर गुरिंदरवीर अब पिछले साल से ही जारी अपनी ट्रेनिंग पर भरोसा कर रहे हैं. और उसी भरोसे के साथ एशियाई खेलों की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं. वे कहते भी हैं, “लक्ष्य क्या है, इस पर बात करने का अभी कोई मतलब नहीं. मैं बस वहां पहुंचना चाहता हूं और फिर दिखाना चाहता हूं कि लक्ष्य कैसे हासिल किया जाता है.”—शैल देसाई
जतन सोना जीतने का
हरमनप्रीत सिंह, 30 वर्ष
खेलः हॉकी
उपलब्धिः 2025 में हॉकी एशिया कप के विजेता
क्यों दावा मजबूतः 2022 के एशियाई कप में स्वर्ण पदक जीता
भारतीय पुरुष हॉकी टीम के लिए यह साल मुश्किल रहा. एफआइएच प्रो लीग में वह (नौ टीमों में) बेहद निराशाजनक आठवीं पायदान पर आई और फिर विश्व कप में पदक का 51 साल का सूखा भी खत्म करने में नाकाम रही.
हरमनप्रीत सिंह की अगुआई वाली इस टीम को बहुत सारी चीजों के बारे में फिक्र और सोच-विचार करना होगा, लेकिन फिर टीम के लिए अपना खोया आत्मविश्वास वापस पाने की खातिर एशियाई खेलों से बेहतर मौका भला क्या हो सकता है.
खिताब का बचाव करने वाला चैंपियन और एशिया की नंबर 1 टीम होने के नाते भारत जीत का प्रबल दावेदार है. पोडियम के शीर्ष पर आना 2028 के लॉस एंजेलिस ओलंपिक खेलों में जगह मिलने की गारंटी भी है.
हरमनप्रीत सिंह कहते हैं, “सब मानते हैं कि हम (एशिया की) दूसरी टीमों पर हावी हैं, मगर हमारी मानसिकता किसी टीम को कम आंकने और यह सोचने की नहीं है कि हम आसानी से जीत सकते हैं. हमें मजबूत सोच के साथ मैदान में उतरने और एकजुट टीम की तरह बेहतरीन हॉकी खेलने की जरूरत है.”
ओलंपिक में एक के बाद एक-दो कांस्य पदक जीतकर टीम ने दुनिया का और ज्यादा ध्यान अपनी तरफ आकर्षित कर लिया. एक दशक पहले ऐसा नहीं था, जब गौरतलब नतीजे निकाल पाना दूभर हो गया था.
फिर हॉकी की किस्मत पलटी जब ओडिशा में नवीन पटनायक की सरकार ने इस खेल में भारी निवेश किया. अंततः वांछित नतीजे भी मिले और दर्शकों की दिलचस्पी भी बढ़ी. मगर ज्यादा दिलचस्पी के साथ ज्यादा आलोचनाएं भी आईं. कहा गया कि मैच के आखिरी हिस्सों में टीम अपना दमखम और रफ्तार गंवाकर गोल खा बैठती है.
सिंह कहते हैं, “हमें पता है कि हमने क्या अच्छा किया और क्या नहीं किया.” वे बताते हैं कि हरेक प्रदर्शन से वे सीखते हैं और अपने चाहने वालों को भरोसा दिलाते हैं कि टीम उनकी उम्मीदों की कद्र करती है. वे कहते हैं, “पहले हमें कमजोर माना जाता था, लेकिन वह नजरिया हमने बदल दिया है. आपके कंधों पर अच्छा प्रदर्शन करने की जिम्मेदारी है क्योंकि सारी मनचाही सुविधाएं आपको मिल रही हैं, जो विश्वस्तरीय हैं.”
तोक्यो में तीन हफ्ते चलने वाले अभियान के लिए सिंह और कोच क्रेग फुल्टन मूल टीम की ताकत और गहराई पर भरोसा करके चल रहे हैं. कप्तान का कहना है कि टीम के 11 खिलाड़ियों में बारी-बारी से फेरबदल करके मैच के कार्यक्रम को संभालना आसान हो जाता है.
सिंह मानते हैं कि उनके अपने प्रदर्शन में “गिरावट” आई है. वे कहते हैं, “जब अच्छा नहीं हो रहा होता है, मैं अपनी गलतियों को समझने की कोशिश करता और पॉजिटिव रहता हूं.” वे सिर्फ ड्रैग फ्लिक और दमखम पर ही ध्यान नहीं देते बल्कि “खिलाड़ियों के साथ जुड़े रहकर” खुद मिसाल कायम करके अगुआई करने की जरूरत भी समझते हैं.
वे कहते हैं, “मुझे पता है यह (हाल का प्रदर्शन) हमारा स्तर नहीं है. हम करके दिखाने और फिर बोलने में यकीन करते हैं. हम जोरदार वापसी करेंगे.”—सुहानी सिंह
दमदार अपरकट
प्रीति पवार, 22 वर्ष
खेलः मुक्केबाजी
स्पर्धाः 54 किलो (बैंटमवेट)
क्यों दावा मजबूतः एशियाई चैंपियनशिप 2026, राष्ट्रमंडल खेल और विश्व बॉक्सिंग कप 2025 में स्वर्ण पदक
हर मुकाबले के लिए उतरते समय प्रीति पवार के दिमाग में बहुत कुछ चल रहा होता है. वे प्रतिद्वंद्वी को परखती और रणनीति की कल्पना करती हैं. लेकिन दर्शकों को रिंग में सबसे बड़ी मुस्कान वाली मुक्केबाज दिखाई देती हैं.
वे हंसते हुए कहती हैं, “मुझे पता है कि मेरे परिवार और दोस्त देख रहे हैं. यह सब उनके लिए है.” रिंग में उतरते ही उनकी जगह शांत दृढ़ता ले लेती है. रफ्तार उनकी सबसे बड़ी ताकत है. बाएं हाथ से खेलने वाली प्रीति खूबसूरती से कदम बदलते हुए सधे वार का सही मौका तलाशती हैं और फिर प्रतिद्वंद्वी की पहुंच से निकल जाती हैं. प्रीति की ताजा कामयाबी राष्ट्रमंडल खेलों का स्वर्ण है, जिसमें उनके प्रतिद्वंद्वी अपेक्षाकृत आसान थे.
लेकिन अप्रैल की एशियाई चैंपियनशिप में उन्हें कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा. उन्होंने पेरिस ओलंपिक 2024 की कांस्य पदक विजेता दक्षिण कोरिया की इम ए-जी और तीन बार की विश्व चैंपियन चीनी ताइपे की हुआंग सियाओ-वेन को हराया.
जेएसडब्ल्यू की इस खिलाड़ी का कहना है, “इम को हराने से मेरा आत्मविश्वास बढ़ा. एशियाई खेलों में इन्हीं मुक्केबाजों से सामना हो सकता है. इसलिए मुझे अपना सर्वश्रेष्ठ देकर समझना था कि कहां और मेहनत की जरूरत है.”
फिलहाल प्रीति का ध्यान शरीर पर वार और फुटवर्क सुधारने पर है. लीवर की बीमारी हेपेटाइटिस से उबरने के बाद वे ताकत और सहनशक्ति बढ़ाने पर लगातार काम कर रही हैं.
बीमारी ने उनके पेरिस ओलंपिक 2024 अभियान को प्रभावित किया और उन्हें लंबे समय तक खेल से दूर रहना पड़ा. वे याद करती हैं, “मुझे शक था कि मैं फिर शीर्ष स्तर पर मुकाबला कर पाऊंगी या नहीं. उस दौर ने मुझे मानसिक रूप से मजबूत बनाया.”
वापसी के बाद उनकी पहली बड़ी परीक्षा नवंबर 2025 का विश्व कप था. वहां उन्होंने हुआंग और विश्व चैंपियनशिप की कांस्य पदक विजेता इटली की सिरीन चरआबी को हराकर स्वर्ण जीता.
पटियाला के राष्ट्रीय शिविर में वे पूनम और आरती धारियाल को मजबूत अभ्यास साथी मानती हैं. राष्ट्रमंडल खेलों की पदक विजेता साक्षी चौधरी और प्रिया घांघस भी उनके साथ हैं. प्रीति कहती हैं, “हर कोई दूसरे से बेहतर करना चाहता है. इससे हम और मेहनत करते हैं.”—शैल देसाई