जंग आजादी के वास्ते
निखिल आडवाणी का नया प्राइम वीडियो शो द रिवोल्यूशनरीज़ उन जांजाब सेनानियों को एक भावांजलि है जिन्होंने भारत की आजादी के आंदोलन में बुनियादी लेकिन निर्णायक भूमिका निभाई

निखिल आडवाणी (चश्मे में) शो की कास्ट के साथ
निखिल आडवाणी को लंबे फॉर्मेट में भारतीय इतिहास को समेटने का थकाऊ काम बहुत भाता है. उनके बैनर एमे एंटरटेनमेंट के ताजे शो की फेहरिस्त इसका प्रमाण है.
एक शो (रॉकेट बॉयज) भारत के एटमी कार्यक्रम की शुरुआत पर है, तो दूसरा भारत की आजादी के ऐन पहले और बाद की उथलपुथल (फ्रीडम ऐट मिडनाइट) पर और तीसरा मुगल सल्तनत के उत्थान (द एंपायर) पर है. अलबत्ता अपने ताजातरीन शो के लिए निखिल ने अलग और हटकर रास्ता चुना. वे “मजे” के लिए “भारत की आजादी की लड़ाई के क्रांतिकारी अध्याय का इनग्लोरियस बास्टर्ड्स संस्करण” बनाना चाहते थे.
मतलब यह कि अमेजन के प्राइम वीडियो शो द रिवॉल्यूशनरीज के चरित्रों—रास बिहारी बोस (भुवन बाम अभिनीत), सचींद्र नाथ सान्याल (रोहित सराफ), बाघा जतिन (गुरफतेह पीरजादा) और प्रतिभा लाहिड़ी (प्रतिभा रांटा)—को दुर्गा पूजा के उत्सव में गाते-नाचते देखा जाएगा. यह इस पीरियड ऐक्शन-ड्रामा शो के नौ गानों में से एक है.
निखिल मानते हैं कि ये चारों ऐसी प्रचंड चौकड़ी थे जिनकी अनकही कहानियों का जश्न मनाना जरूरी है. वे कहते हैं, “चारों के लिए यह उतना ही सहज था जितना ‘हम उन्हें (अंग्रेजों को) निकाल बाहर फेंकेंगे’ था... वे हम पर गोलियां चला रहे हैं तो हम उन पर गोलियां चलाएंगे. हमारे पास हथियार नहीं हैं तो हम हथियार बना लेंगे.”
वे बताते हैं कि 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों के हाथों कत्लोगारत की कहानी बिसरा दी जाती है. उन्हें लगता है कि बाद में हुए अहिंसक आंदोलनों—असहयोग, भारत छोड़ो, सविनय अवज्ञा—की वजह से भी इन क्रांतिकारियों का जिक्र भर करके टाल दिया जाता है.
कल हो न हो और डी-डे सरीखी फिल्में बनाने वाले फिल्मकार के लिए यह जरूरी लगता है कि आज के नौजवान भगत सिंह, झांसी की रानी और मंगल पांडेय सरीखे जाने-माने नामों से आगे भी देखें. उन दूसरी प्रभावी हस्तियों से भली-भांति परिचित हों जिन्होंने आजादी के लिए हिंसक मार्ग चुना.
निखिल जानते थे कि शो को कामयाब बनाने के लिए उन्हें ऐसे अभिनेता-अभिनेत्रियों को लेना होगा जिनसे जेन ज़ी जुड़ाव महसूस करे. भुवन और रोहित को लेने से शो के लिए तुरत-फुरत दर्शक मिल गए. भुवन को बोस के बारे में स्कूल की पाठ्यपुस्तकों में पढ़ी गई कुछ पंक्तियों के अलावा कुछ पता नहीं था. इतने विराट चरित्रों को देख उनके मुंह से बेसाख्ता निकल गयाः ‘ये सही में हुआ था?’ निखिल कहते हैं, “रचनात्मक छूट ली गई है, पर मूल कहानी सच्ची है.”
इतनी कम उम्र में उनमें जो कदम बढ़ाने की हिम्मत और दूर की सोच थी, उस पर गुरफतेह भी हैरत में थे. वही क्रांतिकारी उमंग कुछ हद तक उन्हें जेन ज़ी के विरोध प्रदर्शनों में दिखाई दी. (गुरफतेह और प्रतिभा दोनों को मुंबई के प्रदर्शनों में देखा गया था). वे कहते हैं, “लोग आलसी हो जाते हैं... कौन लड़ेगा, बोलेगा? आज की जेन ज़ी ने यही किया. उन्होंने कहा, ‘हमारे पास आवाज है, हम पढ़े-लिखे हैं, हमें कुछ चाहिए तो उसे मांगने का हमें हक है’.”
भुवन और गुरफतेह दोनों इतनी वजनदार और महान हस्तियों का चरित्र निभाने के साथ आने वाली जिम्मेदारी की बात करते हैं. गुरफतेह कहते हैं, “आप उम्मीद करते हैं कि इसे निभाते हुए आप कोई गलती न कर बैठें.”
एमे की तरफ से पढ़ने को दिए गए दस्तावेजों के अलावा उन्होंने उस शख्स और उसके परिवार के बारे में जानने के लिए अपनी रिसर्च शुरू की. वे बताते हैं, “मैं उनके (बाघा जतिन के) बारे में सब कुछ आत्मसात करते हुए अपनी समझ विकसित करना और उनके प्रति सम्मान को बनाए रखते हुए अपने तरीके से यह चरित्र निभाना चाहता था.”
भुवन मानते हैं कि ये क्रांतिकारी न सिर्फ दिलकश हैं बल्कि उनकी कहानी सुनाना भी जरूरी है. वे कहते हैं, “स्कूल में हमें सतही किस्म की जानकारी मिली. प्रतिभा के चरित्र का तो स्कूल की किताबों में जिक्र तक नहीं. उन लोगों के त्याग और बलिदान के बारे में जानना जरूरी है जिन्होंने कतई परवाह न की कि उन्हें जाना जाए या उनके बारे में लिखा जाए.”
निखिल का कहना है कि “जिम्मेदारी का भार” इन चार मुख्य पात्रों में से भुवन अभिनीत बोस के कंधों पर है. वे कहते हैं, “वह जानना चाहता है कि ‘क्या मैं सही कर रहा हूं? इससे कुछ हासिल होगा?’ उसके पास कोई योजना नहीं, पर उसके पास बंदूकें और जान देने को तैयार लोग हैं.”
निखिल ने शो को भव्य बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. अदाकार बताते हैं कि भुवन उस सेट पर एक बार खो गया जिसमें बनारस, बंगाल, देहरादून समाए थे और जिसमें ट्राम और हवाई जहाज भी था.
निखिल मानते हैं कि इस शो के साथ उन्होंने भारत के बुनियादी इतिहास के बारे में अपने हिस्से की कहानियां सुना दी हैं. वे कहते हैं, “मैं 55 का हूं. मैं चाहता हूं कि मेरी बेटी उस सबको सम्मान से देखे जो मैं बना रहा हूं. मैं स्वतंत्र सिनेमा के लिए अपना थोड़ा-बहुत योगदान देना चाहता हूं.”
अगर द रिवोल्यूशनरीज दिलों को छूती है तो कौन जाने निखिल और उनकी तरह के लेखक इतिहास के भरपूर खजाने में फिर गोता लगाने निकल पड़ें. वहां जानने-बताने को आखिरकार इतना कुछ जो है.