नई लहर पर सवार भारत
एक प्रतिस्पर्धी खेल के तौर पर सर्फिंग ने भले ही भारत में महज एक दशक का सफर पूरा किया हो, लेकिन इस साल के एशियाई खेलों में उसके एथलीट इस विधा में धूम मचाने को तैयार

एशियाई खेलों के लिए चुनी गई टीम के सदस्य किशोर कुमार कर्नाटक के तन्नीरभावी बीच पर
मई के आखिर में एक गर्म और उमस भरे दिन कर्नाटक में मंगलूरू के तन्नीरभावी तट का नजारा खासा सुहाना था. हालांकि दो अलग-अलग माहौल एक दूसरे से जैसे होड़ कर रहे थे. तट के एक तरफ खुश और चहकते सैलानियों का झुंड पानी में अठखेलियां करते हुए परिवार और दोस्तों के साथ छुट्टियां बिता रहा था.
दूसरी तरफ वेटसूट पहने और फौलादी हाव-भाव से भरे युवाओं की कतार सर्फ बोर्ड पर शाही अंदाज में लहरों पर नजरें गड़ाए थी. सर्फिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआइ) की ज्यूरी के सामने उसे अपने पैंतरे और हुनर दिखाने के लिए माकूल मौके का इंतजार था.
यह इंडियन ओपन ऑफ सर्फिंग का सातवां संस्करण था मगर इस साल दांव ज्यादा ऊंचे थे क्योंकि नतीजों से तय होना था कि सितंबर में एशियाई खेलों के लिए जापान कौन जाएगा. कुल 50 से ज्यादा उम्मीदवारों में से दो पुरुष और दो महिलाओं को टूर्नामेंट के लिए चुना जाना था जहां सर्फिंग खेल पहली बार होने जा रहा है. ओलंपिक में यह खेल 2020 से शामिल किया गया है.
महीने भर बाद एसएफआइ ने नामों की तस्दीक कर दी. टीम में हालांकि पूर्वी तट (तमिलनाडु) के सर्फरों के गुट का दबदबा है, जिन्होंने पश्चिमी तट (कर्नाटक) के अपने पुराने प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़ दिया, लेकिन इस तट पर मुकाबला करने वाले सभी सर्फरों की कहानी में एक बात समान है और वह है उनकी शुरुआत: तट के किनारे रहने वाले बच्चे और पानी से उनकी शुरुआती घबराहट; तैरना सीखने और धीरे-धीरे लहरों को समझने के साथ समुद्र से बना उनका रिश्ता; लहरों पर रपटने और उनके साथ ऊपर-नीचे होने का हर्षोल्लास, फिर भले ही वह कुछ सेकंड के लिए ही हो.
तमिलनाडु के महाबलीपुरम की 16 वर्षीया बेहद होनहार लड़की कमाली मूर्ति ने टीम में जगह बनाई. चार बरस की उम्र में सर्फिंग शुरू करने वाली यह लड़की पानी में सहज रहने के लिए जानी जाती है और महिलाओं की और अंडर-18 दोनों प्रतिस्पर्धाएं जीत चुकी है. वे कहती हैं, “मुझे सागर पर भरोसा है. अगर उसे मुझसे कुछ लेना भी है तो मैं उसे लेने देती हूं क्योंकि वह जाता तो सागर में ही है.”
सर्फबोर्ड के साथ शुरुआत
प्रतिस्पर्धी खेल के तौर पर सर्फिंग को भारत में कुछ ही दशक हुए हैं, लेकिन मूर्ति उस बढ़ते जत्थे का हिस्सा हैं जो विश्वस्तरीय चुस्ती और जोश के साथ लहरों पर सवारी करना सीख रहा है. उनके संगी-साथी ज्यादातर दक्षिणी भारत के हैं, फिर भी एसएफआइ को यकीन है कि एशियाई खेलों में भारतीय सर्फरों को मुकाबला करते देखना ऐसा गेमचेंजर हो सकता है जिससे देश भर में इसके प्रति रुचि बढ़ेगी.
मेडल इस काम में बहुत मददगार हो सकता है. अलबत्ता यह मुश्किल काम है क्योंकि जापान और इंडोनेशिया दोनों में इस खेल का समृद्ध इतिहास रहा है और उनके यहां एथलीटों के प्रशिक्षण के लिए बेहतर लहरें भी हैं. लेकिन कौन जानता है? भारत में और भी प्रतिस्पर्धाएं होने वाली हैं. अंडमान द्वीपसमूह में पहली प्रतिस्पर्धा अप्रैल में हुई. पूरे तटीय देश में फैला सर्फिंग समुदाय अब शायद महज कपोल कल्पना न रह जाए.
भारत में सर्फिंग को लाने का श्रेय किसे दिया जाए, इस पर सभी एकमत हैं स्थानीय हलकों में सर्फिंग स्वामी के नाम से मशहूर जैक हेबनर अमेरिकी अध्यात्मवादी थे, जो 1970 के दशक में भारत आए और 2020 में निधन तक चार दशक से ज्यादा वक्त यहीं रहे. फ्लोरिडा में किशोर वय से ही वे सर्फिंग के दीवाने थे. मैसूर के पास अपने आश्रम से वे रोड ट्रिप पर निकल जाते और संयोगवश 2000 के दशक के शुरुआती सालों में कर्नाटक के मुल्की पहुंच गए.
यह अपने शिष्यों का इस खेल से परिचय करवाने के लिए आदर्श तटीय कस्बा था. महाबलीपुरम में उन्होंने लड़कों को लहरों पर सर्फिंग सिखाना शुरू किया और 2004 में मुल्की में मंत्रा सर्फ क्लब बनाया.
कर्नाटक के मुल्की और पनाम्बुर तटों के बीच सर्फिंग सीख रहे बच्चों की मदद करने वाले सर्फिंग स्वामी फाउंडेशन के चेयरमैन और कारोबारी धनंजय शेट्टी कहते हैं, “भारत में सर्फिंग में किसी की दिलचस्पी नहीं थी. मुल्की के बच्चों ने यह खेल पहले देखा नहीं था. स्वामीजी इसे अलग ही स्तर पर ले गए.” मंत्रा सर्फ क्लब के संस्थापकों ने 2011 में सर्फिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया शुरू किया.
रिजर्व खिलाड़ी के तौर पर एशियाई खेलों में जा रहे 25 वर्षीय रमेश बुदिहाल के मुताबिक, भारत के पूर्वी तटों पर आज पहले से ज्यादा सर्फर और मौके हैं. पिछले साल एशियाई सर्फिंग चैंपियनशिप में उन्होंने कांस्य पदक जीता, जिसने इस खेल को बहुत बढ़ावा दिया और साबित किया कि एसएफआइ की कोशिशें रंग ला रही हैं.
कर्नाटक के हुबली और केरल के कोवलम में अपनी जड़ें होने का जिक्र करते हुए वे कहते हैं, “पश्चिमी हिस्से में रफ्तार जरा धीमी है, लेकिन और ज्यादा ग्रोम्स (सर्फिंग की भाषा में जूनियर) को आते देखना अच्छा है.” मुल्की ने भी भारत के पश्चिमी तट की सर्फिंग राजधानी होने की प्रतिष्ठा हासिल कर ली है. यहां एक्वेटिक इंडिका, मम्बो जम्बो और कयाकबॉय सरीखे सर्फ स्कूल ससिहित्लू बीच पर नई पीढ़ी को सर्फिंग सिखा रहे हैं.
सर्फरों को पैडल मारते हुए समुद्र में दूर जाकर गायब होते और फिर बोर्ड पर उभरते देखना जितना रोमांचक और आनंददायक है उतना ही चिंता और घबराहट पैदा करने वाला भी. रिजर्व के तौर पर एशियाई खेलों में जा रहे एक और सर्फर और कई भारतीय सर्फरों की तरह मछुआरों के परिवार से आए 21 वर्षीय श्रीकांत कहते हैं, “लहर को पकड़ना और उस पर सवारी गांठना पानी पर उड़ने की तरह है. यह कुदरत के साथ एक होने की तरह है.”
गोवा की 21 वर्षीया शुगर शांति बनारसे महिलाओं की टीम में हैं. उनका कहना है कि इस खेल ने उन्हें अपने शर्मीले स्वभाव से उबरने में मदद की और उनके भीतर आत्मविश्वास का संचार किया.
गोवा के आश्वेम में सर्फ स्कूल चला रही घुंघराले बालों वाली इस सर्फर को इस खेल के साथ आने वाली जीवनशैली भी खूब भाती है—यात्राएं करना, नई-नई जगहों की तलाश करना और इतने ही जुनूनी लोगों से मिलना. वे कहती हैं, “यह विशाल समुदाय है. हमारे बीच प्यार और मौजमस्ती की तरंगों का रिश्ता है. पानी में उतरते ही हम प्रतिस्पर्धी हो जाते हैं (लेकिन जमीन पर) साथ मिलकर घूमते-फिरते, बातें करते और सीखते हैं.”
आगे की मुश्किलें
मगर सर्फिंग का खेल जितना मजेदार है उतना ही महंगा भी. ज्यादातर साजोसामान अब भी आयात किया जाता है और भारत के अधिकांश सर्फर सर्फ स्कूल से उधार लिए या साझा किए गए बोर्ड पर अपने जुनून की शुरुआत करते हैं.
बोर्ड की कीमत 55,000 रुपए से ऊपर होती है और अपना बोर्ड होना लग्जरी ही है. सर्फिंग की ऐसी जगहें ढूंढना भी आसान नहीं जहां सवारी करने के लिए लहरें अच्छी और ऊंची उठती हों.
सर्फिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया के वाइस प्रेसिडेंट राममोहन परांजपे कहते हैं, “सर्फिंग में हमें एक के बाद दूसरी लहरों से एक्सपोजर की जरूरत होती है. और बात सिर्फ लहरों की नहीं, बात प्रतिस्पर्धी माहौल और बेहतरीन से बेहतरीन सर्फरों का साथ और यह देखने की भी है कि वे क्या कर रहे हैं.”
यह सर्फिंग सरीखे खेल के बारे में खास तौर पर सच है, जो भारत का देशज खेल नहीं. मूर्ति के तमिलनाडु के साथी और कोवेलाँग के रहने वाले 18 वर्षीय किशोर कुमार ने इस साल की इंडियन ओपन ऑफ सर्फिंग में पुरुष वर्ग का खिताब जीता और एशियाई खेलों के लिए जा रहे हैं.
वे पेशेवर सर्फर होने का सपना देखते हैं, यानी ऐसा सर्फर जो विश्व सर्फिंग लीग में मुकाबला करे और ओलंपिक में भारत की नुमाइंदगी करे. मूर्ति और बुदिहाल के साथ वे उस पहली पीढ़ी का हिस्सा हैं जो बाली और श्रीलंका में आयोजित प्रशिक्षण शिविरों में और साथ ही ऑस्ट्रेलिया, ताइवान और मालदीव के टूर्नामेंटों में मुकाबला करने जा रही है. परांजपे कहते हैं, “प्रतिभाएं तो यहां थीं ही, हम बस उन्हें एक्सपोजर दे रहे हैं. पहले हम श्रीलंका और मालदीव को देखकर हैरान रह जाया करते थे, जहां भारत से कहीं बेहतर और लगातार उठती लहरें हैं. मगर आज हम उन्हें मात दे रहे हैं.”
बनारसे भी एशियाई खेलों को महिलाओं की सर्फिंग के फलक में सुधार का बेहद जरूरी प्रोत्साहन मानती हैं. महिलाओं के बीच प्रतिस्पर्धा अब भी कम है. चोट लगने, डूबने और रंग सांवला पड़ने के डर से माता-पिता अपनी बेटियों को यह खेल अपनाने से रोक रहे हैं.
मूर्ति कहती हैं, “मैंने जब सर्फिंग शुरू की तो मेरी मां को खासे विरोध का सामना करना पड़ा. यहां तक कि मेरे रिश्तेदार भी नहीं चाहते थे कि मैं सर्फिंग करूं. ‘उसे कुछ हो गया तो !’ सरीखे तमाम सवाल किए जाते.” मगर उन्हें और बनारसे को जापान में लहरों पर बेधड़क सवारी गांठते देखना भारतीय सर्फिंग के लिए शायद आश्चर्य और वाहवाही भरा पल हो सकता है. बनारसे कहती हैं, “इससे हमें बहुत सारा अनुभव मिलता है और मौके भी. लड़कियों को फिलहाल इसी की जरूरत है.”
तन्नीरभावी तट पर इस साल सबसे जबरदस्त वाहवाही स्थानीय लोगों के पसंदीदा सर्फर 16 वर्षीय प्रदीप पुजार को मिलीं, जो प्रतिस्पर्धा में जीत हासिल करने वाले मुल्की के पहले लड़के हैं. उन्होंने अंडर-18 वर्ग का खिताब जीता. साथ ही वे इंडियन ओपन में पश्चिमी तट के अकेले विजेता थे. तीन दिनों की इस प्रतिस्पर्धा के दौरान उन्होंने उस इलाके को भी जश्न मनाने का मौका दिया जिसे कमतर प्रतिनिधित्व हासिल है.
मुल्की के एक्वेटिका इंडिका सर्फ स्कूल के शिष्य पुजार ने कर्नाटक के ससिहित्लू तट की लहरों पर सवारी करके तकनीकी हुनर हासिल किया. शायद वे भारत में इस खेल की विनम्र शुरुआत की नुमाइंदगी करते हैं, जिसे चमक-दमक और शोहरत के लिए नहीं, बल्कि लहरों की मौज और समुद्र के साथ एकमेक होने के आदिम आनंद के लिए खेला जाता है.