अपनी जमीन के लिए आसमानी जंग
अच्छे-खासे शोध-अनुसंधान के बाद तैयार नेटफ्लिक्स की नई वेबसीरीज ऑपरेशन सफेद सागर करगिल युद्ध में भारतीय वायु सेना के साहसिक कारनामों पर केंद्रित है

(दाएं से क्रमशः) स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा बने सिद्धार्थ, विंग कमांडर बी.एस. धनोआ बने जिमी शेरगिल और ग्रुप कैप्टन अरविंद ओक के किरदार में के.सी. शंकर
युद्ध की कहानियों पर केंद्रित ऐक्शन ड्रामे दर्शकों को हमेशा से लुभाते रहे हैं. जब बात बहादुरी और जज्बे की सच्ची कहानियों की हो तो रोमांच दोगुना हो जाता है. भारतीय सेना की बात करें तो दो अंगों—वायु सेना और नौसेना—को रुपहले पर्दे पर सुर्खियों में आने का मौका कम ही मिला है. बड़े पर्दे पर कभी मौका मिला भी तो ऐसी कहानियां बॉक्स ऑफिस पर कमाल नहीं दिखा पाईं. मसलन, हाल में आईं हवाई ऐक्शन फिल्में तेजस (2023) और फाइटर (2024).
अब नेटफ्लिक्स की ऑपरेशन सफेद सागर 1999 के करगिल युद्ध के दौरान दुर्गम ऊंचाई वाले इलाकों में भारतीय वायु सेना (आइएएफ) के जवानों की वीरता की कहानियों को छोटे पर्दे पर लाकर यह कमी दूर कर रही है.
इस प्लेटफॉर्म के लिए छह एपिसोड की यह सीरीज हीरामंडी (2024) की तरह बेहद अहम प्रोजेक्ट है. प्रोजेक्ट काफी बड़ा होने के अलावा निर्माताओं ने हिम्मत दिखाई है और कहानियों को नई ताजगी के साथ पेश किया गया है.
नेटफ्लिक्स इंडिया की सीरीज हेड तान्या बामी कहती हैं, “सफेद सागर हाल के दिनों का वायु सेना का सबसे अहम अध्याय है. उनकी ऐतिहासिक जीत के किस्से लोगों तक पहुंचने चाहिए. यह हमारे लिए बेहद खास है, इसलिए भी कि यह नेटफ्लिक्स के भारत में दस साल पूरे होने के मौके पर आ रही है.”
बामी आश्वस्त करती हैं कि यह शो ‘‘आपको अधिकारियों की जिंदगी और उनके सामने आने वाली चुनौतियों को बहुत बारीकी से बताएगा.” वायु सेना के सहयोग से बनी इस सीरीज को बामी एक ऐसा प्रोजेक्ट करार देती हैं, जिसमें कहानी कहने में “जिम्मेदारी और सम्मान” के साथ-साथ “जुनून” भी बहुत मायने रखता है.
इन बारीक पहलुओं को सामने लाने का श्रेय सह-निर्माता और लेखक अभिजीत सिंह परमार को जाता है, जिन्होंने पूर्व वायु सेना अधिकारी कुशल श्रीवास्तव के साथ मिलकर इस मिशन की अहमियत समझने के लिए 50-60 वायु सेना कर्मियों से मुलाकात की और कई वर्ष शोध में लगाए. बामी कहती हैं, “डीटेल्स और प्रामाणिकता को सबसे आगे रखा गया.
उन घाटियों की चौड़ाई तक का ध्यान रखा गया जिनके बीच से विमानों को उड़ना था.” इसमें प्रोडक्शन डिजाइन टीम ने हाइड्रोलिक रिग्स पर कॉकपिट के एकदम असली जैसे ढांचे बनाए, जहां वायु सेना के पायलटों ने कलाकारों को उनके अंदर बैठने और गतिविधियों का प्रशिक्षण दिया.
संवाद के मामले में भी बारीकियों पर पूरा ध्यान दिया गया, जिनमें वायु सेना की शब्दावली का इस्तेमाल किया गया है. परमार कहते हैं, “इसे स्वाभाविक और असली लगना चाहिए. उनके बात करने के खास तरीके को बदले बिना यह बात पहुंचानी थी कि क्या कहा जा रहा है.”
वायु सेना ने ऑपरेशन की बारीकियां ही साझा नहीं कीं, शूटिंग के लिए अपने स्टेशन भी क्रू के लिए खोल दिए और लैंडिंग, टेक-ऑफ के दृश्यों के लिए अपने पायलटों से मिग-21 उड़वाए. निर्देशक ओनी सेन और सिनेमाटोग्राफर सेतु को राजस्थान के नाल एअर फोर्स स्टेशन तक मिली इस पहुंच का एहसास अद्भुत था, जिसने उन्हें विमानों के साथ शूट करने में सक्षम बनाया.
भूगोल को सही ढंग से दर्शाने के लिए करगिल की चोटियों के बीच की ऊंचाई और दूरी मापने के बाद सेन और सेतु ने हिमाचल प्रदेश के स्पीति स्थित शिंकुला और बारालाचा में शूटिंग की.
अभियान की विशालता और युद्ध की रणनीति तो सीरीज का अभिन्न हिस्सा हैं ही, असुर सीरीज के लिए ख्यात सेन वर्दीधारी जवानों की मानवीय कहानियों पर जोर देने को भी खासे उत्सुक थेः ‘‘हमने उनके आपसी जुड़ाव, दोस्ती और रिश्तों को पूरी स्वाभाविकता के साथ दिखाने की कोशिश की है.” लेकिन क्या वायु सेना उस रचनात्मक छूट के लिए तैयार थी जो शो को आकर्षक बनाने के लिए जरूरी थी?
परमार मुस्कुराते हुए कहते हैं, “उन्हें सब पता है कि वे क्या देख रहे हैं. वे ड्रामा समझते हैं. उनके पास कुछ ऐसे सुझाव थे जो इतने नाटकीय थे कि हमने उन्हें शो में शामिल ही नहीं किया, वह कल्पना से भी परे लगता.” सेन बताते हैं कि वायु सैनिक एक-दूसरे की टांग खिंचाई के लिए जिस तरह मजाक करते हैं, वह इतने क्रिएटिव होते हैं कि शो में उनका इस्तेमाल ही नहीं किया जा सका.
ऑपरेशन सफेद सागर सीरीज करगिल युद्ध के मामले में घुमा-फिराकर बात नहीं करती. इसमें सीमा पार भारत के दुश्मनों के असली नामों का इस्तेमाल किया गया है और उस धोखे को भी उजागर किया गया है जिसके कारण दो महीने तक यह संघर्ष चला. यह एक साहसिक कदम है, जो शो को ज्यादा प्रभावशाली बनाता है.
निर्माताओं के लिए यह सब तथ्यों पर आधारित युद्ध का सटीक ब्योरा पेश करने के मकसद से किया गया है. बामी कहती हैं, “जब वायु सेना की ओर से असली नामों का इस्तेमाल किया जा रहा हो, तो पूरी कहानी में बहुत कुछ एक सूत्र में जुड़ा होना लाजिमी है.” कहते हैं ना कि सच कड़वा होता है.