अनकही कहानियां

फिल्मकार मेघा रामास्वामी ने जियोहॉटस्टार पर दिखाई जा रही अपनी डॉक्यूमेंटरी सीरीज 'वॉइसेज ऑफ द लैंड' में पूर्वोत्तर भारत के देशज समुदायों की बुद्धिमत्ता और जीती-जागती परंपराओं को पकड़ा है.

documentary 
वॉइसेज ऑफ द लैंड के होस्ट और नैरेटर अभिनेता आदर्श गौरव

दीपा नटराजन लोबो

फिल्मकार मेघा रामास्वामी बचपन से ही स्टोरीटेलिंग की कला से मंत्रमुग्ध थीं. बस तब माध्यम अलग था. वे याद करती हैं, “उस वक्त मैं नॉवेलिस्ट या पोएट बनना चाहती थी.” भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (एफटीआइआइ) ने जब पहली बार स्क्रीनराइटिंग का कोर्स शुरू किया, तब उन्हें लेखन और सिनेमा के प्रति अपने लगाव को एक साथ जोड़ने का रास्ता मिला.

वे प्रसिद्ध पटकथा लेखक सूनी तारापोरवाला और फिल्मकार सई परांजपे को अपनी सबसे बड़ी प्रेरणाओं में मानती हैं. 

कहानी कहने का यही अंदाज उनके नए प्रोजेक्ट वॉइसेज ऑफ द लैंड की पहचान है जो इस समय जियोहॉटस्टार पर स्ट्रीम हो रही है. छह एपिसोड की यह सीरीज पूर्वोत्तर भारत के जंगलों, पहाड़ों और नदी घाटियों की यात्रा कर वहां रह रहे देश के कुछ सबसे पुराने आदिवासी समुदायों के जीवन, परंपराओं और प्रकृति को करीब से दिखाती है.

रामास्वामी कहती हैं, “जो सीधी-सपाट खोजी सीरीज की तरह शुरू हुआ था, वह धीरे-धीरे धैर्य और सम्मान से चीजों को देखने-समझने वाली चीज की तरह विकसित होता चला गया.”

शोध के दौरान जब टीम दूरदराज के आदिवासी समुदायों के बीच पहुंची तो उद्देश्य सिर्फ लोगों का जीवन रिकॉर्ड करना नहीं रहा बल्कि इन समुदायों की प्रतिभाओं के साथ मिलकर काम करने और ईमानदारी से कहानी कहने पर आ गया. वे कहती हैं, “हम उनकी प्राचीन संस्कृतियों और प्रथाओं को अजीब या अनोखा दिखाए बिना उनके संसार को सचाई और सम्मान से दिखाना चाहते थे.”

रामास्वामी को उम्मीद है कि वॉइसेज ऑफ द लैंड देखने के बाद लोग पूर्वोत्तर भारत को लेकर बनी धारणाओं और पूर्वाग्रहों से आगे बढ़ेंगे. वे कहती हैं, “लोग पूर्वोत्तर भारत को ज्यादा जिज्ञासा, खुले मन और सम्मान के साथ देखें.”

वे उम्मीद करती हैं कि पर्यटक आदिवासी समुदायों से प्रकृति संरक्षण का महत्व सीखें और उन नाजुक प्राकृतिक इलाकों के प्रति अधिक संवेदनशील और जिम्मेदार बनें, जिन्हें ये अपना घर मानते हैं.

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