अब एक लहर पूर्वोत्तर से
देश के इस दुर्गम इलाके में बनने वाली दमदार फिल्मों को अब जाकर उस तरह की तवज्जो मिल रही, जिसकी वे हकदार रही हैं, देश में भी और दुनिया के दूसरे मंचों पर भी. उनके लिए फंडिंग की रुकावटें भी दूर हो रहीं

त्रिवेणी राई की पहली फीचर फिल्म शेप ऑफ मोमो (सिक्किम)
त्रिवेणी राई बचपन से यही सोचते बड़ी हुईं कि चाहे छोटा परदा हो या बड़ा, किसी पर भी उनकी तरह दिखने वाले लोग क्यों नजर नहीं आते भला! सिक्किम के ननडोक गांव के कई घरों की तरह राई के परिवार ने केबल कनेक्शन 2007 में उस वक्त लिया जब दार्जिलिंग के प्रशांत तमांग इंडियन आइडल में आए. फिर भी सिक्किमिया फिल्मों के बारे में राई बहुत कम जानती थीं. वे याद करती हैं कि गंगटोक के सिंगल स्क्रीन वाले दो सिनेमाघरों में उन्होंने महज दो नेपाली फिल्में देखी थीं.
नतीजा यह हुआ कि सत्यजित राय फिल्म ऐंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एसआरएफटीआइ) की इस पूर्व छात्रा ने कुछ साल पहले जब शेप ऑफ मोमो लिखना शुरू किया, तो उसका मुख्य पात्र ऐसा रखना पक्का किया, जिससे वे जुड़ सकें. उनके शब्दों में, ''हम अक्सर शिकायतें करते हैं कि हमें परदे पर कितना गलत ढंग से या कम दिखाया जा रहा है. अगर तुम अपनी कहानी के हीरो बनना चाहते हो, तो उसकी कमान अपने हाथ में लो. अगर तुम बदलाव चाहते हो, तो तुम्हें खुद लाना पड़ेगा.''
राणा डग्गूबती की स्पिरिट मीडिया ने शेप ऑफ मोमो 29 मई को भारत भर के 15 शहरों में रिलीज की. इनमें महानगरों के अलावा दार्जिलिंग, कलिम्पोंग (पश्चिम बंगाल) और नामची (सिक्किम) सरीखे नेपालीभाषी केंद्र भी शामिल थे. फिल्म की पृष्ठभूमि ननडोक की है और मुख्य लोकेशन है राई का पारिवारिक घर. वाहवाही बटोरने वाली इस फिल्म में तीसेक साल की एक महिला का दमदार किरदार उकेरा गया है, जो दिल्ली में वक्त बिताने और जिसे वह पितृसत्तात्मक दुनिया मानती है उसमें फिट बैठने की जद्दोजहद के बाद अपने पैतृक घर लौटती है.
मगर शेप ऑफ मोमो इस साल देश का ध्यान खींचने वाली पूर्वोत्तर की अकेली फिल्म नहीं है. लक्ष्मीप्रिया देवी की मणिपुरी फिल्म बूंग भी इस साल बाफ्टा (द ब्रिटिश एकेडमी फिल्म अवार्ड्स) का अवार्ड जीतने के बाद पूरे भारत में दोबारा रिलीज हुई. यह एक मैतेयी लड़के (जिसे कुकी-जो अभिनेता गुगुन किपगेन ने पर्दे पर जिया) की कहानी है जो अपने लापता पिता की खोज में म्यांमार जाता है.
लंदन में अवार्ड जीतने के बाद देवी ने कहा, ''यहां तक चलकर आना उस पहाड़ की चोटी पर पहुंचने के लिए आखिरी कुछ कदम चढ़ने की तरह लगा जिसके बारे में हमें पता तक नहीं था कि हम यह पहाड़ चढ़ रहे हैं. बूंग की जड़ें उस जगह में हैं जो न केवल बहुत अशांत है, (बल्कि) भारत में बहुत उपेक्षित और प्रतिनिधित्व से वंचित (भी) है.''
अगर कोई पैटर्न है तो वह यह कि पूर्वोत्तर अपनी आवाज सुनवा रहा है. राय और देवी उन कई फिल्मकारों में हैं जो पर्याप्त प्रतिनिधित्व से वंचित इन राज्यों की फिल्में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय नक्शे पर ला रहे हैं. अभी फरवरी में पूर्वोत्तर की एक और फिल्म नॉट अ हीरो को बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में स्पेशल मेंशन मिला. यह एक लड़के की कहानी है, जो शहर की चहल-पहल से अपने पूर्वजों के अनोखे गांव चला जाता है. निर्देशिका रीमा दास फिल्म फेस्टिवलों की चहेती हैं. असम के बेचैन युवाओं पर बनीं उनकी फिल्में दुनिया भर की सैर कर रही हैं. ये फिल्मकार पूर्वोत्तर की होनहार और स्वंतत्र आवाजों के उस लश्कर की नुमाइंदगी कर रहे हैं जो न केवल अपने दर्शकों का परिचय पूर्वोत्तर के राज्यों के खूबसूरत नजारों से करवा रहा है, बल्कि स्थानीय रहन-सहन की असलियत में झांकने का मौका दे रहा है.
आगे की कठिन राह
अपनी फिल्म के लिए धन जुटाना और उसे डिस्ट्रीब्यूट कर पाना इलाके के स्वतंत्र फिल्मकारों के लिए अब भी चुनौती बना हुआ है. उनकी पीठ पर बड़े स्टूडियोज का हाथ तो वैसे भी नहीं है, मनोरंजन का उनका पारिस्थितिकी तंत्र भी बॉलीवुड और दक्षिण के मुकाबले छोटा और कमजोर है. शेप ऑफ मोमो के लिए धन जुटाने की खातिर राई अपनी मां के रिटायरमेंट फंड और फ्रीलांस फिल्मकार के तौर पर की गई बचत के आसरे थीं.
तीसेक की उम्र के डॉक्टर और पीएचडी के छात्र के बीच गैरपारंपरिक रिश्ते की कहानी आमिष (2019) से मशहूर असम के भास्कर हजारिका की अपनी कंपनी मेटानॉर्मल पिक्चर्स है. उन्हें लगता है कि फिल्मकारों के वास्ते अनुकूल माहौल बनाने के लिए पूर्वोत्तर की सरकारों को और ज्यादा कोशिशें करनी चाहिए. बकौल भास्कर, ''सिनेमा हमेशा सबसे मजबूत सॉफ्ट पावर में से एक रहा है. वक्त आ गया है कि सरकार इसे पहचाने.''
मेघालय के डोमिनिक संगमा की निर्देशित फिल्म रैप्चर के साथ जो हुआ, वह बताता है कि इस इलाके की फिल्मों को किस किस्म की उपेक्षा का सामना करना पड़ता है. गारो भाषा की इस फिल्म में बच्चों के गायब होने के बाद डर में जकड़े गांव की कहानी है. फिल्म फ्रांस के 100 से ज्यादा सिनेमाघरों में 2024 में रिलीज हुई, लेकिन अपने देश में इसे एक सिनेमाघर तक नसीब न हुआ.
लिहाजा संगमा और उनकी एक प्रोड्यूसर ईवा गुन्मे आर. मारक ने मेघालय के तुरा में 800 सीटों का बहुउद्देश्यीय हॉल किराए पर लेकर दर्शक जुटाने का बीड़ा उठाया. संगमा कहते हैं, ''हम स्कूलों और कॉलेजों में गए, प्रिंसिपल से बात की, और छूट देकर छात्रों को फिल्म देखने आने के लिए प्रोत्साहित किया. हम दिन में तीन शो करते. सभागार तीन हफ्तों तक भरा रहा.''
रैप्चर अभी हेलोमेघालय.कॉम पर स्ट्रीम की जा रही है, जो सिनेमा को मंच देने के लिए सरकार की पहल है. प्रदीप कुरबाह एक और फिल्मकार हैं जिनकी फिल्म इस पर दिखाई जा रही है. मगर इसका मुख्यधारा की तवज्जो पाने का सफर मुश्किल था. संगमा कहते हैं, ''जब हम किसी बड़े स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म से संपर्क करते हैं, तो हमें कहा जाता कि भारत की बहुत छोटी जगह की फिल्म दिखाने पर उसके लिए भला कितने लोग सब्स्क्रिप्शन लेंगे. उन्हें हमारी जैसी फिल्मों की मदद करनी चाहिए, खासकर जब उनके पास पैसा कमाकर देने वाली दूसरी फिल्में हैं.''
बदलनी होगी व्यवस्था
पर संगमा खुशकिस्मत हैं: ''रैप्चर की रिलीज को मिसाल की तरह पेश किया जा रहा है कि स्वतंत्र कला फिल्में भारत में कैसे दिखाई जा सकती हैं.'' वे फिलहाल एसआरएफटीआइ की देखरेख में चल रहे भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान के नए ईटानगर केंद्र में स्क्रीनराइटिंग विभाग के प्रमुख हैं. उन्हें ईवा और चीन के शू जिआनशांग सरीखे भरोसेमंद परोपकारी मिले. लेकिन मणिपुर के हाओबम पवन कुमार सरीखे फिल्मकार भी हैं जिनकी दो फीचर फिल्में—नाइन हिल्स वन वैली और जोसफ्स सन—स्ट्रीमिंग के लिए उपलब्ध नहीं.
इन्हें बनाने के लिए उन्होंने अपनी पत्नी और राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम की शरण ली. एसआरएफटीआइ से स्नातक कुमार कहते हैं, ''दिल्ली में मुझे एहसास हुआ कि काफी लोग हमारे (मणिपुर के) बारे में नहीं जानते. मैं मणिपुर की कहानियां दुनिया को सुनाना चाहता था.''
शेप ऑफ मोमो से फिल्म फेस्टिवलों में धूम मचा रही राई उम्मीद करती हैं कि भारत के सिनेमाघरों में इसके रिलीज होने से पूर्वोत्तर के उन फिल्मकारों को बढ़ावा मिलेगा जो अपना काम यहां दिखाना चाहते हैं. वे कहती हैं, ''हम इतनी विविधताओं भरे हैं और लोग सभी तरह की फिल्म देखते हैं. इतना बड़ा देश है, हम साथ रह सकते हैं. लेकिन स्पेस बनाना है.'' राई को अपने अगले काम के बारे में नहीं पता लेकिन इतना पता है कि उसकी पृष्ठभूमि में उनका गांव ही होगा. वे कहती हैं, ''लोग कहते हैं, सिक्किम इतना खूबसूरत है, तुम दूसरी जगहों पर शूट क्यों नहीं करतीं? मैं यहां रहती हूं. इसलिए मेरे पास दूसरा विकल्प नहीं है.''
अलबत्ता पूर्वोत्तर की मौजूदा फिल्मों को मणिपुर के जाने-माने फिल्मकार अरिबाम स्याम शर्मा की ईशानौ के रिकॉर्ड को पार करना होगा, जो 1991 में कान की अन सर्टन रिगार्ड श्रेणी में प्रतिस्पर्धी फिल्म थी. आंख से परेशान और कलाओं में सुकून खोज रही महिला की यह कहानी इस प्रतिष्ठित फिल्म समारोह में पहुंचने वाली पूर्वोत्तर की अकेली फिल्म है. इस इलाके में प्रतिभाओं के बढ़ते ज्वार को देखकर कह पाना मुश्किल है कि कौन इस कामयाबी को दोहराएगा.
नॉर्थ ईस्ट की कुछ पॉपुलर फिल्में -
शेप ऑफ मोमो (सिक्किम)
त्रिवेणी राई की आत्मविश्वास से भरी पहली फीचर फिल्म इस बात का सबूत है कि निजी अनुभव भी सबके साझा अनुभव बन सकते हैं. महिला रिश्तों की गहरी पड़ताल और पितृसत्ता के खिलाफ एक महिला की खामोश बगावत के चित्रण के जरिए राय यह भी दिखाती हैं कि सिक्किम का परिदृश्य कैसे बदल रहा.
बूंग (मणिपुर)
लक्ष्मीप्रिया देवी की असरदार ड्रामा फिल्म एक ऐसे बच्चे पर केंद्रित है, जिसके लिए आप अपने आप दुआ करने लगते हैं. बूंग के अपने पिता की तलाश के उपक्रम के जरिए देवी मणिपुरी समाज की कठोर सचाइयों को सामने लाती हैं, फिर भी यह दिखाने में कामयाब रहती हैं कि उथल-पुथल के बीच भी उम्मीद की वजह हमेशा बची रहती है.
द एलीसियन फील्ड (मेघालय)
प्रदीप कुरबाह की पिछले साल आई अवार्ड विजेता ड्रामा फिल्म 2047 में दूरदराज के गांव लइतदुह में घट रही कहानी है, जहां ज्यादातर लोगों के पलायन के बाद मात्र छह ग्रामीण बचे हैं. खासी सिनेमा के पथप्रदर्शकों में से एक कुरबाह की दिल को छू लेने वाली यह फिल्म तेजी से बदलती दुनिया में समुदाय की अहमियत पर बल देती है
जोसेफ्स सन (मणिपुर)
यह अपने बेटे को खोज रहे पिता की कहानी है, जो संभवत: बेटे के शव की पहचान के लिए इंफाल की बेचैनी भरी यात्रा करता है. राज्य की कई भाषाओं के साथ हाओबम पवन कुमार की 2023 की यह ड्रामा फिल्म जातीय संघर्ष से त्रस्त इलाके का तनाव से भरा आख्यान रचती है.
नॉट अ हीरो (असम)
कई हुनरों में महारत रखने वाली फिल्मकार रीमा दास की इसी साल रिलीज नवीनतम फिल्म शहर में पले-बढ़े लड़के की कहानी है जिसे अपनी बुआ के साथ रहने के लिए पैतृक गांव भेज दिया जाता है. फिल्म कुदरत के कई करिश्मे, ग्रामीण जिंदगी का ठहराव और सादगी, और एक बच्चे का बड़ा होना पर्दे पर रचती है, जिसने बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में स्पेशल मेंशन अवार्ड जीता.