एआइ का खतरा

रक्षा से लेकर बुनियादी ढांचे तक हमारी तमाम प्रणालियों में एआइ के शामिल होने के साथ स्वायत्त एजेंट सुरक्षा उपायों के बिना भारी तबाही मचा सकते हैं. इस संभावना से निबटते हुए इसकी क्षमता का फायदा उठाने के लिए भारत को क्या करना होगा

इलस्ट्रेशन नीलांजन दास / एआइ

आम आदमी के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) की दुनिया में हो रही घटनाओं पर यकीन न कर पाना स्वाभाविक हो सकता है. जुलाई के मध्य में एआइ से जुड़े शेयरों के आसमान छूते मूल्यांकन और तेजी-मंदी के चक्र की अटकलों के बीच एक नया डर सामने आया—एआइ से तबाही का अंदेशा.

इसकी शुरुआत हगिंग फेस से हुई. अमेरिका के इस ओपन-सोर्स मशीन लर्निंग प्लेटफॉर्म का एआइ डेवलपर समुदाय में खासा इस्तेमाल होता है और इसके करीब 1.3 करोड़ यूजर हैं. प्लेटफॉर्म ने बताया कि उस पर ऐसा साइबर हमला हुआ जैसा उसने पहले कभी नहीं देखा था.

इस सेंध के पीछे एआइ एजेंट यानी ऐसी स्वचालित प्रणालियां थीं जो सवालों के जवाब देने या सामग्री का सार बताने से आगे बढ़कर असल दुनिया में फैसले लेती हैं. इस मामले में उन्होंने जरूरत से ज्यादा फैसले ले लिए. पता चला कि चैटजीपीटी बनाने वाली कैलिफोर्निया की ओपनएआइ की परीक्षण व्यवस्था से 1,206 एआइ एजेंट निकल भागे थे.

हर एजेंट अपने अलग घेरे से निकला, फिर आपसी संपर्क के लिए मैसेज बोर्ड बनाकर ‘झुंड’ बनाया. आखिर में उन्होंने हगिंग फेस की प्रणालियों में सेंध लगा दी. हजारों स्वायत्त कार्रवाइयां. जानकारों ने इसे एआइ के बेकाबू होने का मामला बताया.

हर तरफ गंभीर चेतावनियों के बीच सितंबर की शुरुआत में एआइ शोधकर्ता जैकब कॉक्सन की चेतावनी वायरल होने पर वैश्विक चिंता चरम पर पहुंच गई. ओपनएआइ की अमेरिकी प्रतिद्वंद्वी एंथ्रोपिक से इस्तीफे के बाद 27 वर्षीय कॉक्सन ने लिखा, “एआइ बनाने वाले लोग सचमुच मानते हैं कि यह दशक के अंत तक हम सबको मार सकता है. इस टेक्नोलॉजी की ताकत को कम न आंकें. जल्द ये प्रणालियां इंसानों से ज्यादा ताकतवर होंगी, किसी भी चीज को हैक कर सकेंगी, रातोरात किसी भी क्षेत्र में क्रांति ला सकेंगी और असली ताकत तथा संसाधन हासिल कर लेंगी.”

एआइ समुदाय ने खतरे को नकारा नहीं, स्वीकार किया. एंथ्रोपिक के सह-संस्थापक और सीईओ डारियो अमोदेई ने गंभीर चेतावनी दी, “एआइ की क्षमताएं जिस तेजी से बढ़ रही हैं, उसे देखते हुए मुझे डर है कि 6-12 महीने में ऐसा झुंड पूरे इंटरनेट पर कब्जा कर सकता है.” अमोदेई ने 12 सितंबर को एक्स पर अत्याधुनिक एआइ के विकास की रफ्तार धीमी करने के लिए दुनिया भर में कदम उठाने की मांग की.

जोखिमों में एआइ प्रणालियों पर नियंत्रण खोना, साइबर हमलों और जैव-आतंकवाद में उनका दुरुपयोग तथा गंभीर आर्थिक उथल-पुथल शामिल थे. उन्होंने कहा, फौरन कदम उठाना इसलिए जरूरी है क्योंकि एआइ अगली पीढ़ी का एआइ खुद बनाने में सक्षम हो रहा है.

अमेरिकी टेक दिग्गजों के साथ व्हाइट हाउस की बैठक में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ‘फ्रंटियर रिस्पॉन्सिबिलिटीज पर साझा प्रतिबद्धता’ का ऐलान किया. नवीनतम लार्ज लैंग्वेज मॉडल (एलएलएम) बनाने वाली कंपनियों के लिए इस ‘नैतिक’ संहिता में सुरक्षा की चार परतें बताई गई हैं. इनमें प्रशिक्षण और इस्तेमाल के दौरान साइबर सुरक्षा, जैव सुरक्षा और रासायनिक खतरों से जुड़ा मजबूत आंतरिक नियंत्रण तथा बाहरी विशेषज्ञों से स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट शामिल हैं.

भारत भी खतरे से निबटने की तैयारी के साथ इस संकट से पैदा हुए मौके का फायदा उठाकर अपनी सूचना टेक्नोलॉजी कंपनियों को एआइ सुरक्षा की वैश्विक होड़ में उतारना चाहता है. नैसकॉम के अध्यक्ष राजेश नाम्बियार कहते हैं, “टेक्नोलॉजी का हर दौर ऐसा मुकाम लाता है, जब भरोसा और बुनियादी ढांचा साथ-साथ तैयार करना पड़ता है.” (देखें: कॉलम).

“भारत के लिए यह मौका है, लेकिन तभी जब हम भरोसेमंद एआइ को बाकायदा खड़े किए जाने वाले उद्योग की तरह देखें.” इस बीच, मोदी सरकार ने जरूरी तकनीकी विशेषज्ञता के लिए उच्चस्तरीय एआइ गवर्नेंस ऐंड इकोनॉमिक ग्रुप और एआइ सेफ्टी इंस्टीट्यूट (एआइएसआइ) बनाया है.

एआइ-कयामत

तो एआइ को लेकर कयामत जैसे डर को हवा क्या दे रही है? आइटी के जानकार इसे ‘रिकर्सिव सेल्फ-इम्प्रूवमेंट’ कहते हैं, यानी एआइ प्रणाली की अपने कोड, तर्क क्षमता और बनावट को सुधारकर लगातार अपना ज्यादा होशियार रूप बनाने की काबिलियत. विज्ञान कथाओं जैसी यह संभावना ऐसी बुद्धिमान मशीनों का डर जगाती है जो इंसानों को फैसले से बाहर कर खुद काम करने लगें.

नोबेल पुरस्कार विजेता जेफ्री हिंटन ने तीन अक्तूबर को कहा, “अपने में लगातार सुधार से बुद्धिमत्ता में विस्फोट का विचार पुराना है, लेकिन हाल तक यह करीब नहीं लगता था. अब कई प्रमुख शोधकर्ताओं को लगता है कि ऐसा जल्द हो सकता है.”

हिंटन के सह-लेखन में आए एक ताजा शोधपत्र के मुताबिक, “बुद्धिमत्ता का विस्फोट मानव इतिहास का सबसे दूरगामी तकनीकी विकास हो सकता है. यह वर्षों की प्रगति को कुछ महीनों या उससे कम में समेट सकता है, एआइ प्रणालियों पर इंसानी नियंत्रण को खतरे में डाल सकता है और देशों, कंपनियों तथा सरकार के अंगों के भीतर और उनके बीच ताकत पर अंकुश को बहुत कमजोर कर सकता है.” दूसरे प्रमुख एआइ विशेषज्ञ भी चिंतित हैं.

2024 के नोबेल विजेता और गूगल डीपमाइंड के चेयरमैन डेमिस हसाबिस ने 14 जुलाई को एक्स पर लिखा, “अत्याधुनिक मॉडल साइबर सुरक्षा के लिए कैसी चुनौतियां पैदा करते हैं, हम देख चुके हैं. क्षमताएं बढ़ने के साथ एटमी और जैविक जोखिम समेत दूसरे खतरे भी जल्द उभर सकते हैं. आगे हमें ज्यादा स्वायत्त और खुद में सुधार करने वाली प्रणालियों पर नियंत्रण के लिए मजबूत सुरक्षा उपाय चाहिए होंगे—साथ ही उन अनजान समस्याओं से निबटना होगा जो समय के साथ सामने आएंगी.”

इस बीच, हगिंग फेस की सेंध अकेली घटना नहीं निकली. ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज ने 24 सितंबर को खुलासा किया कि ओपनएआइ एजेंटों ने जून में मेडिकेयर स्टैटिस्टिक्स रिपोर्टिंग सर्विस के पोर्टल में घुसकर सार्वजनिक और गैर-सार्वजनिक फाइलों तक पहुंच बनाई थी. उन्होंने इस घटना को “अस्वीकार्य” बताया. बाद में ओपनएआइ ने 100 से ज्यादा संगठनों को अपने एआइ एजेंटों की गतिविधियों से जुड़ी घटनाओं की सूचना दी.

सैम ऑल्टमैन की अगुआई वाली ओपनएआइ का कहना है कि हगिंग फेस की सेंधमारी के बाद वह अपने एजेंटों की गैर-मंजूर गतिविधियों का पूरा दायरा समझने के लिए करीब 50 पेटाबाइट डेटा खंगाल रही है. साथ ही, अत्याधुनिक एआइ मॉडल की ट्रेनिंग के सुरक्षा नियमों का ढांचा भी बना रही है.

प्रतिद्वंद्वी एंथ्रोपिक की रफ्तार धीमी करने की अपील के बाद ऑल्टमैन ने 14 सितंबर को एक्स पर लिखा, “एआइ की प्रगति दो तरह से बहुत बुरी दिशा में जा सकती है और हमें दोनों से बचना होगा. पहला, हम भविष्य पर अपना नियंत्रण एआइ के हाथों गंवा सकते हैं. दूसरा, दुनिया में ताकत कुछ हाथों में जरूरत से ज्यादा सिमट सकती है. अगर कोई व्यक्ति या कंपनी बेहद ताकतवर एआइ से अपनी सोच सब पर थोपे तो नतीजे बहुत भयावह हो सकते हैं.”

भारत के लिए खतरा

दुनिया भर में वित्तीय क्षेत्र एआइ टूल को सबसे तेजी से अपनाने वालों में रहा है. भारत में भुगतान के लिए संवाद करने वाले एआइ से लेकर ईमेल और कामकाज के ऑटोमेशन तथा कारोबारी विश्लेषण तक इसका इस्तेमाल हो रहा है. ईवाइ की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, जेनएआइ भारतीय बैंकों का कामकाज 46 फीसद तक सुधार सकता है.

मगर एआइ का जुड़ाव जितना बढ़ेगा, बाजार की साख, ग्राहकों के भरोसे और पूरी व्यवस्था से जुड़े जोखिम भी उतने बढ़ेंगे. इन्हें समझना जरूरी है. सबसे खराब स्थिति में एआइ-संचालित हमला नकली पहचान और मंजूरी के जरिए भरोसेमंद दिखने वाले फर्जी लेनदेन की बाढ़ लाकर बैंकों और भुगतान नेटवर्क को पस्त कर सकता है. एआइ आपस में जुड़ी वित्तीय प्रणालियों में सेंध लगाकर लेनदेन के रिकॉर्ड बिगाड़ सकता है और बैंकों में अफरातफरी मचा सकता है.

इसका दूसरा बड़ा खतरा देश की बाहरी और अंदरूनी सुरक्षा को हो सकता है. एआइ सैन्य कमान प्रणालियों तक पहुंचने वाली जानकारी दूषित कर सकता है, सैटेलाइट तस्वीरें बदल सकता है और खुफिया रिपोर्टों से छेड़छाड़ कर सकता है.

वायु रक्षा प्रणालियां निशाना पहचानने में गलती कर सकती हैं, ड्रोन गलत सैन्य बलों पर हमला कर सकते हैं और मिसाइलें अपने-आप चलकर युद्ध छेड़ सकती हैं, जिसमें कमांडर असली और फर्जी आदेश में फर्क न कर पाएं. चुनाव, आतंकी हमले या दंगे के दौरान बेकाबू एजेंट भरोसेमंद दिखने वाले वीडियो, वॉइस मैसेज और सोशल मीडिया खाते बना सकते हैं.

एआइ की अफरातफरी बुनियादी ढांचे तक भी फैल सकती है. भारत की बुनियादी प्रणालियों को एआइ-संचालित डिजिटल तंत्र मिल रहा है, जिससे कामकाज में भारी सुधार हो सकता है. मगर अहम प्रणालियों में एआइ जितना गहरे उतरेगा, हमले का दायरा उतना बढ़ेगा.

परिवहन के डिजिटल तंत्र में सेंध लगने पर रेलवे सिग्नलिंग में रहस्यमय गड़बड़ियां हो सकती हैं, हवाई अड्डों को उड़ानों की फर्जी जानकारी मिल सकती है और यातायात प्रबंधन प्रणाली महाजाम लगा सकती है. एआइ बिजली ग्रिड में घुसकर शहरों में तबाही भी मचा सकता है.

उद्योगों में भी ऐसा हो सकता है. बेहद स्वचालित कारखाने को चलाने वाली एआइ प्रणाली दूषित हो सकती है. तब गुणवत्ता जांचने वाले कैमरे खराब पुर्जों को मंजूरी दे सकते हैं, सप्लाइ चेन प्रणालियां गलत सामान गलत कारखानों में भेज सकती हैं, रोबोट बिगड़ सकते हैं, रासायनिक प्रक्रियाएं सुरक्षित सीमा पार कर सकती हैं और जरूरी पुर्जों की ग्राहकों तक आपूर्ति रुक सकती है.

रक्षा क्षेत्र की कमजोरियां

यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया के सेंटर फॉर इमर्जिंग टेक्नोलॉजीज फॉर आत्मनिर्भर भारत के डायरेक्टर मेजर जनरल (डॉ.) पवन आनंद (रिटायर्ड) भारत की एआइ गवर्नेंस नीति बनाने में सक्रिय रहे हैं. वे बताते हैं कि आयातित टेक्नोलॉजी पर निर्भरता से जोखिम पैदा होता है.

इनमें सप्लाइ चेन के जरिए दबाव या जबरदस्ती, दुश्मन या मित्र देशों के हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर में छिपे बैकडोर या ट्रोजन शामिल हैं. इसके अलावा, एआइ की बुनियादी क्षमताओं—मॉडल, कंप्यूटिंग ताकत या अपडेट—में बाधा आने, उन्हें धोखा दिए जाने या रिमोट किल स्विच से बंद किए जाने पर काम करने की आजादी खत्म हो सकती है.

आनंद कहते हैं, “खासकर अहम बुनियादी ढांचे पर साइबर हमले राष्ट्रीय स्तर पर क्षमता प्रभावित करेंगे. एआइ मॉडल वेट्स, डेटा रिले और डेटा सेंटर, समुद्र के नीचे बिछी केबल तथा सैटेलाइट जैसे कंप्यूटिंग ढांचे पर हमले हुए तो असर रक्षा क्षेत्र तक पहुंच सकता है.विरोधी एआइ डेटा सेंटरों की बिजली और कूलिंग रोक सकते हैं या नेटवर्क संपर्क बिगाड़कर युद्धक्षेत्र में एआइ की क्षमता घटा सकते हैं.”

वे कतर, बहरीन और यूएई के डेटा सेंटरों पर ईरान के ताजा हमलों की ओर इशारा करते हैं. एआइ प्रणालियों को हथियार बनाकर मशीन की रफ्तार से अहम बुनियादी ढांचे पर बड़े साइबर हमले किए जा सकते हैं.

इसलिए कमान और नियंत्रण, रणनीतिक खुफिया जानकारी, निगरानी और टोह, स्वायत्त हथियार तथा साइबर रक्षा जैसे अहम सैन्य इस्तेमाल के लिए पूरी तरह नहीं तो कम से कम आंशिक रूप से स्वदेशी एआइ स्टैक चाहिए. क्षमता मौजूद है; अब संबंधित मंत्रालयों और सेना के बीच तालमेल जरूरी है. आनंद कहते हैं, “रणनीतिक स्वायत्तता का मतलब अलग-थलग रहना नहीं है. भारत आत्मनिर्भरता की बात करता है, पूरी तरह खुद पर निर्भर होने की नहीं. उसे समान हितों और पूरक क्षमताओं वाले देशों के साथ काम करना चाहिए.”

बुनियादी ढांचे पर खतरा

क्रिसिल इंटेलिजेंस में सीनियर डायरेक्टर और ग्लोबल हेड, कंसल्टिंग जगन्नारायण पद्मनाभन कहते हैं कि दूसरे क्षेत्रों के मुकाबले बुनियादी ढांचे में एआइ का इस्तेमाल अभी कम है. वे कहते हैं, “एआइ का इस्तेमाल कैसे और कहां हो तथा कहां उसकी निगरानी जरूरी है, यह तय करने वाला नियामक ढांचा अभी बनना है. मेरा मानना है कि कम से कम शुरुआत में यह नीति या सरकार के निर्देश के बजाए संस्थानों की अपनी पहल से आगे बढ़ेगा.”

हगिंग फेस में सेंधमारी से कई महीने पहले नवंबर 2025 में तैयार मोदी सरकार की इंडिया एआइ गवर्नेंस गाइडलाइंस ने प्रमुख नियामक संस्थाएं बनाने और भारत के मुताबिक जोखिम ढांचे तैयार करने को फौरी प्राथमिकता बताया था. मध्य अवधि के लक्ष्यों में साझा मानक जारी करना, कानूनों और नियमों में बदलाव, एआइ घटना-रिपोर्टिंग प्रणाली चालू करना, नियामक सैंडबॉक्स आजमाना और भारत के डिजिटल सार्वजनिक ढांचे (डीपीआइ) से एआइ का जुड़ाव बढ़ाना शामिल था.

आखिरी लक्ष्य अवसर और खतरे, दोनों के केंद्र में है. मसलन, भारतीय रेलवे संचालन और समय-सारणी में एआइ का इस्तेमाल करके यातायात दोगुना करना चाहता है. रेलटेल के सलाहकार और एआइ सिस्टम डेवलपमेंट फैसिलिटेटर अंशुल गुप्त के मुताबिक, पहले से रखरखाव का अनुमान लगाने से अतिरिक्त फायदा होगा.

वे कहते हैं कि टेक्नोलॉजी अपग्रेड पर पूरी तरह विचार करना जरूरी है. एजेंटिक एआइ फौरी चिंता है तो क्वांटम-सुरक्षित नेटवर्क अपनाने की जरूरत भी सामने है. गुप्त कहते हैं, “हमारा बुनियादी ढांचा बेहद असुरक्षित है. पहली बात, ये पुरानी प्रणालियां हैं; दूसरी, हम टुकड़ों में सुधार करते हैं. बिना सोचे-विचारे किसी उपकरण में एआइ लगाना नुक्सानदेह है.” डेटा सिक्योरिटी काउंसिल ऑफ इंडिया (डीएससीआइ) के सीईओ विनायक गोडसे कहते हैं,

“साइबर सुरक्षा के लिए यह नई दुनिया है. अब तक हमारी आइटी प्रणालियां एक खास ढंग से चलती थीं...हमें बस थोड़ी-सी कार्रवाइयां नियंत्रित करनी होती थीं. अब हम एआइ प्रणालियों से लाखों तरीकों से संवाद कर रहे हैं. इसलिए चुनौतियों के इतने बड़े पैमाने, जटिलता और आपसी जुड़ाव को समझना होगा.”

डेलॉइट के मुताबिक, भारत के 68 फीसद संगठन एआइ में निवेश के दौरान सुरक्षा और नियमों के पालन पर ज्यादा जोर देंगे, जबकि 94 फीसद अगले साल इसमें निवेश बढ़ाना चाहते हैं. एअर इंडिया के मुख्य डिजिटल और टेक्नोलॉजी अधिकारी डॉ. सत्य रामस्वामी कहते हैं, “आज एआइ समेत डिजिटल टेक्नोलॉजी हर एअरलाइन के कामकाज की व्यापक और अहम बुनियाद बन चुकी है.”

एअरलाइन ने आरक्षण, उड़ान प्रस्थान नियंत्रण, चालक दल और रखरखाव योजना, सुरक्षा, नियम पालन और बाधा प्रबंधन से जुड़ी 140 से ज्यादा आइटी तथा डिजिटल प्रणालियां आधुनिक बनाई हैं. एआइ की 100 से ज्यादा पहल और एजेंट-संचालित 30 प्रक्रियाएं भी चल रही हैं.

बुनियादी ढांचा क्षेत्र की दिग्गज लार्सन ऐंड टुब्रो परियोजना प्रबंधन, लागत नियंत्रण, सप्लाइ चेन और वित्तीय प्रक्रियाओं में एजेंटिक एआइ का इस्तेमाल करती है. एलऐंडटी के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और हेड-कॉर्पोरेट आर. गणेशन कहते हैं, “ये एजेंट कार्रवाई सुझाने के साथ कामकाज में स्वायत्तता लाते हैं.”

वे अलग-अलग प्रणालियों में तालमेल बैठाकर बेहद कम इंसानी दखल से मंजूरी शुरू कर सकते हैं. कंपनी इंजीनियरिंग सॉफ्टवेयर में एआइ एजेंट तथा निर्माण स्थलों पर कंप्यूटर विजन और स्पेशल एआइ भी लगाती है. इससे स्वचालित पेंटिंग-प्लास्टरिंग, सामान की आवाजाही, प्रगति की निगरानी तथा सुरक्षा और गुणवत्ता की कमियां पकड़ने वाली ‘फिजिकल एआइ’ परत बनती है.

मैन्युफैक्चरिंग के जोखिम

साइबर सुरक्षा की भाषा में ‘अटैक सर्फेस’ अहम शब्द है—नेटवर्क में घुसने के रास्ते जितने कम हों, उतना बेहतर. स्विट्जरलैंड की साइबर सुरक्षा कंपनी एक्रोनिस के मुख्य सूचना सुरक्षा अधिकारी (सीआइएसओ) जेराल्ड ब्यूखेल्ट कहते हैं,

“आइटी प्रणालियों को ऑपरेशनल टेक्नोलॉजी से जोड़ने पर मैन्युफैक्चरिंग ज्यादा कुशल हो रही है, लेकिन साइबर हमलों के लिए घुसने के रास्ते भी बढ़ रहे हैं. यह बदलाव कंपनियों, खासकर एमएसएमई की साइबर सुरक्षा मजबूत करने की रफ्तार से तेज है.” ब्यूखेल्ट के मुताबिक, एक्रोनिस के खतरे संबंधी शोध और भारत केंद्रित डेटा बताते हैं कि एआइ हमलावरों की तैयारी का समय घटा रहा है.

कंपनी की थ्रेट रिसर्च यूनिट ने हाल ही चीन से जुड़े एक समूह का पता लगाया, जिसने दुनिया की एक बड़ी घटना की खबर आने के कुछ घंटों में उससे जुड़ा मालवेयर बनाकर फैला दिया. वे कहते हैं, “भारतीय ठिकानों के खिलाफ भी ऐसी ही तेजी दिख सकती है क्योंकि एआइ अब हमलावरों को जल्द ही सही समय पर भरोसेमंद दिखने वाले झांसे तैयार करने देता है.”

इस साल हमलों की संख्या के लिहाज से मैन्युफैक्चरिंग भारत के तीन सबसे ज्यादा निशाना बनाए गए क्षेत्रों में था. फिशिंग अटैचमेंट और सेंध लगे डिजाइन टूल घुसने के आम रास्ते थे, जबकि कम हमलों के बावजूद रैनसमवेयर का असर सबसे ज्यादा रहा. भारतीय कंपनियां फैसले लेने, पहले से रखरखाव का अनुमान लगाने, गुणवत्ता नियंत्रण और रोबोटिक्स में एआइ जोड़ रही हैं, जिससे चिंता बढ़ती है.

मॉडल खुद निशाना बन जाते हैं क्योंकि ‘दूषित’ डेटा चुपचाप फैसलों की गुणवत्ता बिगाड़ सकता है. साइबर सुरक्षा स्टार्टअप फायरकंपास के सह-संस्थापक और सीईओ बिकाश बराई कहते हैं,

“मुख्य सुरक्षा चिंता कोई एक खतरा नहीं, बल्कि साइबर हमलों, सप्लाइ चेन में सेंध, डेटा लीक, खुफिया जानकारी में हेरफेर और कामकाजी नियंत्रण खोने का मिला-जुला जोखिम है. सेंध लगी एआइ प्रणाली संवेदनशील जानकारी उजागर या फैसलों को प्रभावित कर सकती है. वहीं, वह कैसे काम कर रही है, उसका डेटा कहां जा रहा है या उससे छेड़छाड़ हुई है या नहीं—यह अनिश्चितता राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकती है.”

अवसर भी

मगर यहीं एआइ रेड-टीमिंग के जरिए फिर काम आता है. साइबर सुरक्षा की तैयारी परखने के लिए नकली हमले करने को उद्योग की भाषा में रेड-टीमिंग कहते हैं. जून-जुलाई में 345 सरकारी और निजी संगठनों के 1,470 लोगों के साथ एआइ खतरे से जुड़ी 10 साइबर सुरक्षा कवायद करने वाले सीईआरटी-इन का कहना है कि एआइ दुर्भावनापूर्ण डोमेन, फिशिंग की कोशिशों और कमजोरियों का अपने-आप पता लगाकर बचाव का समय घटा सकता है.

उसकी फ्रंटियर-एआइ एडवाइजरी बाहरी एआइ रेड-टीमिंग, माइक्रो-सेगमेंटेशन, मजबूत पहचान नियंत्रण और एक साथ कई घटनाओं की कवायद की सिफारिश करती है. नैसकॉम के राजेश नाम्बियार के मुताबिक, यह सेवा के तौर पर साइबर सुरक्षा का अगला रूप है और बाजार इसी दिशा में बढ़ रहा है. वे कहते हैं, “भारत के लिए मौका घरेलू प्रणालियों की रक्षा से आगे है. बड़े पैमाने पर एआइ अपना रही दुनिया के लिए अगली पीढ़ी की साइबर सुरक्षा सेवाएं बनाना भी इसका हिस्सा है.”

यहां पैमाना शायद सबसे अहम शब्द है. भारतीय रिजर्व बैंक की जिम्मेदार और नैतिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस व्यवस्था (फ्री-एआइ) की रूपरेखा पर बनी समिति के सदस्य रहे टेक्नोलॉजी वकील राहुल मट्टन कहते हैं, “एआइ लागू करना वास्तव में कठिन है और भारत डिजिटल प्रणालियां बनाने में माहिर है.” वे कहते हैं कि एआइ से पिंड नहीं छूटेगा.

“ऐसे में भारत क्या करे? हमें सबसे सुरक्षित तरीके से अपने लक्ष्यों के मुताबिक इसका बेहतर इस्तेमाल सीखना चाहिए.” फ्री-एआइ रिपोर्ट भी दो बातों पर आधारित ढांचे की मांग करती है—नवाचार को बढ़ावा और जोखिम में कमी.

बेकाबू एआइ एजेंटों से डरी दुनिया में सिक्के का दूसरा पहलू इस बदलावकारी टेक्नोलॉजी की दौड़ में पीछे छूटने का जोखिम है—जबकि यही टेक्नोलॉजी सुपर इंटेलिजेंस से बचाव का सुरक्षा कवच दे सकती है. भारत को इसे वाइ2के जैसा एक और मौका मानकर एआइ के कुछ क्षेत्रों में अपना दबदबा कायम करना चाहिए. 

—साथ में प्रदीप आर. सागर,अभिषेक जी. दस्तीदार और सोनल खेत्रपाल

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