साख पर संकट
देश की शीर्ष निर्वाचन संस्था के भीतर मची खींचतान और न्यायिक समीक्षा के दायरे में आई कार्यप्रणाली ने इसकी निष्पक्षता, ईमानदारी और पारदर्शिता पर उठाए सवाल. आखिर कैसे बहाल हो इसमें आम जन का भरोसा

इलस्ट्रेशन: नीलांजन दास/एआइ
कई महीनों से चुनाव आयोग विपक्ष के “वोट चोरी” के आरोपों से जूझता आ रहा है. वह इन दावों को भी खारिज करता रहा है कि मतदाता सूचियों के उसके विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) ने कमजोर तबकों के नागरिकों पर असंवैधानिक बोझ डाला लेकिन 23 सितंबर को इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक रिपोर्ट उसकी साख को लेकर चल रहे संघर्ष को निर्वाचन सदन के भीतर ले आई.
खबर के मुताबिक, तीन चुनाव आयुक्तों में से दो—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने 10 महीनों के दौरान कम-से-कम 14 बार ऐसे फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज की जो उनके मुताबिक, उन्हें बताए बिना लिए या जारी किए गए थे. उन्होंने यह भी पूछा कि इन्हें मंजूरी किसने दी थी. चुनाव आयोग ने अपनी ओर से दो प्रेस नोट जारी करके कहा कि एसआइआर से जुड़े सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे, हालांकि उसने खबर में लगाए गए कुछ दूसरे आरोपों का जवाब नहीं दिया.
यह विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. शीर्ष अदालत ने 29 सितंबर को उस याचिका पर अगले हफ्तों में सुनवाई के लिए हामी भरी, जिसमें सवाल उठाया गया है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार ने बाकी दो चुनाव आयुक्तों (ईसी) की सहमति के बिना अहम फैसले लिए. याचिका में अक्तूबर 2025 से अब तक के चुनाव आयोग के रिकॉर्ड पेश करने और सुरक्षित रखने की मांग की गई है.
इससे आयोग के भीतर फैसले लेने की प्रक्रिया और सर्वसम्मति के उसके दावे अदालती जांच के दायरे में आ गए हैं. आयोग को स्वतंत्र होना ही नहीं, उसका स्वतंत्र दिखना भी जरूरी है—सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति दीपंकर दत्ता ने 23 सितंबर को चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा से असहमति जताते हुए यह बात कही.
इस बवंडर के केंद्र में मौजूद तीनों अधिकारी लंबे समय तक नौकरशाही में रहे हैं और सरकार के अलग-अलग महकमों से निर्वाचन सदन पहुंचे हैं. केरल काडर के 1988 बैच के आइएएस अधिकारी और आइआइटी कानपुर के छात्र रहे ज्ञानेश कुमार 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के समय गृह मंत्रालय में जम्मू-कश्मीर विभाग के प्रमुख थे. बाद में वे केंद्र में सहकारिता सचिव रहे.
उसी बैच के उत्तराखंड काडर के अधिकारी संधू ने डॉक्टरी की पढ़ाई की है. वे उत्तराखंड के मुख्य सचिव और भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के चेयरमैन रह चुके हैं. हरियाणा काडर के अधिकारी जोशी आइआइटी रुड़की के छात्र रहे हैं. वे 2019 से 2022 तक देश के महापंजीयक और जनगणना आयुक्त रहे और बाद में हरियाणा के मुख्य सचिव बने.
दोनों चुनाव आयुक्तों की दर्ज आपत्तियों, चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर चल रही अदालती लड़ाई और आयोग के अपने बचाव वाले जवाबों को एक साथ देखें तो ये कई अहम मोर्चों पर चुनाव आयोग के भीतर गहराते साख के संकट की ओर इशारा करते हैं.
पहला संकट: एसआइआर में सबूत दिखाने का बोझ
पहली चिंता खुद एसआइआर को लेकर है: मतदाता सूचियों की लंबे समय से टली सफाई कहीं योग्यता साबित करने का बोझ मतदाताओं पर डालकर करोड़ों लोगों का मताधिकार तो खतरे में नहीं डाल रही! कवायद 24 जून, 2025 को शुरू हुई, जब चुनाव आयोग ने 2003 के बाद पहली बार बिहार की मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण का आदेश दिया.
हर मतदाता को नया गणना फॉर्म देना था; जिनका नाम 2003 की सूची में नहीं मिला, उन्हें 11 दस्तावेजों में से एक पेश करना था. उनमें शुरू में आधार, मतदाता पहचान पत्र और राशन कार्ड नहीं थे. आलोचकों ने इसे पिछले दरवाजे से नागरिकता जांच बताया. सुप्रीम कोर्ट ने बाद में आधार को 12वां दस्तावेज बनाया, पर साफ किया कि वह पहचान का सबूत है, नागरिकता का नहीं. अदालत ने 27 मई, 2026 को एसआइआर कराने का आयोग का अधिकार बरकरार रखा.
पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग ने हर मतदाता के पिछली गहन पुनरीक्षण वाली सूची से मिलान की प्रक्रिया शुरू की. जिनका नाम पिछली सूची में नहीं मिला, उन्हें “अनमैप्ड” यानी असंबद्ध बताया गया. जिनका नाम मिला लेकिन उसमें कोई गड़बड़ी मिली, उन्हें “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसीज” यानी तार्किक खामियों के तहत चिह्नित किया गया. बंगाल में करीब 1.36 करोड़ मतदाताओं को ऐसे नोटिस मिले.
खामियों की श्रेणियां चार से बढ़कर 11 हो गईं. उनमें मतदाता और उसके माता-पिता में से किसी एक की उम्र का अंतर 15 साल से कम होना, एक अभिभावक से छह से ज्यादा संतानों का जुड़ा होना, अभिभावक के नाम की वर्तनी अलग-अलग होना और पुरानी सूची में महिला का नाम पिता से लेकिन मौजूदा सूची में पति से जुड़ा होना शामिल था. जाहिर है, इनमें से किसी भी कसौटी की व्याख्या एसआइआर के आदेशों में नहीं थी.
परिणामस्वरूप देश के ज्यादातर हिस्सों में एसआइआर लागू होने के बाद के 15 महीनों में वोटर लिस्ट से बहुत बड़ी संख्या में वोटरों के नाम हटाए गए हैं. बिहार में 68.6 लाख नाम हटाए गए और 21.5 लाख नाम जोड़े गए. इससे राज्य के वोटरों की संख्या में लगभग 47 लाख यानी करीब छह प्रतिशत की कमी आई. उत्तर प्रदेश की जनवरी की ड्राफ्ट लिस्ट में 2.89 करोड़ वोटरों के नाम नहीं थे जो कुल वोटरों का लगभग पांचवां हिस्सा है.
अप्रैल में जारी राज्य की अंतिम सूची में भी, एसआइआर से पहले की 15.44 करोड़ वोटरों वाली लिस्ट—जिसमें दावे और पहली बार रजिस्टर करने वाले लोग भी शामिल थे—के मुकाबले लगभग 2.04 करोड़ कम वोटर थे. दूसरे चरण के 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अंतिम सूची में कुल 10 फीसदी से ज्यादा वोटर घटे: 51 करोड़ वोटरों में से 5.18 करोड़ से ज्यादा नाम हटा दिए गए.
जिन 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने अब तक अपनी अंतिम सूची जारी की है—जिनमें अभी चल रहे तीसरे चरण के सात राज्य भी शामिल हैं—वहां कुल मिलाकर छह करोड़ से ज्यादा नाम हटाए गए हैं. महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली सरीखे तीसरे चरण के कई बड़े राज्यों ने अभी तक अपनी अंतिम सूची जारी नहीं की है.
16 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में ड्राफ्ट लिस्ट से 6.16 करोड़ से ज्यादा नाम हटाए गए थे. ड्राफ्ट स्टेज पर कुल मिलाकर 13.39 करोड़ नाम हटाए गए. यह संख्या अभी पक्की नहीं है: अंतिम आंकड़े दावों/आपत्तियों और पहली बार नाम दर्ज करने वालों की संख्या पर निर्भर होंगे. मोटे अनुमान के मुताबिक, दूसरे चरण में हटाए गए नामों में 63 लाख से ज्यादा, यानी 12 फीसद से अधिक, आपत्तियों के बाद काटे गए, जबकि 67 लाख मतदाताओं, यानी करीब 13 फीसद, को मृत बताया गया.
पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा का कहना है कि एसआइआर की कवायद आयोग की पारंपरिक जिम्मेदारी को उलट देती है. वे कहते हैं, “यह बुनियादी सोच के स्तर पर ही गलत है. मतदाता की पात्रता साबित करने का बोझ चुनाव आयोग से हटाकर मतदाता पर डालते हुए यह पूरी व्यवस्था को उलट देती है. 75 साल तक चुनाव आयोग का फर्ज था कि वह लोगों तक जाए और उनके नाम मतदाता सूची में शामिल करे. एसआइआर ने मानो प्राथमिकता को लोगों को शामिल करने से बदलकर उन्हें बाहर करने पर टिका दिया है.”
देशभर में मतदाताओं की ओर से दी गई चुनौतियों का साझा आंकड़ा नहीं है. बिहार में आयोग ने दावा किया कि कोई अपील नहीं हुई. बंगाल में आयोग और राज्य सरकार के बीच “भरोसे की कमी” देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी में अनुच्छेद 142 की शक्तियों से करीब 60 लाख लंबित मामले न्यायिक अधिकारियों को सौंपे.
उनमें 16.1 लाख अपीलें आयोग के नाम पर उन वोटरों को हटाने के लिए दायर हुईं जिन्हें न्यायिक अधिकारी मंजूरी दे चुके थे. संधू ने पूछा कि “चुनाव आयोग की ओर से” इन्हें किसने मंजूर किया; न उन्हें जानकारी थी, न जोशी को. 1,607 मतदाताओं की सुनवाई हुई. उन्हें छोड़कर बाकी ऐसे चुनाव से बाहर रहे जिसमें बहुतों को वोट का हक हो सकता था. बंगाल एसआइआर की अनसुलझी अपीलों पर सुप्रीम कोर्ट पांच अक्तूबर को, राज्य में उपचुनावों से एक दिन पहले, सुनवाई करेगा.
चुनाव आयोग तीन आधारों पर एसआइआर का बचाव करता है. पहला, दो दशक से ज्यादा समय से गहन पुनरीक्षण न होने से सूचियों में मृत, कहीं और जा चुके और एक से ज्यादा जगह दर्ज नाम जमा थे; लगभग सभी दल यह मुद्दा उठा चुके थे. आयोग के सूत्र कुल नाम हटाने पर गलत जानकारी फैलने की बात कहते हैं. मसौदा और अंतिम एसआइआर सूचियां बना चुके राज्यों में 13.39 करोड़ नाम बाहर रहे. उनमें 13.13 करोड़ या 98 फीसद मृत,
गैरहाजिर, दूसरी जगह जा चुके या दो जगह दर्ज लोगों की कैटेगरी वाले हैं. दस्तावेज समेत दूसरे कारणों से करीब 26 लाख लोग बाहर हुए. आयोग कहता है कि नोटिस और सुनवाई बिना नाम नहीं कटता और अदालती जांच में इस कवायद को मंजूरी मिली है. बेरुखी के आरोपों के बीच आयोग ने 26 सितंबर को प्रक्रिया नरम की.
बूथ लेवल अफसर आम तौर पर चिह्नित मतदाताओं के घर जाकर दस्तावेज अपलोड करेंगे; ऑनलाइन सुनवाई को तरजीह मिलेगी; बालिग परिजन मतदाता की ओर से पेश हो सकेंगे; कमजोर तबकों के लिए हेल्प डेस्क बनेंगी; दिल्ली और महाराष्ट्र में दावों की समयसीमा बढ़ाई गई है.
दूसरा संकट: फॉर्म 6 में हद से आगे पूछ-पड़ताल
सबसे तीखा कानूनी विवाद फॉर्म 6 पर है और इसी से मतदाताओं की प्रोफाइल बनाने के आरोप को धार मिलती है. मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के नियम 13 का यह फॉर्म नए मतदाता को सूची में नाम जुड़वाने के लिए है. 1950 के कानून की धारा 28 के तहत केंद्र सरकार चुनाव आयोग से सलाह और सरकारी गजट में अधिसूचना के बाद ही इसे बदल सकती है; फिर संशोधन संसद के दोनों सदनों में सत्र के 30 दिनों के भीतर पेश करना अनिवार्य है.
फॉर्म 6 आखिरी बार 2022 में ऐसे ही बदला था लेकिन इस साल 12 जुलाई तक ईसीआइनेट के ऑनलाइन फॉर्म में हिस्से जे और के के बीच पूछा जाने लगा कि आवेदक, उसके माता-पिता या दादा-दादी या नाना-नानी पिछली एसआइआर सूची में थे या नहीं; निर्वाचन क्षेत्र, बूथ और क्रम संख्या भी मांगी गई. यह अनिवार्य नहीं बताया गया, पर उसे भरे बिना फॉर्म जमा नहीं होता था. उसी पोर्टल के कागजी फॉर्म में यह खंड नहीं था.
कथित तौर पर जोशी ने मई में चेताया कि 1960 के नियमों वाला फॉर्म एसआइआर निर्देश से नहीं बदला जा सकता. संधू ने 13 अगस्त को बदलाव को “बिना मंजूरी का और गैरकानूनी” बताकर हटाने को कहा. आयोग के सूत्र कहते हैं कि वैधानिक कागजी फॉर्म जस का तस रहा, ऑनलाइन बदलाव ने पहले से मौजूद दो जरूरतें एक डिजिटल प्रक्रिया में जोड़ दीं और दूसरे ई-हस्ताक्षर की जरूरत खत्म कर दी.
बिहार एसआइआर में अतिरिक्त घोषणा फॉर्म, फॉर्म 6 के अनुलग्नक के रूप में जुड़ा था और सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई को एसआइआर तथा उसके दस्तावेजी ढांचे को वैध माना. आलोचकों का जवाबः अदालत ने इस पर फैसला नहीं दिया था कि आयोग सॉफ्टवेयर से अतिरिक्त शर्त को अनिवार्य बना सकता है या नहीं. कानूनविद और पांच बार के सांसद अभिषेक मनु सिंघवी कहते हैं, “पहले की एसआइआर सूची में माता-पिता या दादा-दादी या नाना-नानी का नाम पूछना प्रक्रिया या फॉर्मेट का बदलाव नहीं, पंजीकरण की शर्त में ठोस इजाफा है.”
वंश की जानकारी का वक्त अहम है. 2021 से टली जनगणना चल रही है: इस साल मकान-सूचीकरण और एक मार्च, 2027 से जाति समेत आबादी की गणना होगी. निर्वाचन क्षेत्रों तथा राज्यों में लोकसभा सीटों के पुनर्बंटवारे पर 2001 के 84वें संशोधन से बढ़ी रोक 2026 के बाद की पहली जनगणना के साथ खत्म होगी. 2023 का महिलाओं को एक-तिहाई विधायी आरक्षण भी परिसीमन के बाद लागू होगा.
परिसीमन जनगणना के आधार पर होता है, मतदाता सूचियों पर नहीं. फिर भी विपक्ष को अंदेशा है कि पारिवारिक कड़ी से जांची सूचियां—जिनमें चिह्नित और हटाए गए मतदाता खास समुदायों-इलाकों में केंद्रित हों—सरकार को मतदाताओं की प्रोफाइल दे सकती हैं और नई सीटों की सीमा, आरक्षण तथा कौन मतदाता गिना जाए, इसे प्रभावित कर सकती हैं. आयोग इसे अटकलबाजी कहता है. दिक्कत यह है कि प्रोफाइल बनाने वाले फिल्टर सार्वजनिक नहीं हुए.
आयोग के सूत्र कहते हैं कि मैपिंग दस्तावेजों का बोझ घटाती है: जरूरी कागज न रखने वाले लोग पुरानी सूची से पारिवारिक रिश्ता साबित कर नई सूची में आ सकते हैं. एक सूत्र कहता है, “मैपिंग जरूरी नहीं है.”
तीसरा संकट: सॉफ्टवेयर का शिकंजा
एक और संकट आयोग के एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म ईसीआइनेट से जुड़ा है. 22 जनवरी को शुरू प्लेटफॉर्म ने आयोग के 40 से ज्यादा ऐप और पोर्टल जोड़े; इससे मतदाता सूची मॉड्यूल से नाम जुड़ते, हटते और सुधरते हैं. मगर कानून यह अधिकार मुख्यालय को नहीं, हर निर्वाचन क्षेत्र के निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) को देता है.
असहमति नोट में जोशी ने “मतदाता सूची डेटाबेस के धीरे-धीरे केंद्रीकरण” की चेतावनी देकर स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट मांगा ताकि सिर्फ वैधानिक अधिकारियों के पास बदलाव के लॉगइन अधिकार हों. संधू ने लिखा कि राज्यों के अधिकारियों को पोर्टल का “उचित और पूरा एक्सेस” ही नहीं; और आइटी महानिदेशक सीमा खन्ना को उन अधिकारियों की एक्सेस सीमित करने का कानूनी हक नहीं है.
महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी ने आयोग से ईसीआइनेट में संशोधन करने को कहा ताकि ईआरओ तार्किक विसंगतियों के निवारण, कमजोर तबके के वोटरों को सुनवाई से छूट देने और व्यापक स्तर के दस्तावेजों को मंजूर करने के अपने वैधानिक अधिकार का इस्तेमाल कर सकें. इससे दो चुनाव आयुक्तों की उठाई आपत्तियों की ही पुष्टि होती है कि केंद्रीय नियंत्रण वाला सॉफ्टवेयर स्थानीय अधिकारियों के कानूनन हासिल अधिकार को बाधित करता है.
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाइ. कुरैशी कहते हैं, “टेक्नोलॉजी कानून को दोबारा नहीं लिख सकती. कंप्यूटर प्रोग्राम वैधानिक अधिकारी का फैसला नहीं पलट सकता.” गोवा में तार्किक खामियों के लिए चिह्नित 97 मतदाताओं को ईआरओ ने सुनवाई और दस्तावेज जांच के बाद योग्य पाया. 1960 के नियम 21 में ईआरओ गलती से छूटे नाम जोड़ सकता है और नियम 22 में अंतिम सूची से पहले ऐसे फैसले शामिल करना जरूरी है.
एक उप चुनाव आयुक्त ने भी लिखा कि आइटी सिस्टम इस अधिकार को नहीं रोक सकता. गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने 11-17 फरवरी के बीच फैसले लागू करने की सॉफ्टवेयर सुविधा आठ बार मांगी, जो 21 फरवरी की अंतिम सूची से पहले नहीं मिली. हक में फैसले के बाद भी 97 नाम बाहर रहे और उन्हें फॉर्म 6 भरना पड़ा. आयोग के मुताबिक, 88 आवेदन कर चुके हैं, छह देश से बाहर हैं और तीन के पास पुर्तगाली पासपोर्ट है.
आयोग के अनुसार, गोवा के मामले में एक सॉफ्टवेयर वर्कफ्लो की कमी सामने आई, न कि सेंट्रल कंट्रोल की. आयोग के एक सूत्र का कहना है, “अगर यह आरोप सही होता कि सेंट्रल आइटी डिवीजन में बैठा कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से वोटर लिस्ट में बदलाव कर सकता है, तो गोवा के 97 मामलों को आसानी से केंद्रीय स्तर पर ही बदला जा सकता था.” सिर्फ अलग-अलग क्रेडेंशियल वाले फील्ड अफसर ही कानूनी काम कर सकते हैं जबकि मुख्यालय साइबर-सिक्योरिटी का काम संभालता है.
यह एक अहम काम है, क्योंकि इस साल विधानसभा चुनावों के दौरान वोटों की गिनती वाले दिन सिस्टम में सेंध लगाने की 68 लाख कोशिशें हुई थीं. हालांकि, आलोचकों का कहना है कि ऐसा सिस्टम जो किसी कानूनी अफसर को काम करने से रोक सकता है, वह खुद भी एक तरह का कंट्रोल ही है.
दूसरी खबरें संस्था के भीतर और टकराव की ओर इशारा करती हैं. मतदाता सूची अपडेट करने और नए मतदाताओं के नाम जोड़ने वाला सालाना विशेष सावधिक पुनरीक्षण (एसएसआर) 2025-26 के लिए अब तक दोबारा शुरू नहीं हुआ जबकि जोशी इसके लिए जोर देते रहे हैं.
चुनाव आयोग का कहना है कि एसआइआर के साथ एसएसआर कराने की कोई कानूनी जरूरत नहीं है क्योंकि दोनों कवायद जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) के तहत की जाती हैं. आयोग के मुताबिक, एसआइआर शुरू होने के बाद से 18 से 28 साल की उम्र के 2.73 करोड़ मतदाता जोड़े गए हैं.
चौथा संकट: चुनाव आयोग में बॉस कौन?
सभी असहमतियां इस बड़े टकराव की ओर इशारा करती हैं कि आयोग को आखिर चलाता कौन है. वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग ने 28 जुलाई के एक आदेश में उप चुनाव आयुक्त संजय कुमार को खन्ना की अगुआई वाले आइटी विभाग की निगरानी से हटा दिया था. संधू और जोशी ने कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन को इस मामले पर अलग-अलग चिट्ठी लिखी और अगले दिन दोनों ने मिलकर उस आदेश को रद्द कर दिया. आयोग का कहना है कि उस पर अमल हुआ ही नहीं था.
अधिकार किसके पास हैं, इस बारे में कानून साफ है. मुख्य चुनाव आयुक्त बराबरी के सदस्यों में पहला भर है. 2023 के कानून की धारा 18 कहती है कि जहां तक मुमकिन हो, आयोग का कामकाज सर्वसम्मति से चलना चाहिए. सदस्यों में मतभेद होने पर बहुमत का फैसला लागू होगा और काम का बंटवारा भी केवल सर्वसम्मति से बदला जा सकता है.
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओ.पी. रावत कहते हैं कि यह बात दोनों तरफ लागू होती है. वे कहते हैं, “वे दोनों मिलकर आयोग का बहुमत बनाते हैं. अगर वे मुख्य चुनाव आयुक्त से असहमत हैं तो उनके फैसले को पलट सकते हैं. मैं मुख्य चुनाव आयुक्त था, तब मेरे साथ भी ऐसा हुआ था.” वे दोनों पक्षों को इस बात के लिए दोषी मानते हैं कि आपस में बैठकर मतभेद सुलझाने से पहले उन्होंने बाहरी अधिकारियों को पत्र लिखे.
आयोग का 23 सितंबर का पहला जवाब बचाव वाला था: बहुसदस्यीय संस्था में लिखित टिप्पणियां सामान्य हैं और हर बड़ा फैसला अंततः सर्वसम्मत था. पूरे आयोग की 26 सितंबर की बैठक के बाद दूसरे नोट में कहा गया कि बिहार आदेश और अक्तूबर 2025 तथा मई 2026 के कार्यक्रम तीनों आयुक्तों ने मंजूर किए. फिर भी कुछ बातों पर वह पीछे हटा.
वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त की अगुआई वाली समिति, जिसमें स्वतंत्र आइआइटी या आइआइआइटी विशेषज्ञ होगा, जांचेगी कि ईसीआइनेट चुनाव कानून के मुताबिक है या नहीं. जमीनी अधिकारियों को वैधानिक शक्तियों की छूट मिलेगी; नए आइटी मॉड्यूल अधिकारियों की समिति जांचेगी; एजेंडा पहले, उसके बाद कार्यवृत्त जारी होगा; आयुक्तों के निर्देशों का “पूरी सावधानी से पालन” होगा.
एसआइआर के खिलाफ याचिकाकर्ता और चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव इसे “आखिरकार अपराध स्वीकार करना” और “संघर्षविराम समझौता” कहते हैं. उनके मुताबिक, “अब मामला सिर्फ सीईसी का नहीं. तीनों चुनाव आयुक्त बेनकाब हुए हैं.”
पांचवां संकट: अंपायरों को कौन चुने?
इन दोनों विवादों की तह में व्यवस्था के ढांचे को लेकर एक गहरा शक है. सात दशकों तक संसद ने चुनाव आयोग में नियुक्तियों के लिए कोई कानून नहीं बनाया और आयुक्त चुनने का जिम्मा सरकार के पास रहा. मार्च 2023 में अरुण गोयल के स्वैच्छिक रिटायरमेंट लेने के अगले ही दिन चुनाव आयुक्त नियुक्त किए जाने पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अनूप बरनवाल बनाम केंद्र मामले में फैसला दिया कि संसद का कानून बनने तक नियुक्तियां प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और देश के प्रधान न्यायाधीश की समिति करेगी.
संसद ने कुछ महीनों में कानून बना दिया. 2023 के कानून ने चयन समिति में प्रधान न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री के नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को रखा. तीन सदस्यों में विपक्ष के नेता के साथ सरकार के दो प्रतिनिधि हो गए. कानून मंत्री की अगुआई वाली खोज समिति नाम शॉर्टलिस्ट करती है और योग्यता केंद्र सरकार में सचिव के बराबर पद संभाल चुके लोगों तक सीमित है, यानी दायरा सेवारत या रिटायर नौकरशाहों तक सिमटता है.
मूल विधेयक चुनाव आयुक्तों का वेतन-दर्जा सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के बजाय कैबिनेट सचिव के बराबर कर रहा था, पर विरोध के बाद प्रावधान हटाया गया. पद-सुरक्षा अब भी असमान है. अनुच्छेद 324(5) के तहत सीईसी सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश वाली प्रक्रिया और आधार पर हट सकता है जबकि चुनाव आयुक्त सीईसी की सिफारिश पर हटाया जा सकता है.
नए कानून की परीक्षा फौरन हो गई. गोयल के इस्तीफे के कुछ ही दिनों बाद मार्च 2024 में ज्ञानेश कुमार और संधू को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया. समिति में तब विपक्ष के सदस्य अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि बैठक से महज कुछ मिनट पहले उन्हें नामों की छोटी सूची दी गई थी. सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा चुनाव से पहले इन नियुक्तियों पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, लेकिन जल्दबाजी पर सवाल उठाया.
फरवरी 2025 में चयन समिति की बैठक वाली रात ही राहुल गांधी की लिखित असहमति के बावजूद ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त बना दिया गया. इस कानून को दी गई चुनौती पर अब भी फैसला नहीं हुआ है. यह विवाद केवल इस सवाल को ही सामने नहीं लाया कि चुनाव आयुक्तों को कौन नियुक्त करता है, बल्कि यह भी कि नियुक्ति के बाद व्यवस्था उन्हें कितनी संस्थागत आजादी देती है.
सरकार के दबदबे वाली चयन प्रक्रिया और असमान पद-सुरक्षा आयोग में असहमति को दुर्लभ और महंगा बनाती है. इतिहास में इसकी मिसालें हैं. वर्ष 2009 में सीईसी एन. गोपालस्वामी ने पक्षपात के आरोपों पर चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफारिश की; सरकार ने उसे ठुकराया और चावला बाद में सीईसी बने. वर्ष 2019 में चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने नरेंद्र मोदी और अमित शाह से जुड़ी आदर्श आचार संहिता शिकायतों पर आयोग से असहमति जताई.
अगला सीईसी बनने की कतार में होने पर भी उन्होंने अगस्त 2020 में इस्तीफा दे दिया. गोयल ने लोकसभा चुनाव कार्यक्रम से कुछ दिन पहले मार्च 2024 में बिना सार्वजनिक वजह बताए इस्तीफा दिया. विडंबना यह कि मौजूदा असहमति जताने वाले संधू और जोशी 2023 के कानून के तहत नियुक्त हुए. समस्या व्यक्तियों से ज्यादा उस व्यवस्था की है जो निष्पक्षता उनके जमीर पर छोड़ती है.
छठा संकट: गैर-बराबरी के अवसर
एक बड़ी चिंता यह है कि अंपायर खिलाड़ियों के साथ किस तरह अलग-अलग बर्ताव करता है. अगस्त 2023 से जनवरी 2024 के बीच इंडिया ब्लॉक ने ईवीएम और वीवीपैट की गिनती पर पूर्ण आयोग से समय मांगते हुए कम-से-कम आठ बार पत्र लिखा, लेकिन उसे चुनाव आयोग की वेबसाइट पर मौजूद एफएक्यू यानी अक्सर पूछे जाने वाले सवालों के जवाब देखने को कहा गया. इसके उलट लोकसभा चुनाव की मतगणना से एक दिन पहले दो जून, 2024 को निर्मला सीतारमण की अगुआई वाले भाजपा के दल ने पूर्ण आयोग से मुलाकात की.
यही गैर-बराबरी वाला रवैया “वोट चोरी” विवाद में भी दिखाई दिया. राहुल गांधी ने सात अगस्त, 2025 को आंकड़े पेश करके बेंगलूरू सेंट्रल के महादेवपुरा खंड में 1,00,250 संदिग्ध नाम दर्ज होने का आरोप लगाया. ज्ञानेश कुमार ने मुख्य चुनाव आयुक्त के तौर पर 17 अगस्त को अपनी पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि कांग्रेस नेता सात दिनों के भीतर हलफनामा दें या देश से माफी मांगें.
कुछ दिन बाद भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर ने रायबरेली, वायनाड, डायमंड हार्बर, कन्नौज और विपक्ष के कब्जे वाली अन्य सीटों पर “फर्जी” तथा “संदिग्ध” मतदाताओं को लेकर ऐसे ही दावे किए. उनसे कोई हलफनामा नहीं मांगा गया.
नवंबर 2025 में राहुल गांधी की “एच फाइल्स” ने हरियाणा में करीब 25 लाख संदिग्ध नाम होने का आरोप लगाया तो राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने जवाब दिया कि 4.16 लाख से ज्यादा दावों पर बिना किसी अपील के कार्रवाई पूरी हो चुकी थी और 86,790 पोलिंग एजेंटों ने कोई आपत्ति नहीं उठाई थी.
सबूतों तक पहुंच भी सीमित कर दी गई है. हरियाणा चुनाव के रिकॉर्ड मांगने वाली कानूनी कार्रवाई के बाद केंद्र ने चुनाव आयोग से सलाह करके दिसंबर 2024 में चुनाव संचालन नियमों के नियम 93(2)(ए) में बदलाव कर दिया और सीसीटीवी तथा वेबकास्टिंग रिकॉर्डिंग तक आम लोगों की पहुंच घटा दी.
मई 2025 में चुनाव आयोग ने निर्देश दिया कि नतीजे आने के 45 दिनों के भीतर कोई चुनाव याचिका दायर न होने पर ऐसी रिकॉर्डिंग नष्ट कर दी जाए. मतदाताओं की प्रोफाइल तैयार किए जाने के खतरे का हवाला देते हुए आयोग ने महाराष्ट्र में शाम पांच बजे के बाद की फुटेज देने की राहुल गांधी की मांग भी खारिज कर दी. इस संशोधन को जयराम रमेश ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिस पर फैसला आना बाकी है.
पार्टियों में टूट से जुड़े फैसलों ने भी पक्षपात की धारणा मजबूत की है. आलोचक उन गुटों के पक्ष में आयोग के फैसलों की ओर इशारा करते हैं जो भाजपा के साथ थे. मसलन, फरवरी 2023 में एकनाथ शिंदे की शिवसेना और फरवरी 2024 में अजित पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के पक्ष में फैसले हुए. दोनों फैसलों को कोर्ट में चुनौती दी गई है. तृणमूल कांग्रेस इसका सबसे नया इम्तिहान है.
पश्चिम बंगाल के उपचुनावों से पहले आयोग ने एक अंतरिम आदेश में तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव निशान पर रोक लगा दी और दोनों विरोधी गुटों को डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस तथा ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस नाम दिए. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को विवाद का जल्द निबटारा करने को कहा. अदालत ने 28 सितंबर को गुटों को चार हफ्ते में दलील रखने और आयोग को तीन महीने का समय दिया.
कैसे बहाल हो साख
आयोग के भीतर के नोट सामने आने से पहले ही सियासी दबाव बढ़ने लगा था. मार्च में 193 सांसदों ने मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग वाला नोटिस दिया था, जिसे अप्रैल में खारिज कर दिया गया. राहुल गांधी ने उसके बाद भाजपा, आरएसएस और चुनाव आयोग पर “देशद्रोह” का आरोप लगाते हुए ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की.
अखिलेश यादव ने भी यही मांग उठाई. कांग्रेस कार्यसमिति ने कथित “वोट चोरी” को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे, ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त के पद से हटाने, एसआइआर पर रोक लगाने और काटे गए नामों को मतदाता सूचियों में बहाल करने की मांग की है. कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मुकदमा चलाने, एसआइआर रोकने और 2023 का कानून रद्द करने की मांग की है.
इसके बाद कानूनी कार्रवाई भी शुरू हो गई. तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने 24 सितंबर को ज्ञानेश कुमार के खिलाफ एफआइआर दर्ज करने की मांग की. वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की जनहित याचिका में सुप्रीम कोर्ट से उन फैसलों और सॉफ्टवेयर बदलावों को रद्द करने की मांग की गई है, जो पूर्ण आयोग की मंजूरी के बिना या धारा 18 के तहत उसके बहुमत की राय के खिलाफ किए गए.
इसमें ज्ञानेश कुमार, गर्ग और खन्ना के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने की मांग भी की गई है. बंबई हाइकोर्ट में दायर दो याचिकाओं में मुख्य चुनाव आयुक्त के जारी किए गए एसआइआर के 14 आदेश रद्द करने की मांग की गई है. एनडीए के सहयोगियों—लोक जनशक्ति पार्टी के चिराग पासवान, तेलुगु देशम पार्टी के लावू श्रीकृष्ण देवरायलु और राष्ट्रीय लोक मोर्चा के उपेंद्र कुशवाहा—ने भी आयोग से स्थिति साफ करने को कहा, हालांकि बाद में इन दलों ने आयोग की कार्रवाई पर अपना भरोसा दोहराया.
चुनाव आयोग के सामने केवल कानूनी चुनौती नहीं है. यह उसकी साख का भी सवाल है. आयोग को न सिर्फ अपने भीतर उठी असहमति से निबटना होगा, बल्कि शक्तियों के इस्तेमाल के तरीके पर मतदाताओं, सियासी दलों और अदालतों के सवालों का भी जवाब देना होगा. ऐसा करके ही वह दिखा सकेगा कि देश का चुनावी अंपायर केवल स्वतंत्र ही नहीं है, बल्कि साफ तौर पर स्वतंत्र नजर भी आता है.