शिक्षा और रोजगार में नहीं मेल

दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था को जिन हुनरमंद कामगारों की जरूरत है, उन्हें तैयार करने में हमारी पुरानी पड़ चुकी उच्च शिक्षा व्यवस्था नाकाम क्यों

तब (बाएं): 2020 में दिल्ली यूनिवर्सिटी से बीए करने के बाद युवा सुधीर को सुरक्षा सेवाओं में नौकरी मिलने की उम्मीद थी; अब: नौकरी हासिल करने में नाकाम रहने के बाद 28 साल के सुधीर सड़क किनारे दर्जी का काम करते हैं

लक्ष्मी नगर, दिल्ली में रहने वाले अर्जुन माहिर बढ़ई हैं और पिछले 25 साल से यही काम कर रहे हैं. उन्हें ज्यादातर काम लोगों की सिफारिश से मिलता रहा. काम की कभी कमी नहीं हुई. हालांकि उनके बेटे पिता के नक्शेकदम पर नहीं चलना चाहते थे. उन्होंने पढ़ाई करके पक्की तनख्वाह वाली नौकरी करना बेहतर समझा.

अर्जुन के बड़े बेटे 28 वर्षीय पंकज कुमार ने बीए किया और बिहार में अपने गृह जिले गया के औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (आइटीआइ) से फिटर का दो साल का कोर्स पूरा किया. फिर उन्हें एक ऑटो कंपनी में सालभर की अप्रेंटिसशिप मिली, लेकिन वह स्थायी नौकरी में नहीं बदल सकी. फिर उन्होंने 12-18 महीने छोटे-मोटे काम करते और दफ्तर की नौकरी तलाशते हुए गुजारे.

आखिर उन्हें गुरुग्राम में नौकरी मिली, लेकिन कंपनी सिर्फ 12,000 रु. महीने दे रही थी. सो, उन्होंने कीर्ति नगर के फर्नीचर बाजार में प्लाइवुड की दुकान पर काम पकड़ लिया. अर्जुन कहते हैं, “अब वह दफ्तर की नौकरी से दोगुने से भी ज्यादा कमा रहा है. उसे बोनस और प्रोविडेंट फंड भी मिलता है.” उनके 26 वर्षीय छोटे बेटे विक्की कुमार ने भी ग्रेजुएशन पूरा कर लिया है और अब गया में ही किसी सरकारी स्कूल में शिक्षक की नौकरी तलाश रहा है.

टूटती-बंधती उम्मीदें

सुधीर शुरू से अच्छे विद्यार्थी थे. उन्होंने 7.8 सीजीपीए के साथ कक्षा 12 पास की. फिर बीए का कोर्स दिल्ली से सेकंड डिविजन में पूरा किया. वे सीआइएसएफ और दिल्ली पुलिस की परीक्षाओं में बैठना चाहते थे लेकिन ये परीक्षाएं पास नहीं कर पाए, क्योंकि उनके दर्जी पिता की सेहत बिगड़ने लगी और घर चलाने के लिए उन्हें काम खोजना पड़ा. फौरन वे यही कर सकते थे कि स्थानीय दर्जियों और यूट्यूब से टेलरिंग की बुनियादी बातें सीखें और डिफेंस कॉलोनी में अपने पिता का कारोबार संभाल लें.

वकील के दफ्तर में क्लर्की करके उन्हें 10,000-12,000 रुपए महीना मिल जाते, लेकिन यह विकल्प उन्हें छोड़ना पड़ा. “मुझे पता है कि साल-दो साल बाद मैं ज्यादा कमा सकता था, लेकिन एक महीने भी मैं इससे कम कमाना गवारा नहीं कर सकता था.” साल-दर-साल बीतने के साथ उसकी जिम्मेदारियां बढ़ती गईं क्योंकि उसने शादी की और गांव में अपना घर बनवाने के लिए कर्ज लिया. आज सुधीर अपनी सिलाई मशीन पर झुके-झुके सुबह 10 बजे से रात 10 बजे तक काम करता है. कभी-कभी रात में ड्राइवरी का अतिरिक्त काम भी कर लेता है. —सोनल खेत्रपाल

अर्जुन और उनके बेटे देश के रोजगार बाजार के उस चिंताजनक विरोधाभास की मिसाल हैं, जिसमें ज्यादा युवा पारंपरिक हुनर और काम-धंधे छोड़कर डिग्री लेना पसंद कर रहे हैं, लेकिन बाद में पता चलता है कि उनकी पढ़ाई उन्हें मनचाही नौकरी या आमदनी नहीं दिला रही. विश्व बैंक के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में 7.6 फीसद की दर से बढ़ी और बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज रफ्तार दर्ज करने वाली अर्थव्यवस्था में यह बेमेल खास तौर पर चौंकाता है.

देश में 15-29 साल की उम्र के 36.7 करोड़ युवा हैं. यह संख्या अमेरिका की पूरी आबादी से भी ज्यादा है. उनमें 19.8 करोड़ यानी 54 फीसद युवा श्रम बाजार से बाहर हैं. मतलब यह कि वे न काम कर रहे हैं और न काम तलाश रहे हैं. बाकी बचे 16.9 करोड़ युवाओं में से 1.7 करोड़ बेरोजगार हैं.

नौकरी या काम करने वाले 15.2 करोड़ युवाओं में सिर्फ 1.8 करोड़ यानी 11.8 फीसद को सामाजिक सुरक्षा के साथ नियमित तनख्वाह वाली नौकरी मिली हुई है. बाकी 13.4 करोड़ युवा असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं, जहां रोजगार सुरक्षित नहीं है.

उनमें सामाजिक सुरक्षा के बिना नियमित वेतन वाला काम, छोटा-मोटा कारोबार, दिहाड़ी मजदूरी और प्लेटफॉर्म या गिग वर्क शामिल हैं. ये आंकड़े व्यावहारिक रिसर्च संगठन जस्टजॉब्स नेटवर्क के सावधिक श्रम बल सर्वे (पीएलएफएस) 2025 के विश्लेषण से सामने आए हैं.

यह तब है जब देश के युवा पहले से कहीं ज्यादा पढ़े-लिखे हैं. जस्टजॉब्स नेटवर्क के विश्लेषण के मुताबिक, 2022 से 2025 के बीच 15-29 साल के ऐसे युवाओं की हिस्सेदारी 56.5 फीसद से बढ़कर 62.6 फीसद हो गई, जिन्होंने माध्यमिक या उससे ऊपर तक पढ़ाई की है. मगर ज्यादा पढ़ाई का मतलब जरूरी तौर पर बेहतर रोजगार नहीं रहा.

कंसल्टिंग कंपनी मर्सर ने अपने ग्रेजुएट स्किल इंडेक्स 2025 के लिए करीब दस लाख छात्रों की पड़ताल की. उसके मुताबिक, देश के सिर्फ 42.6 फीसद ग्रेजुएट नौकरी करने लायक हैं. यह बेमेल बेरोजगारी के आंकड़ों में साफ दिखाई देता है. युवा बेरोजगारी दर 10 फीसद है, जो देश की कुल बेरोजगारी दर से तीन गुना ज्यादा है.

जस्टजॉब्स नेटवर्क के मुताबिक, ग्रेजुएट और उससे ज्यादा पढ़े-लिखे लोगों में यह दर बढ़कर 22.7 फीसद हो जाती है, जबकि माध्यमिक स्तर तक पढ़े लोगों में यह आठ फीसद है. हर साल 70-80 लाख नए युवाओं के कामकाजी आबादी में शामिल होने से इन बेरोजगारों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है.

नौकरी मिलने के बाद भी सिर्फ 8.25 फीसद ग्रेजुएट ऐसे काम में हैं, जो उनकी पढ़ाई और योग्यता से मेल खाता है. आर्थिक सर्वे 2024-25 में भी उसका जिक्र है. नीति आयोग की 2026 की रिपोर्ट ‘रीइमेजिनिंग स्किलिंग फॉर विकसित भारत@2047’ के मुताबिक, इसकी एक वजह सामान्य डिग्री कोर्सों में छात्रों की बहुत ज्यादा संख्या और इन कोर्सों का नौकरियों से कमजोर जुड़ाव है.

अंडरग्रेजुएट कोर्सों में दाखिला लेने वाले 3.4 करोड़ छात्रों में 1.13 करोड़ बीए कर रहे हैं. बीए, बीएससी और बीकॉम में दाखिल छात्रों की कुल संख्या दो करोड़ से ज्यादा है. दूसरी तरफ देशभर के नियोक्ताओं को सही हुनर वाले नहीं मिल रहे. मैनपावरग्रुप के 2026 ग्लोबल टैलेंट शॉर्टेज सर्वे के मुताबिक, देश में 82 फीसद नियोक्ताओं को हुनरमंद लोग नहीं मिल पाते. यह 72 फीसद के वैश्विक औसत से काफी ज्यादा है.

यह रोजगार बाजार में मांग और आपूर्ति का तालमेल टूटने का जाना-पहचाना मामला है. युवा नौकरियां खोज रहे हैं और उद्योग हुनरमंद लोग, क्योंकि कंपनियों को जिस काबिलयत की जरूरत है, शिक्षा तंत्र वह हुनर नहीं दे रहा. नतीजा बेमेल रोजगार बाजार है.

नीति आयोग की रिपोर्ट शिक्षा, हुनर और रोजगार के पूरे तंत्र में मौजूद कई टूटी हुई कड़ियों की ओर ध्यान दिलाती है. नौकरी की तलाश करते उम्मीदवारों की उम्मीदें अक्सर नौकरी बाजार की असलियत से अलग होती हैं. पाठ्यक्रम पुराने हैं और उद्योगों की जरूरतों से मेल नहीं खाते.

चाय में गुजर-बसर

अपने मजदूर पिता की मौत के वक्त शाहीन महज पांच साल की थीं. उन्होंने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई का खर्च उठाया. 2011 में उन्होंने लखनऊ के शशिभूषण डिग्री कॉलेज से समाजशास्त्र और राजनीति विज्ञान में डिग्री के साथ स्नातक किया और डेस्कटॉप पब्लिशिंग और कॉस्मेटोलॉजी में डिप्लोमा कोर्स भी किए.

शाहीन के पास योग्यताएं थीं, लेकिन उनसे मेल खाती नौकरी उन्हें नहीं मिल सकी. उन्होंने निजी फर्मों में काम करने की कोशिश की, लेकिन कम तनख्वाह में बहुत ज्यादा वक्त काम करने का कोई मतलब नहीं था. मई 2022 में उन्होंने अपना काम शुरू करने का फैसला किया.

हजरतगंज में तुलसी थिएटर के सामने टी स्टॉल खोला. वे बताती हैं, “कुकिंग में मेरी दिलचस्पी है और उसी को मैंने अपने कारोबार में बदल लिया.” यह ‘लखनऊ की चायवाली’ सुबह 7 बजे से रात 10 बजे तक काम करती है और उसने अपने ग्राहक तैयार कर लिए हैं.

सेना के लोगों की यहां विशेष आवभगत की जाती है: उनसे वे चाय के पैसे नहीं लेतीं. यह उनके टी स्टॉल को खास बनाता है. वे कहती हैं, “मैं हर लड़की को बताना चाहती हूं कि किसी भी काम को पूरे दिल से करो तो कुछ भी नामुमकिन नहीं है. सबसे बड़ी फायदा यह है कि मैं खुद आपनी बॉस हूं. मैं किसी निजी क्षेत्र की कंपनी में नौकरी से ज्यादा कमाती हूं.” —आशीष मिश्र

शाहीन अंसारी, लखनऊ

बेमेल 1
काबिलियत की कमी
दशकों से आइटीआइ देश में हुनर सिखाने वाली व्यवस्था की रीढ़ रहे हैं. उनमें छह महीने से दो साल तक के कोर्स चलते हैं. नई टेक्नोलॉजी में अपना हुनर बढ़ाने के इच्छुक लोगों के लिए कुछ हफ्तों के छोटे कोर्स भी होते हैं. दसवीं या बारहवीं के बाद कराए जाने वाले इन व्यावसायिक प्रशिक्षण कोर्सों का मकसद छात्रों को उद्योगों की जरूरत के मुताबिक हुनर देना है.

ये कोर्स इलेक्ट्रिशियन, वेल्डर, मशीन ऑपरेटर, कार मैकेनिक और एयर-कंडिशनिंग टेक्नीशियन जैसे हाथ से किए जाने वाले तकनीकी कामों को औपचारिक सर्टिफिकेट और इज्जत भी देते हैं. सरकारी आइटीआइ की फीस पर भारी सब्सिडी मिलती है और यह सालाना 1,000 रु. से शुरू होती है. निजी आइटीआइ कहीं ज्यादा महंगे हैं. वहां कोर्स के हिसाब से फीस सालाना 10,000 रु. से 50,000 रु. तक हो सकती है.

फिलहाल देश में 14,789 आइटीआइ हैं, जिनमें 25,38,487 सीटें हैं लेकिन इनमें सिर्फ 48.2 फीसद सीटें भरती हैं. यानी लगभग हर दो में से एक सीट खाली रहती है. यह बात नीति आयोग की 2023 की रिपोर्ट ‘ट्रांसफॉर्मिंग इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट्स’ में सामने आई है.

इसी वजह से आइटीआइ हर साल सिर्फ 7-10 लाख कामगार तैयार करते हैं जबकि यह संख्या दोगुनी हो सकती है. इसके बाद की तस्वीर और खराब है. केंद्रीय कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय (एमएसडीई) के 2024 के ट्रेसर अध्ययन के मुताबिक, आइटीआइ से पास होने वाले सिर्फ 39.5 फीसद लोगों को रोजगार मिला और 9.5 फीसद अप्रेंटिस के तौर पर काम कर रहे थे.

नतीजतन, देश की कामकाजी उम्र वाली आबादी (15-59 साल) में सिर्फ 4.1 फीसद लोगों ने औपचारिक प्रशिक्षण लिया है. आइटीआइ सर्टिफिकेट से वेतन में कोई खास बढ़ोतरी नहीं होती, सो 30.6 फीसद छात्र अनौपचारिक प्रशिक्षण चुनते हैं. पीएलएफएस 2023-24 में भी यह बात सामने आई है.

अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के असिस्टेंट प्रोफेसर तमोघ्न हलदार कहते हैं, “आइटीआइ को उच्च शिक्षा संस्थानों जैसी प्रतिष्ठा हासिल नहीं है. यह उन लोगों के लिए मजबूरी का विकल्प है, जिनकी पहुंच उच्च शिक्षा तक नहीं है.” वे कहते हैं कि देश में शारीरिक श्रम वाले काम ऐतिहासिक रूप से हाशिए की जातियों से जुड़े रहे हैं.

इसलिए युवा ऐसे काम से बाहर निकलना चाहते हैं. उनकी उम्मीद डिग्री लेकर सम्मान और दफ्तर की नौकरी पाने की होती है. ‘स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026’ में प्रकाशित उनके शोध से पता चलता है कि आइटीआइ के 77.4 फीसद छात्र वंचित तबकों से आते हैं. इनमें अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्र हैं.

खराब नतीजों की एक वजह यह है कि आइटीआइ के कोर्स पुराने हो चुके हैं. नीति आयोग की 2023 की रिपोर्ट में पता चला कि आइटीआइटी के कई कोर्स उद्योगों की जरूरतों से कई साल पीछे हैं. कुछ संस्थान तब भी एचटीएमएल पढ़ा रहे थे, जब उद्योग पाइथन की ओर बढ़ चुका था.

नेशनल काउंसिल फॉर वोकेशनल एजुकेशन ऐंड ट्रेनिंग (एनसीवीईटी) की पूर्व कार्यकारी सदस्य विनीता अग्रवाल कहती हैं कि नियामक संस्था ने इसके बाद कोर्सों की छंटाई की. मौजूदा रोजगार बाजार में कम उपयोगी करीब 7,147 योग्यताओं को हटा दिया गया. हुनर के मानक तैयार करने, सर्टिफिकेट देने और उनकी गुणवत्ता बनाए रखने वाली संस्थाएं करीब 3,221 योग्यताओं में से चुनाव कर सकती हैं.

हालांकि उद्योग जगत का कहना है कि समस्या अब भी बनी हुई है. जिंदल स्टेनलेस की स्टेनलेस एकेडमी की प्रमुख भावना चोपड़ा श्रीकृष्ण प्रशिक्षण और उद्योगों की उभरती जरूरतों के बीच दूरी की ओर इशारा करती हैं. सुरंगों, रेलवे कोच, मेट्रो और बर्तनों में स्टेनलेस स्टील का इस्तेमाल बढ़ रहा है, लेकिन उनके मुताबिक आइटीआइ और पॉलिटेक्निक के वेल्डिंग कोर्स अब भी मुख्य रूप से सामान्य स्टील पर केंद्रित हैं.

वे कहती हैं, “पॉलिटेक्निक और आइटीआइ में वेल्डर के कोर्स बड़े पैमाने पर उपलब्ध हैं, लेकिन उनमें अब भी स्टेनलेस स्टील की वेल्डिंग नहीं सिखाई जाती.” इसी कमी की वजह से जिंदल स्टेनलेस ने 2018 में अपनी एकेडमी शुरू की. इसके बाद उसने स्टेनलेस स्टील की पढ़ाई के लिए सात-आठ इंजीनियरिंग कॉलेजों और पॉलिटेक्निक संस्थानों से समझौता किया और अब सर्टिफिकेट देने वाली संस्था बनने के लिए आवेदन किया है.

ऑटोमोटिव स्किल्स डेवलपमेंट काउंसिल के सीईओ प्रसन्न पहाड़े कहते हैं कि कुछ संस्थान अब कंप्यूटर न्यूमेरिकल कंट्रोल (सीएनसी) मशीनों, प्रोग्रामेबल लॉजिक कंट्रोलर (पीएलसी), रोबोटिक्स और इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) सिस्टम से छात्रों को परिचित करा रहे हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर आधुनिकीकरण की अब भी जरूरत है.

आइटीआइ की पढ़ाई का रोजगार बाजार से जुड़ाव भी एक समस्या है. इनके कोर्सों का झुकाव अब भी मैन्युफैक्चरिंग की ओर बहुत ज्यादा है, जबकि देश की जीडीपी में सर्विस सेक्टर की हिस्सेदारी 50 फीसद से अधिक है. इसकी एक वजह यह है कि आइटीआइ मुख्य रूप से उद्योगों की जरूरतें पूरी करने के लिए बनाए गए थे. इसलिए छात्र भी उन्हें औद्योगिक काम-धंधों से जोड़कर देखते हैं.

मैन्युफैक्चरिंग में करिअर की राह तय है, मसलन, इलेक्ट्रिशियन से टेक्नीशियन और फिर सुपरवाइजर तक पहुंचा जा सकता है. लेकिन सर्विस सेक्टर में आगे बढ़ने का ऐसा साफ रास्ता नहीं है. यही वजह है कि विभिन्न आइटीआइ में इंजीनियरिंग और गैर-इंजीनियरिंग के लगभग बराबर कोर्स होने के बावजूद—क्रमशः 86 और 78—करीब 85 फीसद छात्र मैन्युफैक्चरिंग के कामों में दाखिला लेते हैं.

यह बात नीति आयोग के 2026 के वर्किंग पेपर ‘एजुकेशन ऐंड स्किलिंग फॉर एम्प्लॉयमेंट: फ्रॉम क्रेडेंशियल्स टु लर्निंग आउटकम्स’ में है. पढ़ाई तय करने में भूमिका निभाने वाले ट्रेनरों की भी भारी कमी है. नीति आयोग के वर्किंग पेपर के मुताबिक, जुलाई 2025 तक आइटीआइ में मंजूर ट्रेनरों के 2,17,724 पदों में सिर्फ 46.9 फीसद भरे गए थे.

आइटीआइ के निजीकरण ने उनकी गुणवत्ता को लेकर चिंता की एक और परत जोड़ दी है. ‘स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026’ रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2000 के बाद आइटीआइ का ज्यादातर विस्तार निजी क्षेत्र के सहारे हुआ. अब 70 फीसद से ज्यादा आइटीआइ निजी हाथों में हैं. इसके उलट, 1980 के दशक से पहले 80 फीसद आइटीआइ सरकार चलाती थी.

कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय की आइटीआइ रैंकिंग के विश्लेषण से संकेत मिलता है कि निजी आइटीआइ के गुणवत्ता के पैमानों पर पिछड़ने की आशंका सरकारी संस्थानों से ज्यादा है. इनमें ट्रेनरों की योग्यता, पढ़ाने का तरीका और छात्रों का दाखिला शामिल हैं.

जस्टजॉब्स नेटवर्क की संस्थापक और एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर सबीना दीवान कहती हैं कि बुनियादी ढांचे, ट्रेनरों की गुणवत्ता और पाठ्यक्रम के अलावा आइटीआइ के हुनर सिखाने वाले पूरे तंत्र को बेहद स्थानीय जरूरतों के मुताबिक बनाना होगा. फिलहाल पूरे देश में लगभग एक जैसे कोर्स चल रहे हैं, जबकि उन्हें स्थानीय रोजगार बाजार की मांग के हिसाब से तय किया जाना चाहिए.

वे कहती हैं, “कोर्स उस इलाके के उद्योगों की बेहद स्थानीय जरूरतों के आधार पर तय होने चाहिए.” वे अंबाला की मिसाल देती हैं, जहां कभी मेडिकल उपकरण बनाने वाली कंपनियों का फलता-फूलता तंत्र था. यह उद्योग डूब गया. इसकी एक वजह यह भी थी कि इलाके के आइटीआइ ने इस क्षेत्र के लिए हुनरमंद लोग तैयार नहीं किए. वे कहती हैं, “जब स्थानीय स्तर पर कामगारों की मांग के बारीक आंकड़े उपलब्ध होंगे और प्रशिक्षण को उस मांग से जोड़ा जाएगा, तभी असली बदलाव आएगा.”

सरकार का कहना है कि वह विकेंद्रीकरण की दिशा में बढ़ रही है. कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय के मुताबिक, अब राज्यों और जिलों के स्तर पर हुनर विकास की योजनाएं तैयार की जा रही हैं. उनमें स्थानीय उद्योगों, कामगारों की उपलब्धता, लोगों के आने-जाने के रुझान, प्रशिक्षण की क्षमता और उभरती नौकरियों का नक्शा बनाया जाता है.

वर्ष 2024-25 में जिलों की 746 और राज्यों की 28 योजनाएं सौंपी गईं. मंत्रालय सरकारी योजनाओं के लक्ष्यों और खर्च को जिलों की मांग से जोड़ने पर काम कर रहा है. मंत्रालय का कहना है, “यह अहम बदलाव है. अब प्रशिक्षण के मौके प्रशासनिक तरीके से बांटने के बजाए हर इलाके की आर्थिक पहचान और जरूरत के हिसाब से योजना बन रही है.”

कामगारों की अनुमानित कमी इस काम की जल्द जरूरत बताती है. स्टाफिंग कंपनी क्वेस का अनुमान है कि 2031 तक देश में निर्माण और बुनियादी ढांचा क्षेत्र में 18 लाख कामगारों की कमी हो सकती है.

इलेक्ट्रिशियन, वेल्डर, प्लंबर, फिटर और एचवीएसी टेक्नीशियन समेत हुनरमंद पेशेवरों की कमी 13 लाख तक पहुंच सकती है. इसके अलावा 5,98,026 नर्सों और उनसे जुड़े स्वास्थ्यकर्मियों तथा पर्यटन और होटल क्षेत्र में 9,46,543 कामगारों की कमी हो सकती है. कुल 19 क्षेत्रों में कामगारों की कुल कमी करीब 99 लाख तक पहुंचने का अंदेशा है.

सिएट के चीफ ह्यूमन रिसोर्स ऑफिसर राहुल गामा कहते हैं कि उन नौकरियों के लिए लोग खोजना सबसे मुश्किल है, जिनमें पारंपरिक हुनर और नई टेक्नोलॉजी दोनों की जरूरत पड़ती है. उनमें स्वचालित और आधी स्वचालित क्योरिंग तथा मोल्डिंग लाइन पर काम कर सकने वाले माहिर मशीन ऑपरेटर, मैकेनिकल और इलेक्ट्रॉनिक दोनों सिस्टम समझने वाले मेंटेनेंस टेक्नीशियन और आधुनिक जांच तथा डेटा विश्लेषण के औजारों की ट्रेनिंग पा चुके क्वालिटी कंट्रोल इंस्पेक्टर शामिल हैं.

वे कहते हैं, “इन कामों के लिए डिजिटल डैशबोर्ड की व्यावहारिक समझ, बुनियादी खराबियां तलाशने का तरीका और सुरक्षा नियमों की ऐसी जानकारी चाहिए जो पारंपरिक पाठ्यक्रम में पढ़ाई जाने वाली बातों से कहीं आगे है.” उनके मुताबिक, कारखानों में तेजी से आ रहे आधुनिक बदलावों की रफ्तार के साथ हुनरमंद लोगों की सप्लाइ नहीं बढ़ी है. वे कहते हैं, “कई उम्मीदवार सैद्धांतिक सर्टिफिकेट लेकर आते हैं, लेकिन सही मायने में काम करने लायक बनने से पहले उन्हें तीन से छह महीने तक तय ढंग से काम के दौरान प्रशिक्षण देना पड़ता है.”

सरकार भी कहती है कि उसका तरीका बदल रहा है. कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय ने कहा, “देश का हुनर विकास अभियान अब ज्यादा परिपक्व दौर में प्रवेश कर रहा है. प्रशिक्षण को अब अलग-थलग गतिविधि के बजाए ऐसे पूरे तंत्र के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें हुनर को रोजगार, उत्पादकता, कारोबार शुरू करने और आगे बढ़ने के अवसरों से जोड़ा जाता है.” इसकी एक मिसाल प्रधानमंत्री स्किलिंग ऐंड एम्प्लॉयबिलिटी ट्रांसफॉर्मेशन थ्रू अपग्रेडेड आइटीआइ (पीएम-सेतु) योजना है. इसके तहत 60,000 करोड़ रु. के निवेश से 1,000 सरकारी आइटीआइ को बेहतर बनाने का प्रस्ताव है.

उनमें 200 हब संस्थान और 800 स्पोक संस्थान होंगे. मंत्रालय के मुताबिक, इस योजना का फर्क यह है कि “उद्योगों की भागीदारी को इसके ढांचे का हिस्सा बनाया गया है.” इसी साल मई में अंदरूनी समीक्षा के बाद डायरेक्टरेट जनरल ऑफ ट्रेनिंग ने ऐसे 611 आइटीआइ की मान्यता भी खत्म कर दी, जो काम नहीं कर रहे थे और जिनमें 2022 से 2025 तक लगातार चार साल कोई दाखिला नहीं हुआ था लेकिन कमजोर बुनियाद पर खड़ी व्यवस्था को बेहतर बनाने भर से जरूरी नहीं कि मनचाहे नतीजे मिल जाएं.

बेमेल 2
उद्योगों के हाथ हुनर की ट्रेनिंग
सरकार अकेले हुनरमंद कामगारों की कमी की समस्या हल नहीं कर सकती. उद्योगों की भागीदारी इसलिए जरूरी है कि वे अपनी जरूरत के हुनर तय करें, आइटीआइ के साथ मिलकर पाठ्यक्रम बनाएं, अप्रेंटिस रखें और कर्मचारियों का हुनर बढ़ाने में पैसा लगाएं. मगर नीति आयोग के 2026 के वर्किंग पेपर के मुताबिक, देश की सिर्फ 7.7 फीसद कंपनियां कर्मचारियों को प्रशिक्षण देती हैं.

एनसीवीईटी की अग्रवाल उद्योगों से हुनर की ट्रेनिंग में ज्यादा भागीदारी की अपील करती हैं. वे पूछती हैं, “आखिर हम हुनर सिखा किसके लिए रहे हैं?” वे कहती हैं, “मंत्रालय और एनसीवीईटी ने उद्योगों को इस मंच पर लाने की बहुत कोशिश की है, लेकिन हमें उनकी ओर से आगे बढ़कर सहयोग करने वाली प्रतिक्रिया नहीं मिलती.”

इस समस्या से निबटने के लिए सरकार का मुख्य जरिया राष्ट्रीय अप्रेंटिसशिप प्रोत्साहन योजना (एनएपीएस) रही है. वर्ष 2016 में शुरू की गई यह योजना अलग-अलग क्षेत्रों में 14 से 35 साल के उम्मीदवारों को काम के दौरान प्रशिक्षण देती है ताकि वे कमाई के साथ सीख भी सकें. योजना के तहत अप्रेंटिस को हर महीने 6,800 रु. से 12,300 रु. तक स्टाइपेंड मिलती है. सरकार तय स्टाइपेंड का 25 फीसद हिस्सा नियोक्ताओं को वापस करती है, जिसकी सीमा प्रति अप्रेंटिस हर महीने 1,500 रु. है.

लेकिन दोनों तरफ से भागीदारी कम बनी हुई है. एनएपीएस में रजिस्टर्ड 1,95,939 संस्थानों में वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान सिर्फ 26 फीसद (51,133) सक्रिय थे. दूसरी तरफ 13 लाख उम्मीदवारों ने रजिस्ट्रेशन कराया, लेकिन सिर्फ 75.3 फीसद (9,85,000) प्रशिक्षण में शामिल हुए. इनमें से केवल 25.4 फीसद (2,51,000) ने वित्त वर्ष 2024-25 में ट्रेनिंग पूरी की. ये आंकड़े नीति आयोग की फरवरी 2026 की रिपोर्ट ‘रिवाइटलाइजिंग इंडियाज अप्रेंटिसशिप इकोसिस्टम’ में हैं.

उद्योगों की कम भागीदारी पर सीआइआइ नेशनल कमेटी ऑन स्किल्स के चेयरमैन और ब्लू स्टार के मैनेजिंग डायरेक्टर बी. त्यागराजन कहते हैं कि बड़े उद्योगों को ज्यादा मुश्किल नहीं होती, लेकिन सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्यमों (एमएसएमई) को दिक्कत आती है. अप्रेंटिस के बीच में प्रशिक्षण छोड़ने की ऊंची दर के बारे में उनका कहना है कि अप्रेंटिसशिप के दौरान मिला अनुभव अक्सर उन्हें दूसरी जगह नौकरी दिला देता है. उनके मुताबिक, जरूरी नहीं कि इसे खराब बात मान जाए.

फिर भी जर्मनी के मुकाबले भारत में अप्रेंटिसशिप में भागीदारी कम है. जर्मनी में अप्रेंटिस और इंटर्न कुल कामकाजी आबादी का 2.7 फीसद हैं. टीमलीज सर्विसेज के सह-संस्थापक मनीष सभरवाल कहते हैं कि समस्या की एक वजह अप्रेंटिसशिप के मकसद को ठीक से न समझना है.

वे कहते हैं, “हम अप्रेंटिसशिप को नौकरी की तरह देखते हैं और यही गलती है. अप्रेंटिसशिप एक क्लासरूम है.” लेकिन यह ऐसा क्लासरूम है, जहां उम्मीदवार कारखाने में असली समस्याएं हल करते हैं, दूसरे कामगारों को देखकर सीखते हैं और काबिलियत विकसित करते हैं.

हालांकि इसकी ज्यादा गहरी समस्या पैसे की हैः हुनर सिखाने का खर्च कौन उठाए? सभरवाल कहते हैं, “हुनर विकास में हमारी फंडिंग व्यवस्था नाकाम है,” क्योंकि नियोक्ताओं को “अपने कर्मचारी खुद तैयार करने” के लिए बहुत कम आर्थिक फायदा मिलता है. तीन खतरे नियोक्ताओं के लिए प्रशिक्षण पर लगाए पैसे का फायदा हासिल करना मुश्किल बनाते हैं.

सभरवाल उन्हें “बाल्टी में तीन छेद” कहते हैं. एक, सीखने का जोखिम है, जिसमें कंपनी ट्रेनिंग पर पैसा लगाती है, लेकिन उम्मीदवार सीख नहीं पाता. दूसरे, ट्रेनिंग के बाद कर्मचारी काम करने लायक बनता है, लेकिन दूसरी नौकरी में चला जाता है. तीसरे, उत्पादकता का जोखिम है, जिसमें कंपनी ट्रेनिंग पर पैसा खर्च करती है, फिर भी उम्मीदवार ठीक से काम करने लायक नहीं बन पाता.

भारतीय कुटीर, लघु और मझोले उद्योग परिसंघ (एफआइएसएमई) के महासचिव अनिल भारद्वाज कहते हैं कि छोटे कारोबारों के लिए पैसे की यह समस्या और भी गंभीर है. वे कहते हैं, “दिल्ली या तमिलनाडु में कोई युवा 10,000-15,000 रु. के लिए कारखाने में काम नहीं करना चाहेगा. वह इसके बजाए डिलिवरी का काम करना या बाइक टैक्सी चलाना पसंद करेगा.”

बिहार और झारखंड जैसे दूर के राज्यों से कामगार बुलाना भी आर्थिक रूप से फायदेमंद नहीं होता क्योंकि जिस शहर में उन्हें काम करना है वहां रहने का खर्च शुरुआती तनख्वाह के हिसाब से बहुत ज्यादा होता है.

इसके अलावा एमएसएमई आम तौर पर बहुत सीमित बजट पर चलते हैं. अक्सर उनके पास अलग एचआर या ट्रेनिंग विभाग भी नहीं होता. ऐसे में उत्पादन से जुड़े कर्मचारियों के लिए अपने लक्ष्य पूरे करते हुए नए लोगों को प्रशिक्षण देना मुश्किल हो जाता है.

सरकार ने 18-25 साल के युवाओं को बड़ी कंपनियों में इंटर्नशिप के मौके देने के लिए पीएम इंटर्नशिप योजना भी शुरू की थी. इंटर्न को हर महीने 9,000 रु. स्टाइपेंड, एक बार 6,000 रु. की मदद और बीमा कवर मिलता है. कॉर्पोरेट मामलों का मंत्रालय इस योजना को चला रहा है और धीरे-धीरे इसमें भागीदारी बढ़ रही है.

अप्रैल से दिसंबर 2026 तक चलने वाले तीसरे पायलट में 340 कंपनियों ने इंटर्नशिप के 1,22,000 मौके दिए. इनमें 15 जुलाई, 2026 तक 10,195 उम्मीदवार जॉइन करने पहुंच गए. यह संख्या पहले पायलट के 8,760 और दूसरे पायलट के 7,308 उम्मीदवारों से पहले ही ज्यादा हो चुकी है. 

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शिक्षा की कमियां
उच्च शिक्षा और हुनर सिखाने वाली व्यवस्था अब भी अलग-अलग पटरियों पर चल रही हैं. उच्च शिक्षा काफी हद तक उद्योगों की मांग से भी कटी हुई है. देश कई दशकों से स्कूलों में रोजगारपरक शिक्षा शुरू करने की कोशिश कर रहा है. इस दिशा में सबसे नई कोशिश राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 है. उसे 2020 से चरणों में लागू करना शुरू किया गया.

इसमें छठी कक्षा से छात्रों को अलग-अलग काम-धंधों और हुनर का अनुभव दिलाने पर जोर है. साथ ही अकादमिक और रोजगारपरक शिक्षा के बीच सख्त बंटवारा खत्म करने की बात कही गई है. मकसद शुरुआत से ही व्यावहारिक सबक लेने को बढ़ावा देना और रोजगारपरक शिक्षा को मजबूरी के विकल्प के बजाए अपनी पसंद से चुना जाने वाला सम्मानजनक रास्ता बनाना था. हुनर वाले कामों से कम उम्र में परिचय मिलने पर सामाजिक झिझक भी कम हो सकती है.

इससे हुनरमंद कारीगरों के काम की कीमत और कमाई बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है लेकिन आज भी स्कूल रोजगारपरक शिक्षा को असरदार ढंग से अपनी पढ़ाई में शामिल करने के लिए तैयार नहीं हैं.जस्टजॉब्स नेटवर्क की दीवान कहती हैं, “फिलहाल इसे अपनाने वाले स्कूलों की संख्या बेहद कम है, क्योंकि स्कूल रोजगारपरक शिक्षा को कैसे लागू करें, इसका पाठ्यक्रम ढांचा हाल में ही बना है.” वे कहती हैं, “इसे असरदार तरीके से लागू करने के लिए कहीं ज्यादा तालमेल वाली और जोरदार कोशिश की जरूरत है.”

नीति आयोग की रिपोर्ट ‘स्कूल एजुकेशन सिस्टम इन इंडिया’ (2026) कई दूसरी समस्याओं की ओर भी ध्यान दिलाती है. ज्यादातर व्यावसायिक कोर्स वैकल्पिक विषय के रूप में पेश किए जाते हैं. उनकी पढ़ाई के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया जाता और अक्सर उन्हें पढ़ाई में कमजोर छात्रों के विकल्प के रूप में देखा जाता है.

कई स्कूलों में व्यावहारिक अनुभव से सीखने के लिए जरूरी सुविधाएं—वर्कशॉप, प्रयोगशालाएं और औद्योगिक उपकरण—मौजूद नहीं हैं. ट्रेनरों की भी भारी कमी है. रिपोर्ट में शिक्षा मंत्रालय की 2023 की समीक्षा का हवाला है, जिसमें कई राज्यों में व्यावसायिक ट्रेनरों के मंजूर पदों में 40 फीसद से ज्यादा खाली थे.

देश व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण (वीईटी) पर निवेश के मामले में भी पीछे है. नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) के दिसंबर 2025 के अध्ययन ‘इंडियाज एम्प्लॉयमेंट प्रॉस्पेक्ट्स: पाथवेज टु जॉब्स’ के मुताबिक, देश में 2021 में शिक्षा पर होने वाले कुल खर्च का सिर्फ करीब तीन फीसद व्यावसायिक प्रशिक्षण पर लगाया गया. इसके मुकाबले जर्मनी, सिंगापुर और कनाडा वीईटी संस्थानों पर शिक्षा बजट का 10-13 फीसद खर्च करते हैं. 

रितिक कुमार, वर्ष, पटना

यह रास्ता बंद है

मै ट्रिक करने के बाद 2024 में रितिक ने स्थानीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (आइटीआइ) से प्लंबिंग का कोर्स पूरा किया. उसे उम्मीद थी कि आखिरकार वह अपने परिवार की आमदनी में कुछ योगदान दे पाएगा. उसके पिता निजी अस्पताल में काम करते और करीब 12,000 रुपए महीना कमाते हैं. मगर बारंबार कोशिशें करने के बाद भी रितिक प्लंबिंग का काम नहीं खोज पाया.

उसने भर्ती एजेंसियों के कई चक्कर लगाए. लेकिन एक ही जवाब मिलता कि ज्यादातर मौके या तो महानगरों में हैं या विदेश और खासकर खाड़ी के देशों में हैं. उसकी आर्थिक पृष्ठभूमि भी ऐसी नहीं थी कि किसी दूसरे शहर या विदेश जा पाए या भर्ती का कमिशन दे पाए. लिहाजा, फौरन आमदनी के लिए रितिक ने कपड़े की दुकान में सेल्समैन का काम पकड़ लिया.

लेकिन उसने उम्मीद पूरी तरह छोड़ी नहीं है. वह पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट (पीएचईडी) सहित सरकारी महकमों में प्लंबिंग से जुड़े पदों के लिए आवेदन करता रहता है. उसे उम्मीद है कि अपने प्रशिक्षण के क्षेत्र में काम अंततः उसे मिल जाएगा. —अमिताभ श्रीवास्तव

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अरमान बनाम नौकरी की हकीकत
अक्सर कामगारों की कमी सिर्फ उनकी उपलब्धता का सवाल नहीं होती. इसका रिश्ता लोगों की दिलचस्पी और समाज में उस काम की छवि से भी होता है. हॉस्पिटैलिटी और पर्यटन क्षेत्र को ही लें. इसमें नौकरी शुरू करने की रुकावटें अपेक्षाकृत कम हैं.इस क्षेत्र में दाखिल होने की बाधाएं अपेक्षाकृत कम हैं.

क्वेस के अनुमान के मुताबिक, खर्च करने लायक आमदनी बढ़ने और घरेलू पर्यटन से मांग में तेजी के कारण 2031 तक इसे 14 लाख अतिरिक्त कामगारों की जरूरत होगी, फिर भी 9,46,543 कामगारों की कमी रहेगी. फिर भी सबसे बड़ी कमी रोजमर्रा का काम संभालने वाले और सुपरवाइजर स्तर पर है. इनमें शेफ और रसोई के पेशेवर, खाना और पेय परोसने वाले कर्मचारी, हाउसकीपिंग तथा फ्रंट ऑफिस स्टाफ, टेक्नीशियन और इंजीनियरिंग कर्मचारी शामिल हैं.

ऐसे कामगारों की मांग भी बढ़ रही है जो हॉस्पिटैलिटी के हुनर को डिजिटल टेक्नोलॉजी के साथ जोड़ सकें. फेडरेशन ऑफ एसोसिएशंस इन इंडियन टूरिज्म ऐंड हॉस्पिटैलिटी (फेथ) के सेक्रेटरी जनरल राजीव मेहरा कहते हैं, “हॉस्पिटैलिटी में कर्मचारियों को अक्सर सप्ताहांत, छुट्टियों और शिफ्टों में काम करना पड़ता है. कई होटल और दूसरी इकाइयां बड़े शहरी केंद्रों से बाहर हैं, जिससे हुनरमंद कामगारों की कमी होती है. युवा कामगारों के बीच यह धारणा भी है कि हॉस्पिटैलिटी में काम के हालात मुश्किल हैं जबकि करिअर में आगे बढ़ने के मौके उतने आकर्षक नहीं हैं.” 

स्वास्थ्य सेवा में भी ऐसी ही चुनौती है, खासकर नर्सों और इलाज की प्रक्रियाओं, उपकरणों तथा फिजियोथेरेपी के रूप में मददगार दूसरे हेल्थ टेक्नीशियन की नौकरियां भरने में. अनुभवी ऑपरेशन थिएटर नर्सों और कैंसर, दिल की बीमारियों तथा इमरजेंसी देखभाल में माहिर टेक्नीशियन की कमी खास तौर पर गंभीर है.

अपोलो हॉस्पिटल्स के ग्रुप चीफ ह्यूमन रिसोर्सेज ऑफिसर मयंक रौतेला कहते हैं कि इसकी एक वजह संबंधित कोर्स कराने वाले कॉलेजों की कम संख्या है. साथ यह धारणा भी जुड़ी है कि इन नौकरियों में वेतन आकर्षक नहीं है. वे मानते हैं कि शुरुआती स्तर पर यह बात सही हो सकती है, लेकिन अनुभव के साथ आगे बढ़ने के मौके काफी बढ़ जाते हैं. इस धारणा को बदलने के लिए अपोलो ने ऐसी पहल शुरू की है, जिनमें कर्मचारियों को नौकरी के पहले दिन से ही आगे बढ़ने के रास्ते बताए जाते हैं.

उसके कार्यक्रम नर्सों को करिअर तेजी से आगे ले जाने का मौका देते हैं. वे कहते हैं, “पहले कोई स्टाफ नर्स पांच से सात साल तक एक ही पद पर रहती थी. अब हमने अलग-अलग स्तर बनाए हैं—जूनियर नर्स, स्टाफ नर्स और सबसे ज्यादा मांग वाली ऑपरेशन थिएटर नर्स तक.” हुनर बढ़ाने के ऐसे कार्यक्रम भी हैं, जिनके सहारे नर्सें मैनेजमेंट में जा सकती हैं, नर्स ट्रेनर बन सकती हैं या पश्चिम एशिया और ब्रिटेन समेत विदेशों में मौके तलाश सकती हैं.

लेकिन हुनर की हर कमी को कंपनियों की पहल से दूर नहीं किया जा सकता. कुछ रुकावटों की जड़ें देश के सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने में कहीं ज्यादा गहरी हैं. बिजली और प्लंबिंग जैसे हाथ के हुनर वाले कामों में भारी कमी है. जस्टजॉब्स नेटवर्क की दीवान के मुताबिक, हाथ के हुनर और ब्लू-कॉलर काम को कम कीमती समझा जाता है. क्वेस का अनुमान है कि प्लंबर और इलेक्ट्रिशियन समेत हुनरमंद कारीगरों की कमी 2031 तक बढ़कर 13 लाख हो जाएगी.

दीवान कहती हैं, “कोई मां-बाप नहीं चाहता कि उसका बच्चा बढ़ई या इलेक्ट्रिशियन बने. इन कामों को मजबूरी का माना जाता है.” लेकिन हकीकत यह है कि व्हाइट-कॉलर नौकरियां भी घट रही हैं और ज्यादा विशेषज्ञता वाली बनती जा रही हैं. दीवान कहती हैं, “एआइ के इस दौर में दिमागी काम वाली नौकरियां लगातार कम होंगी और हाथ के हुनर की अहमियत वास्तव में बढ़ेगी. इसलिए हमें इन कामों की गुणवत्ता बेहतर करने के साथ नीतियों में इनसे जुड़ी सामाजिक सोच सुधारने पर भी ध्यान देना होगा.”

मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने भी हाल में सॉफ्टवेयर की नौकरियों के बदलते भविष्य और वेल्डिंग, प्लंबिंग, बिजली तथा बढ़ईगीरी जैसे कामों को महत्व देने की जरूरत पर बल दिया. उन्होंने कहा कि देश में ऐसे हुनर को इज्जत और सम्मान की नजर से देखा जाना चाहिए. “यह उन व्यावहारिक हुनरों की बात है, जिनकी जगह एआइ आसानी से नहीं ले सकता और जिनमें इंसान की मौजूदगी जरूरी है.”

सोच बदलना केवल कोर्स और शिक्षकों का मामला नहीं है. इसमें करिअर काउंसलिंग और सही जानकारी देने की अहम भूमिका है. छात्रों और उनके माता-पिता को अक्सर पता नहीं होता कि हुनर की ट्रेनिंग अगले 10-20 साल में करिअर के कौन-कौन से रास्ते खोल सकती है—जर्मनी में इलेक्ट्रिशियन का काम करने से लेकर जापान में बुजुर्गों और मरीजों की देखभाल करने तक. एफआइएसएमई के भारद्वाज कहते हैं कि हुनर की ट्रेनिंग तभी मांग पैदा करेगी, जब छात्र उन पर भरोसा करेंगे.

हुनर सिखाने की योजनाओं को असली समर्थन तभी मिलेगा, जब वे छात्रों के अरमानों, योग्यता और दिलचस्पी से मेल खाएंगी. वे कहते हैं, “हुनर कार्यक्रमों के मुख्य कस्टमर छात्र होते हैं और उनमें छात्रों के अरमान का ख्याल रखना चाहिए.”

बुरादे में मिली उम्मीदें

पंकज कुमार, दिल्ली

गया, बिहार के रहने वाले पंकज अपने पिता अर्जुन की तरह बढ़ई नहीं बनना चाहते थे. उन्होंने बीए की डिग्री हासिल की और फिर अपने शहर के आइटीआइ से दो साल का फिटर का कोर्स किया. एक ऑटो कंपनी में साल भर प्रशिक्षु के तौर पर काम भी किया, लेकिन स्थायी नौकरी का सपना पूरा नहीं हुआ.

अगले एक साल तक दफ्तर की नौकरी तलाशते हुए उन्होंने छोटे-मोटे काम किए. आखिर गुरुग्राम की एक कंपनी से नौकरी का प्रस्ताव मिला, मगर तनख्वाह केवल 12,000 रुपए महीना थी. इस बीच उनकी शादी हो चुकी थी और घर चलाने की जिम्मेदारी थी. सो, पंकज ने कीर्ति नगर के फर्नीचर बाजार में एक प्लाइवुड दुकान पर लैमिनेट के कैटलॉग बनाने की नौकरी कर ली.

उन्हें भले इसका मलाल हो, मगर उनके पिता को उन पर गर्व है: “दफ्तर की नौकरी में जितनी तनख्वाह मिल रही थी, वह उससे दोगुना कमा रहा है. बोनस और प्रॉविडेंट फंड भी मिल रहा है.” —सोनल खेत्रपाल

बेमेल 5 
भूगोल की गहरी खाई
अधिकतर मैन्युफैक्चरिंग कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात और दिल्ली-एनसीआर में सिमटी है, जबकि ज्यादातर कामगार बिहार, झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ से आते हैं. यानी नौकरियां वहां नहीं हैं, जहां लोग रहते हैं. क्वेस स्टाफिंग के चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर नितिन दवे कहते हैं कि करिअर शुरू कर रहे उन कामगारों के लिए पलायन मुश्किल होता है, जो कभी अपने गांव से बाहर नहीं गए.

दूसरी जगह जाने का खर्च और सुरक्षित मकान की कमी तो है ही, इसके साथ “दोस्तों और परिवार से दूर रहने, अलग संस्कृति में बसने और अलग तरह का खाना खाने जैसे पहलू” भी जुड़े हैं. दवे कहते हैं कि महिला कामगारों के लिए ये समस्याएं और बड़ी हैं.

कामगारों का झुकाव भी अब कारखानों के बजाए डिलिवरी की नौकरियों की ओर बढ़ रहा है क्योंकि ये काम घर के पास मिल जाते हैं, इनमें तुरंत कमाई शुरू हो सकती है. दवे कहते हैं, “हम कामगारों को बड़े पैमाने पर समझा रहे हैं कि कारखाने में काम करने से लंबे समय में आमदनी कैसे बढ़ सकती है.” वे कहते हैं, “हम 1,200 नियोक्ताओं से कहते हैं कि नौकरी नहीं, भविष्य की भी पेशकश करें.”

देश में दुनिया की सबसे बड़ी कामकाजी उम्र वाली आबादी है. टीमलीज सर्विसेज के सभरवाल कहते हैं कि युवा आबादी की इस ताकत का पूरा फायदा उठाने के लिए शिक्षा, नौकरी पाने की काबिलियत और रोजगार, तीनों समस्याओं से एक साथ निबटना होगा. 

शिक्षा में सुधार के बिना किसी उम्मीदवार की नौकरी पाने की काबिलियत बेहतर नहीं हो सकती. लेकिन शिक्षा बेहतर हो भी जाए तो रोजगार के नतीजे आखिरकार बाजार में काम की अच्छी और उत्पादक नौकरियां मौजूद होने पर निर्भर करेंगे.  वे कहते हैं, “शिक्षा, रोजगार और नौकरी पाने की काबिलियत को अलग-अलग नहीं किया जा सकता.”

इस पूरी कड़ी को मजबूत करना होगाः बुनियादी हुनर से लेकर उद्योगों की जरूरत के मुताबिक पढ़ाने वाले आइटीआइ और नौकरियां तक. कोई भी कड़ी छूटी तो पूरी शृंखला टूट जाएगी. युवा आबादी की ताकत तब निराशा और अशांति में बदल सकती है, जिसकी एक झलक हमने इस गर्मी में जंतर मंतर पर देखी.

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