दर्जन भर नए खलनायक
सेहतमंद होने के कंपनियों के बड़े-बड़े दावे वाले जिन फूड प्रोडक्ट्स को हम चाव से खा रहे, उनमें कितने तरह के हानिकारक एडिटिव और प्रिजर्वेटिव भरे पड़े

रश्मि मुखर्जी खानपान में पुराने खलनायकों से परिचित थीं: मैदा, ज्यादा चीनी और ट्रांस फैट. उन्हें पता था कि इन चीजों को खाने में कम से कम रखना चाहिए. सो, उन्होंने 13 वर्षीय बच्चे के खाने से चिप्स और पैकेट वाले बिस्कुट हटा लिए. उनकी जगह ग्रेनोला बार, मल्टीग्रेन स्नैक्स, प्रोटीन उत्पाद और ‘नो ऐडेड शुगर’ लिखे खाद्य पदार्थ आ गए.
मगर गुरुग्राम की 45 वर्षीया बुटीक होटल मैनेजर ने जब पैकेट पलटकर देखे तो उन चीजों में पामोलीन, माल्टोडेक्सट्रिन, ग्लूकोज-फ्रुक्टोज सिरप, प्रोटीन आइसोलेट, इमल्सिफायर, मॉडिफाइड स्टार्च और अनजाने स्वीटनर मिले, जिन्हें वे बेहतर विकल्प समझती थीं. वे कहती हैं, ‘‘मैंने नहीं सोचा था कि पीछे लिखा ब्योरा भी पढ़ना होगा.’’
दिल्ली के बीएलके-मैक्स अस्पताल में क्लिनिकल न्यूट्रिशन विभाग की प्रमुख डॉ. ईशा वाधवा लूथरा का मानना है कि सबसे पहले यही करना चाहिए. वे कहती हैं, “अल्ट्रा-प्रोसेस्ड एडिटिव जानने के लिए इस्तेमाल घटकों की सूची देखें.” खासकर माल्टोडेक्सट्रिन, कार्बोक्सीमिथाइलसेल्युलोज और पॉलीसॉर्बेट-80 जैसे इमल्सिफायर तथा रिफाइंड पाम ऑयल पर ध्यान दें.
दिल्ली की जानी-मानी न्यूट्रिशनिस्ट डॉ. ईशी खोसला के मुताबिक, दिक्कत यह है कि लोग सूप को सेहतमंद मान लेते हैं. वे कहती हैं, “मगर वह भी पैकेट से ही निकला है.” पीछे का लेबल ध्यान से देखें तो पुरानी चिंताएं नए रूप में मिल सकती हैं.
चेन्नै के रेला अस्पताल में इंटरनल मेडिसिन की सीनियर कंसल्टेंट डॉ. पर्ल्सी ग्रेस राजन कहती हैं, “एफएसएसएआइ के प्रस्तावित चेतावनी लेबल कुछ पोषक तत्वों की अधिक मात्रा पहचानना आसान बना सकते हैं. पर सही विकल्प चुनने के लिए लेबल की समझ अब भी जरूरी है.”
चीनी की ही मिसाल लें. हाइ-फ्रुक्टोज कॉर्न सिरप, ग्लूकोज-फ्रुक्टोज सिरप और ग्लूकोज सिरप स्टार्च आम तौर पर मक्के के स्टार्च को तोड़कर साधारण शर्करा में बदलकर बनाए जाते हैं. प्रसेत्या गुंटारी और उनके साथियों की 2025 की व्यवस्थित समीक्षा और मेटा-विश्लेषण में पाया गया कि फ्रुक्टोज-ग्लूकोज मिश्रण से खाली पेट रक्त शर्करा और सीरम इंसुलिन में काफी बढ़ोतरी हुई.
माल्टोडेक्सट्रिन एक और प्रोसेस्ड कार्बोहाइड्रेट है, जिससे सावधान रहना चाहिए. इसे स्टार्च को आंशिक रूप से तोड़कर ग्लूकोज की बहुत छोटी शृंखलाओं में बदलकर बनाया जाता है. यह सीजनिंग पाउडर, न्यूट्रिशन ड्रिंक, सॉस और प्रोटीन खाद्य पदार्थों की मात्रा बढ़ाता, बनावट सुधारता और स्वाद बनाए रखता है.
साल 2024 में मेटाबोलाइट्स जर्नल में प्रकाशित डबल-ब्लाइंड मानव परीक्षणों में माल्टोडेक्सट्रिन ने धीरे पचने वाले कार्बोहाइड्रेट के मुकाबले भोजन के बाद ग्लूकोज और इंसुलिन में काफी ज्यादा वृद्धि की. यह असर स्वस्थ लोगों के साथ मोटापे या टाइप-2 डायबिटीज वाले प्रतिभागियों में भी दिखा.
मिठास में छिपा खतरा
आपको लग सकता है कि आपने चीनी छोड़ दी, मगर उसका विकल्प अलग समस्याएं पैदा कर सकता है. सुक्रालोज चीनी से बना बेहद मीठा पदार्थ है, जिसमें लगभग कोई कैलोरी नहीं होती. डायट ड्रिंक, प्रोटीन पाउडर और ‘जीरो’ उत्पादों में इसका इस्तेमाल आम हो गया है.
2025 में क्लिनिकल न्यूट्रिशन ईएसपीईएन में प्रकाशित छोटे, रैंडमाइज्ड और प्लेसेबो-नियंत्रित परीक्षण में पाया गया कि स्वस्थ वयस्कों में 30 दिन तक सुक्रालोज लेने से आंतों के बैक्टीरिया में बदलाव आया. इसका संबंध भोजन के बाद ग्लूकोज और इंसुलिन के ऊंचे स्तर तथा इंसुलिन संवेदनशीलता में 20.3 फीसद कमी से भी मिला.
यह अध्ययन इतना छोटा और कम अवधि का था कि इससे यह साबित नहीं होता कि रोज सुक्रालोज लेने से डायबिटीज होती है. मगर यह उस धारणा पर सवाल जरूर उठाता है कि बिना कैलोरी वाला स्वीटनर मेटाबॉलिज्म पर असर नहीं डालता.
गुरुग्राम के मेदांता-द मेडिसिटी अस्पताल में एंडोक्राइनोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. जसजीत वसीर कहते हैं, “अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (यूपीएफ) में मिलने वाली नई सामग्रियों के लिए रोजाना सेवन की कोई एक सुरक्षित सीमा नहीं है. कुछ एडिटिव्स के लिए औपचारिक स्वीकार्य दैनिक सेवन (एडीआइ) तय है. मगर कई दूसरी चीजों में असली चिंता दिनभर खाए जाने वाले अलग-अलग खाद्य पदार्थों से उनके बार-बार शरीर में पहुंचने की है. इसलिए अब किसी एक एडिटिव को अलग करके देखने के बजाए इस पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा कि व्यक्ति कुल कितना अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाना खाता है.”
यह खासकर अहम है क्योंकि उपभोक्ता फूड लेबल पर लिखी हर सामग्री के लिए ‘रोज इतने ग्राम’ का एक जैसा नियम लागू नहीं कर सकते. एडीआइ किसी खास पदार्थ के लिए तय होता है और जीवनभर उसके सेवन की सुरक्षा के आकलन पर आधारित होता है. सो, किसी एक एडिटिव का सेवन एडीआइ से कम रखने भर से यूपीएफ वाला आहार सेहतमंद नहीं हो जाता.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, सेहतमंद भोजन पर्याप्त पोषण, संतुलन, संयम और विविधता पर आधारित होता है. इसकी नींव बिना प्रोसेस्ड या बहुत कम प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ होने चाहिए. यही बहस एस्पार्टेम और एसेसल्फेम-के पर भी लागू होती है. डॉ. खोसला चेताती हैं कि चीनी के विकल्प हानिरहित लग सकते हैं, मगर इसका अर्थ यह नहीं कि उन्हें बिना किसी सीमा के रोजमर्रा के खानपान का हिस्सा बना लिया जाए.
कुछ निगरानी आधारित अध्ययनों में शुगरफ्री स्वीटनर के ज्यादा सेवन और टाइप-2 डायबिटीज के बढ़े जोखिम के बीच संबंध मिला. वैसे, शोधकर्ता यह नहीं कह सकते कि जोखिम बढ़ने की वजह खुद स्वीटनर थे. प्रमाण अब भी मिले-जुले हैं और कम अवधि के क्लिनिकल परीक्षणों में आम तौर पर ऐसा असर नहीं मिला है.
चीनी के विकल्प सिर्फ मेटाबॉलिज्म ही नहीं, सेहत के दूसरे पहलुओं पर भी असर डाल सकते हैं. कम कार्बोहाइड्रेट, कीटो और शुगर-फ्री खाद्य पदार्थों में लोकप्रिय शुगर अल्कोहल एरिथ्रिटॉल पर 2024 के अध्ययन के बाद नए सिरे से ध्यान गया. इसमें पाया गया कि 30 ग्राम एरिथ्रिटॉल लेने से स्वस्थ लोगों में प्लेटलेट की सक्रियता और खून के थक्के जमने से जुड़े संकेतकों में तत्काल वृद्धि हुई.
इन नतीजों से यह साबित नहीं होता कि एरिथ्रिटॉल हार्ट अटैक या स्ट्रोक का कारण बनता है.मगर ये रक्त में एरिथ्रिटॉल के ऊंचे स्तर को दिल की बीमारियों के जोखिम से जोड़ने वाले पुराने शोधों को बल देते हैं और इसकी लंबे समय की सुरक्षा पर सवाल उठाते हैं.
मुंबई के सर एच.एन. रिलायंस फाउंडेशन अस्पताल में पोषण एवं आहार विभाग की प्रमुख डॉ. आइलीन कैंडे कहती हैं, “बहुत मीठे या कृत्रिम स्वीटनर वाले पैकेटबंद उत्पादों पर नियमित निर्भरता के बजाए पानी, दूध और बहुत कम प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ खानपान का आधार होने चाहिए.”
इस पर ज्यादा ताज्जुब हो सकता है कि सबसे ज्यादा अध्ययन की गई कुछ सामग्रियां स्वीटनर हैं ही नहीं. कार्बोक्सीमिथाइलसेल्युलोज यानी सीएमसी (ई466) सेल्युलोज से बना इमल्सिफायर और स्टेबिलाइजर है. यह विभिन्न घटकों को अलग होने से रोकता और आइसक्रीम, सॉस तथा दूसरे प्रोसेस्ड फूड को मुलायम बनावट देता है. मानव अध्ययनों में आंत पर इसके असर को लेकर सवाल उठे हैं.
एक छोटे नियंत्रित परीक्षण में सीएमसी लेने वाले लोगों की आंत के बैक्टीरिया की बनावट और विविधता के साथ उनके मेटाबॉलिक उप-उत्पादों में भी बदलाव मिला. दिल्ली के मधुकर रेनबो चिल्ड्रंस हॉस्पिटल की डायटीशियन और लैक्टेशन कंसल्टेंट डॉ. समीक्षा कालरा कहती हैं, “शोध बताते हैं कि कुछ इमल्सिफायर और स्टेबिलाइजर आंत के सूक्ष्म जीवों की बनावट, आंत की सुरक्षा परत और सूजन की प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकते हैं.”
मगर किसी एडिटिव को मंजूरी मिलने का मतलब यह नहीं कि उससे बना खाद्य पदार्थ अपने आप सेहतमंद हो गया. दिल्ली के सीके बिरला अस्पताल की क्लिनिकल न्यूट्रिशनिस्ट डॉ. दीपाली शर्मा कहती हैं, “किसी एडिटिव को मंजूरी मिलने का मतलब है कि उसने सुरक्षा जांच पास की है. इसका अर्थ यह नहीं कि उसे इस्तेमाल करने वाले सभी खाद्य पदार्थ सेहतमंद हैं.”
यही बात नुकसानरहित सुनाई देने वाले ‘मॉडिफाइड स्टार्च’ पर लागू होती है. इसे सामान्य स्टार्च में भौतिक, एंजाइम या रासायनिक बदलाव करके बनाया जाता है, ताकि सूप गाढ़ा रहे, फिलिंग्स अलग न हों और जमे खाद्य पदार्थ दोबारा गर्म करने पर अपनी बनावट बनाए रखें.
2025 में पीएलओएस मेडिसिन में प्रकाशित अध्ययन में टाइप-2 डायबिटीज की ज्यादा दर से जुड़े एडिटिव मिश्रणों में मॉडिफाइड स्टार्च प्रमुखता से शामिल था. मगर नतीजा अकेले मॉडिफाइड स्टार्च पर नहीं, पूरे मिश्रण पर था. उसमें पेक्टिन, ग्वार गम, कैरेजीनन, पॉलीफॉस्फेट, पोटैशियम सॉर्बेट, करक्यूमिन और जैंथन गम भी शामिल थे.
कुछ चीजों पर उपभोक्ता शायद ही सोचते हैं, जैसे फॉस्फेट एडिटिव. सोडियम फॉस्फेट, पॉलीफॉस्फेट और फॉस्फोरिक एसिड का प्रयोग प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों में अम्लता नियंत्रिण, नमी बनाए रखने और बनावट बचाने के लिए होता है. कमजोर किडनी वाले लोगों के लिए यह चिंता खासकर अहम है क्योंकि शरीर में फॉस्फोरस का स्तर नियंत्रित करने में किडनी की प्रमुख भूमिका होती है. शोध में पाया गया कि फॉस्फेट एडिटिव घटाने से फॉस्फोरस नियंत्रित करने वाले हॉर्मोन कम हो सकते हैं.
प्रोटीन का जाल
आधुनिक स्वास्थ्य उत्पादों के दूसरे छोर पर प्रोटीन आइसोलेट और कंसंट्रेट हैं. इनमें व्हे, सोया, मटर या गेहूं के प्रोटीन को बाकी खाद्य पदार्थ से अलग कर पाउडर के रूप में गाढ़ा किया जाता है. ये अपने आप में नुक्सानदेह नहीं हैं और ज्यादा प्रोटीन की सचमुच जरूरत होने पर उपयोगी हो सकते हैं.
समस्या इनके साथ आने वाली अन्य सामग्रियों की है. किसी उत्पाद पर ‘प्रोटीन’, ‘मल्टीग्रेन’, ‘बेक्ड’ या ‘नो ऐडेड शुगर’ लिखा हो सकता है मगर उसमें रिफाइंड सामग्री, सोडियम, सैचुरेटेड फैट, स्वीटनर या दूसरे एडिटिव भी हो सकते हैं.
पुणे के रूबी हॉल क्लिनिक में कंसल्टेंट पीडियाट्रिशियन और नियोनेटोलॉजिस्ट डॉ. कंचनकुमार भाग्यवंत कहते हैं, “मैंने पैकेटबंद खाद्य पदार्थों के लगातार सेवन को बच्चों में मोटापा, इंसुलिन प्रतिरोध, फैटी लिवर रोग के शुरुआती संकेत, कब्ज और पाचन की अन्य समस्याओं में योगदान देते देखा है.”
शायद सबसे अहम बदलाव यह है कि शोधकर्ता अब अलग-अलग सामग्रियों से आगे बढ़कर उन मिश्रणों का अध्ययन करने लगे हैं, जिन्हें लोग असल में खाते हैं. डॉ. वसीर कहते हैं, “लोग किसी प्रयोगशाला में कोई एडिटिव नहीं खाते, बल्कि मिश्रण खाते हैं. इसलिए हम नहीं जानते कि किसी बीमारी की वजह यही इमल्सिफायर था. पर इतना जानते हैं कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का ज्यादा सेवन खराब स्वास्थ्य नतीजों से जुड़ा है, भले उसे सेहतमंद बताकर बेचा जाए.”
नए शोध अब यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि इन सामग्रियों के मेल और उन्हें इस्तेमाल करने वाले खाद्य पदार्थ सेहत को कैसे प्रभावित कर सकते हैं. आधुनिक पैकेट के भीतर छिपी असली चेतावनी शायद यही है.