सबल, सफल और शक्ति स्वरूपा
दमखम वाली ऐसी 50 महिलाओं का पूरा एक दल जो अपनी जिद और हौसले के बूते अगुआ बनकर उभरीं. ये वे चेहरे हैं जिनकी उपलब्धियां पूरे भारत की महिलाओं के लिए मानक बन सकती हैं और देश के लिए उम्मीद की किरण भी

50 स्त्रियां जीवट वाली 50 से कम वय की
जिस देश में महिलाओं की आबादी में हिस्सेदारी लगभग आधी है, वहां वे जल्द ही देश की सर्वोच्च विधायी संस्था संसद में एक-तिहाई राजनैतिक प्रतिनिधित्व पा सकती हैं. 2023 के नारी शक्ति वंदन अधिनियम के लागू होने से भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं का भरोसा और मजबूत हो सकता है. जैसे-जैसे ज्यादा युवतियां सत्ता और फैसले लेने वाली जगहों पर पहुंचेंगी, वे सिर्फ आज की राजनीति को नहीं, बल्कि कल के भारत को भी आकार देंगी.
महिला सशक्तीकरण किस तरह बदलाव ला सकता है, यह देखने के लिए देश भर की बुनियादी संस्थाओं पर नजर डालनी होगी. फिलहाल भारत के पंचायती राज संस्थानों में करीब 14.5 लाख निर्वाचित महिला प्रतिनिधि हैं. यह कुल प्रतिनिधियों का 46 फीसद है, और स्थानीय शासन में महिलाओं की हिस्सेदारी के लिहाज से दुनिया में सबसे ज्यादा.
बिहार के शादीपुर गांव की 36 साल की सरपंच डॉली को वह समय अच्छी तरह याद है जब उन्होंने स्थानीय विवाद सुलझाने के लिए ग्राम कचहरी संभाली थी. शुरुआत में लोग उनके पास से निकलकर उनके पति की तरफ चले जाते थे.
उन्हें लगता था कि असली जिम्मेदारी उन्हीं के पास होगी क्योंकि भारत के ग्रामीण इलाकों में प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व आम हकीकत है. लेकिन डॉली ने अपने काम को बोलने दिया और जल्द ही किसी को शक नहीं रहा कि फैसले कौन ले रहा है.
बिहार के ही एक और गांव, मुंगेर जिले के तिलकारी में बीना देवी ने पहले खुद आर्थिक आजादी की अहमियत समझी और फिर सौ से ज्यादा गांवों की महिलाओं तक इसे पहुंचाया. जब पास के कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक महिलाओं को मशरूम खेती की ट्रेनिंग देने आए तो उस समय तिलकारी की सरपंच रहीं बीना देवी ने इस हुनर को सिर्फ परिवार के लिए नहीं, बल्कि पूरे इलाके की महिलाओं के लिए उद्यम का इंजन बना दिया.
कई बार सत्ता में मौजूद किसी महिला का दिखने में छोटा-सा हस्तक्षेप भी आसपास की महिलाओं की रोजमर्रा की जिंदगी बदल देता है. तेलंगाना में आइएएस अधिकारी हरिचांदना दसारी ने यही भूमिका निभाई.
नारायणपेट की जिला कलेक्टर रहते हुए उन्होंने देखा कि स्थानीय महिलाओं ने साप्ताहिक बाजार जाना बंद कर दिया था क्योंकि वहां उनके लिए शौचालय की कोई सुविधा नहीं थी. हरिचांदना ने बाजार में ‘शी-टॉयलेट’ बनवाया और स्थानीय लोग इसके लिए उनका जितना शुक्रिया अदा करें, कम है.
डॉली, बीना और हरिचांदना उन 50 साल से कम उम्र की 50 महिलाओं में शामिल हैं, जिन्हें हम इस साल अपने स्वतंत्रता दिवस विशेषांक में पेश कर रहे हैं. हमने इस बार एक अलग तरह की राष्ट्रीय उपलब्धि का उत्सव मनाने का फैसला किया:
अपने दम पर अपना मकाम बनाने वाली महिलाओं का उभार, जो भारत के भविष्य को आकार दे रही हैं और उसकी नई परिभाषा गढ़ रही हैं. इन महिलाओं ने अपनी कामयाबी की कहानी खुद लिखी है. किसी नए विचार, किसी इनोवेशन, किसी नए नजरिए या परंपरा को चुनौती देने के साहस के साथ.
और यह सब उन्होंने अपनी जिंदगी के पचासवें पड़ाव तक पहुंचने से पहले किया है. यहां तक पहुंचने के लिए उन्होंने अपने हालात से ऊपर उठकर रास्ता बनाया है. चाहे वह आय की कमी रही हो, शिक्षा की कमी, लैंगिक पूर्वग्रह, परिवार की जिम्मेदारी या कई बार खुद पर शक.
बिजनेस, साइंस, खेल, गवर्नेंस और सिनेमा जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में उन्होंने न सिर्फ बाधाएं तोड़ी हैं, बल्कि यह भी दिखाया है कि जब महिलाओं को अपनी किस्मत खुद गढ़ने की आजादी मिलती है तो क्या कुछ मुमकिन हो सकता है.
इन 50 साल से कम उम्र की 50 महिलाओं के लिए आजादी का मतलब सिर्फ राजनैतिक या संवैधानिक अधिकार नहीं है. इसका मतलब है आर्थिक स्वतंत्रता, पेशे से जुड़े मौके, रचनात्मक अभिव्यक्ति और नेतृत्व करने की आजादी.
यही वजह है कि वे भारत की 50 साल से कम उम्र की करीब 56 करोड़ महिलाओं के लिए आदर्श रोल मॉडल हैं. यूएन के अनुमान के अनुसार, यह संख्या देश की 71.5 करोड़ महिला आबादी का 78 फीसद है.
उनका वक्त आ गया है
बात अब साफ है. भारत की महिलाएं अपने हिस्से की शोहरत हासिल करने के लिए काफी समय से तैयार हैं. अब सिर्फ प्रतीकात्मक मौजूदगी से काम नहीं चलेगा. उनका संघर्ष हमेशा ज्यादा कठिन रहा है.
जन्म से ही इसकी शुरुआत होती है क्योंकि भारत में लड़कियों के मामले में लिंग अनुपात लंबे समय तक प्रतिकूल रहा है. फिर स्कूल या कॉलेज की शिक्षा के अधिकार तक बात आती है, जहां उनकी साक्षरता दर 74.6 फीसद है, जो पुरुषों की 87.2 फीसद साक्षरता दर से अब भी कम है.
बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे अभियानों ने अंधेरा कुछ हद तक जरूर कम किया है, लेकिन हजारों बरसों से जड़ जमाए पितृसत्ता के सामने वे अपने आप में काफी नहीं हो सकते. वयस्क होने पर भी जिंदगी आसान नहीं होती. बाल विवाह का पुराना अभिशाप देश के ग्रामीण इलाकों में अब भी मौजूद है.
कुछ दशक पहले यह करीब 50 फीसद था, अब 20 से 23 फीसद के बीच है. महिलाओं के खिलाफ अपराध देश पर अब भी धब्बा हैं. हर दिन ऐसी करीब 1,210 से 1,220 शिकायतें दर्ज होती हैं, यानी लगभग हर घंटे 51. फिर भी भारतीय महिला के भीतर जीवटता जैसे गहरे तक धंसी-बसी हुई है. यही उसे सबसे मुश्किल हालात में भी टिकाए रखती है.
खेलों में यह सबसे साफ दिखता है. मेहनत की शुरुआत बहुत जल्दी होती है, जैसे 21 साल की रेसलिंग चैंपियन अंतिम पंघाल के साथ हुआ. वे 10 साल की उम्र में हर दिन सुबह छह बजे उठकर हरियाणा के भगाना से 20 किलोमीटर दूर ट्रेनिंग के लिए जाती थीं. 3-4 घंटे अभ्यास करके घर लौटतीं.
आज वे महिलाओं की 53 किलो कैटेगरी में दुनिया की नंबर एक खिलाड़ी हैं. और कौन सोच सकता था कि झारखंड के गांव बड़की छापर की एक लड़की, जो स्थानीय खेलों में हॉकी स्टिक से कमाल दिखाने पर बकरियां और मुर्गे जीतती थी, एक दिन भारतीय हॉकी टीम की कप्तान बनेगी. सलीमा टेटे ने यह कर दिखाया.
लेकिन सफलता कहानी का सिर्फ दिखाई देने वाला हिस्सा है. असफलता ज्यादा अकेली जगह है, और ज्यादा परिचित भी. मगर महिलाएं उसमें भी रास्ता निकालना जानती हैं. शायद वे खुद से वही कहती हैं जो भारतीय महिला क्रिकेट की स्टार ऑलराउंडर शेफाली वर्मा दूसरों से कहती हैं:
“हमेशा खुद पर भरोसा रखिए. कठिन समय आएगा, हर चीज आपके हिसाब से नहीं होगी, लेकिन एक झटके को अपने भविष्य का फैसला न करने दें.” शेफाली खुद इससे गुजर चुकी हैं. उन्हें 2025 की वनडे अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ल्ड कप की टीम से बाहर कर दिया गया था. फिर वे एक घायल खिलाड़ी की जगह लौटीं और बल्ले और गेंद से ताबड़तोड़ करते हुए भारत को जीत दिलाने में मदद की.
बिजनेस की कमान
सफलता वह पहली चीज नहीं होती, जिसका पीछा कोई महिला उद्यमी करती है. शुरुआत में उसके पास बस एक विचार होता है, जो शायद किसी अधूरी जरूरत से जन्म लेता है, और उसे आगे बढ़ाने का भरोसा.
विनीता सिंह के लिए यह प्रेरणा इस कमी से आई कि भारतीय स्किन टोन के लिए बने और भारत की गर्मी तथा नमी को झेल सकने वाले ब्यूटी प्रोडक्ट्स बाजार में कम थे. इसी ने उन्हें कॉस्मेटिक्स कंपनी शुगर शुरू करने की राह दिखाई. लेकिन यह आसान नहीं था.
विनीता के प्रस्ताव को सौ निवेशकों ने नकार दिया, तब जाकर ग्लोबल प्राइवेट इक्विटी फर्म एल कैटरटन और अभिनेता रणवीर सिंह ने उनके ब्रांड पर भरोसा और पैसा लगाया. आज उनके साथ 2,000 से ज्यादा सेल्फ-मेड महिलाएं काम करती हैं.
उनकी कंपनी लिप्स, आइ और स्किन केयर से जुड़े 550 प्रोडक्ट देश के 45,000 रिटेल आउटलेट्स और ऑनलाइन बेचती है. उनकी सीख? “आपको कम आंकने वाले लोग काफी मिलेंगे. बस यह तय कीजिए कि आप खुद उनमें से एक न हों.”
गुरुग्राम में इंजीनियरिंग ग्रेजुएट उपासना टाकू की तेज और आसान ऑनलाइन पेमेंट सिस्टम की तलाश आखिरकार बेहद सफल मोबिक्विक वॉलेट कंपनी तक पहुंची, जिसे उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर शुरू किया.
विनीता सिंह और उपासना टाकू जैसी महिलाओं की जीत सभी महिलाओं की जीत है. भारत अब दुनिया का दूसरा ऐसा देश बन गया है, जहां महिला नेतृत्व वाले स्टार्ट-अप्स को सबसे ज्यादा फंडिंग मिलती है. यह रकम 26 अरब डॉलर है.
यह तब है, जब नैसकॉम के आंकड़ों के मुताबिक, महिला नेतृत्व वाले स्टार्टअप्स पूरे ईकोसिस्टम का सिर्फ 18 फीसद हैं. यह उपलब्धि इसलिए भी अहम है, क्योंकि रास्ते में जेंडर आधारित भेदभाव, पूंजी तक सीमित पहुंच, तेजी से बढ़ने वाले सेक्टर्स में कम प्रतिनिधित्व और समाज का संदेह लगातार मौजूद रहता है.
भारत में महिला श्रम भागीदारी अब भी 40 फीसद है, जो पुरुषों की 79.1 फीसद हिस्सेदारी से काफी कम है. 2024 में 15 से 59 साल की महिलाओं ने हर दिन करीब 305 मिनट बिना मानदेय वाले घरेलू कामों में लगाए. इसी उम्र की 41 फीसद महिलाओं ने घर के सदस्यों की देखभाल में हिस्सा लिया.
जेंडर बराबरी क्या कर सकती है, इसे दोहराना जरूरी है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक, यह भारत की जीडीपी को 27 फीसद तक बढ़ा सकती है. वर्ल्ड बैंक का आकलन है कि अगर 50 फीसद महिलाएं सक्रिय वर्कफोर्स में आ जाएं, तो सालाना जीडीपी ग्रोथ 1 से 1.5 परसेंटेज पॉइंट तक बढ़ सकती है.
सांचे तोड़ती महिलाएं
कुछ और क्षेत्र भी हैं, जहां महिलाएं अब भी लगभग अकेले रास्ता बना रही हैं. जैसे विज्ञान और तकनीक. रिसर्च वर्कफोर्स में देश में महिलाओं की मौजूदगी अब भी बेहद कम सिर्फ 18.6 फीसद है.
चीन में यह 45.8 फीसद है, जबकि अमेरिका में 27 से 35 फीसद के बीच. लेकिन कुछ महिलाएं शोर से दूर रहकर काम करना पसंद करती हैं. जैसे जंगलों में. बरखा सुब्बा को अपनी राह वहीं मिली. उन्होंने हिमालयन सैलामैंडर को बचाने का बीड़ा उठाया.
पक्षी विज्ञानी परवीन शेख ने संकटग्रस्त इंडियन स्किमर (पनचीरा) के लिए काम किया, जो नदी किनारे रहने वाला परिंदा है. दोनों ने इस साल प्रतिष्ठित व्हिट्ले अवॉर्ड जीते. डॉ. सुब्बा कहती हैं, “विज्ञान और संरक्षण में ज्यादा महिलाओं की जरूरत है, सिर्फ प्रतिभागी के रूप में नहीं, बल्कि रिसर्चर, लीडर और फैसले लेने वालों के रूप में भी.”
महिलाएं सचमुच हर जगह बाधाएं तोड़ रही हैं, यहां तक कि हमारे पुरुष-प्रधान रक्षा बलों में भी. फिलहाल उनकी मौजूदगी अभी बस शुरुआत भर है: भारतीय सेना में 3.8 फीसद अधिकारी, भारतीय नौसेना में छह फीसद और भारतीय वायु सेना में 13 फीसद अधिकारी महिलाएं हैं.
लेकिन भारतीय महिलाएं अब युद्ध के मैदान तक पहुंच रही हैं, चाहे फाइटर पायलट के रूप में हों या सैनिक के रूप में. स्क्वॉड्रन लीडर भावना कांत हाल ही में ‘टॉप गन’ फाइटर पायलटों के उस खास वर्ग की एकमात्र महिला सदस्य बनीं, जो कॉम्बैट मिशन का नेतृत्व करने के लिए योग्य हैं. नौसेना में उनकी साथी लेफ्टिनेंट कमांडर दिलना के. और रूपा ए. ने खुले समुद्र में नई सीमा पार की. दोनों अपने बूते दुनिया की परिक्रमा करने वाली पहली महिलाएं बनीं.
रचनात्मक जमात
कला की बात आती है तो देश की सांस्कृतिक विरासत को जिंदा रखने में महिलाओं की भूमिका बहुत बड़ी रही है. चाहे लोकप्रिय मनोरंजन हो या शास्त्रीय कलाएं. कपिला वेणु कुडियाट्टम के साथ यही कर रही हैं.
यह केरल की 2,000 साल पुरानी नाट्य परंपरा है, जो सिर्फ शारीरिक रूप से कठिन नहीं, बल्कि धैर्य की भी परीक्षा लेती है. इसकी एक प्रस्तुति कभी-कभी एक महीने तक चल जाती है. सिनेमा में हाशिए की आवाजें अब ज्यादा मजबूती से सुनी जा रही हैं.
जैसे पूर्वोत्तर की अवॉर्ड विजेता फिल्ममेकर त्रिवेणी राई और रीमा दास. बॉलीवुड की पकड़ को तोड़ने में दक्षिण भारतीय सिनेमा की अभिनेत्रियां भी आगे हैं. रश्मिका मंदाना और कल्याणी प्रियदर्शन जैसी कलाकार भाषा की सीमाओं को सहजता से पार करते हुए दर्शकों के दिल तक पहुंच रही हैं.
बहुत कुछ बदलने के बावजूद काफी कुछ वैसा ही बना हुआ है. बॉलीवुड में बाहर से आने वाले कलाकार को अब भी इंडस्ट्री में पैदा हुए बच्चे की तुलना में दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है. #मीटू एक ऐसी हकीकत है, जो कहीं गई नहीं है. पुरुष कलाकारों के बराबर भुगतान अब भी दूर का सपना है, खासकर उन कलाकारों के लिए जो पर्दे के पीछे काम करती हैं.
नेतृत्व के स्तर पर भी स्थिति बेहतर नहीं है. भारतीय मीडिया और मनोरंजन उद्योग में महिलाओं के पास प्रमुख क्रिएटिव और नेतृत्व भूमिकाओं में सिर्फ करीब 12-15 फीसद हिस्सेदारी है. इनमें विभाग प्रमुख, डायरेक्टर, राइटर और सीनियर एग्जीक्यूटिव रोल शामिल हैं.
यह ऐसी स्थिति है जिसे महिलाओं ने लंबे समय तक झेला है. कई ने देसी तरीका चुना है, कुछ ओटीटी की ओर बढ़ रही हैं, और कुछ चुनिंदा महिलाएं डटकर लड़ रही हैं. जैसे सान्या मल्होत्रा. उन्होंने मेहनत और आत्मविश्वास के दम पर बॉलीवुड की कठिन दुनिया में अलग जगह बनाई है.
वे कहती हैं, “ज्यादातर महिलाएं अक्सर अपनी योग्यता पर संदेह से जूझती हैं. इसे दूर भगाइए.” इस स्वतंत्रता दिवस पर और आने वाले वर्षों के लिए देश की महिलाओं के लिए यह सार्थक विचार है.