उठी एक बड़ी लहर
दिल्ली के जंतर-मंतर से उठती आवाजें, वहां की गंध और माहौल पर जमीनी रपट

प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर पर 21 जुलाई को अपने फोन से सारी हलचल रिकॉर्ड करते हुए
सबसे पहले जंतर-मंतर पर जो चीज महसूस हुई, वह थी गंध. नारों से पहले, मंच से भी पहले, या मंच की ओर उठे मोबाइलों के समंदर से पहले. यह बारिश से भीगी टी-शर्ट्स के नीचे पसीने की गंध थी, दोपहर की धूप में खराब हो चुके राजमा-चावल की गंध. ज्यादा पके केले, गीला कार्डबोर्ड और जमीन पर छिड़के गए डिसइंफेक्टेंट की तीखी ऐंटीसेप्टिक गंध.
फिर भी, एक युवती काला कचरा बैग हाथ में लिए वहां घूम रही थी और सारे लोगों से पूछ रही थी, ‘‘किसी के पास कोई कचरा तो नहीं?” प्लास्टिक की बोतल, कागज का कप, बिस्कुट का रैपर, डिस्पोजेबल चम्मच—वह सब कुछ इकट्ठा कर रही थी. उसने कहा, “हम यहां विरोध-प्रदर्शन करने आए हैं, कचरा फैलाने नहीं. हमें अपना कचरा खुद साफ करना होगा.” वे द्वारका की रहने वाली 25 साल की सौम्या थीं.
जंतर-मंतर उसके जैसे लोगों से भरा हुआ था. एक समूह बारी-बारी से पीने का पानी बांट रहा था; दो युवतियां भीड़ के बीच चलते हुए पारले-जी बिस्कुट के कार्टन ऊपर उठाए थीं. एक आदमी की दोनों बांहों से खिचड़ी से भरे डिब्बे लटक रहे थे और वह उन लोगों को आवाज दे रहा था, जिन्होंने खाना नहीं खाया था. मंच पर वक्ता थके हुए मगर सब्र से लबरेज दिख रहे थे और इंतजाम में लगे लोगों से कह रहे थे, “आपके समर्थन के लिए धन्यवाद. कृपया लाइन बनाइए.”
कुछ छात्र अपने माता-पिता के साथ आए थे तो कुछ अपने मां-बाप से झूठ बोलकर वहां पहुंचे थे. बहुत-से नौजवान काम से छुट्टी लेकर आए थे; कुछ एक्सप्रेस ट्रेन से उतरकर सीधे जंतर-मंतर चले आ पहुंचे, उनके बैगों में किताबें, पानी की बोतलें, पोस्टर, यहां तक कि तिरंगा भी था.
एक महिला सिर्फ इसलिए विरोध में आई थी क्योंकि अमेरिका में रहने वाली उसकी बेटी ने उसे आने को कहा था. रियल एस्टेट में काम करने वाली 26 साल की कनिष्का ने कहा, “कुछ साल पहले तक हम भी छात्र थे और हम जानते हैं कि ग्रेजुएशन के बाद नौकरी पाना कितना मुश्किल होता है. जब हमने देखा कि छात्रों को पीटा गया और उन पर आंसू गैस छोड़ी गई, तो हमने यहां आने और समर्थन जताने का फैसला लिया.”
दिल्ली में भजनपुरा के दर्जी खालिद अपने परिवार के साथ वहां आए हुए थे—खचाखच भीड़ के दबाव के बीच मजबूती से खड़े हुए. उन्होंने कहा, “मेरी बहनों ने 2024 में नीट दिया था और कुछ नहीं हुआ. आज मैं अपनी 10 साल की बेटी के भविष्य के लिए यहां हूं.” मूल वजह अब उनकी बेटी से भी जुड़ गई थी—एक शिकायत, जो समय से पहले विरासत में दे दी गई.
शुरुआत भले नीट पेपर लीक के विरोध के रूप में हुई थी. लेकिन कुछ ही दिनों में मसला उससे बड़ा बन गया: एक पीढ़ी, जो सुने जाने की मांग कर रही है. पुलिस जब प्रदर्शनकारियों की घनी भीड़ के करीब आती, तो उसका स्वागत “लूजर, लूजर!” के नारों से होता. मंच से ऐलान हुआ, “उन्हें जाने दीजिए, प्लीज. उनको नजरअंदाज कीजिए. पूरी दुनिया उन्हें देख रही है. वे जानते हैं कि उन्होंने हमारे साथ क्या किया है.”
भारतीय असहमति की पुरानी प्रतीक-परंपरा अब भी जिंदा है. भगत सिंह के पोस्टर रेलिंग से लटके थे; लैम्प पोस्ट पर चिपकी तस्वीर से चे ग्वेरा की दूर तक देखने वाली नजर उभरती थी; पेड़ों के बीच बंधे बैनर से गांधी स्नेहिल ढंग से देख रहे थे. लेकिन ये तस्वीरें सिर्फ पृष्ठभूमि थीं. जंतर-मंतर पर सबसे ऊंची और बेबाक भाषा कुछ और थी—मीम्स, रील्स, लाइवस्ट्रीम, सेल्फी वीडियो और हाथ से लिखे नारों के साथ कार्डबोर्ड पर उकेरे गए हैशटैग.
आप विरोध के बदलते व्याकरण को रियल टाइम में देख सकते थे: हर कुछ मिनट में कोई किसी साथी प्रदर्शनकारी को त्वरित इंटरव्यू के लिए पकड़ लेता. एक ने कहा, “एक मिनट, हम लाइव हैं. बस बताइए कि आप क्यों आए?”
एक महिला ने रील रिकॉर्ड करना खत्म किया, फिर अपना फोन घुमाकर किसी और की रील देखने लगी. कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ता सौरभ दास कहते हैं, “पूरा आंदोलन सोशल मीडिया से चल रहा है. लोग यहां आ रहे हैं और खुद पता लगा रहे हैं कि सच क्या है. पारंपरिक मीडिया का समय खत्म हो गया है.”
सीजेपी ने दावा किया कि उसका इंस्टाग्राम अकाउंट बैन कर दिया गया था. लेकिन वह सिर्फ एक अकाउंट है. “उठ बे स**ले, बहुत हो गया तेरा”—एक वायरल मीम में कथित तौर पर उस पुलिसकर्मी को उद्धृत किया गया, जिसने 18 जुलाई को जंतर-मंतर पर अनशनकारी कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को उठाया था.
तब से सोशल मीडिया प्रदर्शनकारियों से भर गया है, जो इन रूखे शब्दों को विरोध के नारे में बदल रहे हैं और उनसे नए नारे बना रहे हैं. एक युवक ने हाथ से बना पोस्टर लहराया, जिस पर आंख मारता हुआ लिखा था, ‘‘माइ एक्स ऐंड मोदी आर हार्टलेस (मेरी पूर्व प्रेमिका और मोदी निर्मम हैं).’’ एक पुलिसवाला उसे देख रहा था.
वांगचुक कहते हैं, “हमारे लोकतंत्र का भविष्य इस पर निर्भर नहीं करता कि वह उससे सहमत लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है, बल्कि इस पर निर्भर करता है कि जब उसके युवा नागरिक साहस, उम्मीद और विश्वास के साथ बोलने की हिम्मत करते हैं, तो वह उनके साथ कैसा व्यवहार करता है.”
दीपक कुंजू छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा से एक दोस्त के साथ यही करने आए थे. उनकी मांग पीड़ा से भरी लेनी जमीनी लगती थी, “आप नौकरी नहीं दे सकते, कम से कम परीक्षाएं तो ठीक से कराइए, ताकि बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो सकें.” थोड़ा रुककर वे जोड़ते हैं, “कम से कम मान तो लीजिए कि आप गलत हैं.”
—साथ में अंजुम शर्मा