सतलज : क्या है पूरा सच

प्रतिबंधित फिल्म ने पंजाब में ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद न्यायेतर ढंग से मारे गए लोगों के प्रकरण से परदा उठाया.

cover story satluj 
हरिके बैराज पर जसवंत सिंह खालड़ा और कथित फर्जी मुठभेड़ों में मारे गए लोगों की याद में अरदास के लिए 14 जुलाई को जुटे लोग 

जब मोदी सरकार ने आदेश दिया कि तीन जुलाई को रिलीज होने के बमुश्किल दो दिन बाद ही दिलजीत दोसांझ-हनी त्रेहन की फिल्म सतलज को ज़ी5 से हटा दिया जाए, तो इसकी आधिकारिक वजह पंजाब में सुरक्षा संकट टालने को बताया गया. लेकिन इस प्रतिबंध का उलटा असर हुआ.

जो फिल्म एक भी सिनेमाघर के परदे पर नहीं दिखाई गई थी, वह पंजाब से निकले एक सिनेमा की हाल के वर्षों में सबसे ज्यादा देखी गई कृति बन गई. सिर्फ विवाद के दम पर वह ब्लॉकबस्टर दर्जे तक पहुंच गई. भारत में ब्लॉक होने के बाद भी यह विदेशों में प्लेटफॉर्म पर कई और दिनों तक उपलब्ध रही, और प्रवासी समुदाय ने इसे उतनी ही शिद्दत से देखा, जितनी पंजाब ने.

राज्य के भीतर गुरुद्वारों में सामुदायिक स्क्रीनिंग में खचाखच भीड़ जुटी, जहां काले दशक के सफेद होते बालों वाले बचे हुए लोग उस जेन ज़ी के साथ बैठे दिखे, जो उस दौर को सिर्फ पारिवारिक यादों से जानती है. दोनों की आंखें नम थीं.

यही प्रतिक्रिया सतलज को सिर्फ सेंसरशिप की कहानी से कहीं बड़ा बना देती है. यह फिल्म बेहद तीखे ढंग से उस बहस को फिर जगा देती है, जिसे पंजाब ने कभी पूरी तरह सार्वजनिक नहीं किया: किसे शहीद के रूप में याद किया जाए, किसे सामूहिक हत्यारे के रूप में, और यह तय कौन करे.

इस फिल्म के नायक जसवंत सिंह खालड़ा हैं, एक मानवाधिकार कार्यकर्ता जिन्होंने पुलिस के न्यायेतर तरीकों पर रोशनी डाली. इसके खलनायक वे दो शख्स हैं, जिन्हें खालिस्तानी आतंकवाद खत्म करने का सबसे ज्यादा श्रेय दिया जाता है—पंजाब के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) के.पी.एस. गिल और मुख्यमंत्री बेअंत सिंह.

गिल को खासकर पंजाब के बाहर भी, करीब एक दशक के खूनखराबे के बाद शांति लौटाने के लिए सराहा जाता रहा है. दोनों कथानकों में कुछ सच है: खालड़ा एक निडर और सच बोलने वाले व्यक्ति थे, जिन्होंने “अज्ञात” युवा सिखों के गुप्त दाह संस्कारों का खुलासा करके अपनी जान देकर उसकी कीमत चुकाई.

और फिल्म सुविधाजनक ढंग से उस आतंकी हिंसा पर परदा डाल देती है जिसने राज्यतंत्र को प्रतिक्रिया के लिए उकसाया. विधानसभा चुनाव से कुछ ही महीने पहले आई फिल्म का समय उसे सिनेमाई मुद्दा बनाता है, और राजनैतिक टकराव का भी. आगे की यह रिपोर्ट इस फिल्म को ऐतिहासिक रिकॉर्ड के बरअक्स रखती है.

केस स्टडीः चार चेहरे भर हैं उनके पास

जागीर कौर के पास परिवार की फ्रेम में मढ़ी तस्वीर नहीं है. उनके पास एक पोस्टर है. उस पर चार फीके पड़ चुके चेहरे हैं: उनके पूर्व सैनिक पति प्यारा सिंह, वल्द हरफूल सिंह, जो पंजाब पुलिस में कॉन्स्टेबल बनने ही वाले थे, भतीजा गुरदीप सिंह, और एक रिश्तेदार स्वर्ण सिंह.

कागज पीला पड़ चुका है, मगर वे उसे अपने दिल के करीब रखती हैं—पोस्टर पर छपे ये चेहरे ही उनके पास इन चारों की अकेली निशानी हैं.

जागीर जियोबाला गांव में 1.5 एकड़ के खेत में बने अपने घर के बाहर खड़ी हैं. यही खेत कभी उनके परिवार का पेट पालता था. उनके छोटे बेटे बलदेव सिंह का हिफाजती हाथ उनके कंधों पर फैला है. बलदेव कहते हैं, “हमारे पास अदालती सुनवाई के लिए जाने के साधन भी नहीं थे...लेकिन हमने ठान ली थी...मेरी मां ही मेरा और मैं उनका भावनात्मक सहारा थे.”

बलदेव खुद एसपीओ (स्पेशल पुलिस ऑफीसर) और विवादास्पद पुलिस अफसर अजित सिंह संधू की टीम का हिस्सा थे. परिवार के सदस्यों के गायब होने के कुछ ही महीने पहले उन्होंने नौकरी छोड़ी थी.

घर के अंदर प्यारा सिंह की महज एक तस्वीर है, जिसमें वे मुस्करा रहे हैं. किसी ने बरसों पहले शादी में खींची थी. जागीर अक्सर उसे देखती हैं. वे कहती हैं, “मेरी नजर कमजोर हो गई है. अगर वे आज आ जाएं, तो मुझे नहीं पता मैं पहचान भी पाऊंगी या नहीं.”

डीएसपी भूपिंदरजीत सिंह की अगुआई में पुलिस का एक जत्था 23 जुलाई 1992 को प्यारा सिंह और कुछ अन्य लोगों को उठा ले गया. उन्होंने कहा कि वे आतंकवाद से जुड़े एक मामले पर काम कर रहे थे और एक हथियार की तलाश में थे जिसके बारे में उन्हें यकीन था कि प्यारा सिंह को पता था.

जागीर कौर याद करती हैं, “पुलिस ने कहा कि वे उनसे पूछताछ करके वापस ले आएंगे.” बलदेव उस दिन अपनी बहन के साथ कोलकाता में थे. परिवार ने हर जगह तलाशा, अस्पतालों, जेलों और सरकारी दफ्तरों में. उन्होंने अधिकारियों से दया की भीख मांगी.

बहुत बाद में दूर के एक रिश्तेदार तथा पुलिसवाले ने बताया कि चारों को मारकर शव सतलज नदी में फेंक दिए गए. वर्षों बाद सीबीआइ की जांच में परिवार के दावे की तस्दीक करने वाले सबूत मिले. अदालतों में दोष सिद्ध हुआ. कुछ भी परिवार को तसल्ली न दे सका.

आखिर किसका सच है यह?
खालड़ा के साहसी जीवन को सतलज दिखाती है, जिनकी भूमिका दोसांझ ने निभाई है. खालड़ा ने उन मामलों का पता लगाया जिन्हें वे पंजाब पुलिस की ओर से युवा सिखों की बड़ी संख्या में बिना मुकदमे के की गई हत्याएं मानते थे, और जिनके शवों को तीन सीमावर्ती कस्बों—अमृतसर, पट्टी और तरन तारन—के श्मशानों में “अज्ञात” बताकर चुपचाप ठिकाने लगा दिया गया. ये वे इलाके थे, जिन्होंने खालिस्तानी आतंकवाद की सबसे भीषण मार झेली थी.

फिल्म के निर्माताओं का कहना है कि यह सच्ची घटनाओं और अदालत के रिकॉर्ड पर आधारित है. यह गिल और बेअंत सिंह से कोई हमदर्दी नहीं बरतती. इसी डिजाइन से नायक का साहस और उभरता है.

यह भी जाहिर तौर पर इसी डिजाइन का हिस्सा है कि फिल्मकार खालड़ा की अपनी खालिस्तानी सहानुभूतियों का कोई जिक्र नहीं करते. आधिकारिक रूप से शिरोमणि अकाली दल के मानवाधिकार प्रकोष्ठ के महासचिव रहे खालड़ा का रिकॉर्ड है कि उन्होंने ऑपरेशन ब्लूस्टार में मारे गए जरनैल सिंह भिंडरांवाले की तारीफ “कौमी हीरो” के रूप में की थी, “जिनके बलिदान ने भारत के साथ सिखों के रिश्ते को नए सिरे से परिभाषित किया.”

1992 में उन्होंने दावा किया था कि अलग राज्य के लिए संघर्ष करते हुए करीब 50,000 सिख “स्वतंत्रता सेनानी” मारे गए थे. उन्होंने इंदिरा गांधी के हत्यारों, सतवंत सिंह और केहर सिंह, की तुलना भगत सिंह और करतार सिंह सराभा से की और लिबरेशन खालिस्तान पत्रिका के एक लेख में उन्हें “खालिस्तानी हीरे” कहा.

फिर भी इसका कोई प्रमाण नहीं है कि खालड़ा खुद किसी उग्रवादी संगठन में शामिल हुए, हिंसा की वकालत की या खालिस्तानी आतंकवादियों के निशाने पर आए हजारों लोगों की हत्या से सार्वजनिक रूप से जुड़े रहे.

कई लोग मानते हैं कि सतलज खालड़ा के अंतिम वर्षों की संकरी, एकतरफा कहानी पेश करती है; कुछ लोग तो यहां तक कहते हैं कि यह “जानबूझकर गढ़े गए और एकपक्षीय झूठों” पर बनी है. इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट और साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल के कार्यकारी निदेशक अजय साहनी के मुताबिक, खालड़ा को “मानवाधिकार कार्यकर्ता नहीं, बल्कि ओवरग्राउंड वर्कर या आतंकवादी सहयोगी कहना ज्यादा सही होगा,” जिनकी पृष्ठभूमि और विचारधारा को फिल्म पूरी तरह नजरअंदाज करती है.

फिल्मकार खालड़ा के अपने उस दावे से काफी करीब हैं कि पूरे पंजाब में 25,000 अज्ञात सिख युवाओं का अवैध दाह संस्कार किया गया था—यह आंकड़ा अमृतसर के दुर्गियाना मंदिर और पट्टी तथा तरन तारन के नगरपालिका श्मशानों में दर्ज 2,097 दाह संस्कारों के आधार पर पूरे प्रदेश में अनुमानित रूप से निकाला गया था. साहनी इस ढीले-ढाले अनुमान को तथ्य की तरह पेश करने को “दिल्ली के सबसे खतरनाक चौराहे पर हुई मौतों को लेकर शहर की सारी ट्रैफिक लाइट से गुणा कर देने” जैसा बताते हैं.

लेकिन निर्देशक त्रेहन इस आलोचना को पाखंड बताकर खारिज करते हैं. उन्होंने इंडिया टुडे के साथ बातचीत में कहा, “अगर उन्हें लगता है कि सतलज एकतरफा कहानी है, तो वे दूसरी तरफ की कहानी पर फिल्म बनाने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं. कोई मुझे यह नहीं बता सकता कि मुझे क्या बनाना चाहिए.

कश्मीर फाइल्स का भी दूसरा साइड होगा, केरला स्टोरी का भी होगा. मैं उन फिल्मों के खिलाफ नहीं हूं. लेकिन अगर उनकी अभिव्यक्ति की आजादी का स्वागत होता है, तो मेरी अभिव्यक्ति का क्यों नहीं?” वे बताते हैं कि फिल्म में ऐसे दृश्य शामिल हैं, जो इलाके के हिंसक अतीत का संदर्भ देते हैं (देखें बातचीत, मेरी फिल्म ने पंजाब को एक किया).

अपने बचपन का बड़ा हिस्सा तरन तारन में बिताने वाले त्रेहन इस फिल्म को—जिसके केंद्र में वह व्यक्ति है जिसे वे पंजाब के महानतम शहीदों में से एक भगत सिंह के बराबर रखते हैं—अपना पैशन प्रोजेक्ट कहते हैं. इसका विचार उनके साथ उस वक्त भी बना रहा, जब वे ओमकारा, फुकरे, उड़ता पंजाब और हिंदी मीडियम जैसी फिल्मों के साथ मुंबई के प्रमुख कास्टिंग डायरेक्टर बन गए.

उन्हें निर्माता रॉनी स्क्रूवाला (रंग दे बसंती, उड़ी: द सर्जिकल स्ट्राइक) और अभिनेता-गायक दिलजीत दोसांझ में वे सहयोगी मिले, जिन्हें वे चाहते थे. कोविड-19 महामारी के तुरंत बाद फरवरी से मई 2022 के बीच पंजाब की 137 जगहों पर शूट की गई यह फिल्म त्रेहन की उस कहानी को कहने की कोशिश थी, जो “पंजाब के लिए मायने रखती है”. वे कहते हैं, “अब वक्त आ गया है कि पंजाब के पास कुछ गंभीर सिनेमा हो, जो संवाद शुरू कर सके.”

त्रेहन अपने नायक को पर्दे पर अराजनैतिक रखने के लिए रचनात्मक छूट लेते हैं मगर खालड़ा की बेटी नवकिरण कौर खालड़ा, जो अब अमेरिका में रहती हैं, अपने पिता की राजनीति को लेकर संकोच नहीं करतीं.

वे भारतीय राज्य के खिलाफ “प्रतिरोध के हर तरीके” का इस्तेमाल करने की बात करती हैं और कहती हैं कि सतलज यह दिखाने का एक तरीका है कि “सिस्टम हमारी बात नहीं सुनता”. वे कहती हैं कि उनके पिता भारत को “सताते” रहेंगे. खालड़ा की विधवा परमजीत कौर ने 2019 का लोकसभा चुनाव पंजाब एकता पार्टी के टिकट पर लड़ा था, जिसे कट्टरपंथियों का समर्थन था, लेकिन वे हार गईं.

केस स्टडीः बत्तीस साल से राह देखती एक मां
सुखवंत कौर ने 1992 में महीने भर के भीतर अपने बेटे, पति और पिता को खोया था

सुखवंत कौर को 88 साल की जिंदगी में 1992 की शरद ऋतु की यादें अब भी ताजा हैं. उन्होंने अपने पिता, पति और एक बेटे को गंवा दिया था. धीमी आवाज में वे कहती हैं, “एक औरत के जीवन में तीन मर्द सबसे खास होते हैं, मैंने एक महीने में तीनों को खो दिया.”

उनकी यह पीड़ा अक्तूबर 1992 के अंत में अमृतसर के उपनगर खांडवाला से शुरू हुई, जब एसएचओ चबाल सुरिंदर पाल सिंह के नेतृत्व में पुलिस की एक टुकड़ी ने कौर के पति सुखदेव सिंह और उनके 80 वर्षीय पिता सुलाखन सिंह को उठा लिया.

वे पुलिस के निशाने पर नहीं थे; बल्कि पुलिस उनके बड़े बेटे बलजिंदर सिंह की तलाश में थी. इलेक्ट्रिकल इंजीनियर बलजिंदर पर पुलिस को संदेह था कि वह कई हत्याओं में शामिल एक उग्रवादी संगठन से जुड़ा था.

फिर जो कुछ हुआ उसने सरकारी सेवा के साथ जुड़े रहे एक परिवार को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया. दादा पंजाब पुलिस से सेवानिवृत्त हुए थे, सुलाखन स्वतंत्रता सेनानी थे, और सुखदेव एक सम्मानित शिक्षक थे. इसके बावजूद उन्हें संदेह से परे नहीं माना गया.

सुखवंत के छोटे बेटे जसविंदर सिंह कहते हैं, “हम पुलिस के आगे-पीछे भटकते रहे लेकिन कुछ पता नहीं चला.” परिवार को बाद में पता चला कि सुखदेव और सुलाखन की पुलिस हिरासत में मौत हो गई थी.

कोर्ट में स्वीकारे गए अभियोजन पक्ष के मुताबिक, दोनों शवों को सतलज नदी में ठिकाने लगा दिया गया था. वर्षों बाद उन्हें पता चला कि बलजिंदर को नवंबर 1992 में एक फर्जी मुठभेड़ में मारा गया और शव का अमृतसर के दुर्गियाना मंदिर श्मशान घाट में गुप्त रूप से अंतिम संस्कार कर दिया गया था.

अगले 32 वर्षों तक, सुखवंत कौर आयोगों, जांचकर्ताओं और अदालतों के चक्कर लगाकर मामले की पैरवी करती रहीं. उनकी दृढ़ता का नतीजा आखिरकार सामने आया जब 2024 में सीबीआइ अदालत ने पूर्व एसएचओ सुरिंदर पाल को सात साल के कारावास की सजा सुनाई. इसके बावजूद न्याय अधूरा-सा लगता है.

वे कहती हैं, “मैंने अदालत के फैसले के बाद ही पति और पिता का भोग किया. मेरी बस एक आखिरी इच्छा है कि ये पुलिसवाले मुझे बताएं कि उन्होंने सतलज के किस किनारे पर उनके शवों को फेंका था. मैं बस एक बार वहां जाना चाहती हूं...और मरने से पहले रोना चाहती हूं.”

गड़बड़ियां और गफलतें
इस फिल्म का नाम शुरू में पंजाब '95 था. त्रेहन और निर्माता स्क्रूवाला केंद्रीय फिल्म सर्टिफिकेशन बोर्ड से तीन साल तक उलझते रहे थे, इसलिए त्रेहन एक बार को तो फिल्म की कानूनी मंजूरी को छोटे-मोटे चमत्कार जैसा मानते हैं. 2023 में अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव को ध्यान में रखकर उसे बोर्ड की मंजूरी के लिए भेजा गया था लेकिन उसमें 21 कट सुझाए गए.

टीम ने उसे मानने से इनकार करते हुए बंबई हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. यह जद्दोजहद 2024 तक चलती रही, और तब तक बोर्ड की कांटछांट की फेहरिस्त बढ़कर 127 हो गई. त्रेहन बताते हैं कि उन्होंने स्क्रूवाला को 127 कांटछांट करके फिल्म ‌रिलीज करने का विकल्प दिया, लेकिन उनका या दोसांझ का नाम हटा देने को कहा.

पर स्क्रूवाला उनके साथ खड़े रहे और जी5 से संपर्क किया. जी5 के पास पहले ही कश्मीर फाइल्स और केरला स्टोरी जैसी फिल्में थीं. प्लेटफॉर्म फिल्म का नाम बदलने की शर्त पर उसे रिलीज करने को राजी हो गया.

त्रेहन पहले ही सतलज नाम पंजीकृत करा चुके थे और उन्हें लगा कि यह थीम के साथ "प्राकृतिक न्याय" जैसा है, क्योंकि पुलिसिया प्रताड़ना के बाद खालड़ा का शव कथित तौर पर उसी नदी में फेंक दिया गया था. इस तरह वह शीर्षक आया, जिससे लहरें उठने लगीं, खासकर जब मोदी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर रोक लगा दी.

फिल्म की खासियत यह है कि उसमें न्यायेतर हत्याओं के बारे में जो दिखाया गया है, उसमें काफी सचाई है. उस दशक की हिंसक घटनाओं के आंकड़ों से पता चलता है कि पंजाब में ऐसी कुल वारदातों में 27 फीसद सिर्फ तीन पुलिस जिलों—तरनतारन, अमृतसर और मजीठा—में हुईं.

उत्तर प्रदेश और बिहार से आए प्रवासी मजदूरों की लक्षित हत्याओं जैसी संगीन वारदातों से शायद बताया जा सके कि बड़ी संख्या में मिले अज्ञात शव कुछ हद तक उन वारदातों से जुड़े हो सकते हैं. हालांकि, नवंबर 1995 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हुई सीबीआइ जांच में 2,097 मामलों की पुष्टि हुई थी, जिसे फिल्म में सही ढंग से दिखाया गया है.

बाद में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने पंजाब को पहचाने गए पीड़ितों के परिवारों को मुआवजा देने का आदेश दिया. सीबीआइ जांच की वजह से 100 से ज्यादा मामलों में पुलिस अधिकारियों पर ‌मुकदमे चले, और जेल की सजा हुई. कई मामले अब भी चल रहे हैं.

फिल्म जिन‍ बातों को अनदेखा कर देती है, उसी से उस पर एकतरफा होने का आरोप चस्पां होता है. फिल्म के मुताबिक, खालड़ा ने 1995 में जिसका खुलासा किया था वह 1991 में चरम पर पहुंची आतंकवादी हिंसा वाले वाकए थे. तब पंजाब में 5,265 आम लोग, सुरक्षाकर्मी और आतंकवादी मारे गए थे.

15 जून 1991 को ही खालिस्तान कमांडो फोर्स के खाड़कुओं ने लुधियाना जिले में दो ट्रेनों पर हमला किया. धूरी-हिसार ट्रेन में सिख यात्रियों को अलग करके 48 हिंदू यात्रियों को मार दिया गया और 30 घायल हो गए.

फिरोजपुर-लुधियाना ट्रेन में 62 लोग मारे गए और 40 घायल हो गए. उसी दिन आतंकवादियों ने 11 और लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी, जिनमें चमकौर साहिब के उम्मीदवार जतिंदर सिंह भी शामिल थे. यह उस वारदात का हिस्सा था जिसमें 50 लोग मारे गए, जिनमें 24 अकाली दल के उम्मीदवार थे. आखिरकार वह चुनाव रद्द कर दिया गया.

कुछ दिन पहले सात जून 1991 को केंद्रीय गृह राज्यमंत्री सुबोधकांत सहाय लुधियाना में काफिले पर बम हमले में बाल-बाल बचे थे. उसी साल 1-2 फरवरी को के.पी.एस. गिल की जगह डीजीपी बने डी.एस. मंगत भी ऐसे ही हमले में बच गए थे.

1991 के चुनावों का आतंकी संगठनों ने बहिष्कार किया था. उस दौरान खालिस्तानी हिंसा में 700 से ज्यादा लोग मारे गए. वोटिंग से ठीक एक शाम पहले चुनाव रद्द कर दिया गया था. साल के आखिर तक हिंसा में मरने वालों की संख्या थी 2,591 आम लोग, 497 सुरक्षाकर्मी और 2,177 उग्रवादी.

हिंसा का वह दौर दिल्ली में सरकार की अस्थिरता के वक्त ही चरम पर पहुंचा. 1989 में राजीव गांधी की हार के बाद केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर की अगुआई में दो अल्पमत सरकारें बनीं. पंजाब के चुनावी नतीजों में 'पंथिक' आंदोलन का जोर दिखा. सिमरनजीत सिंह मान के नेतृत्व वाली शिरोमणि अकाली दल (मान) ने छह लोकसभा सीटें जीतीं.

मान समर्थित तीन निर्दलीय उम्मीदवार भी जीते. उनमें रोपड़ से इंदिरा गांधी के हत्यारे बेअंत सिंह की पत्नी बिमल कौर खालसा और बठिंडा से बेअंत सिंह के पिता सूचा सिंह शामिल थे. लिहाजा, बदलते गठबंधनों पर निर्भर केंद्र सरकार के सामने इस गुट को काफी ताकत मिल गई.

केस स्टडीः जसवंत सिंह खालड़ा
शहीद के पीछे का चेहरा

छात्र आंदोलनकारी और सिख राष्ट्रवादी से लेकर पंजाब के लापता लोगों की गुमशुदगी का सच सामने लाने वाले साहसी शख्स—और फिर हिरासत में उनकी हत्या के बाद एक सियासी विरासत के पुरोधा

जन्मजात आंदोलनकारीः जसवंत सिंह संधू का जन्म 1952 में खालड़ा गांव में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े परिवार में हुआ था. जातिगत पहचान हटाने के लिए गांव का नाम ही उपनाम बना लिया. 1973 में नौजवान भारत सभा से जुड़े. कथित पुलिस मुठभेड़ों में मारे गए युवकों के दस्तावेज तैयार किए. बिजली बोर्ड और बाद में अमृतसर सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक में नौकरी की. 1981 में परमजीत कौर से उनकी शादी हुई.

राजनैतिक कार्यकर्ताः ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद खालड़ा सिख राजनीति और नागरिक अधिकारों के आंदोलन से गहरे जुड़े. वे अकाली दल से जुड़े, नागरिक अधिकारों की फैक्ट-फाइंडिंग टीमों का पंजाब में मार्गदर्शन किया. 

खालिस्तान से सहानुभूति: 1990 में ब्रिटेन गए, राजनैतिक शरण की अर्जी दी और अगले साल स्वत: भारतीय नागरिकता त्याग दी. लिबरेशन खालिस्तान मूवमेंट इंटरनेशनल की स्थापना की और लिबरेशन खालिस्तान पत्रिका का संपादन किया.

लेखों में जरनैल सिंह भिंडरांवाले को कौमी नायक बताया, सशस्त्र अभियान को सिखों की आजादी का संघर्ष कहा और सिख उग्रवादी परंपरा को आतंकवाद से अलग बताया. इस बात का कोई सबूत नहीं मिलता कि उन्होंने खुद कभी उग्रवादी गतिविधि में भाग लिया हो या हिंसा का समर्थन किया हो. 1992 में भारत लौटे और अकाली दल के मानवाधिकार प्रकोष्ठ के महासचिव बने.

लापता लोगों की आवाजः उग्रवाद-विरोधी अभियान तेज होने के साथ, खालड़ा का सामना ऐसे परिवारों के साथ ज्यादा होने लगा जिनके बेटे और पति को सुरक्षाबलों ने उठा लिया था. अमृतसर सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक के उनके साथी प्यारा सिंह की गुमशुदगी से यह मसला उनके और भी करीब आ गया.

जसपाल सिंह ढिल्लों, वकीलों और अन्य मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर उन्होंने यह पता लगाने की कोशिश शुरू की कि ये लापता लोग हिरासत में या फिर कथित मुठभेड़ों में मारे गए.

मानवाधिकार के पैरोकारः 1994 के उत्तरार्ध में खालड़ा और उनके सहयोगियों ने दुर्गियाना मंदिर, पट्टी और तरनतारन के श्मशान घाटों के रजिस्टरों की जांच की तथा उनका मिलान नगर निकाय के जलावन लकड़ी संबंधी रिकॉर्ड से किया.

जनवरी 1995 में उन्होंने नामों, तिथियों और आधिकारिक रूप से दर्ज विवरणों को पेश किया और उनके आधार पर आरोप लगाया कि 1984 से 1994 के बीच इन तीनों श्मशान घाटों में पुलिस ने 2,097 से ज्यादा शवों का अज्ञात या लावारिस बताकर अंतिम संस्कार कर दिया.

बाद में उन्होंने इन तथ्यों को विदेशों में भी सार्वजनिक किया और अनुमान पेश किया कि पूरे पंजाब में इसी तरह चोरी-चुपके 25,000 अंतिम संस्कार कर दिए गए. हालांकि यह आंकड़ा विवादित भी रहा.

शहीदः मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के छह दिन बाद छह सितंबर 1995 को खालड़ा का अमृतसर स्थित उनके घर के बाहर से अपहरण कर लिया गया. बाद में सामने आए सबूतों से यह पता चला कि पंजाब पुलिस के कुछ जवानों ने उन्हें अवैध हिरासत में रखकर यातनाएं दीं, उनकी हत्या कर दी और उनके शव को सतलज नदी में फेंक दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआइ जांच के आदेश दिए, कई पुलिस अधिकारियों को दोषी ठहराया गया और बाद में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने चोरी-चुपके की गई अंत्येष्टि के मामले में मुआवजे के पात्र के रूप में 1,513 पीड़ितों की पहचान की.

दूरगामी असरः खालड़ा की विरासत राजनैतिक रूप से विवादास्पद है. उनकी विधवा परमजीत कौर ने 1999 का लोकसभा चुनाव सरब हिंद शिरोमणि अकाली दल के टिकट पर और 2019 का चुनाव पंजाब एकता पार्टी की उम्मीदवार के रूप में लड़ा. उनकी बेटी नवकिरण कौर अब अमेरिका में रहती हैं और अपने पिता की सिख सियासी विरासत की मुखर पक्षधर बन गई हैं. वे कहती हैं कि खालड़ा हमेशा “व्यवस्था को झकझोरते रहेंगे.” 

खून-खराबे का दशक
समझौते की उम्मीद में चंद्रशेखर सरकार ने मान गुट के साथ बातचीत की. उसकी मांगों में गिल को हटाना शामिल था, जिन्हें उग्रवादी उग्रवाद-विरोधी कार्रवाई का मुख्य चेहरा मानते थे. दिल्ली की सरकार मान गई और गिल की जगह मंगत को लाया गया. लेकिन मान ने संयुक्त राष्ट्र के दखल की मांग की तो बातचीत टूट गई. उग्रवादियों ने दिल्ली की अस्थिर सरकार और गिल की गैरमौजूदगी को कमजोरी समझा और पीछे हटने के बजाय गतिविधियां तेज कर दीं.

उग्रवादी हमलों के तरीके भी बदल गए. पहले सुरक्षा बलों पर हमले किए जाते थे, बाद में पुलिस, न्यायिक अधिकारियों, सरकारी कर्मचारियों और खास परियोजनाओं पर काम करने वाले इंजीनियरों के परिवारों को निशाना बनाया जाने लगा. 1989 और 1993 के बीच पंजाब में 12 न्यायिक अधिकारियों की हत्या कर दी गई.

मई 1992 में उग्रवादियों ने जगराओ में न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रेम कुमार गोयल और उनकी पत्नी की हत्या कर दी. उससे पहले 23 जुलाई 1990 को बलविंदर सिंह जताना की अगुआई में उग्रवादियों ने बीबीएमबी (भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड) के मुख्य इंजीनियर एम.एस. सेखरी और सुपरिटेंडिंग इंजीनियर अवतार सिंह औलख की उनके चंडीगढ़ दफ्तर में हत्या कर दी. मकसद था सतलज-यमुना लिंक नहर के निर्माण को रोकना. वह परियोजना करीब तीन दशक बाद भी पूरी नहीं हो पाई है.

गिल 1999 में छपी अपनी किताब एंडगेम इन पंजाब में बताते हैं कि उग्रवादियों ने पुलिसवालों को धमकी देनी शुरू कर दी थी कि वे नौकरी छोड़ दें, वरना उनके परिजनों को मार दिया जाएगा. 1991 में पुलिसवालों के 134 परिजनों की हत्या कर दी गई. 1992 में यह संख्या 200 से ज्यादा थी. सबसे कुख्यात हमला नौ अगस्त 1992 की रात हुआ. उग्रवादियों ने बरनाला जिले के तीन गांवों में 21 लोगों की हत्या कर दी.

उनमें ज्यादातर पुलिसवालों के रिश्तेदार थे. बखतगढ़ गांव में 14 लोगों को उनके घरों से खींचकर मार डाला गया. माना जाता है कि यह हमला बब्बर खालसा के प्रमुख सुखदेव सिंह बब्बर को पुलिस के मार गिराने के बदले में किया गया था.

ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद 1984 से 1994 के दशक में ट्रेनों और बसों में हिंदुओं की हत्याओं के साथ-साथ खालिस्तानी आतंकवादी गुटों का दबदबा बढ़ा. प्रशासन, निचली अदालतों और मीडिया का कामकाज लगभग ठप हो गया. तब बड़ी संख्या में केंद्रीय अर्द्धसैनिक जवानों की मदद से पंजाब पुलिस ही राज्य सरकार का इकलौता सक्रिय अंग थी.

पंजाब के भीतरी इलाकों, खासकर सीमावर्ती जिलों में डर और आतंक का माहौल तारी था. वहां हथियारों से लैस खालिस्तानी गुटों का राज था और सूरज ढलने के बाद वे बेरोक-टोक अपनी चलाते थे. ज्यादातर सड़कें, ग्रैंड ट्रंक रोड जैसे आम तौर पर व्यस्त रहने वाले हाइवे भी सुनसान हो गए थे.

इक्का-दुक्का वही गाड़ियां निकलती थीं, जिन पर भारी हथियारों से लैस पुलिसवाले होते थे या फिर ट्रैक्टर-ट्रॉलियों पर अंधाधुंध गोलीबारी करने वाले आतंकवादी सवार होते थे. उनमें ज्यादातर कच्ची उम्र के लड़के होते थे. सच तो यह है कि पंजाब में कलाश्निकोव का राज था.

तालिबान के दौर से काफी पहले खालिस्तानी गुट बंदूकों के दम पर अपने सामाजिक फरमान लागू करवा रहे थे. मसलन, स्कूलों में हिंदी पढ़ाने या राष्ट्रगान गाने पर रोक; लड़कियों को स्कर्ट के बजाय केसरिया दुपट्टे के साथ सलवार-कमीज पहनने के लिए मजबूर करना वगैरह: दिसंबर 1990 में राजपुरा के एनटीसी में एक सीनियर सेकेंडरी स्कूल की प्रिंसिपल निर्मल कांता की ऐसे आदेश न मानने की वजह से स्कूल परिसर में गोली मारकर हत्या कर दी गई. सड़कों पर जींस पहन या मेकप करके चलने पर भी सजा मिलती थी.

जिन आदमियों के बाल कटे होते या दाढ़ी छोटी होती, उन्हें सबके सामने सजा दी जाती थी. 17 अगस्त 1986 को अमृतसर के पास धत्तल गांव में 30 साल के पावर-लूम वर्कर बलदेव सिंह और उनके एक साथी को हथियारबंद लोगों ने रोका और उनके बालों के स्टाइल पर ऐतराज जताया. बंदूकधारियों ने उनके दोस्त को मार डाला और सिंह के गले और रीढ़ की हड्डी में गोली मारकर उन्हें हमेशा के लिए अपाहिज बना दिया.

अंधेरा होने के बाद आतंकवादी खुलेआम आ-जा सकें, इसके लिए ग्रामीणों को कुत्ते पालने से मना किया गया और आवारा कुत्तों को मारने का आदेश दिया गया. आदेश न मानने का नतीजा मौत हो सकती थी, और कई बार ऐसा हुआ भी. कुछ फरमान तो वाकई अजीब थे: सिख दंपतियों से कहा गया कि वे गर्भनिरोधक का इस्तेमाल न करें, ताकि "लड़ाई" के लिए ज्यादा लड़के मिल सकें.

राज्य में निचली अदालतें लुंजपुंज थीं. ज्यादातर जज पुलिस की हिरासत वाले आतंकवादियों से जुड़े केस लेने से डरते थे. हालात और बिगड़ गए जब न्यायिक अधिकारियों पर सीधे हमले होने लगे. मोगा में जज हंसराज कौशिक की उनके ही कोर्टरूम में गोली मारकर हत्या कर दी गई (देखें केस स्टडी, जज की हत्या).

उधर, गांवों में तरनतारन के मनोचहल और गुरजंट सिंह बुधसिंहवाला जैसे आतंकवादी सरगना अदालतें लगाते थे और हर तरह के मामले सुलझाते थे. चाहे वह जमीन का झगड़ा हो, खेतों में पानी के बंटवारे का मसला या शादी-ब्याह से जुड़े विवाद.

मीडिया भी निशाने पर आ गया. चंडीगढ़ में ऑल इंडिया रेडियो के स्टेशन डायरेक्टर आर.के. तालिब की छह दिसंबर 1990 को गोली मारकर हत्या कर दी गई. पटियाला में आकाशवाणी के स्टेशन डायरेक्टर एम.एल. मनचंदा को बब्बर खालसा के आतंकवादियों ने अगवा कर लिया.

उनकी मांग थी कि सभी स्थानीय प्रसारण हिंदी के बजाय पंजाबी में हों.सरकार अपहरणकर्ताओं की तय समय-सीमा के अंदर मांगें पूरी नहीं कर पाई, तो 27 मई 1992 को उनका सिर काट दिया गया.

आकाशवाणी ने पंजाब और चंडीगढ़ में हिंदी भाषा में होने वाले सभी प्रसारण बंद कर दिए. दूरदर्शन ने भी ऐसा ही किया और यह भी पक्का किया कि उसके एनाउंसर ऑन-एयर सलवार-कमीज और दुपट्टा पहनें. यहां तक कि पंजाब के जनसंपर्क विभाग ने भी घुटने टेक दिए और गुरमुखी में प्रेस विज्ञप्ति जारी करने लगा.

केस स्टडीः अदालत में ही कत्ल
भरी अदालत में हंसराज कौशिक की हत्या ने न्यायपालिका को दहलाकर रख दिया था, उनका परिवार आज भी सदमे में

सरकारी रिटायर अधिकारियों में पंजाब काडर के पूर्व आइएएस अधिकारी रविंदर कौशिक की पहचान नौकरशाही के चलते-फिरते विश्वकोश की तरह है.

उनके साथी तारीखें और सरकारी आदेश याद रखने की उनकी क्षमता पर हैरानी जताते हैं, और मजाक में कहते हैं कि अभिलेखागार के मुकाबले उन्हें भारतीय नौकरशाही के घटनाक्रम ज्यादा अच्छी तरह पता हैं.

हालांकि, बहुत कम लोगों को इसके पीछे की त्रासदी का पता होगा. कौशिक के पिता मोगा में न्यायिक मजिस्ट्रेट हंसराज कौशिक की नौ फरवरी, 1987 को खालिस्तानी उग्रवादियों ने भरी अदालत में गोली मारकर हत्या कर दी थी. आजाद भारत में भरी अदालत में किसी जज की हत्या का यह संभवत: इकलौता मामला है.

रविंदर तीन भाइयों में सबसे बड़े हैं. वे कहते हैं, “मैं तब एक बेपरवाह लड़का था. ऐसा लगा कि रातोरात परिपक्व हो गया.” दुख की उस घड़ी में सामाजिक अलगाव भी झेलना पड़ा. वे बताते हैं, “कई रिश्तेदारों और दोस्तों ने हमारे यहां आना तक छोड़ दिया.”

हर भाई ने इस दुख को अलग तरह से झेला. उनके छोटे भाई चेतन ने कभी शादी न करने का फैसला किया और जीवन अपनी विधवा मां की देखभाल में बिता दिया. रविंदर कहते हैं, “मैंने पंजाब काडर में सेवा की लेकिन मैंने पंजाब में एक छोटा-सा प्लॉट तक नहीं खरीदा.” तीसरे भाई अशोक कभी यह स्वीकार नहीं कर पाए कि कोई अदालत में घुसकर सबके सामने जज की हत्या कर सकता है.

हत्या के लिए सिख उग्रवादी गुटों पर आरोप लगाया गया लेकिन किसी भी अदालत ने बंदूकधारियों का नाम तक नहीं लिया और न ही किसी संगठन को जिम्मेदार ठहराया. लगभग चार दशक बाद भी रविंदर उस हत्या के बारे में बिना किसी कड़वाहट के बात करते हैं. जो व्यक्ति पंजाब का प्रशासनिक इतिहास बेहतर जानता है, वह खुद मौन रूप में उसका एक अभिन्न हिस्सा है.

अतीत से मुक्ति 
तत्कालीन डीजीपी गिल को सतलज में ऐसे कसाई के तौर पर पेश किया गया है जिसने उग्रवादियों की गैर-न्यायिक हत्या का आदेश दिया था. फिल्म यह भी इशारा करती है कि खालड़ा की हत्या शायद उन्हीं के कहने पर हुई. हालांकि कई जानकार 1991 से 1995 के बीच गिल के दूसरे कार्यकाल को ही उग्रवाद के खात्मे की मुख्य वजह मानते हैं.

सेना की मदद के साथ गिल ने 1992 के विधानसभा चुनाव को सफलतापूर्वक संपन्न करवाया, जिसमें चुनाव लड़ रहे किसी भी उम्मीदवार की जान नहीं गई. यह बड़ी उपलब्धि थी, क्योंकि जून 1991 के चुनावों से पहले आतंकवादियों ने कई उम्मीदवारों और उनके समर्थकों को मार डाला था. नतीजतन उन चुनावों को रद्द करना पड़ा था.

बेअंत सिंह 1992 में मुख्यमंत्री बने तो प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव ने उनसे साफ कहा कि पुलिस के कामकाज में कोई राजनैतिक दखलंदाजी न हो. गिल ने सबसे पहले पुलिस बल का हौसला बढ़ाया और उन अफसरों को प्रमोशन और इनाम दिए, जिन्होंने उग्रवाद से मुकाबले में हिम्मत और काबिलियत दिखाई.

पुलिसवाले कई साल से अंधेरा होते ही थानों में लौट जाते थे. उसके बाद वे रात के समय दूर-दराज के इलाकों में भी धमक दिखाने लगे. अपनी अहम पहल 'ऑपरेशन नाइट डॉमिनेंस' के तहत डीजीपी खुद मैदान में मौजूद रहते थे.

हालांकि गांवों में घेराबंदी का काम सेना के जवान करते थे, लेकिन उन जगहों पर गिल और उनके पुलिसवालों की तस्वीरें हर अखबार में छपती थीं, जो तब तक आतंकवादियों के गढ़ हुआ करते थे. इससे आतंकवादियों का मनोबल बुरी तरह टूट गया और उनके लिए अंधेरा होने के बाद भी इधर-उधर आना-जाना मुश्किल, बल्कि नामुमकिन हो गया.

वर्ष 1994 तक आम लोगों की हत्या की आतंकवादी वारदातें महज दो हो गईं और कोई सुरक्षाकर्मी नहीं मारा गया. गिल ने कभी न्यायेतर हत्याओं की बात स्वीकार नहीं की. वे यही कहते रहे कि खालड़ा किसी मामले में वांछित नहीं थे और न पुलिस हिरासत में थे. वे बढ़ते आरोपों के बावजूद तरन तारन के एसएसपी अजित सिंह संधू के पीछे खड़े रहे, सिर्फ यही कहा कि संधू उस तैनाती से भी नहीं हिचके, जो कोई अधिकारी लेना नहीं चाहता था.

अपनी किताब में गिल ने इन तौर-तरीकों की सराहना की, “उदार दिमाग हमेशा ही इस तथ्य से सामना होने पर दुविधा में रहा है कि राज्य-सत्ता, बाकी बातों के अलावा, जोर-जबरदस्ती का पर्याय है. और यह कि उसे समय-समय पर ताकत के विकल्प को इस्तेमाल करना चाहिए, अलबत्ता वह न्यायिक विवेक के साथ, बेहद बारीक व्याख्या और लक्षित बल प्रयोग हो. उसे स्वतंत्रता, लोकतंत्र और कानूनसम्मत प्रशासन के दुश्मनों के भारी हिंसा से प्रभावित नहीं होना चाहिए.”

बेअंत सिंह की 31 अगस्त 1995 को हत्या के छह दिन बाद छह सितंबर को खालड़ा को अमृतसर में उनके घर से उठा लिया गया. उन्हें गैर-कानूनी पुलिस हिरासत में मार डाला गया. उनके शव को हरिके बैराज के पास सतलज नदी में फेंक दिया गया.

शव कभी नहीं मिला. इस मामले में तरनतारन के तत्कालीन एसएसपी समेत नौ पुलिसवालों पर आरोप था. संधू ने मई 1997 में चंडीगढ़ के बाहर एक तेज रफ्तार ट्रेन के सामने कूदकर जान दे दी, जिन‍ पर लापता होने के अन्य मामलों में सीबीआइ पहले ही मुकदमा चला रही थी.

केस स्टडी
अब भी अंदर धंसी हैं गोलियां

मोगा में 1989 में आरएसएस की शाखा के दौरान उग्रवादी हमले में 30 लोग मारे गए, जिससे हिंदू समुदाय में दहशत फैल गई

आज भी गोलियां अजय गुप्ता के शरीर से बाहर नहीं निकल सकी हैं. डॉक्टरों का कहना है कि धातु के कुछ टुकड़े अब भी अंदर धंसे हैं. वे उस समय सिर्फ 13 वर्ष के थे. 25 जुलाई 1989 की वह सुबह उन्हें ऐसे याद है, मानो कल की बात हो—स्वचालित हथियारों से अंधाधुंध फायरिंग, चीखें, और चारों ओर गिरते शव.

अजय उस दिन मोगा के नेहरू पार्क में एक विशेष शाखा के लिए जुटे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सैकड़ों स्वयंसेवकों में शामिल थे, जब कथित उग्रवादियों ने धावा बोला और अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी. चार अन्य लोगों के साथ संघ के 21 स्वयंसेवक मारे गए.

इन मारे गए लोगों में अजय के पिता भगवान दास और चचेरे दादा जगदीश भगत भी थे. बड़े भाई अरुण गुप्ता बच गए. अजय कहते हैं, “मैंने अपने पिता और अन्य लोगों के सीने गोलियों से छलनी होते देखा. वे तस्वीरें कभी आपका पीछा नहीं छोड़तीं.”

संजीव कुमार उस समय 17 वर्ष के थे और मोगा में आरएसएस के बाल स्वयंसेवकों के साथ काम करते थे. वे जीवित तो बच गए लेकिन इस हमले ने उन्हें हमेशा के लिए दिव्यांग बना दिया. उनका पूरा जीवन अपराधबोध से घिरा है. वे कहते हैं, “मेरे दो युवा साथी नीरज और प्रभजोत (दोनों 10 वर्ष से कम उम्र के थे) इस हमले में मारे गए. मैं उन्हें बचा नहीं सका.”

हमलावर इससे कहीं ज्यादा लोगों को मारना चाहते थे. अपने पिता बाबूराम सिंगला को गंवा देने वाले प्रवीण सिंगला के दोनों पैरों में गोली लगी. वे बताते हैं कि उग्रवादियों ने पार्क के चारों ओर बम लगाए थे. वे कहते हैं, “एक बम उस वक्त फटा जब लोग घायलों को सुरक्षित स्थान पर ले जा रहे थे. पुलिस ने पार्क में दूसरे बम को निष्क्रिय किया और तीसरा बम अस्पताल से बरामद किया गया, जहां घायलों को ले जाया गया था.”

मोगा की घटना इकलौती नहीं थी. उन वर्षों के दौरान उग्रवादियों ने हिंदू आबादी को निशाना बनाया. मोगा के रहने वाले वरिष्ठ आरएसएस प्रचारक रामगोपाल का तर्क है कि वह हमला हिंदू संगठनों को भड़काने के लिए किया गया था “ताकि उसे हिंदू बनाम सिख संघर्ष में बदला जा सके.” उस समय, लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे वरिष्ठ भाजपा नेताओं ने शांत रखने में सक्रिय भूमिका निभाई.

रामगोपाल कहते हैं, “खालिस्तान आंदोलन कोई हिंदू बनाम सिख मुद्दा नहीं था; यह उग्रवादी बनाम समाज का मुद्दा था. यही हमारी सोच है.” हालांकि, मोगा के हिंदू समुदाय पर बुरा असर पड़ रहा था. कई परिवारों ने तो पलायन करने के बारे में सोचा. अजय कहते हैं, “लेकिन हम कहां जा सकते थे? हिंदुओं को निशाना बनाया जा रहा था. हमारा व्यवसाय, संपत्तियां, जीवन, सब खतरे में था. हमने फैसला किया कि यहीं रहेंगे और डटकर सामना करेंगे.”

जख्म आज भी ताजा हैं. अजय, संजीव और प्रवीण जैसे लोगों के लिए जीवित बच जाना कहानी का अंत नहीं था, बल्कि कठिन दौर की शुरुआत थी, ऐसे सच के साथ जीना, जिसे भुलाया नहीं जा सकता.

‘‘मैंने अपने पिता और दूसरों को गोलियों से छलनी होते देखा. वे दृश्य कभी पीछा नहीं छोड़ते. ’’
—अजय गुप्ता, जिन्होंने अपने पिता और दादा को हमले में खोया’’

इतिहास से सुलह
जब 2027 की शुरुआत में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनावों से ठीक 6-7 महीने पहले सतलज के अचानक रिलीज से राज्य की सभी राजनैतिक पार्टियों के बीच बढ़त हासिल करने की होड़ लग गई है. सत्ताधारी आम आदमी पार्टी और कांग्रेस दोनों ने ही ओटीटी से फिल्म को हटाए जाने पर दिल्ली पर हमला बोला है और पूरे पंजाब में उसकी प्राइवेट स्क्रीनिंग का समर्थन किया है.

पंजाब के कई पूर्व नौकरशाहों और पुलिस अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि घटनाओं को एकतरफा तरीके से दिखाने से युवा सिखों में कट्टरपंथ की नई लहर पैदा हो सकती है. ये वे युवा हैं जो पिछले 31 साल में पैदा हुए हैं और जिन्होंने पंजाब के उस खौफनाक दशक को खुद नहीं देखा है. फिल्म की कहानी उन्हें आसानी से भड़का सकती है.

जैसा कि पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अम‌र‌िंदर सिंह ने द ट्रिब्यून से कहा, "इतिहास से भागने का कोई फायदा नहीं. लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि इतिहास वर्तमान में बंटवारा पैदा करे. हमें अपने अतीत से सीख लेनी चाहिए और उसे इस हद तक याद रखना चाहिए कि हम उन गलतियों को न दोहराएं."

पंजाब को अब डर और बदले की भावना की नहीं, बल्कि वह करने की जरूरत है जिससे अतीत के घाव भर सकें. ऐसी ईमानदार पहल हो जो राज्य के अंधेरे दशक की बुरी यादों को फिर से जिंदा करने के बजाय उससे मुक्ति दिला सके.

—साथ में सुहानी सिंह

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