कब एडजस्ट न करें
महिला सशक्तीकरण के दशकों बाद भी अगर हम पुरुषों की हिंसा से सुरक्षित नहीं तो कहीं कुछ बड़ी खामी है. हमें रणनीतियां बदलनी होंगी और व्यक्तिपरक से सामुदायिक सोच की ओर बढ़ना होगा. इसमें पुरुषों की भी भागीदारी जरूरी.

- दीपा नारायण
दशक भर पहले मैंने 600 शहरी, मध्यम और ऊंची आमदनी वाली महिलाओं के साथ गहन बातचीत के जरिए उनके अंतर्मन में झांका और चुप किताब में उनके बारे में बताया. दशक भर बाद सहमति-असहमति की महिलाओं की ताकत और आजादी का पैमाना होने पर इंडिया टुडे का यह सर्वे मेरी पहले की रिसर्च के सांख्यिकी हमराही की तरह लगता है.
निर्भया बलात्कार कांड के बाद महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तीकरण के जबरदस्त राष्ट्रीय अभियान के बाद इन दोनों ही अध्ययनों से सोच में आए बदलावों का तो पता चलता ही है, रोजमर्रा के उन व्यवहारों में चिंताजनक ठहराव का भी पता चलता है जिनमें महिलाओं ने सुरक्षित और जिंदा रहने के लिए अपने को समेट लिया है.
जिंदगी और सीख पारिवारिक घर में शुरू होती है. यह सभी सदस्यों के लिए सुरक्षा और प्यार का ठिकाना होना चाहिए. इसके बजाए लड़कियों और महिलाओं के लिए यह अक्सर सबसे खतरनाक जगह होती है.
इंडिया टुडे के सर्वे में 66 फीसदी महिलाएं मानती हैं कि विवाह में भी बलात्कार हो सकता है, मगर केवल 32 फीसदी वैवाहिक बलात्कार को आपराधिक बनाना चाहती हैं. वहीं, केवल एक-चौथाई महिलाएं ही यौन उत्पीड़न का शिकार होने पर परिवार और दोस्तों से बात करते हुए सहज महसूस करती हैं.
बलात्कार अकेला खौफ नहीं है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (एनएफएचएस)-5 बताता है कि तमाम पुरुषों में से एक-तिहाई अपनी पत्नियों के खिलाफ शारीरिक, यौन और भावनात्मक हिंसा करते हैं, जिसका सबसे आम इजहार थप्पड़ है. यहां तक कि शीर्ष आय समूहों में भी पांच में से एक पुरुष अपनी पत्नियों के साथ हिंसक होता है. और उच्च शिक्षित एक-तिहाई महिलाएं इसे सामान्य मानती हैं. हिंसा के खिलाफ मजबूत रक्षाकवच न तो ऊंची आमदनी दे पाती है और न ही औपचारिक शिक्षा.
हमारे समाधानों में ही शायद बुनियादी गड़बड़ी हो. महिलाओं के सशक्तीकरण को हमने बाहरी, सीधा और सरल समझने की गलती की. यह प्रक्रिया इसके बजाए बहुत आंतरिक, आड़ी-तिरछी और जटिल है.
महिलाओं को गहरी जड़ें जमाए बैठी सांस्कृतिक प्रक्रिया के जरिए शक्तिहीन बनाया गया है. इसमें ऐसी नैतिक आदतें डाली जाती हैं जो महिलाओं को अस्तित्वहीन और पुरुष को सत्ता में बनाए रखने की जकड़बंदी में कसकर बांध देती हैं. इस तरह शक्तिहीन बनाने को पकड़ने वाला जो मुहावरा मेरी रिसर्च में उभरकर आया, वह है 'एडजस्ट कर लो’. क्या महानगर और क्या कस्बे, यह हर जगह सुनने को मिला.
महिलाएं अब भी शुरुआती बचपन के उसी प्रशिक्षण के हाथों खेल रही हैं जिसमें उन्हें अपने को अदृश्य कर लेना सिखाया गया है: अच्छी बनो, शरीर को समेटकर रखो, चुप करो, खामोश रहो, 'दायरों और सीमाओं’ के भीतर रहो, 'ना’ मत कहो, इजाजत का इंतजार करो, और सबसे बढ़कर, पसंद किए जाने वाले काम करो, मुस्कराओ और सुरक्षित रहो. इन व्यवहारों के धागे खोलना गहरी सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है.
सशक्तीकरण की हमारी रणनीतियां सामुदायिक होने के बजाए व्यक्तिपरक हैं, जो पहले से ही बेबस महिलाओं को ठीक उन्हीं लोगों के खिलाफ खड़ा कर देती हैं जिन्हें उनके ऊपर सत्ता हासिल है और जिन पर वे निर्भर हैं—यानी उनके परिवार. इसका कोई मतलब समझ नहीं आता.
दरअसल बेबस और अकेली महिलाओं से दो बार कीमत चुकाने के लिए कहा जाता है.
पहली बार तब जब उनकी मर्यादा भंग की जाती है, और दूसरे जब वे उसी समूह के खिलाफ अकेली बोलती हैं जिसका वे हिस्सा होती हैं. हमारी रणनीतियां बदलाव का बोझ हिंसा को बरदाश्त करने और बढ़ावा देने वाले सामाजिक समूहों के बजाय निर्दयतापूर्वक अकेली महिलाओं पर डाल देती है.
हमने पुरुषों को तकरीबन दरकिनार ही कर दिया. राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं को सशक्त बनाने की रणनीतियां इतनी साधनसंपन्न नहीं हैं कि पुरुष या महिला होने के मायनों के बारे में पुरुषों से बातचीत कर सकें. लैंगिक चिंताएं और तनाव महिलाओं और पुरुषों दोनों को होते हैं.
महज नारों, तकनीकपरस्त तरीकों या केवल महिलाओं पर ध्यान देने के बजाय महिलाओं और पुरुषों के समूहों को इन दुष्चिंताओं को संभालने के उपाय सिखाकर परिवारों के भीतर कहीं ज्यादा सौहार्द लाया जा सकता है.
लेखिका जानी-मानी समाजशास्त्री हैं और उन्होंने चुप: ब्रेकिंग द साइलेंस अबाउट इंडियाज विमेन किताब लिखी है.