सेक्स और सहमति

ना कहने पर महिलाओं को अपने संगी, परिवार और समाज से किस-किस तरह की चुनौतियों का करना पड़ता है सामना: इंडिया टुडे-रेकिट सर्वे ने इसी को बनाया आधार.

AWARENESS: EQUITY:PROTECTION CONSENT: INCLUSION
सांकेतिक तस्वीर

हर दिन, लाखों भारतीय घरों में एक शांत-सा समझौता होता है. कोई महिला किसी मांग, किसी स्पर्श, किसी अपेक्षा को 'ना’ कहना चाहती है और मन ही मन उसके खामियाजे का अंदाजा लगाती है:  इसे सीमा के रूप में लिया जाएगा या अपमान माना जाएगा?

यह बात उसे समझानी पड़ेगी, नरमी से नकारना होगा या इसके लिए माफी मांगनी होगी? या फिर हामी भर देना ही आसान है? आखिर किसी महिला की 'ना’ की कोई अहमियत है? इस इकलौते सवाल के जवाब के मूल में है सहमति.

यह सवाल अहम है, क्योंकि सहमति आजादी की सबसे छोटी इकाई है. संविधान, कार्यस्थल या वैवाहिक रिश्ते में बराबरी का दावा करने से पहले किसी महिला को बिना डर इनकार करने और बिना सजा के अपना मन बदलने में सक्षम होना चाहिए.

भारत ने हाल के वर्षों में सहमति पर खूब बहस की है: वैवाहिक बलात्कार पर विचार करती अदालतों में, #मीटू के बाद न्यूजरूम में, फिल्मों, क्लासरूम और परिवार के व्हाट्सऐप ग्रुपों में. यह शब्द राष्ट्रीय शब्दावली में आ चुका है. लेकिन अब तक किसी ने यह नहीं मापा था कि क्या यह राष्ट्रीय विमर्श में भी शामिल हुआ है.

इंडिया टुडे ग्रुप ने इसी का पता लगाने की कोशिश की है. देश में अपनी तरह के इस पहले सहमति सर्वे में हर क्षेत्र, आय वर्ग, शिक्षा स्तर, धर्म, रोजगार श्रेणी, वैवाहिक स्थिति और सामाजिक समूह की 5,000 वयस्क महिलाओं से पूछा गया कि वे सहमति के बारे में क्या सोचती हैं और जब वे उसे लागू करती हैं, तो वास्तव में क्या होता है.

सर्वे के सवाल चार हिस्सों में रखे गए: सहमति, विकल्प और प्रेम की सीमाएं; परिवार, विवाह और नियंत्रण का निजी दायरा; सार्वजनिक, पेशेवर और डिजिटल उल्लंघनों से बनी असुरक्षित दुनिया; और शिक्षा, कानून तथा जवाबदेही के जरिए सहमति की संस्कृति बनाना. जवाब बताते हैं कि महिलाएं संगी, बड़ों, बॉस, अजनबी और स्क्रीन के सामने 'ना’ कहने जैसा काम कैसे करती हैं.

पहले अच्छी खबर. लगभग पांच में से चार महिलाएं—सभी वर्ग, क्षेत्र और पीढ़ी की—मानती हैं कि हर परिस्थिति में, बिना किसी अपवाद के, 'नहीं का मतलब नहीं’ होता है. पर उनके पास जो नहीं है, वह है इसे अमल में ला पाने की सामाजिक अनुमति.

केवल 36 फीसद के आसपास महिलाएं साफ कहती हैं कि दबाव में दी गई सहमति, सहमति नहीं होती. बाकी महिलाएं किसी न किसी रूप में दबाव में बनी सहमति को सहमति मानती हैं. अपना मन बदलने के अधिकार पर नमूना लगभग दो हिस्सों में बंट जाता है:

45 फीसद कहती हैं कि 'हां’ कहने के बाद बीच में सहमति वापस लेना स्वीकार्य है; 48 फीसद कहती हैं कि यह स्वीकार्य नहीं; सिर्फ 28 फीसद कहती हैं कि अंतरंग पलों के दौरान सहमति वापस लेने में कोई बुराई नहीं. ज्यादातर के मुताबिक ऐसी स्त्रियों को धोखेबाज, धूर्त या ड्रामेबाज समझा जाता है.

यह सर्वे इस फासले को कंसेंट एम्पावरमेंट इंडेक्स के जरिए मापता है, जिसे धारणा और अनुभव से जुड़े 20 इनपुट से बनाया गया है. 0-100 के पैमाने पर महिलाओं की सहमति को लेकर समझ का स्कोर करीब 59 है, जबकि उनके वास्तविक अनुभव का स्कोर करीब 44 है (देखें बॉक्स). स्वायत्तता से लगभग 15 अंक आगे चल रही है जागरूकता. कुल स्कोर करीब 52 पर टिकता है.

इनकार का प्रदर्शन
पहली कसौटी सबसे सरल है: क्या कोई महिला 'ना’ कह सकती है? करीब 56 फीसद महिलाएं कहती हैं कि जब वे कुछ नहीं करना चाहतीं तो सीधे मना कर देती हैं. लेकिन 41 फीसद या तो बहाने बनाकर अपने इनकार को नरम करती हैं या मना करने का पूरा मन होने के बावजूद राजी हो जाती हैं. भारतीय महिलाओं के एक बड़े हिस्से के लिए इनकार एक प्रदर्शन है, जिसे रचना, समझाना और संभालना पड़ता है.

'ना’ को शायद ही कभी अपने-आप में पूरा माना जाता है. उसके लिए सामाजिक रूप से स्वीकार्य वजह चाहिए—बीमारी, परिवार, समय, डर. जब महिलाएं चुप रहती हैं, तो इसकी मुख्य वजह सहमति नहीं होती. करीब 43 फीसद महिलाएं शांति बनाए रखना चाहती हैं. फिर उन्हें लगता है कि इनकार से कुछ बदलने वाला नहीं.

स्पष्टवादिता की सामाजिक कीमत चुकानी पड़ती है. तीन-चौथाई महिलाएं कहती हैं कि जो महिलाएं प्रस्ताव ठुकराती हैं या सीमाएं तय करती हैं, समाज उन्हें नकारात्मक नाम देता है—अड़ियल, घमंडी, 'बहुत आधुनिक’ या चरित्रहीन. यह कलंक शिक्षा और रोजगार की श्रेणियों के पार भी दिखाई देता है.

निजी रिश्तों के भीतर विरोधाभास और तीखे हो जाते हैं. केवल 36 फीसद महिलाएं कहती हैं कि अंतरंग स्थिति में सहमति साफ शब्दों में दी जानी चाहिए. बाकी संकेतों, आदत या स्थिति की समझ पर निर्भर करती हैं. करीब आधी महिलाएं कहती हैं कि वे अवांछित यौन गतिविधि से साफ इनकार कर देती हैं. और सिर्फ 36 फीसद कहती हैं कि शुरुआती सहमति के बाद जब वे अपना मन बदलती हैं, तो उस बदलाव का सम्मान किया जाता है.

विवाह अब भी सबसे विवादित दायरा बना हुआ है. करीब 51 फीसद महिलाएं कहती हैं कि वे विवाह या लंबी रिलेशनशिप में सेक्स से इनकार कर सकती हैं और उनके इनकार का सम्मान होता है. बाकी महिलाएं इसे लिए सवाल-जवाब किए जाने, दबाव बनाए जाने या फिर भावनात्मक अपराधबोध की बात करती हैं.

स्पष्ट बहुमत—66 फीसद—मानता है कि विवाह के भीतर भी बलात्कार हो सकता है, और करीब 75 फीसद किसी न किसी रूप में इसकी कानूनी मान्यता का समर्थन करती हैं. करीब 17 फीसद महिलाएं बताती हैं कि पति या साथी ने उन्हें शारीरिक रूप से जबरन संबंध बनाने के लिए मजबूर किया और 16 फीसद ने अवांछित यौन कृत्यों के लिए मजबूर किए जाने की बात कही.

दफ्तर, सड़क, फोन
पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों में कौन क्या है, वह पदानुक्रम भी सहमति के मसले को उलझा देता है. करीब 36 फीसद महिलाएं बताती हैं कि किसी वरिष्ठ व्यक्ति—बॉस, शिक्षक या मेंटॉर—की ओर से उन्हें असहज दबाव या ताड़े जाने का सामना करना पड़ा. सिर्फ 44 फीसद कहती हैं कि वे काम से जुड़े ऐसे अनुरोधों को सहजता से मना कर सकती हैं, जो उन्हें असुरक्षित महसूस कराते हैं.

36 फीसद मना तो कर सकती हैं, लेकिन नौकरी पर असर पड़ने का डर रहता है, और 12 फीसद बिल्कुल मना नहीं कर पातीं. आर्थिक निर्भरता इसे कमजोर बना देती है. कार्यस्थल की व्यवस्थाएं भी बहुत भरोसा नहीं देतीं: सिर्फ 32 फीसद महिलाएं उत्पीड़न पर सार्थक ट्रेनिंग या नीतियों की बात करती हैं, जबकि 36 फीसद मौजूदा नीतियों को औपचारिकता मानती हैं.

सार्वजनिक जगहें अब भी रोजाना की जद्दोजहद का मैदान बनी हुई हैं. करीब 48 फीसद महिलाएं बसों, ट्रेनों, बाजारों और सड़कों पर अनचाहे स्पर्श, छेड़छाड़ या बहुत करीब आने जैसे अनुभव बताती हैं. करीब 70 फीसद कहती हैं कि उससे बचने के लिए वे कम से कम कभी-कभी अपना व्यवहार, रास्ते, कपड़े या समय बदलती हैं.

फोन एक और मोर्चा है—28 फीसद महिलाएं 'ना’ कहने के बाद बार-बार संदेश मिलने की बात करती हैं, 28 फीसद को अनचाही अश्लील तस्वीरें मिली हैं, और 24 फीसद ऑनलाइन पीछा करने या उत्पीड़न का अनुभव बताती हैं.

असली ताकत का स्रोत
सर्वे के सबसे उलट लगने वाले निष्कर्ष इस बात से जुड़े हैं कि सच में सशक्त कौन है. शिक्षा सहमति की शब्दावली को धार तो देती है—कानूनी अधिकार, दबाव, वैवाहिक बलात्कार—लेकिन सुरक्षा की गारंटी नहीं देती. ज्यादा शिक्षित महिलाएं कम नहीं, बल्कि ज्यादा उत्पीड़न की बात करती हैं.

इसकी एक वजह है उनकी ज्यादा गतिशीलता, वे डिजिटली ज्यादा दिखाई देती हैं और किसी के तीन-पांच करने पर उसे चेतावनी देने में भी सक्षम हैं. रोजगार व्यवहार में ज्यादा मजबूत कारक है: ऊंची पेशागत श्रेणियों की महिलाओं के वास्तविक अनुभव के स्कोर सबसे अच्छे हैं. सर्वे का निचोड़ एक पंक्ति में है: कम शिक्षित लेकिन अधिक आर्थिक स्वतंत्रता वाली ग्रामीण महिला, आर्थिक स्वतंत्रता के बिना रहने वाली शहरी, अत्यधिक शिक्षित महिला की तुलना में ज्यादा सशक्त है.

सर्वे अंत में सहमति पर पहुंचता है. करीब 86 फीसद महिलाएं स्कूलों और कॉलेजों में सहमति की अनिवार्य शिक्षा का समर्थन करती हैं, और ज्यादातर चाहती हैं कि यह 10 से 14 साल की उम्र के बीच शुरू हो. करीब 85 फीसद कहती हैं कि वे छोटी लड़कियों को सहमति और इंकार के अधिकार के बारे में सिखाएंगी. यह सर्वे एक ऐसे देश को दिखाता है, जिसने 'नहीं का मतलब नहीं’ समझ लिया है लेकिन अभी वह व्यवस्था नहीं बनाई है, जो इसे जीने लायक बनाती है.ठ्ठ

सर्वेक्षण का तरीका

इंडिया टुडे ग्रुप का कंसेंट कल्चर (सहमति की संस्कृति) सर्वेक्षण सोशल रिसर्च एजेंसी सीवोटर ने 5-20 मई के बीच किया. भारत भर में 18 वर्ष और उससे अधिक उम्र की 6,379 महिला उत्तरदाताओं तक पहुंचने के लिए कंप्यूटर असिस्टेड टेलीफोनिक इंटरव्यूइंग (सीएटीआइ) का इस्तेमाल किया गया. यह सर्वे सभी 11 प्रमुख आधिकारिक भाषाओं में किया गया और नमूना सभी राज्यों के प्रमुख जिलों तक फैला था.

डेटा को भारत की ज्ञात जनसांख्यिकीय प्रोफाइल से मिलाने के लिए संतुलित किया गया है. अंतिम डेटा फाइल सामाजिक-आर्थिक प्रोफाइल को देश की जनसांख्यिकीय प्रोफाइल के +/- 5 फीसद के करीब रखती है, जिससे सबसे करीबी रुझान मिलते हैं. 

टि की सीमा मैक्रो स्तर पर +/- 3 फीसद और माइक्रो-स्तर के रुझान अनुमानों के लिए +/- 5 फीसद है, 95 फीसद भरोसे के अंतराल पर. पूर्णांक के कारण कुछ तालिकाओं के आंकड़े 100 तक नहीं जुड़ सकते.

कड़े रैंडम प्रॉबेबिलिटी सैंपल और सर्वे डेटा की सांख्यिकीय वेटिंग स्थानीय आबादी का प्रतिनिधि विश्लेषण तय करती है. इसे नवीनतम जनगणना और उपलब्ध अन्य जनसांख्यिकीय डेटा के आधार पर बेंचमार्क किया गया है.

सीवोटर नैतिक और पारदर्शी वैज्ञानिक अभ्यास के लिए वैपोर (वर्ल्ड एसोसिएशन फॉर पब्लिक ओपिनियन रिसर्च) की आचार संहिता का सख्ती से पालन करता है और उसने प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआइ) के दिशानिर्देशों को अपनी मानक संचालन प्रक्रिया में शामिल किया है.

नोट: हर श्रेणी के उत्तरदाताओं को सहमति से जुड़े 20 चुने हुए सवालों पर स्कोर दिया गया. हर जवाब को दो ध्रुवों वाले स्कोर में बदला गया: सहमति का सम्मान करने वाले जवाब के लिए 1, और कमजोर, अस्पष्ट या असुरक्षित जवाब के लिए 0. 'पता नहीं’, 'कह नहीं सकते’ और 'लागू नहीं’ को भी शून्य स्कोर दिया गया, क्योंकि अस्पष्टता को असुरक्षा माना गया.

इन 20 सवालों को दो बराबर हिस्सों में बांटा गया. दस सवाल अवधारणा के स्तर पर सशक्तीकरण को परखते हैं—यानी उत्तरदाता सिद्धांत रूप में सहमति को कितनी साफ तरह समझते हैं. इसमें 'नहीं का मतलब नहीं’, दबाव में सहमति, सहमति वापस लेना, वैवाहिक बलात्कार और सहमति शिक्षा शामिल हैं.

बाकी 10 सवाल अनुभव आधारित सशन्न्तीकरण को परखते हैं—यानी अंतरंगता, परिवार, कार्यस्थल, ऑनलाइन व्यवहार और नौकरी से जुड़ी स्वायत्तता जैसी वास्तविक स्थितियों में सहमति का कितना सम्मान होता है.

हर जनसांख्यिकीय समूह के लिए अवधारणा वाले 10 सवालों के औसत स्कोर को 100 में से अवधारणा अंक में बदला गया. यही तरीका अनुभव वाले 10 सवालों पर लागू कर 100 में से एक्सपीरिएंस अंक निकाला गया. अंतिम सहमति सशक्तीकरण सूचकांक इन दोनों अंकों का औसत है.

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