कमर कसने का वक्त

तेल की कीमतों और आपूर्ति के झटकों से देश की अर्थव्यवस्था पर खतरा मंडराया, तो प्रधामंत्री नरेंद्र मोदी ने की हर खर्च में किफायत की अपील. आने वाले दिन कैसे होंगे आखिर?

cover story: austerity
सांकेतिक तस्वीर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 10 मई को सिकंदराबाद की जनसभा में कोविड के वर्षों का जिक्र करके पुरानी यादें भर ताजा नहीं कीं. असल में यह एक चेतावनी थी. महामारी के दौरान लोगों ने वर्क फ्रॉम होम, ऑनलाइन मीटिंग और कम खर्च की जिंदगी के साथ तालमेल बिठा लिया था. अब मोदी का इशारा है कि शायद उन्हीं तरीकों की फिर जरूरत पड़े. लेकिन किसी वायरस के कारण नहीं, बल्कि देश के दरवाजे पर दस्तक दे रहे आर्थिक तूफान की वजह से.

यह तूफान हजारों मील दूर पश्चिम एशिया से उठा है. अमेरिका, इज्राएल और ईरान के बीच जंग के हालात खत्म न होने से ऊर्जा बाजार हिचकोले खा रहा है, कच्चे तेल की कीमतें चढ़ गई हैं, खाड़ी देशों से भारत आने वाली रकम बैठ गई है और देश में विदेशी पूंजी का प्रवाह टूटता जा रहा है.

हाल ही पांच में से तीन विधानसभा चुनावों में जीत हासिल करने वाली सरकार के मद्देनजर मोदी के संदेश का वक्त अहम था. प्रधानमंत्री लोगों से आने वाले मुश्किल समय के लिए तैयार रहने और स्वेच्छा से खर्च में कटौती करने की अपील कर रहे थे.

उन्होंने एक साल तक सोना न खरीदने, विदेश यात्रा और डेस्टिनेशन वेडिंग से बचने, यथासंभव वर्क फ्रॉम होम करने, खाद और खाने के तेल का इस्तेमाल कम करने, सार्वजनिक परिवहन और कार-पूलिंग का उपयोग करने, और स्वदेशी सामान अपनाने की पैरवी की. मोदी ने कहा, ''कोरोना काल के दौरान हमने वर्क फ्रॉम होम, ऑनलाइन मीटिंग, वीडियो कॉन्फ्रेंसों को अपनाया था. आज वक्त है कि हम उन तौर-तरीकों को फिर से अपनाएं.’’

इस अपील की वजह भारत के चालू खाते के घाटे—यानी विदेशी मुद्रा की आमद और खर्च का फासला—में चिंताजनक बढ़ोतरी है. इसका मुख्य कारण ऊर्जा कीमतों में तेज उछाल है. फरवरी में ईरान पर अमेरिकी और इज्राएली हमलों से पहले ब्रेंट क्रूड की कीमत 70 डॉलर (6,700 रु.) प्रति बैरल थी जो बढ़कर लगभग 110 डॉलर (10,500 रु.) प्रति बैरल तक पहुंच गई.

यह पिछले साल जुलाई की तुलना में 60 फीसद से भी ज्यादा है. अनुमान है कि ईंधन कीमतों में वृद्धि की घोषणा से पहले, देश की तेल रिफाइनरियों को हर दिन लगभग 1,000 करोड़ रु. का नुक्सान हो रहा था. नतीजतन, चालू खाता घाटे का सबसे बड़ा घटक व्यापार घाटा 2013-14 में 148 अरब डॉलर (14.2 लाख करोड़ रु.) से बढ़कर वित्त वर्ष 26 में करीब 300 अरब डॉलर (28.8 लाख करोड़ रु.) तक जा पहुंचा.

इस दबाव के बीच सोने के आयात में इजाफे ने कचूमर निकाल दिया. यह वित्त वर्ष 21 में 34.6 अरब डॉलर (3.3 लाख करोड़ रु.) था जो वित्त वर्ष 26 में 72 अरब डॉलर ( 6.9 लाख करोड़ रु.) तक पहुंच गया. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भी इस साल अब तक 2.2 लाख करोड़ रु. के शेयर बेच दिए हैं, जबकि पूरे 2025 में उन्होंने 1.7 लाख करोड़ रु. के शेयर बेचे थे.

फरवरी तक शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश लगातार छह महीनों से नकारात्मक दायरे में बना हुआ है. हेग में अपने भाषण में मोदी ने फिर अपनी चिंताओं को दोहराया. उन्होंने महामारी, युद्धों और ऊर्जा संकटों का जिक्र करके कहा, ''यह दुनिया के लिए आपदाओं का दशक बनता जा रहा है.’’ उन्होंने चेताया कि हालात नहीं बदले तो ''पिछले कई दशकों की उपलब्धियां पानी में बह जाएंगी.’’

तूफान की आहट
अलबत्ता, देश की सभी आर्थिक दुश्वारियों की जड़ सिर्फ पश्चिम एशिया नहीं है. मैन्युफैक्चरिंग में मंदी, वस्तु निर्यात में सुस्ती, निजी निवेश की कमी और लगातार घटते रोजगार इस संकट से पहले ही मौजूद थे. भू-राजनैतिक झटकों ने तो सिर्फ उन्हें और तेज कर दिया है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने बड़े संकट की चेतावनी देने के लिए मोदी की टिप्पणियों को पकड़ लिया.

उन्होंने रायबरेली की जनसभा में कहा: ''एक आर्थिक तूफान आ रहा है. उनका अदाणी-अंबानी वाला ढांचा ज्यादा दिन नहीं टिकेगा; वह ढह जाएगा. दुख की बात यह है कि इसका खमियाजा आम आदमी को भुगतना पड़ेगा.’’

यह बहस और तीखी हो गई, जब बैंकर उदय कोटक ने नई दिल्ली में भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआइआइ) के कार्यक्रम में कड़ी चेतावनी दी, ''झटका आ रहा है और यह बहुत बड़ा होगा.’’ उन्होंने कहा कि देशों को ''अपने साधनों से ज्यादा खर्च’’ से बचना चाहिए और संकट पूरी तरह आए, उससे पहले ही मुश्किल वक्त के लिए तैयार हो जाना चाहिए.

रुपए पर इसका असर पहले से ही दिख रहा है. देश के बढ़ते बाहरी घाटे ने रुपए का मूल्य प्रति डॉलर 96 रुपए के पास पहुंचा दिया है और जानकार आगाह करते हैं कि पश्चिम एशिया का संकट बना रहा, तो रुपया 100 की मनोवैज्ञानिक सीमा पार कर सकता है.

भारतीय रिजर्व बैंक ने डॉलर बेचकर हस्तक्षेप किया है, लेकिन इसकी भी कीमत चुकानी पड़ती है. विदेशी मुद्रा भंडार फरवरी में 728 अरब डॉलर (69.9 लाख करोड़ रुपए) से घटकर मई में 697 अरब डॉलर (66.9 लाख करोड़ रुपए) रह गया. बेशक, देश 1991 के संकट जैसे हालात के करीब नहीं है. अभी करीब 10 महीने के आयात के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा है.

लेकिन अर्थशास्त्रियों को फिक्र है कि रुझान गलत दिशा के ही हैं. बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस कहते हैं, ''निर्यात में नकारात्मक दर है, और युद्ध तथा शिपिंग में रुकावटों की समस्या दरवाजे पर दस्तक दे रही है. रेमिटेंस (विदेश से भारतीयों की ओर से भेजा जाने वाला पैसा) घट रहा है क्योंकि उसमें बहुत सारा खाड़ी देशों से आता है.

एफडीआइ में भी हो यह रहा है कि निवेशक मुनाफे को दोबारा यहीं निवेश करने के बजाए अपने देश भेज रहे हैं. प्रधानमंत्री का संदेश कमखर्ची के जरिए सिर्फ 5-10 अरब डॉलर (48,000-96,000 करोड़ रु.) बचाने पर केंद्रित लगता है.’’ व्यापार विशेषज्ञ विश्वजीत धर तो और ज्यादा दो टूक बोलते हैं, ''चिंता करने के लिए बहुत कुछ है.

बाहरी सेक्टर की हालत बहुत खराब है.’’ इन सभी फैक्टर के कारण आर्थिक विकास की गति धीमी पड़ जाएगी. भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) का अनुमान है कि आर्थिक वृद्धि पर 0.8 फीसद का असर पड़ेगा; लेकिन दूसरी एजेंसियां एक फीसद असर की बात कर रही हैं, जिससे वित्त वर्ष 27 में देश की विकास दर गिरकर लगभग 6.5 फीसद रह जाएगी.

कई ने कमखर्ची की प्रधानमंत्री की अपील को गंभीरता से लिया है. द एनर्जी ऐंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (टेरी), नई दिल्ली की महानिदेशक विभा धवन ने ईंधन खपत कम करने के लिए सोलर कुकर ले लिया है. परिवार इस साल विदेश यात्रा टालकर दिल्ली-एनसीआर में ही रहेगा. नागपुर की एअर ट्रीटमेंट कंपनी निर्मि‌ति रोबोटिक्स के महानिदेशक जय मोटघरे ने इस साल सोने के बजाए म्युचुअल फंडों में निवेश का निर्णय किया है.

टीस कहां-कहां
असल में लोगोंं की सबसे बड़ी तात्कालिक समस्या ईंधन है. भारत कच्चे तेल की अपनी जरूरतों का करीब 89 फीसदी आयात करता है और अमेरिका और चीन के बाद दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है. कच्चे तेल की कीमतों में हर 10 डॉलर (960 रु.) के इजाफे से भारत का सालाना आयात बिल अनुमानित 13-18 अरब डॉलर (1.2-1.7 लाख करोड़ रु.) बढ़ जाता है और महंगाई 35-60 आधार अंक उछल जाती है.

चार साल तक स्थिर रहने के बाद पेट्रोल और डीजल की कीमतों में मई में दो बार वृद्धि हुई है. सीएनजी की कीमतें भी बढ़ गई हैं. विमानन उद्योग भी ऐसे ही झटकों की तैयारी कर रहा है. महाराष्ट्र और दिल्ली ने जेट ईंधन (एटीएफ) पर मूल्य वर्धित कर घटा दिया है. जल्द ही एटीएफ कीमतों में बढ़ोतरी एअरलाइंस पर डाली जाएगी. 

ईंधन की ऊंची कीमतें आखिरकार पूरी अर्थव्यवस्था पर असर डालती हैं. इससे ढुलाई की लागत बढ़ जाती है, मैन्युफैक्चरिंग के खर्च में इजाफा हो जाता है और पैकेटबंद सामान से लेकर खाने-पीने की हर चीज महंगी हो जाती है. एफएमसीजी कंपनियों ने बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डालना शुरू कर दिया है.

अमूल ने दूध की कीमतें 2 रुपए प्रति लीटर बढ़ा दी हैं. डाबर और हिंदुस्तान यूनिलीवर ने कीमतों में 2-5 फीसद की वृद्धि का ऐलान किया है. सबनवीस चेतावनी देते हैं कि साल के आखिर तक महंगाई 5 फीसद से ऊपर निकल सकती है. वे कहते हैं, ''घरेलू धारणा इससे जुड़ी है कि खरीद क्षमता किस वजह से टूट रही है.’’

धारणा बदलनी शुरू हो गई है. रिजर्व बैंक के महंगाई आशंका सर्वे में पाया गया कि आम लोग मौजूदा महंगाई 7.2 फीसद मान रहे हैं और उन्हें लगता है कि अगले तीन महीनों में यह बढ़कर 8.5 फीसद हो जाएगी. ऐसी आशंकाएं मायने रखती हैं क्योंकि उससे ग्राहकों का व्यवहार तय होता है. जैसे-जैसे घरों का बजट तंग होता जाता है, गैर-जरूरी चीजों पर होने वाला खर्च सबसे पहले घटता है.

इंडिया रेटिंग्स के सौम्यजीत नियोगी कहते हैं कि अमीर ग्राहक तो खर्च करना जारी रखेंगे लेकिन मध्य आय और निम्न आय वाला तबका सस्ते सामान की ओर रुख करेगा. भविष्य की आय को लेकर अनिश्चितता, एआइ के कारण रोजगार की कमी और कंपनियों की कमजोर आय से खर्च पर और भी ज्यादा असर पड़ सकता है.

फिर राजकोष की चिंताएं भी हैं. ईंधन टैक्स में कटौती की वजह से सरकार को पहले ही लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपए का झटका झेलना पड़ा है. राजस्व कम होता है और खर्च का दबाव बढ़ता है, तो केंद्र सरकार को पूंजीगत खर्च के लक्ष्यों को बरकरार रखने में मुश्किल हो सकती है.

स्वर्णिम दुविधा
अगर तेल भारत की सबसे बड़ी बाहरी कमजोरी है, तो सोने और खाद पर बाहरी निर्भरता बताती है कि हमारी आम आर्थिक जिंदगी पर वैश्विक झटके कितना गहरा असर डालते हैं. सोना देश में सांस्कृतिक जुनून है, तो खाद हमारी खाद्य सुरक्षा के लिए चुनौती. ये दोनों ही अब सरकार के खर्च कटौती अभियान के केंद्र में हैं.

सरकार ने हाल ही सोने और चांदी पर आयात शुल्क छह फीसद से बढ़ाकर 15 फीसद कर दिया है—जिसमें 10 फीसद बेसिक कस्टम ड्यूटी और पांच फीसद एग्रीकल्चर इन्फ्रास्ट्रक्चर ऐंड डेवलपमेंट सेस शामिल है—ताकि चालू खाते के बढ़ते घाटे को रोका जा सके. इस बार भी नीति-निर्माताओं को उम्मीद है कि ज्यादा ड्यूटी से मांग कम होगी.

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुमानों के मुताबिक, आयात शुल्क में हर एक फीसद की बढ़ोतरी से मांग में लगभग 6.4 टन की कमी आती है. नौ फीसद की वृद्धि से वार्षिक खपत में लगभग 60 टन की कमी आ सकती है, जो भारत की सालाना मांग (लगभग 700 टन) के एक महीने के बराबर है. गोल्ड ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म ऑग्मोंट की रिसर्च हेड डॉ. रेनिशा चैनानी कहती हैं, ''अमूमन ड्यूटी बढऩे का मांग पर थोड़े समय असर होता है, लेकिन अंतत: ग्राहक वापस आ ही जाते हैं.’’

लेकिन बाजार में अभी से लचक दिखने लगी है. ऑल इंडिया जेम ऐंड ज्वेलरी डोमेस्टिक काउंसिल के चेयरमैन राजेश रोकड़े का कहना है कि उत्तरी और पश्चिमी भारत में जेवरात की बिक्री पहले ही करीब 30 फीसद तक गिर चुकी है. वे कहते हैं, ''जो ग्राहक आ रहे हैं, वे घबराहट में खरीदारी कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि शायद और भी पाबंदियां लगाई जा सकती हैं.’’

ज्यादा ड्यूटी से एक पुरानी समस्या फिर से जिंदा हो गई है: तस्करी. रोकड़े बताते हैं कि बाजार में अब दो तरह की कीमतें चलने लगी हैं: बिल के साथ और बिना बिल के. सरकार का अगला कदम शायद स्वर्ण मुद्रीकरण योजना को फिर शुरू करना हो. अनुमान है कि भारतीय घरों में करीब 30,000 टन सोना बिना उपयोग किए हुए पड़ा है. उसका एक फीसद भी बाजार में आ जाए, तो आयात घट सकता है. 

चांदी भी चिंता का सबब है. भारत अब दुनिया में शुद्ध चांदी का सबसे बड़ा आयातक है और 44 फीसद उछाल के साथ 2025 में चांदी का आयात बढ़कर 9.2 अरब डॉलर ( 88,300 करोड़ रु.) तक पहुंच गया. इसकी मुख्य वजह इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर और इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती मांग के साथ-साथ ईटीएफ में बढ़ता निवेश है. चैनानी कहती हैं, ''ये सभी बातें नीति निर्माताओं को चिंता में डाल रही हैं.’’

खाद की मार
अगर सोने से लोगों के रुझान का पता चलता है, तो खाद से भारत की ढांचागत निर्भरता उजागर होती है. पश्चिम एशिया की जंग ने दुनिया के खाद बाजारों में भारी उथल-पुथल मचा दी. इस दौरान होर्मुज जलसंधि के रास्ते टैंकरों की आवाजाही 90 फीसद से ज्यादा गिर गई. दुनिया का करीब एक-तिहाई उर्वरक इसी रास्ते से गुजरता है.

यूरिया की वैश्विक कीमतें फरवरी में 510 डॉलर (48,960 रु.) प्रति टन थीं जो अप्रैल में करीब 950 डॉलर (91,200 रु.) तक जा पहुंचीं. भारत में दूसरी सबसे ज्यादा इस्तेमाल वाली खाद-डाइअमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) के दामों में भी भारी उछाल आया.

भारत की चुनौतियां तिहरी हैं: आयात पर निर्भरता, विदेशी मुद्रा का जोखिम और सब्सिडी का दबाव. आंकड़े चौंकाने वाले हैं. हम अपना लगभग सारा पोटाश, 90 फीसद से ज्यादा फॉस्फेट रॉक और 55-60 फीसद डीएपी की जरूरतें आयात से पूरी करते हैं. खाद आयात पर अमूमन सालाना 10-20 अरब डॉलर (96,000 करोड़ रु. से 1.9 लाख करोड़ रु.) खर्च होते हैं. दुनिया में कीमतें बढ़ती हैं, तो सब्सिडी खर्च भी बढ़ जाता है. वित्त वर्ष 27 में खाद सब्सिडी फिर 2 लाख करोड़ रु. से ज्यादा हो जाने का अनुमान है.

होर्मुज संकट ने बता दिया है कि यह तंत्र कितना नाजुक है. भारत का 60 फीसद से ज्यादा यूरिया और करीब 80 फीसद अमोनिया और सल्फर का आयात खाड़ी देशों से होता है. घरेलू उत्पादन भी आयातित ऊर्जा के भरोसे रहता है: भारत की लगभग आधी एलएनजी खाड़ी देशों से आती है, यूरिया उत्पादन में करीब 80 फीसद हिस्सा प्राकृतिक गैस का होता है. भारत में बनी खाद का उत्पादन भी आयातित ऊर्जा से ही होता है.

इस खतरे को भांपकर सरकार ने लड़ाई बढ़ने के फौरन बाद कई मोर्चों पर कदम उठाए. बड़े पैमाने पर भंडारण किया. इंडियन पोटाश लिमिटेड ने बुवाई के सीजन से पहले सप्लाइ पक्की करने के लिए 25 लाख टन यूरिया आयात के टेंडर जारी किए.

जहाजों के देर से पहुंचने की आशंका से समय-सीमा में ढील दी गई. केप ऑफ गुड होप के रास्ते रूस और मोरक्को से आयात शुरू किया और अल्जीरिया, मिस्र, इंडोनेशिया, मलेशिया और कनाडा जैसे देशों से भी आपूर्ति जुटाई जाने लगी. 

इस बीच, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने खरीफ 2026 के लिए गैर-यूरिया उर्वरकों की समर्थन दरों को 10 से 21 फीसद तक बढ़ाने को मंजूरी दे दी, जिससे खजाने पर 41,534 करोड़ रु. का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा. थोड़े समय के लिए सही, ये उपाय कारगर साबित हुए.

मार्च तक उर्वरकों का स्टॉक रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था, और ऐसा नहीं लगता कि खरीफ के मौसम में देश को खाद की कमी से जूझना पड़ेगा. संकट दूर तो हुआ है मगर इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी है. फिर भी इस क्षेत्र में सुधार अभी भी राजनैतिक रूप से टेढ़ा काम है. यूरिया की कीमतों में बदलाव लगभग असंभव है. भारी सब्सिडी खाद इस्तेमाल का तौर-तरीका बिगाड़ देती है, और लोग जरूरत से ज्यादा खाद का उपयोग करने लगते हैं.

खाद्य तेलों में गर्मी
खाद्य तेल की सरदर्दी भी बड़ी है. विदेश से खाद्य तेल खरीदने पर देश हर साल लगभग 1.61 लाख करोड़ रुपए खर्च करता है क्योंकि देश में उतना पैदा नहीं होता. वर्षों से कई तरह की नीतियां लागू करने के बावजूद इससे देश की बुनियादी कमजोरी उजागर होती है. पिछले वित्त वर्ष में देश में 2.78 करोड़ टन खाद्य तेलों की खपत हुई.

इसकी मुख्य वजहें थीं—लोगों की बढ़ती आय, खान-पान की आदतों में बदलाव, और प्रोसेस्ड फूड तथा रेस्तरां की खपत में इजाफा. प्रति व्यक्ति सालाना खपत 19.7 किलोग्राम रही और नीति आयोग का अनुमान है कि यह 2028 तक बढ़कर 25.3 किलोग्राम हो जाएगी. इतनी भारी मांग के मुकाबले देश में खाद्य तेलों का उत्पादन बहुत ही कम है.

वर्ष 2023-24 में देश में सिर्फ 1.218 करोड़ टन तेल का उत्पादन हुआ, जो कुल मांग का महज 44 फीसद है. बाकी 56 फीसद तेल आयात किया गया. सो, पिछले साल खाद्य तेलों का आयात 1.61 लाख करोड़ रु. तक पहुंच गया था और उसमें कमी के कोई खास संकेत नहीं दिख रहे हैं.

खाद्य तेलों के आयात का हिसाब-किताब देखें तो कुल आयात में पाम ऑयल की हिस्सेदारी करीब 55-57 फीसद है, जो मुख्य रूप से इंडोनेशिया और मलेशिया से आता है. सोयाबीन तेल काफी हद तक अर्जेंटीना और ब्राजील से और सूरजमुखी तेल रूस और यूक्रेन से आता है.

मौजूदा तेल आयात वर्ष के छह महीनों में ही 87,000 करोड़ रु. तक पहुंच गया, जो पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 19 फीसद ज्यादा है. रुपया पिछले एक साल में डॉलर के मुकाबले 9 फीसद से ज्यादा गिर गया है. उससे आयातित हर टन और भी महंगा हो रहा है.

इसी पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री मोदी ने ऐसी अपील की, जो शुरू में अटपटी लगी: खाने के तेल की खपत 10 फीसद कम करें. उन्होंने कहा, ''हमें इसके आयात पर विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है. हर घर खाद्य तेल का इस्तेमाल कम कर दे, तो यह देशभक्ति में बहुत बड़ा योगदान होगा. इससे देश के खजाने और परिवार के हर सदस्य की सेहत, दोनों में सुधार होगा.’’ मतलब कि आर्थिक मजबूरियों को अनदेखा करना मुश्किल है.


वर्ष 2014 से मोदी सरकार ने आयात पर निर्भरता घटाने की लगातार कोशिशें की हैं. सरसों, सोयाबीन और सूरजमुखी जैसी तिलहनी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में बार-बार इजाफा किया गया है. पिछले एक दशक में रकबा बढ़ने और बेहतर पैदावार के मिले-जुले प्रयासों से तिलहन की उपज 55 फीसद तक बढ़ी है.

सरकार ने दो बड़े मिशन भी शुरू किए: 2021 में 11,040 करोड़ रु. के बजट के साथ राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन-पाम ऑयल, और 2024 में राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन-तिलहन. इन दोनों मिशन का लक्ष्य 2030-31 तक देश में 2.545 करोड़ टन खाद्य तेल का उत्पादन करना है, जो अनुमानित मांग के लगभग 72 फीसद के लिए पर्याप्त होगा.

लेकिन, लक्ष्य और हकीकत के बीच फासला अभी भी काफी बड़ा है. बड़ी समस्या प्रोत्साहन में है. गेहूं और धान किसानों को दशकों से चली आ रही खरीद प्रणालियों का फायदा मिलता है, जिनमें उनकी फसल की खरीद की लगभग गारंटी होती है. तिलहन किसानों को एमएसपी का समर्थन तो मिलता है लेकिन उन्हें गेहूं-चावल जैसी खरीद गारंटी नहीं मिलती. इस कमी को दूर करने की सख्त जरूरत है.

ईवी की कमी पर ध्यान
प्रधानमंत्री ने यह अपील भी की कि लोग पेट्रोल और डीजल गाड़ियां छोड़ें और इलेक्ट्रिक वाहन अपनाएं, यह देशभक्ति भी होगी और आर्थिक जरूरत भी. आज देश में करीब 40 करोड़ पंजीकृत वाहन हैं. उनमें 92 फीसद से भी ज्यादा पेट्रोल या डीजल से चलते हैं; इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी सिर्फ 4 फीसद है.

हालांकि नई बिक्री में उसका हिस्सा 5 फीसद को पार कर गया है. प्रधानमंत्री की अपील के बाद सरकार तुरंत हरकत में आई. सरकारी बैंकों, वित्तीय संस्थानों और बीमा कंपनियों को निर्देश दिए गए कि वे अपने यात्रा खर्च में कटौती करें और इलेक्ट्रिक वाहन बढ़ाएं. नेता भी आगे आए.

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने काफिले का आकार घटाया, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस मोटरसाइकिल से ऑफिस पहुंचे और केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने मुंबई मेट्रो पकड़ी. ग्लोबल स्ट्रैटेजिक फर्म डालबर्ग एडवाइजर्स के भारत प्रमुख जगजीत सिंह सरीन कहते हैं, ''बदलाव से कार्बन उत्सर्जन घटेगा,आर्थिक सुरक्षा भी मजबूत होगी.’’ 

लेकिन कुछ विरोधाभास भी हैं. सितंबर 2025 में आंतरिक दहन इंजन (आइसीआइ) यानी डीजल-पेट्रोल वाले वाहनों पर जीएसटी घटा था, जिससे ये गाड़ियां इलेक्ट्रिक वाहनों से काफी सस्ती हो गई थीं. अनुमान यही है कि अगले एक दशक में इलेक्ट्रिक वाहनों और ऊर्जा-दक्षता से होने वाले फायदों से तेल की मांग में होने वाली बढ़ोतरी पर बहुत ही मामूली असर पड़ेगा. भारी परिवहन, माल ढुलाई और विमानन जैसे क्षेत्र अभी भी बड़े पैमाने पर जीवाश्म ईंधनों पर ही निर्भर हैं.

विदेश यात्राओं पर लगाम
खर्च में कटौती की अपील का असर अब ईंधन की खपत तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि लोगों के व्यवहार पर भी पडऩे लगा है. मुंबई के कारोबारी स्नेहांशु मंडल ने इस सितंबर में परिवार के साथ इटली घूमने और काम के सिलसिले में सिडनी जाने की योजना बनाई थी. लेकिन उन्होंने ये दोनों टाल दिए हैं. कोलकाता की यात्रा भी रद्द कर दी.

ऐसा करने वाले वे अकेले नहीं हैं. रुपया कमजोर होने और विमानन ईंधन की कीमतें बढ़ने के कारण यात्रा करना अब कहीं महंगा हो गया है. उद्योग के अनुमानों के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय हवाई किराए 20-25 फीसद और घरेलू किराए करीब 10-15 फीसद बढ़ गए हैं. एअर इंडिया ने जून से अगस्त 2026 के बीच सात अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को फिलहाल निलंबित कर दिया है. उनमें माले समेत बेहद लंबी दूरी की शिकागो और शंघाई जैसी उड़ानें शामिल हैं.

फेडरेशन ऑफ एसोसिएशन्स इन इंडियन टूरिज्म ऐंड हॉस्पिटैलिटी के महासचिव राजीव मेहरा कहते हैं, ''इसका असर विदेश यात्रा पर पड़ना तय है.’’ उनका अनुमान है कि छुट्टियों के मौसम में विदेश यात्रा में 20-25 फीसद की गिरावट आएगी.

युद्ध की वजह से पश्चिम एशिया लोगों की यात्रा से कमोबेश बाहर हो गया है, जहां कभी भारत की कुल अंतरराष्ट्रीय यात्रा का करीब एक-तिहाई हिस्सा जाता था. ट्रैवल कंपनियां मांग में भारी गिरावट के बजाय लोगों के व्यवहार में बदलाव देख रही हैं. ईजमाइट्रिप के सह-संस्थापक रिकांत पित्ती कहते हैं कि लोग यात्राएं एकदम रद्द करने के बजाए बजट और पसंद बदल रहे हैं. वे कहते हैं, ''लोग अब पहले से बुकिंग कर रहे हैं, कम दिन की यात्राएं और ऐसी जगहें चुन रहे हैं जहां उनको कम खर्च में ज्यादा मजा आए.’’

नीति-निर्माताओं के लिए मोदी का संदेश अब सिर्फ खर्च में कटौती से कहीं ज्यादा बन गया है. अर्थशास्त्री मौजूदा संकट को ऐसे मौके के तौर पर देख रहे हैं, जिसमें व्यापक सुधारों की जरूरत है. व्यापार विशेषज्ञ विश्वजीत धर का तर्क है कि सिर्फ संयम बरतने से काम नहीं चलेगा.

वे कहते हैं, ''हमें उत्पादन और निर्यात में सुधार करने की जरूरत है,’’ और बताते हैं कि पूर्वी एशिया के देशों ने प्रोत्साहन के साथ-साथ जवाबदेही को भी शामिल किया है जबकि भारत ने प्रदर्शन के लक्ष्य तय किए बिना सब्सिडी पर बहुत ज्यादा भरोसा किया.

दूसरे लोग निवेश और रोजगार से जुड़ी चिंताओं का जिक्र करते हैं. योजना आयोग के पूर्व सलाहकार प्रणब सेन का मानना है कि निजी निवेश अभी भी बड़ी कमजोरी बना हुआ है. सेन ने हाल ही कहा, ''निजी निवेश को बढ़ावा देने का एक तरीका सार्वजनिक निवेश है. लेकिन बार-बार लगे झटकों—नोटबंदी से लेकर कोविड तक—के कारण निवेशक जोखिम लेने से और भी ज्यादा हिचकिचाने लगे हैं.’’

वे चेतावनी देते हैं कि दुनिया में अनिश्चितता बनी रहती है तो लघु, छोटे और मझोले उद्यमों को खास तौर पर मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है. बैंक छोटे कारोबारों को कर्ज देने में भरोसा खो देते हैं, तो उस पूरे तंत्र को फिर से खड़ा करना मुश्किल हो जाता है. शिव नाडर विश्वविद्यालय के डीन पार्थ चटर्जी का तर्क है कि महंगाई से निबटना ही काफी नहीं होगा.

निवेशकों, कारोबार और लोगों के बीच भरोसा बहाल करना भी उतना ही जरूरी है. कमजोर निर्यात, निवेश में गैर-बराबरी, ऊर्जा पर निर्भरता, कृषि क्षेत्र में गड़बडिय़ां और रोजगार के अवसरों की कमी बड़ी चुनौतियां हैं. लिहाजा, कड़े सुधारों और राजनैतिक फैसलों की जरूरत है. अब देखना है कि स्वैच्छिक संयम और नीतिगत सुधार का कोई खास असर होता है या फिर आगे और कठिन फैसले लेने होंगे. 

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