अब दिखाना होगा असली नायकत्व

विजय ने अब जो रोल चुना है, उसमें सिर्फ स्टारडम से काम नहीं चलने वाला. बदलाव लाने संबंधी अपने वादे पूरे करने के लिए उन्हें अपनी टीम, व्यवस्था का पूरा एक तंत्र और राजकाज का नया मॉडल तैयार करना होगा.

 cover story: tamil nadu CM
चेन्नै में 10 मई को शपथ ग्रहण समारोह के बाद भाषण देते विजय

नए मुख्यमंत्री सी. जोसफ विजय ने तमिलनाडु की राजनीतिक व्यवस्था में कदम रखते ही बदलाव की नींव रख दी. कुछेक दिन तनाव भरे रहे, थोड़ी चिंगारियां भी उठीं, लेकिन आखिरकार सुलह के रास्ते खुल गए.

यह सब मानो उनकी जीत के तरीके ने ही तय कर दिया था. जोशोखरोश वाले माहौल के बीच तमिलगा वेत्रि कलगम (टीवीके) की जीत 108 सीटों पर अटक गई, जो बहुमत से 10 कम थी.

अब वे उस स्थापित राजनैतिक व्यवस्था में बाहरी बनकर खड़े नहीं रह सकते थे. अब उन्हें इस व्यवस्था का समर्थन चाहिए था. उसके बाद चले घटनाक्रम में तनाव बढ़ने और माहौल बिगड़ने का खतरा पैदा हो गया था. उनके समर्थन में आगे आने वाली हर पार्टी को मतभेद झेलने पड़े.

कांग्रेस को लंबे समय की सहयोगी द्रविड़ मुनेत्र कलगम (द्रमुक) को बाकायदा गच्चा देना का फैसला करना पड़ा. वामपंथी दलों और विदुतलै चिरुतैगल कलगम (वीसीके) को हिचक दूर करने में वक्त लगा.

और अंत में ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कलगम (अन्नाद्रमुक) के भी एक बड़े धड़े को पार्टी व्हिप की अनदेखी करके 13 मई को विश्वास मत के दौरान टीवीके के पक्ष में वोट डालना पड़ा. 'दलपति’ विजय को 234 सदस्यीय विधानसभा में 144 विधायकों का बहुमत मिल गया. तमिलनाडु की राजनीति ने अब झटकों के लिए कमर कस ली है.

अनिश्चितता और ऊहापोह से उबरकर नए मुख्यमंत्री ने अपने पहले बड़े बयानों में से एक में पिछली द्रमुक सरकार पर आरोप लगाया कि वह ''खजाना खाली’’ कर गई है और विरासत में छोड़ गई है कर्जे का पहाड़. द्रमुक ने फौरन पलटवार किया. पूर्व मुख्यमंत्री तथा पार्टी अध्यक्ष एम.के. स्टालिन ने जवाब दिया, ''पैसा तो है...जरूरत है तो बस कुशलता और काम करने की राजनैतिक इच्छाशक्ति की.’’

आमतौर पर ऐसी नोक-झोंक से लंबी सियासी कड़वाहट का दौर शुरू हो जाता है, लेकिन इसके उलट विजय ने जल्दी ही स्टालिन से मिलने पहुंचकर सबको चौंका दिया. वे मारुमलार्ची द्रविड़ मुनेत्र कलगम (एमडीएमके) के प्रमुख वाइको, पट्टालि मक्कल काच्चि (पीएमके) के अंबुमणि रामदॉस, और नाम तमिलर काच्चि (एनटीके) के प्रमुख सीमान जैसे दूसरे वरिष्ठ नेताओं से भी मिलने पहुंचे. उन्होंने अपना नैरेटिव बना दिया था. खुद को विरासत में कथित रूप से खस्ताहाल व्यवस्था मिलने की बात कहकर मोहलत मांग ली थी. लेकिन फिर आदर और शिष्टाचार की छवि पेश करने का फैसला किया.

हालांकि, अन्नाद्रमुक में जल्द ही शिष्टाचार का सूखा देखने को मिल सकता है. इसकी वजह 13 मई को विधानसभा का घटनाक्रम है. उस समय कांग्रेस और दूसरी पार्टियों के 13 विधायक ही सरकार के साथ थे, जिससे धुकधुकी-सी चल रही थी.

असली ऑक्सीजन तो अन्नाद्रमुक के 47 विधायकों में से सी.वी. षण्मुगम खेमे के 25 विधायकों ने अपने समर्थन से दी. उन्होंने पार्टी प्रमुख एडप्पदी के. पलानीस्वामी (ईपीएस) की चेतावनियों को कान ही नहीं दिया. विजय ने पिछली शाम ही षण्मुगम से मिलकर बगावत की पुष्टि कर ली थी. मतलब साफ था कि छूटते ही उन्होंने सियासत के गुर तेजी से सीखने शुरू कर दिए हैं.

शुरुआती सत्र से तो यही लगता है कि तमिलनाडु सरकार ऐसी पहेली है, जिसमें कई सूत्रों का जोड़-घटाव जारी है. टीवीके के लिए राजनैतिक तालमेल तैयार हो गया है, तो अब सबसे जरूरी होगा राजकाज का युक्ति-कौशल. भले पार्टी स्थापित राजनैतिक धाराओं से इतर ढर्रे से सत्ता में आई, लेकिन अब उसे उन संस्थाओं, नौकरशाही और राजनैतिक नेटवर्क के साथ काम करना होगा, जिन्हें द्रविड़ पार्टियों ने दशकों में गढ़ा है.

इसलिए विजय का विरोधियों और बड़े नेताओं के पास पहुंचना अहम है. उसका मकसद सत्ता-तंत्र और मतदाताओं दोनों को भरोसा दिलाना है. नेताओं ने विजय के इस कदम की तारीफ की. वीसीके के विधायक वन्नी अरासु कहते हैं, ''तमिलनाडु के हाल के राजनैतिक इतिहास में यह नई बात थी.’’

राजकोषीय स्थिरता
सब कुछ के बावजूद असल सवाल कहीं गंभीर है: विरासत में मिली अर्थव्यवस्था को विजय आखिर क्या शक्ल देना चाहते हैं? पूर्ववर्ती सरकार पर ''खाली खजाना’’ छोड़ जाने का आरोप थोड़े समय के लिए काम कर सकता है. उससे लोगों की उम्मीदें कुछ घट जाएंगी और कड़े फैसले करने की गुंजाइश बन जाएगी.

लेकिन इस बयान से सरकार पर भी दबाव बनता है कि वह जल्द एक सुस्पष्ट आर्थिक नीति लेकर आए. तमिलनाडु इकलौता राज्य है, जहां लगातार दो वित्त वर्ष—25 और 26—में असली आर्थिक वृद्धि दर रिकॉर्ड दहाई अंकों में दिखी है. वह प्रति व्यक्ति आय के मामले में भी देश में दूसरे स्थान पर है और देश में सबसे ज्यादा औद्योगिक विकास वाले क्षेत्रों में से है, जहां मैन्युफैक्चरिंग, वाहन, इलेक्ट्रॉनिक्स और स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में भारी निवेश हुआ है.

जानकार इन सभी बातों का जिक्र करके कहते हैं कि राजकोषीय अस्थिरता की आशंका के नतीजे राजनीति से परे भी हो सकते हैं. उससे निवेशकों का भरोसा डिग सकता है और राजकाज प्रभावित हो सकता है.

इसलिए विजय की सरकार का मूल्यांकन सिर्फ इससे नहीं होगा कि उसने खजाने की खस्ताहाली को उजागर किया. वह उद्योग जगत, कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों और नौकरशाही को यह भरोसा दिला पाने से होगा कि राज्य में दीर्घकालिक स्थिरता बनी हुई है. एक वरिष्ठ राजनैतिक टीकाकार कहते हैं, ''नए मुख्यमंत्री कुछ ज्यादा ही जल्दबाजी में बोल उठे. उन्हें कुर्सी ठीक से संभालने तक इंतजार करना चाहिए था.’’

इस बीच, 'विजय विरासत’ गढ़ने की कवायद भी जोरों पर है. विधानसभा के पहले सत्र में नए अध्यक्ष जे.सी.डी. प्रभाकर ने दिवंगत मुख्यमंत्रियों एमजीआर और जयललिता के साथ विजय का जिक्र किया.

उन्होंने विजय को ''लिविंग एमजीआर’’ तक कह डाला. चुनावी नतीजों के बाद से ही विजय को उनके समर्थक और टीवीके नेतृत्व के एक तबके ने तमिलनाडु में सिनेमा से निकली लोक-राजनीति की लंबी परंपरा का हिस्सा बताया है. यहां तक कि अब उनके सार्वजनिक कार्यक्रम भी उसी अंदाज में आयोजित किए जाते हैं. उनका काला कोट वाला पहनावा और करीने से रची गई एंट्री गौरतलब है.

ये तुलनाएं उनके सामने की बड़ी चुनौतियों को भी जाहिर करती हैं. एमजीआर और जयललिता सिर्फ करिश्माई फिल्मी सितारे होने की वजह से कामयाब नहीं हुए, बल्कि वे अपने प्रति आकर्षण को मजबूत राजनैतिक संगठन में बदलने में सफल हुए थे. दोनों ने एक बेहद केंद्रीकृत लेकिन अनुशासित पार्टी ढांचा खड़ा किया, जो चुनावी जंग और राजकाज के दबावों का सामना करने में सक्षम था.

फिलहाल, टीवीके का राजनैतिक ढांचा विजय के फैन बेस और दूसरी पार्टियों से आए नेताओं-लोगोंं से बना है. पार्टी को भविष्य की चुनौतियों का सामना करके टिके रहना है, तो मौजूदा वॉलंटियर वाली उसकी ताकत को सुव्यवस्थित राजनैतिक पार्टी के ढांचे में ढलना होगा—खासकर बूथ स्तर पर. टीवीके को पहले ही चुनाव में मिली जबरदस्त जीत शायद अगली बार इतनी आसान न हो. भाजपा के के. अन्नामलै तो इसे असंगत-अस्वाभाविक ही मानते हैं. अगले चुनावों में टीवीके को जमी-जमाई पार्टियों के मुकाबले 'अलग’ होने का फायदा शायद न मिल पाए.

शुरुआती दौर
नई टीवीके सरकार की सबसे ज्यादा सुर्खियों में चढ़ी घोषणाओं में स्कूलों, कॉलेजों, पूजा स्थलों या भीड़ वाली सार्वजनिक जगहों के पास स्थित करीब 700 सरकारी शराब की दुकानों को बंद करने का फैसला है. इसी के साथ सरकार ने महिलाओं और आम लोगों की सुरक्षा के इंतजामात का भी ऐलान किया है.

राजनैतिक तौर पर ये शुरुआती कदम असरदार हैं. तमिलनाडु में शराब पर रोक का मुद्दा लंबे समय से खासकर महिला वोटरों की भावनाओं से जुड़ा रहा है. हर बड़ी पार्टी ने समय-समय पर शराब बिक्री पर पाबंदी लगाने का वादा किया है, लेकिन सत्ता में आने के बाद कल्याणकारी योजनाओं के लिए वे उसी से होने वाली कमाई पर ही ज्यादा निर्भर रहे हैं.

असल में विजय और टीवीके अपने चुनावी वादों की वजह से खजाने पर भारी बोझ डाल सकते हैं. जानकारों का कहना है कि कल्याणकारी योजनाओं पर होने वाला खर्च सालाना करीब एक लाख करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है, जो राज्य के कुल राजस्व का एक-तिहाई हिस्सा है.

नई दुल्हनों के लिए सोने के सिक्के और नवजातों के लिए अंगूठियां, हर परिवार के लिए छह मुक्रत गैस सिलेंडर, माताओं, महिलाओं, बेरोजगार ग्रेजुएट युवाओं और किसानों को नकद आर्थिक मदद—फेहरिस्त काफी लंबी है. अब बही खाता दुरुस्त रखना शायद ज्यादा मुश्किल हो. स्टालिन भी विजय पर तंज कसने से खुद को रोक नहीं पाए. उन्होंने पूछा, ''लोगों से वादे करने से पहले आपको इसका अंदाजा नहीं था?’’

नई सरकार का एक और कदम विवाद पैदा करने के साथ विजय के नौसिखिएपन को भी उजागर कर दिया. उनके जाने-माने ज्योतिषी राधन पंडित वेत्रिवेल को मुख्यमंत्री का विशेष अधिकारी (ओएसडी) नियुक्त किया गया. तमिलनाडु आज भी महान तर्कवादी विचारक पेरियार की धरती है, जिन्हें द्रविड़ पार्टियां और विजय भी पूज्य मानते हैं. इस नियुक्ति की चौतरफा आलोचना के बाद उनकी नियुक्ति रद्द कर दी गई.

आगे चलकर टीवीके सरकार को चुनौतियों की प्राथमिकता तय करनी होंगी. सबसे खास चुनौती तो कांग्रेस के साथ बनी नाजुक गठबंधन सरकार को ही चलाना होगा (बाकी पार्टियां बाहर से समर्थन दे रही हैं).

केंद्र में भाजपा की अगुआई वाली सरकार के साथ संबंध भी चुनौती होंगे, खासकर इसलिए कि कांग्रेस गठबंधन का हिस्सा है और उसके अपने हित भी हैं. आखिर में टीवीके सरकार हिंदी, नीट और जीएसटी जैसे अहम मुद्दों पर किसी भी तरह नरम पड़ती नहीं दिखनी चाहिए. बड़ी द्रविड़ पार्टियां घात लगाए बैठी होंगी और मौका मिलते ही वार करने को तैयार रहेंगी.

ऐतिहासिक तौर पर तमिलनाडु में ऐसे नेताओं को तरजीह मिलती रही है, जो करिश्मा, कल्याण कार्यक्रमों और भावनात्मक मुद्दों का सही मिश्रण तैयार करने में कामयाब हो पाए हैं. लेकिन उनसे तुलनाएं भारी उम्मीदें भी जगाती हैं. करिश्मा भले ही चुनाव जिता दे, लेकिन अंतत: राजकाज ही स्थायी राजनैतिक जगह तैयार करता है.

टीवीके सरकार के पहले हफ्ते में प्रतीकात्मक पहलकदमियां ही दिखी हैं, कोई बुनियादी नीतिगत बदलाव नहीं. विजय ने जनता के मिजाज, मीडिया कवरेज और राजनैतिक संदेश को पढ़ने की सूझबूझ दिखाई है. ये उपयोगी साधन तो हैं लेकिन सबसे बड़ी चुनौती राजकाज का सुसंगत दर्शन में विकसित करना है. ऐसा दर्शन जो देश में राजनैतिक रूप से सबसे जटिल राज्य में उनकी लोकप्रियता और सरकारी साख दोनों को बनाए रखे.

विजय ने अपना नैरेटिव बना दिया था. खुद को विरासत में कथित रूप से खस्ताहाल व्यवस्था मिलने की बात कहकर मोहलत मांग ली थी. लेकिन फिर उन्होंने आदर और शिष्टाचार की छवि पेश करने का फैसला किया.

विजय और टीवीके अपने चुनावी वादों की वजह से खजाने पर भारी बोझ डाल सकते हैं. जानकारों का कहना है कि कल्याणकारी योजनाओं पर होने वाला खर्च सालाना करीब एक लाख करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है, जो राज्य के कुल राजस्व का एक-तिहाई होगा.

टीवीके को अगर भविष्य की चुनौतियों से पार पाना है, तो उसे अपने मौजूदा वॉलंटियर फोर्स को राजनैतिक पार्टी संगठन के ढांचे में बदलना होगा, खासकर बूथ स्तर पर पक्के कार्यकर्ताओं को खड़ा करना होगा.

पांच प्रमुख चुनौतियां

  • नाज़ुक गठबंधन सरकार चलानी है, ऐसे में नीतियों को लेकर विवाद होना तय.
  • प्रशासनिक अनुभव की कमी से उनकी सरकार की कार्यक्षमता पर सवाल उठेंगे. इसमें जनता की उम्मीदों का बोझ भी जुड़ जाएगा.
  • टीवीके के महंगे कल्याणकारी वादों के कारण तमिलनाडु का 10 लाख करोड़ रुपए का सार्वजनिक कर्ज और बढ़ जाएगा. राजकोषीय संतुलन बनाए रखना बड़ी चुनौती होगा.
  • चुनाव में विजय की जीत का श्रेय उनके व्यक्तिगत करिश्मे और बदलाव की गहरी चाहत को है. अब भविष्य की सफलता के लिए उन्हें टीवीके को व्यवस्थित राजनैतिक संगठन में बदलना जरूरी.
  • नीट, हिंदी थोपने, राज्यपाल की भूमिका जैसे विवादास्पद मुद्दों के बावजूद भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखना. 

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