बड़ी चुनौती कर्ज और बेरोजगारी की
कांग्रेस के नए मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन के लिए एक बड़ा काम यह है कि पार्टी के धड़ों और सहयोगियों के बीच तालमेल बैठाएं, साथ ही खाली खजाने की मुश्किल से निबटें.

भले थोड़ी देर से आया लेकिन फैसला पूरी तरह जन-भावनाओं के अनुरूप था. केरल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की अगुआई वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) ने 4 मई को शानदार जीत हासिल की थी—140 में से 102 सीटें. उसके दस दिन बाद 14 मई को कांग्रेस आलाकमान ने आखिरकार निवर्तमान विधानसभा में नेता विपक्ष रहे 61 वर्षीय वी.डी. सतीशन को राज्य का नया मुख्यमंत्री घोषित कर दिया.
यह पद उन्होंने पार्टी के दो वरिष्ठ नेताओं को पछाड़कर हासिल किया—एक तो कांग्रेस महासचिव और अलप्पुझा से सांसद के.सी. वेणुगोपाल, जिन्हें एक मजबूत दावेदार माना जा रहा था और कहा जा रहा था कि उन्हें नवनिर्वाचित विधायकों में से ज्यादातर का समर्थन हासिल है; और दूसरे राज्य के पूर्व गृह मंत्री तथा हरिप्पाड़ से विधायक रमेश चेन्नितला. सतीशन को 18 मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेनी है.
पार्टी के आला नेता जब दावेदारों की सूची पर माथापच्ची करने बैठे, उस समय मुख्यमंत्री पद के लिए जोरदार लामबंदी के बीच सतीशन को सिर्फ केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्षों वी.एम. सुधीरन और के. मुरलीधरन का ही समर्थन हासिल था.
सतीशन के पक्ष में एक अहम बात यह थी कि यूडीएफ के सहयोगियों, जिनमें 22 सीटों वाली इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आइयूएमएल) भी शामिल है, से उन्हें भरपूर समर्थन मिल रहा था और केरल की जनभावना भी उनके साथ थी. मुख्यमंत्री के नाम पर मंथन जैसे-जैसे लंबा खिंचता गया, सतीशन के लिए समर्थन बढ़ता गया, और लोगों में यह भावना भी बढ़ी कि 'दिल्ली का गुट’ उनके साथ अन्याय कर रहा है.
वायनाड में गांधी परिवार को 'चेताते’ नोटिस, सड़कों पर लोगों का उन नए कांग्रेस विधायकों को घेरकर खरी-खोटी सुनाना जो वेणुगोपाल का पक्ष लेते दिख रहे थे और कुछ शहरों में पार्टी कार्यकर्ताओं की ओर से अचानक निकाले गए विरोध मार्च—इन सबने साफ कर दिया कि कोच्चि के पास परवूर से पांच बार के विधायक सतीशन ही 'जनता की पसंद’ थे, जैसा कि कम से कम दो अखबारों ने कहा.
इस सबकी कुछ ठोस वजहें भी थीं. सतीशन 2021 में विपक्ष के नेता का पद संभालने के बाद से ही विपक्ष का चेहरा बने हुए थे; उस समय प्रदेश कांग्रेस वाममोर्चा के हाथों करारी हार के बाद अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही थी. उन्होंने विधानसभा के अंदर और बाहर, दोनों ही जगह मोर्चा संभाला, सत्ता में वापसी की लड़ाई का नेतृत्व किया और पिनाराई विजयन सरकार को कई मुद्दों पर कड़ी चुनौती दी.
आलाकमान के सामने जिस वजह से उनका पलड़ा भारी रहा, वह शायद यह थी कि एक जमीनी नेता को सीएम बनाना केरल में कांग्रेस के लिए शुभ संकेत है, खासकर ऐसे समय में जब राहुल गांधी और प्रियंका गांधी दोनों ने उत्तरी केरल के वायनाड से बड़ी जीत दर्ज की है और उन्हें फिर मतदाताओं के सामने जाना भी होगा.
लंबे सियासी मंथन के बाद
अगले कुछ हफ्ते सतीशन के लिए काफी चुनौतीपूर्ण होंगे, खासकर कैबिनेट बनाना और मंत्रालयों का बंटवारा उनके लिए आसान न होगा. कांग्रेस विधायकों के अलग-अलग गुटों (जिनमें ज्यादातर को वेणुगोपाल ने टिकट दिया था और वही उनका समर्थन कर रहे थे) के अलावा, सहयोगियों को भी साधना होगा.
आइयूएमएल चुनाव से पहले डिप्टी सीएम के पद की बात कर रही थी, लेकिन ऐसा लगता है कि उसने फिलहाल इस मुद्दे को ठंडे बस्ते में डाल दिया है. सतीशन को नाराज चेन्नितला का भी सामना करना होगा, जिन्होंने सार्वजनिक रूप से घोषणा कर दी है कि किसी भी हैसियत से सरकार में शामिल नहीं होंगे.
यूडीएफ ने राज्य के विकास से जुड़े अहम मुद्दे उठाकर शानदार जीत हासिल की है. चुनाव से पहले किए गए दूसरे वादों के अलावा, पार्टी कुछ और मुद्दों को सुलझाने का भरोसा दिला चुकी है, मसलन-विरोध प्रदर्शन करने वाली आशा कार्यकर्ताओं का मासिक मानदेय बढ़ाना, केरल राज्य सड़क परिवहन निगम (केएसआरसीटी) के कर्मचारियों को पेंशन और बकाया वेतन का भुगतान आदि.
सामाजिक मोर्चे की बात करें तो सतीशन को अलग-अलग धार्मिक और जाति समूहों की मांगों के बीच संतुलन साधना होगा. इसमें अगर उनसे कोई भी चूक हुई तो पूरी आक्रामकता के साथ अपनी पैठ बनाने में जुटी भारतीय जनता पार्टी को ही फायदा होगा, जिसने इस चुनाव में पहली बार तीन विधानसभा सीटें जीती हैं.
नए मुख्यमंत्री के पक्ष में एक अच्छी बात यह है कि उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि बहुत मजबूत है. चुनाव पूर्व सतीशन ने नायर सर्विस सोसाइटी (एनएसएस) और एझवा समुदाय के श्री नारायण धर्म परिपालन योगम (एसएनडीपी) के शीर्ष नेतृत्व का यह कहकर विरोध किया था कि अपने मुस्लिम-विरोधी बयानों से वे माहौल बिगाड़ रहे हैं.
यह जोखिम लेना एक सोचा-समझा दांव था क्योंकि पिनाराई और वामपंथियों के कथित 'नरम हिंदुत्व’ वाले कदम सुर्खियों में बने हुए थे. नतीजतन, वामपंथियों को इसका भारी नुक्सान उठाना पड़ा, जबकि सतीशन ध्रुवीकरण की राजनीति के खिलाफ अपनी स्पष्ट राय के साथ विजेता बनकर उभरे. नए मुख्यमंत्री का कहना है कि सांप्रदायिक ताकतों का, चाहे वे संगठित हों या असंगठित, उनकी सरकार के कामकाज में कोई दखल नहीं होगा; भले ही उनके मुख्य सहयोगियों में से एक आइयूएमएल ही क्यों न हो.
वित्त प्रबंधन दुरुस्त करने की चुनौती
वित्त प्रबंधन भी नई सरकार के सामने कम बड़ी चुनौती नहीं है क्योंकि सरकारी खजाना लगभग खाली हो चुका है. केरल का कर्ज-से-सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) अनुपात लगभग 24.8 फीसद है. राजस्व घाटा जीएसडीपी का 2.49 फीसद है, जिसके 14.3 लाख करोड़ रुपए होने का अनुमान है.
पिछले कुछ साल में राजस्व घाटे में लगातार बढ़ोतरी के तीन प्रमुख कारण हैं—केंद्र सरकार की ओर से आवंटन में कमी, शराब और लॉटरी टैक्स के अलावा राज्य सरकार का घरेलू राजस्व बढ़ाने में असमर्थ होना, और राज्य के कुल राजस्व का लगभग 70 फीसद हिस्सा वेतन, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च होना. मौजूदा समय में केरल पर कुल कर्ज 4.8 लाख करोड़ रुपए के करीब है.
लंबित बिल निबटाने के साथ-साथ नई सरकार को अपने चुनावी वादों को पूरा करने के लिए भी पैसे जुटाने होंगे. इनमें सार्वजनिक परिवहन में महिलाओं को मुफ्त सफर, स्नातक और पीजी कोर्स करने वाली छात्राओं को हर महीने 1,000 रुपए की आर्थिक मदद और हर परिवार के लिए 25 लाख रुपए का चिकित्सा बीमा जैसे वादे शामिल हैं.
केंद्र सरकार ने इस साल दिसंबर तक 23,000 करोड़ रुपए तक उधारी की मंजूरी दी है लेकिन नई सरकार को इससे कोई बहुत ज्यादा राहत नहीं मिलने वाली. राजकोषीय मामलों में राहत काफी हद तक इस पर भी निर्भर करेगी कि सतीशन भाजपा की अगुआई वाली केंद्र सरकार के साथ राज्य के रिश्ते कितनी अच्छी तरह संभाल पाते हैं.
मौजूदा समय में जारी कई बुनियादी ढांचागत परियोजनाओं के लिए भी यह बहुत जरूरी है क्योंकि फंड के लिए केरल को नरेंद्र मोदी सरकार पर निर्भर रहना होगा. वहीं, लंबित बिल निबटाने और केरल इन्फ्रास्टक्चर इन्वेस्टमेंट फंड बोर्ड (केआइआइएफबी) के कर्जों को चुकाने के लिए भी पैसे अलग रखने होंगे, जो फिलहाल हर साल करीब 3,300 करोड़ रुपए होते हैं.
नए मुख्यमंत्री को उन गलतियों से बचना होगा जिनके कारण पिनाराई सरकार गिरी. सामाजिक सुरक्षा पेंशन बढ़ाने और गरीबों के लिए करीब पांच लाख मुफ्त घर उपलब्ध कराने के बावजूद राजनैतिक भ्रष्टाचार और सार्वजनिक धन के कुप्रबंधन ने वाम लोकतांत्रिक मोर्चा सरकार का बेड़ा गर्क कर दिया.
जैसा कि सेवानिवृत्त टेक्नोक्रेट शाजेन राफेल इंडिया टुडे से कहते हैं, राजनैतिक दलों को केरल में उभरता परिदृश्य समझना होगा. चुनाव जीतने के लिए मुफ्त रेवड़ियों की जरूरत नहीं है बल्कि उनसे स्वच्छ और पारदर्शी शासन और केरल के भविष्य के लिए दूरदृष्टि की अपेक्षा की जाती है. वे कहते हैं, ''एक दशक तक सत्ता में रहने के बाद वामपंथी नेता जनता से बात करने और संवाद स्थापित करने की बुनियादी नैतिकता ही भूल गए थे.’’
कुल मिलाकर, सतीशन सरकार के लिए सब कुछ आसान नहीं होगा. सरकार को नए राजस्व स्रोत और मौजूदा कल्याणकारी योजनाओं के लिए धन जुटाना होगा. एक वरिष्ठ सेवानिवृत्त नौकरशाह के शब्दों में, ''कांग्रेस ने केरल के खजाने पर इसके प्रभाव को समझे बिना मतदाताओं को लुभाने के लिए वादों की झड़ी लगा दी थी.
उन्हें जल्द पता चल जाएगा कि चुनाव जीतना और राज्य का शासन चलाना बिल्कुल अलग चुनौतियां हैं.’’ ऐसे में लगता तो यही है कि अगले पांच वर्षों में राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी सतीशन के लिए कांटों भरा ताज साबित होने वाली है.
कैबिनेट बनाते समय सतीशन को कांग्रेस विधायकों के अलग-अलग धड़ों का ख्याल रखना पड़ेगा. पार्टी विधायकों में से ज्यादातर ने मुख्यमंत्री पद के लिए उनके प्रतिद्वंद्वी का समर्थन किया था. इसके अलावा गठबंधन के घटकों की महत्वाकांक्षाओं का भी ख्याल रखना होगा.
पांच प्रमुख चुनौतियां
सतीशन सरकार के लिए वित्तीय प्रबंधन सबसे अहम होगा. केरल का भारी-भरकम कर्ज चुकाना और पार्टी के चुनावी वादों पर अमल के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होगा.
- प्रदेश कांग्रेस की अंदरूनी कलह से निबटना.
- कांग्रेस की अगुआई वाला यूडीएफ आइयूएमएल, आरएसपी और केरल कांग्रेस जैसे सहयोगियों पर निर्भर है. इस गठबंधन को एकजुट रखना होगा.
- रोजगार की तलाश में बड़ी संख्या में लोग केरल से बाहर जाते हैं. रोजगार सृजित करने के लिए निवेश लाना सतीशन के प्रमुख लक्ष्यों में से एक होगा.
- सेवा क्षेत्र और पर्यटन क्षेत्र, केरल में राजस्व के दो सबसे बड़े स्रोत हैं—उन्हें नीतिगत बढ़ावा देने की जरूरत है; साथ ही, अटकी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को पूरा करने के लिए भी पैसों का इंतजाम करना होगा.
- राज्य के कुल राजस्व का करीब 70 फीसद हिस्सा वेतन, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च होता है. मौजूदा समय में केरल पर कुल कर्ज करीब 4.8 लाख करोड़ रुपए का है.