उल्टे पांव चलता 'इंडिया’
संसद में डटकर खड़ा रहने वाला गठबंधन राज्यों में लगातार जमीन खोता जा रहा. इसके सिकुड़ते नक्शे ने रणनीति, नेतृत्व और पहचान को लेकर मतभेदों को उघाड़कर रख दिया.

जब विपक्ष पार्टियां अपना नाम इंडियन नेशनल डेवलपमेंट इन्क्लूसिव अलायंस या इंडिया रखने के लिए 2023 की उमस भरी गर्मी में इकट्ठा हुई थीं, तब 11 राज्यों में उसकी सरकारें थीं. खुद कांग्रेस ने उत्तर में राजस्थान और हिमाचल प्रदेश, पूरब में छत्तीसगढ़ और दक्षिण में कर्नाटक थाम रखा था.
तृणमूल कांग्रेस पश्चिम बंगाल में मजबूती से सत्ता पर काबिज थी, तो मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की अगुआई वाला वाम लोकतांत्रिक मोर्चा केरल में गद्दीनशीन था. तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कलगम की अगुआई वाले मोर्चे की हुकूमत थी, तो आम आदमी पार्टी पंजाब और दिल्ली में, जनता दल (यूनाइटेड)-राष्ट्रीय जनता दल-कांग्रेस-वाम गठबंधन बिहार में, और झारखंड मुक्ति मोर्चा-कांग्रेस-राजद का गठजोड़ झारखंड में सत्तारूढ़ था.
अब आइए सीधे 2026 की गर्मियों में. उसका नक्शा आधे से ज्यादा सिकुड़ चुका है. 2024 से अब तक हुए विधानसभा चुनावों में महाराष्ट्र, हरियाणा, मध्य प्रदेश, बिहार, दिल्ली, और अब पश्चिम बंगाल और असम में भाजपा ने या तो अपनी सत्ता कायम रखी या विपक्ष से छीन ली.
2011 से ही बंगाल में सत्ता पर काबिज तृणमूल की जज्बे और जीवट से भरी नेता ममता बनर्जी पहली बार सत्ता से बेदखल हुईं. डीएमके प्रमुख एम.के स्टालिन तमिलनाडु में फिल्मी सितारे विजय के हाथों पराजित हुए. और केरल हारने के बाद वामपंथी दलों का 1977 के बाद से पहली बार देश में एक भी मुख्यमंत्री नहीं है.
अकेले बंगाल और तमिलनाडु मिलकर लोकसभा में पूरे 81 सांसद भेजते हैं, जो सदन की कुल सदस्य संख्या का करीब छठवां हिस्सा हैं. यही वे राज्य थे जिन्होंने भाजपा को 2024 में निर्णायक ढंग से बहुमत हासिल करने से रोक दिया था. विपक्ष ने भारतीय जनता पार्टी को अठारहवीं लोकसभा में 240—बहुमत से 32 कम—सीटों पर रोक दिया था.
और यह इंडिया के सह-संस्थापकों में से एक नीतीश कुमार के चुनाव से पहले ही उसे छोड़ जाने के बावजूद हुआ था. अब विपक्षी गठजोड़ की सरकारें पांच राज्यों में बची हैं. ये हैं केरल, कर्नाटक, तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश और झारखंड. इसके अलावा केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस की सरकार है. ममता और स्टालिन सरीखे क्षेत्रीय क्षत्रप तो अपनी खुद की सीटें भी नहीं बचा सके. यह जले पर नमक छिड़कने जैसा था.
दोनों ही उम्र के सातवें दशक में चल रहे हैं. पांचेक साल तक और सत्ता से बाहर रहे तो उन्हें पीढ़ीगत बदलाव का सामना करना पड़ सकता है. नया नेतृत्व इंडिया गुट के साथ अपने समीकरणों की नए सिरे से व्याख्या कर सकता है. पहले अक्षरों से मिलकर बना यह छोटा नाम इंडिया अपने संस्थापकों का मखौल उड़ा रहा है. असली इंडिया बढ़-चढ़कर एनडीए के साथ है.
धारणा की लड़ाई
इस गुट को केरल जरूर थोड़ी तसल्ली देता है, लेकिन यहां भी देखते ही देखते पेचीदगियों की खटास सामने आ जाती है. कांग्रेस की अगुआई वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) ने निर्णायक जनादेश हासिल किया, जिसमें अकेले कांग्रेस ने 140 में से 63 सीटें जीतीं और मोर्चे ने 90 का निशान पार कर लिया. वाम मोर्चा धूल-धूसरित हो गया.
पिनाराई विजयन की दो कार्यकालों की हुकूमत खत्म हो गई. कहने को सबसे मनहूस आंकड़ा भाजपा के खाते में है. पार्टी ने तीन सीटें जीत लीं, जबकि 2021 में एक भी नहीं थी. यह भले बहुत छोटा आंकड़ा लगता हो लेकिन इसी से मिलता-जुलता गणित कभी पश्चिम बंगाल में लागू था, जहां वाम दलों ने 34 साल शासन किया.
2016 में बंगाल ने 10 फीसद से कुछ ज्यादा वोट हिस्सेदारी के साथ 294 सदस्यों की विधानसभा में भाजपा के तीन विधायक भेजे. 2026 आते-आते भाजपा के पास 46 फीसद वोट हिस्सेदारी के साथ 207 सीटें हैं. पहले वाम दलों का एक और गढ़ रहे त्रिपुरा में भाजपा को 2013 में 1.54 फीसद वोट मिले और कोई सीट हाथ नहीं आई. पांच साल बाद उसने 60 में से 36 सीटों और 45 फीसद वोट हिस्सेदारी के साथ सरकार बना ली.
केरल की जनसांख्यिकी कुछ जानी-पहचानी बातें बताती है. यहां हिंदू आबादी 54 फीसद और मुस्लिम आबादी 27 फीसद है. यह 27 फीसद पश्चिम बंगाल की मुस्लिम आबादी के तकरीबन बराबर है और असम की 34 फीसद से ज्यादा कम नहीं. यही वे चुनावी अखाड़े हैं जहां भाजपा की ध्रुवीकरण की राजनीति ने सबसे शानदार नतीजे दिए हैं. अगर वामपंथी दलों का यहां भी वही हाल होता है जो बंगाल और त्रिपुरा में हुआ, तो केरल को कब्जाना भगवा खेमे का अगला इनाम हो सकता है.
यही वह जाल है जिसमें विपक्ष फंस गया मालूम देता है. इससे भाजपा की यह धारणा और पुख्ता हो जाती है कि इंडिया गुट मुख्य रूप से मुस्लिम वोटों के लिए बनाया गया गठबंधन है. असम में कांग्रेस के 19 विधायकों में से 18 मुसलमान हैं. इसी तरह बंगाल की नई विधानसभा में कांग्रेस और वाम दलों के तीनों विधायक मुसलमान हैं.
यहां तक कि तृणमूल के भी 80 में से 32 यानी 40 फीसद विधायक मुसलमान हैं. आपसी गणित तब और तीखा हो जाता है जब पता चलता है कि इन दोनों राज्यों में भाजपा का एक भी विधायक मुसलमान नहीं. धर्म को अपने अभियानों में सबसे आगे रखने वाली पार्टी के लिए यह वह तोहफा है जो उसे मिलता रहता है.
इसमें एक ऐतिहासिक विडंबना है जो कांग्रेस को चुभ सकती है. 2014 के आम चुनाव में उसकी बेहद बुरी हार के बाद यह केरल के नेता ए.के. एंटनी ही थे जिन्होंने आगाह किया था कि पार्टी को मुसलमानों की तरफदारी करने की धारणा से लड़ने की जरूरत है.
एंटनी की वह रिपोर्ट, जिसे पार्टी को फिर से जिंदा करने का रोडमैप होना था, बारह साल बाद भी धूल खा रही है. ऐसे में हिंदू मतदाताओं के बीच अपनी अपील बढ़ाने की भरोसेमंद कोशिश किए बिना विपक्ष ऐसे ही चुनाव लड़ता रहेगा, जिनमें भाजपा को जीतने के लिए महज बहुसंख्यक वोटों को गोलबंद करने की जरूरत होगी.
बढ़ती फूट
इस गुट के भीतर एकता एक बार फिर छुईमुई ही है. महाराष्ट्र और बिहार में लगे झटकों के बाद कांग्रेस और क्षेत्रीय साझेदारों—शिव सेना और राजद—के बीच रिश्ते, जो दोस्ताना हुआ करते थे, एकदम ठंडे पड़ गए. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के दो धड़ों के बीच विलय की चर्चाओं से इस गठबंधन को अपने एक और संस्थापक सदस्य शरद पवार से हाथ धोना पड़ सकता है.
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी संसद में तो कांग्रेस के साथ सहयोग कर रही है लेकिन 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले जमीन पर तालमेल के प्रति इच्छा उसने कम ही दिखाई है. आम आदमी पार्टी इस गुट से पहले ही विदा हो चुकी है, और पंजाब में, जो अगले साल चुनावों में जाने वाला एक और राज्य है, कहने भर को भी कोई इंडिया गुट नहीं बचा है.
उधर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने विधानसभा चुनाव अभियान ममता पर हमला करने में लगाया. उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार, ध्रुवीकरण और कमजोर राजकाज सरीखी तृणमूल सरकार की नाकामियों के कारण ही बंगाल में भाजपा पैर पसार पाई. तृणमूल की हार के बाद अलबत्ता वे विपक्षी एकता की आवाज के अवतार में नजर आए, जब उन्होंने ममता के इस दावे मोहर लगा दी कि 100 से ज्यादा सीटें 'चुरा ली गईं. असम में कांग्रेस की बुरी पराजय के लिए भी उन्होंने यही सफाई दी.
इस बदलाव का उनकी पार्टी के भीतर एकसार ढंग से स्वागत नहीं किया गया. राहुल ने 5 मई को खुद कहा कि कांग्रेस के कुछ नेता तृणमूल की हार पर अकेले में खुश हो रहे हैं. उन्होंने आगाह किया कि भाजपा की जीत विपक्षी पार्टियों के लिए सामूहिक वजूद का खतरा पैदा कर रही है. इससे एक जाना-पहचाना अंतर्विरोध सामने आता है. कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व तो राष्ट्रीय भाजपा-विरोधी मोर्चा चाहता है लेकिन उसकी राज्य इकाइयां इंडिया गुट के क्षेत्रीय सहयोगी दलों को अक्सर अपने सबसे अव्वल प्रतिद्वंद्वियों की तरह देखती हैं.
राहुल ने विजय की तमिलगा वेत्रि कलगम (टीवीके) को बधाई देने में जरा देर नहीं की, जब टीवीके को डीएमके समेत तमिलनाडु की दोनों द्रविड़ पार्टियों को धूल चटाए अभी एक ही दिन हुआ था. टीवीके के पास बहुमत के लिए जरूरी सीटों से महज 10 कम हैं. कांग्रेस के पांच विधायक इस फासले को कम करने में मदद कर सकते हैं. गौर करने वाली बात यह है कि कांग्रेस के भीतर एक तबका, जिनमें प्रवीण चक्रवर्ती और मणिकम टैगोर हैं, चुनाव से पहले विजय के साथ गठबंधन के लिए जोर डाल रहा था. पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राज्य इकाई ने इसे नामंजूर कर दिया था.
आगे की चुनौती
इस तरह से ये ताजातरीन झटके संसद में विपक्ष को कई साल में मिली सबसे अहम जीत के बमुश्किल एक पखवाड़े बाद लगे. एकजुट इंडिया गुट ने 17 अप्रैल को संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026 पारित नहीं होने दिया. इस विधेयक के जरिए मोदी सरकार लोकसभा की सीटें बढ़ाकर कुल 850 करने के साथ 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन को पहले करवाना चाहती थी.
विधेयक के पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े. सरकार को 528 मौजूद सदस्यों में से 352 के वोट की जरूरत थी, लेकिन 54 कम पड़ गए. 12 साल में यह पहली बार हुआ जब उसका संविधान संशोधन विधेयक गिर गया. यह जबरदस्त झटका उस गठबंधन ने दिया जिसमें डीएमके और तृणमूल शामिल थे. उनके सांसदों ने एक होकर वोट डाला और डटे रहे. इस गुट के लिए इम्तिहान यह है कि 2029 तक वह यह एकता कायम रख पाता है या नहीं, खासकर जब राज्य स्तर के समीकरण बदलने लगे हैं.
इंडिया गुट की दिक्कत अब महज गणित नहीं है. बल्कि भूभागीय और मनोवैज्ञानिक है. पांच राज्यों में उसका सत्ता में होना भूगोल के लिहाज से असंतुलित है. उसकी तीन सरकारें दक्षिण में हैं, एक हिमाचल प्रदेश में और एक झारखंड में. राष्ट्रीय विपक्ष के नेतृत्व का तर्कसंगत दावा करने सकने वाली अकेली पार्टी कांग्रेस के सामने खतरा यह है कि उसे दक्षिण की पार्टी करार दिया जा सकता है. उधर उसके सहयोगी दल सबसे मजबूत ठीक उन्हीं राज्यों में हैं जहां उनकी प्रतिस्पर्धा उसी से है.
दूसरी ओर भाजपा है जिसकी 17 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में अकेले अपने दम पर सरकारें हैं, और पांच अन्य राज्यों में वह एनडीए के साझेदारों के साथ सरकारें चला रही है. सब मिलाकर भारत की 70 फीसद आबादी और दो-तिहाई से ज्यादा भूभाग पर उसकी हुकूमत है. इंडिया गुट संसद में संविधान संशोधन तो रोक सकता है लेकिन गणराज्य उसके हाथ से फिसलता जा रहा है.
राज्यों में सहयोगी दल प्रतिद्वंद्वियों में बदल रहे हैं, स्थानीय महत्वाकांक्षाएं राष्ट्रीय रणनीति पर भारी पड़ रही है, और नतीजों की फसल भाजपा काट रही है. इंडिया को दोबारा हासिल करने के लिए इंडिया गुट को पहले यह तय करना होगा कि वह गठबंधन है या एक व्यवस्था भर है, या पहले अक्षरों को जोड़कर बनाया गया महज एक ऐसा नाम है जो अपना उद्देश्य खो चुका है.
तमिलनाडु में कांग्रेस ने गठबंधन की अपनी खासी पुरानी सहयोगी द्रविड़ मुनेत्र कलगम (द्रमुक) से एक झटके में नाता तोड़ लिया. जवाब में द्रमुक ने भी ऐलान कर दिया कि इंडिया गठजोड़ का अब कोई अस्तित्व नहीं.