2024 की बिसात
गुजरात की ऐतिहासिक जीत से भाजपा के लिए लोकसभा चुनाव की संभावना रोशन हुई, मगर इसके लिए पार्टी को मोदी मैजिक बरकरार रखना होगा.

मोर्चे की अगुआई : अहमदाबाद में 1 दिसंबर को एक रोड शो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
नरेंद्र मोदी कभी भी एक मुकाम हासिल कर चैन से बैठने वालों में नहीं हैं. 5 दिसंबर को मतदान के आखिरी दिन जब यह साफ हो गया कि उनके गृह राज्य के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ऐतिहासिक जीत की ओर बढ़ रही है, प्रधानमंत्री कुछ आगे की सोच रहे थे. उनकी निगाहें 2024 के लोकसभा चुनाव की और बड़ी मंजिल हासिल करने पर जम गई हैं, जिसे वे लगातार तीसरी बार भाजपा के लिए जीतना चाहते हैं.
वे अहमदाबाद के निशांत हाइ स्कूल में अपने वोट डालने को सार्वजनिक आयोजन में बदलने के फौरन बाद राजधानी दिल्ली लौट आए, जिसे विपक्ष ने चुनाव आचार संहिता का घोर उल्लंघन बताया. हवाई अड्डे से वे सीधे दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर भाजपा मुख्यालय पहुंचे. वहां उन्होंने पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारियों, राज्य प्रभारियों और 2023 में तय चुनाव वाले नौ राज्यों के पार्टी अध्यक्षों के साथ तैयारियों की जानकारी ली ताकि 2024 में पार्टी की जीत की रूपरेखा बनाई जा सके.
गुजरात की धमाकेदार जीत ने यह बखूबी स्थापित कर दिया कि मोदी का जादू कायम है. 27 साल के शासन के भारी सरकार विरोधी रुझान के बावजूद, भाजपा ने कुल 182 में से 156 सीटें जीत लीं और 1985 में कांग्रेस की 149 सीटों की सबसे बड़ी जीत को पीछे छोड़ दिया. इसमें हल्का-सा भी शक नहीं है कि गुजरात में भाजपा के प्रचार अभियान की तरह ही उसकी जीत का सेहरा भी मोदी के सिर बंधा है.
निर्णायक नेतृत्व ही मोदी की सबसे बड़ी खासियत है, पिछले साल जब पार्टी के आंतरिक सर्वे में संकेत मिले कि भाजपा हारने जा रही है तो प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्री विजय रूपाणी और उनके समूचे मंत्रिमंडल को फौरन चलता करने में कोई हिचक नहीं दिखाई. रूपाणी की जगह अपेक्षाकृत अनजान-से पहली बार के विधायक तथा अहमदाबाद के पूर्व पार्षद भूपेंद्र पटेल और एकदम नए चेहरों की टोली बैठा दी गई. चुनाव में भी भाजपा ने कई दिग्गजों के टिकट काट दिए गए और एक-तिहाई सीटें पहली बार वालों को दी गईं.
मोदी कोई कसर बाकी नहीं छोड़ना चाहते थे. सो, प्रधानमंत्री ने राज्य में अथक प्रचार अभियान चलाया, करीब 30 रैलियों को संबोधित किया और सूरत तथा अहमदाबाद में भव्य रोड शो के जरिए भी लोगों को खींचने की कोशिश की. उन्होंने गुजराती अस्मिता का आह्वान किया और मतदाताओं से हाथ मजबूत करने की अपील की, ताकि केंद्र और राज्य दोनों में बेहतर कामकाज कर सकें.
उन्होंने चतुराई से यह नारा भी उछाला की, 'आ गुजरात मैं बनाऊं छूं’ (यह गुजरात मैंने बनाया है), ताकि लोगों को याद दिलाया जा सके कि उनको चुनने में ही उनका हित है. उनके इस धुआंधार प्रचार में पार्टी के भीतर बगावत, गुटबाजी और ऐंटी-इन्कंबेंसी सब ढक गई, जिससे पार्टी को अपने ही गढ़ में हार जाने का खतरा मंडरा रहा था. जैसा कि भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा अपने लच्छेदार अंदाज में कहते हैं, ''पीएम का मतलब सिर्फ प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि पसीना और मेहनत भी है, जिसे मोदी जी ने अपने करिश्मे के अलावा अपनी क्षमता और लगन से भी युवा नेताओं के सामने उदाहरण की तरह पेश किया.’’
लेकिन गुजरात में भारी जीत से भाजपा के तुरुप के इक्के के रूप में मोदी की छवि और मजबूत हुई, तो हिमाचल प्रदेश की हार ने उस दुखती रग की याद दिलाई कि सरकार विरोधी रुझान को मात देने के लिए मजबूत क्षत्रपों की दरकार है. ऐसा ही कुछ दिल्ली नगर निगम चुनाव के नतीजों ने भी जाहिर किया, जिसमें भाजपा ने कुछ बेहतर तो किया, मगर उसकी 15 साल की सत्ता को आम आदमी पार्टी ने छीन लिया और पहली बार विजेता बन गई (देखें: दिल्ली में भी डबल इंजन).
देश भर में कई उपचुनावों के नतीजे भी भाजपा के लिए मिले-जुले रहे, मगर उसे विपक्ष के कुछ राज्यों में बेहतर प्रदर्शन को भी ध्यान में जरूर रखना चाहिए. उत्तर प्रदेश के मैनपुरी संसदीय क्षेत्र के ऌपारिवारिक गढ़ में डिंपल यादव की जीत की तो उम्मीद थी, समाजवादी पार्टी के सहयोगी राष्ट्रीय लोकदल ने खतौली विधानसभा सीट जीत ली.
भाजपा जरूर आजम खान के गढ़ रामपुर में सेंध लगा सकी है. राजस्थान में कांग्रेस ने सरदारशहर सीट जीत ली और साबित किया कि पार्टी की अशोक गहलोत शासित राज्य में मजबूत स्थिति बनी हुई है. इसलिए आगामी राज्य विधानसभा या 2024 का लोकसभा चुनाव भी पार्टी के लिए आसान नहीं होंगे, जैसा कि गुजरात भाजपा और उसके करिश्माई नेता के लिए साबित हुआ है.
आगे की चुनौतियां
मोदी की सरपरस्ती और गुह मंत्री अमित शाह की काबिल मदद से भाजपा चुनावी मशीन में बदल गई है, जो हर चुनाव को अपने जीने-मरने का सवाल बना लेती है. पार्टी सिर्फ अपने नेताओं के भारी तोपखाने पर ही आश्रित नहीं है, बल्कि उसने अपने मिशन और नजरिए को जमीन पर उतारने के लिए प्रतिबद्ध काडरों की फौज भी तैयार की है.
उसने एकदम बूथ स्तर तक पन्ना समितियों तथा प्रमुखों, शक्ति केंद्रों के जरिए चुनाव प्रबंधन के विज्ञान को साध लिया है और उसकी डिजिटल फौज ने हर वोटर के घर तक पहुंच बना ली है. भाजपा लगातार अपने प्रदर्शन की समीक्षा करती है और हर बड़े चुनाव के सबक पर अमल करती है. मसलन, गुजरात और हिमाचल प्रदेश दोनों में पार्टी ने अपने हिंदुत्व तेवर धीमे किए, 70 वर्ष से अधिक उम्र के नेताओं या उनके परिजनों को चुनाव लड़ने नहीं दिया. उसने दलित और आदिवासी समुदायों में गहरी पैठ बनाई. हालांकि वोटरों पर सबसे भारी मोदी का आकर्षण था.
मसलन, गुजरात में पार्टी ने आदिवासी समुदाय को लुभाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, जिन्होंने 2017 में कांग्रेस को वोट दिया था. हर क्षेत्र में जमीनी संपर्क के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के आनुषंगिक संगठनों को लगाने के फैसले का फायदा मिला. इंडिया टुडे-एक्सिस माइ इंडिया एग्जिट पोल जनमत सर्वेक्षण से पता चलता है कि अनुसूचित जनजाति के करीब 33 फीसद वोटरों ने भाजपा की ओर रुख किया, जबकि कांग्रेस को उनके वोट करीब 27 फीसद ही मिले.
हैरानी की बात तो यह कि उनके 31 फीसद वोट आप को मिले. उम्मीद की जाती है कि गुजरात में आदिवासियों के बीच पैठ का फायदा राजस्थान, छत्तीसगढ़ के साथ-साथ मध्य प्रदेश में भी मिलेगा. इन तीनों राज्यों में नवंबर 2023 में चुनाव होने हैं. गुजरात के नतीजे से आदिवासी समुदायों के बीच भाजपा को अपना काडर तैयार करने और आधार बढ़ाने की कोशिशों में मदद मिलेगी.
गुजरात की ही तरह, भाजपा ने कर्नाटक और त्रिपुरा में भी नेतृत्व परिवर्तन किया है. कर्नाटक में मई 2023 में चुनाव हैं और त्रिपुरा में फरवरी 2023 में. इसलिए, पिछली जुलाई में कर्नाटक में बी.एस. येदियुरप्पा की जगह बासवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री बनाया गया और त्रिपुरा में इस साल मई में बिप्लव देब की जगह माणिक साहा लाए गए.
यह इसलिए किया गया, ताकि विकास कार्यों में तेजी लाई जा सके और गुटबाजी तथा भ्रष्टाचार के आरोपों को दूर किया जा सके. हालांकि भाजपा के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, नेतृत्व परिवर्तन से हालात काफी नहीं बदले हैं. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''फिर, भाजपा के खिलाफ लहर को पलटने के लिए मोदी करिश्मे की ही जरूरत पड़ेगी.’’
मोदी फैक्टर
वाकई मोदी का करिश्मा ही अगले साल चुनाव वाले तीन हिंदी प्रदेशों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के नतीजे तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा. इन तीनों राज्यों में भाजपा नेतृत्व के सवाल पर बुरी तरह बंटी हुई है. मध्य प्रदेश में कुछ पार्टी नेता शिवराज सिंह चौहान की जगह नरेंद्र सिंह तोमर का नाम आगे बढ़ा रहे हैं.
लेकिन पार्टी आलाकमान को तोमर का असर पूरे राज्य में नहीं लगता है. भाजपा राजस्थान और छत्तीसगढ़ में पूर्व मुख्यमंत्रियों क्रमश: वसुंधरा राजे और डॉ. रमन सिंह को फिर मुख्यमंत्री प्रत्याशी के रूप में पेश करने को लेकर दुविधा में है. पार्टी में एक वर्ग इस राय का है कि तीनों राज्यों में बिना मुख्यमंत्री के चेहरे के चुनाव में उतरा जाए.
फिर, पिछले कुछ महीनों में पार्टी की निर्णय-प्रक्रिया केंद्रीकृत हो गई है. कैबिनेट की नियुक्ति समिति में यूपीए के दौर में किसी अधिकारी की नियुक्ति के पहले कई मंत्रियों के यहां से फाइल गुजरती थी लेकिन अब इसके सदस्य सिर्फ पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह है. इसी तरह, भाजपा की दो सर्वोच्च निर्णयकारी संस्थाओं केंद्रीय चुनाव समिति और संसदीय बोर्ड में अगस्त में फेरबदल किया गया.
उसमें शाहनवाज हुसैन, शिवराज सिंह चौहान, नितिन गडकरी जैसे पार्टी दिग्गजों की जगह कम वजनदार इकबाल लालपुरा, सुधा यादव और सत्यनारायण जटिया जैसे नेताओं को शामिल किया गया. भाजपा के एक अंदरूनी सूत्र के मुताबिक, ना-नुकुर करने वालों को हटा दिया गया, ताकि मोदी-शाह-जे.पी. नड्डा तिकड़ी की क्चालुकर चले. निजी बातचीत में कई भाजपा नेता कहते हैं कि क्षत्रपों को बढ़ावा देने की जरूरत है.
एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''उत्तर प्रदेश में योगी, असम में हिमंत बिस्व सरमा और महाराष्ट्र में देवेंद्र फड़नवीस हो सकते हैं लेकिन दूसरे हिस्सों में कोई नए दौर का क्षत्रप नहीं है. अगले तीन-चार वर्ष ऐसे नेताओं को विकसित करने पर जोर होना चाहिए.’’ राजनैतिक जानकारों को आशंका है कि भाजपा ’70 के दशक के दौर की कांग्रेस की राह पर चल पड़ी है, जब इंदिरा गांधी ऐसी विराट शख्सियत बन गई थीं कि उन्हीं के नाम पर हर चुनाव लड़ा और जीता जाता था. मोदी को उसी ढांचे में ढलता हुआ देखा जा रहा है, जो भाजपा की ताकत और कमजोरी दोनों एक साथ बन चुके हैं.
विपक्ष में बिखराव
भाजपा को 2024 में जिससे बड़ी मदद मिलने की संभावना है वह है विपक्ष में फूट और बिखराव. कांग्रेस भले हिमाचल जीत गई लेकिन सिर्फ चार लोकसभा सीटों वाला यह राज्य लोकसभा चुनाव में बहुत ज्यादा मायने नहीं रखता. इसलिए, पहाड़ी राज्य में जीत से पार्टी को कोई महत्वपूर्ण राजनैतिक ताकत मिलने की संभावना नहीं है, खासकर एक साथ मिली दो अपमानजनक हार देखते हुए. गुजरात में, कांग्रेस ने 2017 में 77 सीटें जीती थीं, आज वह 17 सीटों पर सिमट गई है जो राज्य में उसका अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन है. दिल्ली नगर निगम चुनावों में कांग्रेस नगण्य तीसरी ताकत है और कुल 250 में से केवल नौ सीटें ही जीत सकी.
फिर भी, हिमाचल में जीत से देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए लगातार हार का सिलसिला टूटा है. यह जीत राहुल गांधी की अनुपस्थिति के बावजूद मिली है, और यह स्पष्ट हुआ है कि जिन राज्यों में कांग्रेस के पास अभी भी संगठन बचा है और कोई मजबूत तीसरी पार्टी नहीं है, वहां वह भाजपा की चुनावी मशीनरी का मुकाबला कर सकती है और मोदी के जादू को फीका कर सकती है.
कर्नाटक में, जहां मई में चुनाव होने हैं वहां कांग्रेस के पास न केवल दो बड़े मुख्यमंत्री उम्मीदवार सिद्धरमैया और डी.के. शिवकुमार हैं बल्कि मजबूत काडर भी है. इसलिए, कांग्रेस की संभावना उज्ज्वल है, बशर्ते वह मुख्यमंत्री पद के लिए पार्टी के भीतर के घमासान को नियंत्रित रख पाने मंन कामयाब रहे. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में उसने 2018 में चुनाव जीता था, लेकिन दलबदल के कारण बाद में मध्य प्रदेश उसके हाथ से फिसलकर भाजपा के पाले में चला गया.
अगर कांग्रेस को सत्ता में लौटना है तो इन राज्यों में नेताओं को एकजुट होना होगा. हालांकि, यह लोकसभा में सफलता की कोई गारंटी नहीं होगी, क्योंकि 2018 में इन राज्यों को जीतने के बावजूद इन तीनों राज्यों की 91 लोकसभा सीटों में से केवल एक सीट पर ही कांग्रेस का कब्जा है.
इन राज्यों में लंबे समय से जारी रुझानों में कोई बदलाव नहीं हुआ है. जब मतदाताओं को विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और भाजपा के बीच चयन करना होता है, तो वे स्थानीय मुद्दों, कामकाज और नेतृत्व के आधार पर चुनाव करते हैं. हालांकि, लोकसभा चुनाव में जब चुनाव मोदी और राहुल गांधी के बीच होता है तो लड़ाई एकतरफा हो जाती है.
इसका अंदाजा हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, हरियाणा और छत्तीसगढ़ की कुल 110 सीटों में से कांग्रेस के खाते में सिर्फ एक सांसद होने से लगाया जा सकता है. इन 110 सीटों पर प्रदर्शन यह इंगित करेगा कि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा, जो कांग्रेस नेता के लिए अपनी नई छवि बनाने का अभ्यास है, वह इसके चारों ओर गढ़ी जा रही कहानियों और शोर के अलावा भी कुछ असर डाल पाई है या नहीं. इन सीटों पर पार्टी के प्रदर्शन से विपक्ष की सामूहिक ताकत की भी थाह मिलेगी.
कांग्रेस को केवल भाजपा से चुनौती नहीं मिल रही बल्कि आप जैसे नए खिलाड़ियों से भी मिल रही है जो उन इलाकों में उभर रही है, जहां सबसे पुरानी पार्टी की संगठनात्मक उपस्थिति है. कई जानकारों का दावा है कि गोवा, उत्तराखंड और गुजरात जैसे राज्यों में आप की मौजूदगी ने भाजपा विरोधी वोटों को विभाजित करके भाजपा की मदद की है. गुजरात में भी कांग्रेस के कई नेता उनका वोट काटने और भाजपा को ऐतिहासिक जनादेश दिलाने के लिए आप को ही जिम्मेदार मानते हैं.
हालांकि, पार्टी में हर कोई इस तर्क से सहमत नहीं है. अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली पार्टी की अपनी चुनौतियां भी हैं, खासकर उन राज्यों में जहां भाजपा की स्थानीय इकाई मजबूत है. निश्चित रूप से, पार्टी हाल ही में दिल्ली नगर निगम चुनावों मंन और इस साल के शुरू में पंजाब में मिली जीत से उत्साहित है. लेकिन जब लोकसभा की बात आती है, तो उसे भी उसी मोदी सिंड्रोम का सामना करना पड़ता है जो कांग्रेस करती है.
करीब दस वर्षों की दिल्ली पर पकड़ के बावजूद, यह पिछले दो लोकसभा चुनावों में एक भी लोकसभा सीट जीतने में विफल रही. मोदी बनाम केजरीवाल की लड़ाई में मोदी अब भी लोकसभा में बढ़त बनाए हुए हैं. साथ ही, जैसा कि गुजरात विधानसभा चुनावों ने दिखाया है, केजरीवाल को कुछ और समय के लिए इंतजार करना होगा और उम्मीद करनी होगी कि मोदी का जादू जब बेअसर होने लगे तब वे खुद को सही मायने में राष्ट्रीय नेता साबित करने के लिए तैयार हो जाएं.
जहां केजरीवाल अपने घरेलू मैदान में काफी सुरक्षित नजर आ रहे हैं, वहीं अन्य गैर-कांग्रेसी नेताओं को अपने गढ़ में जोर लगाना पड़ रहा है. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी ने लोकसभा में पहला झटका झेला जब भाजपा ने 2019 में राज्य की 42 में से 18 सीटें जीत लीं. खुशकिस्मती से, उसका पिछले साल के विधानसभा चुनाव में ममता की पार्टी पर कोई असर नहीं पड़ा.
कई दल-बदल और भाजपा द्वारा पूरी चुनावी मशीनरी और वित्तीय ताकत झोंक देने के बावजूद ममता ने पश्चिम बंगाल को आसानी से फिर जीत लिया. पड़ोसी ओडिशा में नवीन पटनायक के नेतृत्व वाला बीजू जनता दल पिछले दो दशकों से सत्ता का आनंद ले रहा है, लेकिन 2019 में भाजपा ने उसके आधार में कुछ सेंध लगा दी. भगवा ब्रिगेड ने राज्य की 21 सीटों में से आठ सीटों पर कब्जा कर लिया. पटनायक वर्षों से सत्ता में हैं और बीजद में उत्तराधिकार को लेकर कोई स्पष्टता नहीं है, इसलिए भाजपा बीजद के भीतर के असंतोष से लाभ की आस में है.
पटनायक खुद नरम पड़ने के मूड में नहीं हैं. वे भाजपा की हर चाल नाकाम कर रहे हैं. एक और बड़ा युद्ध का मैदान महाराष्ट्र होगा, जहां 48 लोकसभा सीटं हैं. भाजपा ने पुराने सहयोगी शिवसेना को कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के हाथों गंवा दिया. उसके बाद, हालांकि, वह शिवसेना को तोड़ने में सफल रही है. शिवसेना के कमजोर होने से भाजपा यह उम्मीद कर रही है कि अब महाराष्ट्र विकास आघाड़ी जैसा प्रभावी गठबंधन बनाना मुश्किल होगा.
उत्तर प्रदेश में भी भाजपा की जमीन मजबूत बनी हुई है. योगी आदित्यनाथ के रूप में मजबूत और करिश्माई मुख्यमंत्री के साथ, पार्टी का डबल इंजन वाला आख्यान उसे निर्णायक बढ़त देता है. सपा के अखिलेश यादव और बसपा की मायावती जैसे क्षेत्रीय दिग्गज 2019 में एकजुट होकर लड़े लेकिन राज्य में भाजपा की पकड़ को तोड़ने में नाकाम रहे. भाजपा ने यहां अपने दम पर 80 में से 62 सीटें जीतीं जो लोकसभा में पार्टी के लिए किसी राज्य से सबसे बड़ी संख्या थी. सपा-बसपा गठबंधन ने केवल 15 जीतीं और शेष अन्य को गईं.
इसलिए, अगर गैर-भाजपा दलों के लिए 2024 में भाजपा के लिए एक विश्वसनीय विपक्ष खड़ा करने की कोई उम्मीद बची है, तो सबसे पहले उन्हें सीट बंटवारे का प्रभावी फॉर्मूला तैयार करना होगा. भगवा पार्टी के लिए एक चुनौती बिहार से आ सकती है, जहां जनता दल (यूनाइटेड), राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस का महागठबंधन, जो 2015 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ सफल रहा, उस राज्य में भाजपा की सीटों में सेंध लगा सकता है जो 40 सांसदों को चुनता है.
बिहार के मुख्यमंत्री और जद (यू) प्रमुख नीतीश कुमार को मोदी के खिलाफ प्रधानमंत्री पद के संभावित उम्मीदवार के रूप में पेश किया जा रहा है. लेकिन पहले उन्हें विपक्ष के अन्य दिग्गजों का विश्वास हासिल करना होगा और मोदी के खिलाफ अपने घरेलू मैदान पर भी पकड़ बनानी होगी, जैसा कि दक्षिणी नेताओं ने सफलतापूर्वक किया है. दक्षिण में, जहां आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और केरल को मिलाकर 101 सीटें हैं, भाजपा ने 2019 में सिर्फ चार सीटें जीतीं और ये चारों तेलंगाना से थीं.
पार्टी के लिए इन राज्यों में कोई भी लाभ हासिल करना मुश्किल होगा. और भले ही भाजपा मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की लोकसभा सीटों पर 2019 की तरह जीत हासिल कर ले और उत्तर प्रदेश और गुजरात जैसे अपने गढ़ों को बचाकर रखे, तो भी कुल संख्या 200 से नीचे रहेगी. अपने दम पर फिर 272 के बहुमत के निशान को पार करने के लिए भाजपा को महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और तेलंगाना जैसे बड़े राज्यों में बड़ा हाथ मारना होगा.
इस प्रकार भगवा पार्टी 2024 के आम चुनाव के लिए अब भी प्रमुख धुरी बनी हुई तो है, लेकिन तीसरे कार्यकाल के लिए भाजपा की लड़ाई उतनी आसान नहीं होगी. हालांकि, भारतीय राजनैतिक परिदृश्य में मोदी का कद लगातार बढ़ रहा है, लेकिन उसे चुनौती देने के लिए विपक्ष में अभी कोई विकल्प नहीं नजर आता. यही एक कारक, भाजपा की जीत की पथरीली राह को सुगम बना सकता है.
आर्थिक मोर्चे की दिक्कतें
राजनीति से ज्यादा अर्थशास्त्र तीसरे कार्यकाल की मोदी तलाश को ठेस पहुंचा सकता है. 2020 की शुरुआत में कोविड-19 के हमले से पहले भी देश की आर्थिक वृद्धि लगातार कई तिमाहियों से 5 फीसद से नीचे के दायरे में थी, जो देश की क्षमता से काफी कम थी. महामारी और फिर लगाए गए लॉकडाउन के चलते यह और भी रसातल में चली गई, जब 2020-21 के वित्त वर्ष में लगातार दो तिमाही में नकारात्मक वृद्धि दर्ज की गई.
हालांकि भारत बाद में इससे उबर आया, पर फिक्र की बात यह है कि यह बहाली टिकाऊ है या नहीं. कई एजेंसियों के साथ-साथ केंद्रीय बैंक ने भी मौजूदा वित्त वर्ष के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि के अनुमानों में बदलाव किए हैं, जो बताता है कि अर्थव्यवस्था अब भी कितनी कमजोर बनी हुई है, खासकर जब ऊंची मुद्रास्फीति और बढ़ती ब्याज दरों के साथ कई सारे बाहरी झटकों के चलते घरेलू मांग में नरमी कायम है. मूडीज ने नवंबर में 2022 के लिए भारत की जीडीपी वृद्धि का अनुमान पहले के 7.7 फीसद से घटाकर 7 फीसद कर दिया, तो आरबीआइ ने भी 2022-23 के लिए देश की वृद्धि दर का अनुमान पहले के 7.2 फीसद से घटाकर 7 फीसद कर दिया.
जल्द बेहतरी की कोई संभावना नजर नहीं आती और यह मोदी तथा भाजपा के लिए परेशानी का सबब होगा. यूक्रेन में जंग लंबी खिंचने की वजह से उत्पन्न भू-राजनैतिक अनिश्चितता इसमें मुख्य कारक है. सारे संकेत इन सर्दियों में जंग के और तेज होने के आसार बता रहे हैं, जिससे दुनिया भर में महंगाई की आग को और हवा मिलेगी, क्योंकि कच्चे तेल सहित जिंसों की कीमतें फिर बढ़ सकती हैं.
जिंसों की कीमतें फरवरी में यूक्रेन पर रूस के हमले के फौरन जितने ऊंचे स्तर पर पहुंच गई थी, उससे वाकई नीचे आई हैं (मसलन, कच्चे तेल फरवरी में यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद कई हफ्तों तक 130 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर था, जो 4 दिसंबर को करीब 86 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया), पर इस राहत की वजह भी आसन्न मंदी की आशंका मालूम देती है, जो फिर वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बुरी खबर है.
भारत सरीखे देश, जो अपनी जरूरत का 80 फीसद से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है, आयात की बढ़ती लागत और निर्यात में गिरावट की वजह से अपने व्यापार घाटे को आसमान छूता देख रहे हैं. रूस कह रहा है कि ऊर्जा ठिकानों पर और ज्यादा हमले 'अवश्यंभावी’ हैं, ऐसे में कई विशेषज्ञों को आशंका है कि आने वाले महीनों में कच्चे तेल की कीमतें फिर 100 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच जाएंगी.
यह सत्तारूढ़ पार्टी के लिए अच्छी खबर नहीं हो सकती. बढ़ती कीमतों और बेरोजगारी का चुनावी संभावनाओं पर गहरा असर पड़ता है. बीते कुछ महीनों में महंगाई ने आम आदमी की जेब में काफी सेंध लगाई है. उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआइ) से मापी जाने वाली खुदरा महंगाई की बढ़ोतरी दर हालांकि अक्तूबर में तीन माह के निचले स्तर 6.77 फीसद पर आ गई, जो सितंबर 7.4 फीसद थी.
फिर भी यह इस साल लगातार 10 महीनों से केंद्रीय बैंक के 6 फीसद की ऊपरी सीमा के लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है. खाद्य महंगाई अब भी और ज्यादा 7.04 के स्तर पर है और अनाज तथा दूध की ऊंची कीमतें इसे हवा दे रही हैं. केंद्रीय खाद्य सुरक्षा योजना को आगे बढ़ाने के बाद अनाज भंडार में कमी आई और मौसम के उतार-चढ़ावों के कारण खरीद भी कम हुई. अनाजों की महंगाई दर अक्तूबर में 12.08 फीसद पर पहुंच गई. ग्रामीण भारत में महंगाई ज्यादा है, क्योंकि यहां खाद्य पदार्थों की कीमतें ज्यादा हैं.
सत्तारूढ़ पार्टी के लिए दूसरी बड़ी चुनौती रोजगार के मोर्चे पर आएगी. देश की बेरोजगारी दर पिछले महीने की 7.7 फीसद से बढ़कर नवंबर में 8 फीसद पर पहुंच गई. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआइई) का डेटा बताता है कि शहरी बेरोजगारी अक्तूबर की 7.12 फीसद से बढ़कर नवंबर में 8.95 फीसद पर पहुंच गई.
बहुत छोटे, छोटे और मध्यम स्तर के उद्यम (एमएसएमई) महामारी से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए और बताया जाता है कि उनमें से सैकड़ों को तो ताले डाल देने पड़े. अगस्त में इंडिया टुडे के देश का मिजाज सर्वे में 56.4 फीसद लोगों ने कहा कि देश में बेरोजगारी की स्थिति 'बहुत गंभीर’ है, जो बताता है कि यह अत्यंत जरूरी मुद्दा है जिससे केंद्र को निबटना होगा. बढ़ती गैरबराबरी भी मोदी सरकार के लिए मुश्किलें पैदा कर सकती है.
अर्थव्यवस्था 2019 में भी उम्मीद और क्षमता से कमतर प्रदर्शन कर रही थी. मोदी फिर भी दूसरी बार फतह हासिल करने में कामयाब रहे और भाजपा ने अपने दम पर बहुमत हासिल कर लिया. उस जीत का श्रेय अचानक और अप्रत्याशित रूप से हुए पुलवामा के आतंकी हमले और बालाकोट में आतंकी शिविर पर हवाई हमले की शक्ल में दिए गए मोदी के मजबूत जवाब को भी जाता है. 2024 के आम चुनाव की तैयारी करते हुए मोदी की आस्तीन में और भी तुरुप के पत्ते हैं.
इनमें मुख्य अयोध्या का राम मंदिर भी है. कश्मीर में अनुच्छेद 370 खत्म करने और समान नागरिक संहिता पर सरकार के जोर को उनके सुदृढ़ और निर्णायक नेतृत्व के अन्य पहलुओं की तरह देखा जाता है. ये सब प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी की तीसरा कार्यकाल जीतने की संभावनाओं में चार चांद लगाते हैं. मगर अपनी जीत को हकीकत में बदलने के लिए उन्हें पक्का करना होगा कि मोदी का जादू तब तक कायम रहे.


