भ्रष्टाचार का गुबार
राजधानी दिल्ली के पड़ोस नोएडा में दो बहुमंजिला टावरों के धराशायी होने से बिल्डरों के सर्वशक्तिमान होने का गुरूर टूटा लेकिन खरीदारों को न्याय दिलाने के लिए बिल्डर-बाबू सांठगांठ से लंबी लड़ाई अभी बाकी.

कानूनी विस्फोट : विस्फोट के दौरान नोएडा में सुपरटेक के ट्विन टावर और धमाके के बाद इलाके का विहंगम दृश्य
गिरते ढांचे और उठते गुबार का वह 12 सेकंड का वीडियो मानो प्रतीक बन गया कि बिल्डरों पर नकेल कसी जा सकती है, बशर्ते सरकारी और संवैधानिक तंत्र चौकस हो. देश के सबसे बड़े रियल एस्टेट मार्केट में से एक, दिल्ली-एनसीआर में उत्तर प्रदेश के नोएडा में सुपरटेक ट्विन टावर का ढहाया जाना यह भी संकेत दे गया कि बिल्डर-बाबूशाही-नेता सांठगांठ से कैसे कोरा अवैध निर्माण और आम लोगों की गाढ़ी कमाई की लूट खुल्लमखुल्ला दशकों तक जारी रहती है
शुक्र मनाइए कि देश की सर्वोच्च अदालत के फैसले से न सिर्फ इस गोरखधंधे की इमारत ढहाई गई, बल्कि समूचे रियल एस्टेट कारोबार पर नए सिरे से विचार करने और नए कानूनी कवच की जरूरत भी महसूस हुई. इससे नोएडा जैसे तमाम प्राधिकरणों की कार्यशैली पर भी सवाल उठे. नोएडा के सेक्टर 93ए में सुपरटेक ने प्राधिकरण के अधिकारियों की मिलीभगत से ये टावर खड़े कर लिए थे. सुपरटेक एमराल्ड कोर्ट के रेजिडेंट्स ने बिल्डर-बाबू मिलीभगत के पूरे सिस्टम से लड़कर 10 साल लंबी कानूनी जंग में जीत हासिल की.
नोएडा यानी न्यू ओखला इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी की कार्यशैली पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस डी.वाइ. चंद्रचूड़ की यह टिप्पणी बहुत महत्वपूर्ण है: ''नोएडा एक भ्रष्ट निकाय है. इसकी आंख, कान, नाक और यहां तक कि चेहरे से भी भ्रष्टाचार टपकता है. जब आपसे रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन ने बिल्डिंग का सैंक्शन प्लान मांगा तो आपने सुपरटेक से पूछा और उसने मना कर दिया तो आपने बिल्डिंग प्लान नहीं दिया. आप सुपरटेक की मदद ही नहीं कर रहे थे, आपकी उसके साथ मिलीभगत है.’’ न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ का यह ऑब्जर्वेशन 4 अगस्त, 2021 को सुपरटेक ट्विन टावर मामले की सुनवाई खत्म होने के बाद फैसला सुरक्षित रखने के दौरान का है.
नोएडा प्राधिकरण पर प्रतिकूल टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट तक ही सीमित नहीं है. दिसंबर, 2021 में उत्तर प्रदेश विधानसभा के पटल पर रखी गई नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट में कई दूसरे मामलों का जिक्र करते हुए अधिकारियों की कोताही और भ्रष्टाचार पर तीखी टिप्पणी की गई. इसमें कहा गया, ''नोएडा प्राधिकरण अपनी खराब हालत से वाकिफ होने के बावजूद बिल्डरों पर कार्रवाई करने में विफल रहा.
साथ ही कर्तव्य निर्वाह में कोताही बरतने वाले और नियमों के उल्लंघन की मंजूरी देने वाले अपने अफसरों पर भी कोई कार्रवाई नहीं कर सका.’’ इसी तरह सुप्रीम कोर्ट ने एनसीआर में डेवलपर आम्रपाली के घोटाले से जुड़े बिक्रम चटर्जी बनाम केंद्र के मामले में कहा, ''प्रोजेक्ट की प्रगति देखने और उसकी समीक्षा करने के मामले में नोएडा और ग्रेटर नोएडा के अफसरों का रवैया बेहद लापरवाही भरा है.
लीज लेने वालों के साथ उनकी मिलीभगत है और इसलिए उससे ये भुगतान नहीं करवाते हैं. उन्होंने अवैध तरीके से जमीन सबलीज पर देने की अनुमति दी हुई है. फ्लैटों का बोगस अलॉटमेंट किया. अधिकारियों और बैंकरों ने जनता का विश्वास तोड़ा है और बदकिस्मती से उन्होंने बिल्डरों के साथ साठगांठ की है.’’
नोएडा, प्रॉपर्टी घोटालों की खबरों से कोई पहली बार शर्मसार नहीं हो रहा है. प्राधिकरण की सीईओ रहीं नीरा यादव के कार्यकाल में 1993 से 1995 के दौरान हुए प्लॉट घोटाले में दूसरे कई लोगों के अलावा इस महिला आइएएस अफसर को दोषी ठहराया गया और उन्हें करीब दो साल जेल में काटने पड़े.
इस बीच छोटे-मोटे घोटाले होते रहे. सुपरटेक ट्विन टावर के मामले से पहले 2012 में यादव सिंह नाम के चीफ इंजीनियर की गड़बड़ियां भी काफी चर्चित रहीं (देखें इंडिया टुडे की आवरण कथा: घोटालों का इंजीनियर, 17 दिसंबर, 2014). यादव सिंह ने आठ दिनों के भीतर 950 करोड़ रु. से ज्यादा के मेंटेनेंस के एग्रीमेंट कर लिए थे. बाद में उसे भी जेल जाना पड़ा और सीबीआइ जांच का सामना करना पड़ा.
दरअसल, दिल्ली-एनसीआर और मुंबई (एमएमआर या मुंबई मेट्रोपोलिटन रीजन) दो प्रॉपर्टी बाजार सबसे बड़े माने जाते हैं. देश भर के दो-तिहाई प्रोजेक्ट लॉन्च इन दोनों जगहों पर ही होते हैं. दोनों ही बाजारों में बहुत पैसा लगा हुआ है, इसलिए नियमों की जमकर धज्जियां उड़ाई जाती हैं. दो टावर्स के बीच फासला कम होने पर उन्हें ध्वस्त किए जाने के मामले में महाराष्ट्र रेरा के पूर्व चेयरमैन गौतम चटर्जी कहते हैं, ''इस मामले में नक्शे में ग्रीन एरिया बताया गया था.
प्रोजेक्ट में बदलाव के लिए रेरा से भी मंजूरी ली जाती है लेकिन यहां इसका पालन नहीं किया गया. मुंबई में आबादी का घनत्व ज्यादा होने के कारण कुछ छूट दी गई हैं. वहां तीन मीटर तक के फासले पर भी टावर बने हुए हैं. लेकिन वहां भी टावरों के बीच फासला बढ़ाने से लेकर वेंटिलेशन तक के मुद्दे पर एक्टिविस्ट अभियान चला रहे हैं.’’ बाबू-बिल्डर नेक्सस पर चटर्जी इतना ही कहते हैं, ''इस सेक्टर में दांव बहुत ऊंचे हैं इसलिए ट्रांसपैरेंसी होनी चाहिए. इस नेक्सस पर अंकुश के लिए लोगों को आगे आकर दबाव बनाना होगा.’’
रियल एस्टेट में चल रहे गुलगपाड़े को लेकर अरसे से सक्रिय मुंबई के भाजपा नेता किरीट सोमैया ने सुपरटेक ट्विन टावर गिराए जाने के बाद महाराष्ट्र सरकार को चिट्ठी लिखकर मुंबई में अवैध इमारतों का ऑडिट कराने की मांग की है. देश की आर्थिक राजधानी में हुए 31 मंजिला आदर्श सोसाइटी के घोटाले ने 2010 में देश भर में तहलका मचा दिया था.
इस मामले में शामिल कई नेताओं की चूलें हिल गई थीं और तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण को तो इस्तीफा देना पड़ा था. 2016 में हाइकोर्ट ने बिल्डिंग को अवैध ठहराते हुए इसे ढहाने का आदेश दिया लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी. फिलहाल इसे वैध ठहराने की कसरत चल रही है. इसमें बहुत रसूखदार लोगों ने फ्लैट खरीदे हैं.
रियल एस्टेट में भ्रष्टाचार तो खैर देश भर में है लेकिन देश की राजधानी की चौहद्दी में होने की वजह से दिल्ली-एनसीआर में यह कहीं ज्यादा सिर चढ़कर बोल रहा है. सुप्रीम कोर्ट में आम्रपाली, यूनिटेक, जेपी, रहेजा, लोढ़ा, पार्श्वनाथ, बीपीटी, डीएलएफ के पीड़ित खरीदारों के केस लड़ रहे सुप्रीम कोर्ट के वकील एम.एल. लाहौटी इसकी पुष्टि करते हैं, ''केस तो मैं बेंगलूरू, पुणे और दूसरे शहरों के भी लड़ रहा हूं लेकिन एनसीआर में तो बेइंतहां धांधली है.
आप कहीं से किसी भी प्रोजेक्ट को उठाकर देख लीजिए: बिल्डर, अफसर और नेता नेक्सस साफ दिख जाएगा. फर्क बस डिग्री का है: कोई डकैत है, कोई लुटेरा और कोई उठाइगीर. उनका गठजोड़ आपको पहले तो बिल्डर-बायर एग्रीमेंट में ही दिख जाएगा, जो बिल्डर के पक्ष में झुका होता है.’’ एग्रीमेंट में आम तौर पर शर्त होती है कि खरीदार अगर भुगतान में देरी करे तो उसके ऊपर 18 प्रतिशत से ज्यादा ब्याज लगेगा पर अगर बिल्डर वक्त पर फ्लैट बनाकर न दे तो वह महज एक फीसद के आसपास ब्याज देगा.
ज्यादातर प्रोजेक्ट्स में बिल्डर 36 महीने में फ्लैट देने का वादा करते हैं लेकिन हजारों केस ऐसे हैं जो आठ से 12 साल की देरी से चल रहे हैं. यानी शुरू में लुभाने के लिए तो कुछ इस तरह से पेश करेंगे कि जी, आपके घर में झिलझिल सितारों का आंगन होगा. पर खरीद लेने के बाद फ्लैट हासिल करने में उसे छटी का दूध याद दिला देते हैं.
और अब तो बिल्डरों ने पैसा दबाने का एक नया तरीका निकाल लिया है. गुड़गांव के मनीष गंभीर के वाकए इसे समझें जरा. उन्होंने नोएडा में लॉर्ड 79 शुभकामना नाम के प्रोजेक्ट में करीब 50 लाख रु. कीमत का फ्लैट बुक किया और 2015 तक वे 25 लाख रुपए भर चुके थे. इसके लिए उन्होंने 3.5 लाख रु. का कर्ज लिया था. 2012 से 2015 तक प्रोजेक्ट का काम लस्टम-पस्टम चलता रहा.
किंडल डेवलपर्स नाम की इसकी प्रमोटर कंपनी 2018 तक पैसे लेती रही. इस दौरान नोएडा अथॉरिटी तक शिकायत पहुंची तो उसने कानों में अच्छे ढंग से रुई लगा ली. और तभी किंोडल डेवलपर्स ने इस बिसात पर शातिराना चाल चलते हुए अपना वजीर का मोहरा एनसीएलटी यानी नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल में पहुंचा दिया. वहां उसने कहा कि उसे दिवालिया घोषित कर दिया जाय.
खरीदारों के तो होश फाख्ता! खैर, एकजुट होकर वे भी एनसीएलटी पहुंचे और कहा कि कंपनी नहीं बना पा रही तो यह प्रोजेक्ट उन्हें दे दिया जाए, ताकि वे खुद ही इसे बनवा लें. बिसात पर बारीकी से नजर गड़ाए नोएडा अथॉरिटी ने अब कानों से रुई निकालकर फेंकी, तेज कदमों से एनसीएलटी पहुंचा और अर्जी लगाकर कहा कि इस जमीन का तो उसने आवंटन ही 2015 में निरस्त कर दिया था. अब? 180 करोड़ रु. फंसा चुके खरीदार इधर-उधर भाग रहे हैं. बिल्डर पीयूष तिवारी इस साल जाकर गिरफ्तार हुआ है. लेकिन झिलमिल सितारों के वादों वाले उनके फ्लैटों का क्या?
बिल्डरों के इस खेल का लाहौटी और खुलासा करते हैं, ''असल में, ज्यादातर खरीदार बिल्डर की शिकायत करने नेशनल कंज्यूमर फोरम जाते हैं. पर अब एक नई चीज आ गई है इनसॉल्वेंसी ऐंड बैंकरप्सी कोड या दिवाला और दिवालियापन संहिता (आइबीसी).धोखाधड़ी से निकल भागने के कानूनी नुक्तों की लगातार तलाश करते बिल्डर सोची-समझी रणनीति के तहत दिवालिया होने की अर्जी के साथ एनसीएलटी में हाजिर हो जाता है.
आइबीसी की धारा 14 के तहत किसी कंपनी के दिवालिया होने की प्रक्रिया में जाने पर सुप्रीम कोर्ट को छोड़कर बाकी सभी अदालतों में चल रहे मुकदमों की कार्रवाई स्थगित हो जाती है.’’ इसी तरकीब के तहत नोएडा में ड्रीम प्रोकोन बिल्डर भी एनसीएलटी जा चुका है और उसके प्रोजेक्ट में सपनों का घर तलाशते 500 से ज्यादा खरीदार अब कोई राह नहीं तलाश पा रहे हैं.
फिर ट्विन टावर पर लौटते हैं. रेरा पर शहरी विकास मंत्रालय की एडवाइजरी काउंसिल के सदस्य और फाइट फॉर रेरा अभियान चलाकर उसे लागू कराने वाले अभय उपाध्याय यहां एक और सवाल उठाते हैं, ''नोएडा में इमारत नहीं, बिल्डर का ईगो भी जमींदोज हुआ. ठीक है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसकी कोई व्यवस्था नहीं दी कि आगे ऐसा न हो. उसके फैसले में सीधे-सीधे कुछ अफसरों की गर्दन पकड़ी जाती तो दूसरे प्राधिकरणों के लिए भी यह नजीर बनती. इसमें पर्दे के पीछे के किरदारों को सामने लाना जरूरी है.’’
और ट्विन टावर की तरह केस लड़ने में अगर 10 साल और लाखों रुपए लगेंगे तो कितने लोग कोर्ट जाएंगे. बिल्डरों के आसानी से लोन की रकम हजम कर जाने के मामले में भी उपाध्याय एक सूत्र देते हैं: ''पूरे देश में कोई भी रेगुलेटर बिल्डर का एकाउंट चेक नहीं करता, जिससे गड़बड़ी होने से पहले उसका पता नहीं चल पाता. दूसरे बिजनेस भी होते हैं लेकिन वहां इस लेवल का भ्रष्टाचार नहीं है जितना रियल एस्टेट में है.’’
इस कहानी में उस शख्स की दास्तान सुनना दिलचस्प होगा, जिसने सुपरटेक के भ्रष्टाचारी गुरूर को जमींदोज करवाने में अहम रोल निभाया. सुपरटेक एमराल्ड कोर्ट रेजिडेंट वेल्फेयर एसोसिएशन के प्रेसिडेंट और सीआरपीएफ के सेवानिवृत्त डीआइजी, 82 वर्षीय उदयभान सिंह तेवतिया बताते हैं कि ढहाए गए टावर उनके घर से 100 गज दूरी पर ही थे. 2006 में जब उन्होंने इसमें फ्लैट बुक किए थे तो बिल्डर ने चौड़े होकर कहा था कि यह नोएडा का सबसे पॉश अपार्टमेंट है.
यहां सबसे छोटे फ्लैट की कीमत भी 1 करोड़ रु. है. तेवतिया ने डेढ़ करोड़ रु. की कीमत वाला फ्लैट बुक किया, जो 2,800 वर्ग फुट का था. 2010 में उन्होंने पजेशन लिया तब पता चला कि जिन सुविधाओं का वादा किया गया था, वे तो वहां थी ही नहीं. बारिश में बेसमेंट पार्किंग में एक-एक फुट पानी भर जाता था. वे दो साल तक बहुत परेशान रहे. टावर का फाउंडेशन बनाने के लिए जब काफी गहरा गड्ढा खोदा गया तो तेवतिया ने बिल्डर से सवाल किया. जवाब मिला कि वह अलग प्लॉट है, उनका उससे कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए.
लेकिन रेजिडेंट्स को खटका हुआ कि तैयार टावर से महज 9 मीटर की दूरी पर कोई टावर कैसे बनेगा? पुलिस में शिकायत की गई, जांच हुई, आरोप सौ टका सही निकले. बिल्डर भी कम रसूख वाला न था. 2012 में उसने जांच रिपोर्ट ही दबवा दी. तेवतिया ने नोएडा अथॉरिटी से प्रोजेक्ट का नक्शा मांगा तो उन्हें मना कर दिया गया. उधर नया निर्माण चालू हो गया तो आने-जाने के रास्ते पर मलबा गिरने लगा. कई बार लोगों को चोटें आईं.
उन्होंने साल भर बाद इलाहाबाद हाइकोर्ट का रुख किया और वहां साफ कहा कि उनके पास कोई दस्तावेज नहीं हैं क्योंकि बिल्डर और अथॉरिटी दस्तावेज देने को तैयार नहीं. हाइकोर्ट ने अथॉरिटी को लताड़ा और याचिकाकर्ताओं को प्रोजेक्ट से जुड़े सारे दस्तावेज 15 दिनों में उपलब्ध कराने के आदेश दिए. पूरी कानूनी लड़ाई में 90 लाख रु. खर्च हुए जो कि रेजिडेंट्स ने आपस में चंदा करके जुटाए.
तेवतिया तंज कसते हैं, ''सबको मालूम है कि 2000 रु. प्रति गज के हिसाब से पैसा ऊपर तक जाता है. भ्रष्टाचार के लिए हमारा सिस्टम और सरकारें जिम्मेदार हैं.’’ इस मामले को खींचने में बिल्डर ने कोई कसर नहीं छोड़ी. सुपरटेक और नोएडा प्राधिकरण ने हाइकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की. बिल्डर ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि टावर नियमानुसार बना है. इसकी जांच करा ली जाए.
नेशनल बिल्डिंग कॉन्स्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन (एनबीसीसी) से प्रोजेक्ट की जांच कराई गई. उस मोड़ पर रेजिडेंट्स को लगा कि बिल्डर कहीं फिर से 'मैनेज’ न कर ले. पर ऐसा हुआ नहीं. एनबीसीसी ने निर्माण को पूरी तरह अवैध बताया. तेवतिया सुकून की सांस लेते हुए बताते हैं, ''अब ट्विन टावर की जमीन हमारे पास आ जाएगी और हम लोग तय करेंगे कि यहां क्या बने.’’
भारत में वैसे इससे पहले भी गैरकानूनी ढंग से बनी रिहाइशी इमारतें गिराई जाती रही हैं. केरल में अर्नाकुलम जिले के मराडू में जनवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट के ही आदेश पर चार लग्जरी अपार्टमेंट विस्फोटक लगाकर गिराए गए थे. वे समुद्र के किनारे हाइ टाइड (ज्वार) लाइन के नजदीक बनाए गए थे जबकि कोस्टल रेगुलेशन जोन (सीआरजेड) के नियमों के मुताबिक, समुद्र तट से 200 मीटर की दूरी तक निर्माण पर रोक है.
उससे भी पहले राजस्थान की राजधानी जयपुर में 2012 में 63 फ्लैट वाली तीन बहुमंजिला इमारतें राजस्थान हाइकोर्ट के आदेश पर विस्फोटक लगाकर तोड़ी गई थीं. इन्हें जयपुर के मानसरोवर में दृव्यवती नदी के बहाव क्षेत्र में बनाया गया था. एक निर्दलीय विधायक रणवीर पहलवान की एरा कंपनी ने इन इमारतों को शहर के अमानीशाह नाले को रिवर फ्रंट बताकर लोगों को बेचा था.
लेकिन लखनऊ में नजूल की जमीन पर बना यजदान अपार्टमेंट मानो अब भी कानून को मुंह चिढ़ा रहा है. उसे विस्फोट से उड़ाने की योजना बनाए पांच महीने हो गए हैं लेकिन अभी तक उस पर अमल नहीं हुआ. लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) को करीब 12,000 से ज्यादा बिल्डिंग में अवैध निर्माण की शिकायतें मिल चुकी हैं.
बीते तीन साल के भीतर इनमें से 400 इमारतों को तोड़ने का आदेश न्यायालय दे चुका है. लेकिन एकाध मकान गिराने के बाद अचानक कार्रवाई रुक गई. एलडीए के एक अफसर बताते हैं, ''अवैध निर्माण पर कार्रवाई शुरू होते ही अफसरों और नेताओं ने बिल्डरों की पैरवी शुरू कर दी.’’ एलडीए के सचिव पवन गंगवार बताते हैं, ''अवैध प्लॉटिंग को ढहाने का काम चल रहा है, जल्द ही अवैध निर्माण पर भी कार्रवाई की जाएगी.’’
कई बार प्राधिकरण या नगर निगम अवैध निर्माण को गिराना चाहते हैं लेकिन बाबू-बिल्डर-नेता गठजोड़ कानूनी दांवपेच से उसकी कोशिशों पर पानी फेर देता है. मुंबई की कैंपा कोला सोसाइटी भी अवैध निर्माण का ही एक चर्चित मामला था, जिसे बीएमसी ने ढहाना चाहा था लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी.
कोलकाता, बेंगलूरू, पुणे, हैदराबाद जैसे उभरते प्रॉपर्टी मार्केट में भी बिल्डरों की मनमानी चल रही है. पश्चिम बंगाल में जहां रेरा जमीन पर नहीं उतर पाया है, बिल्डरों को मनमानी की छूट मिली हुई है. यहां अपार्टमेंट में अपना मकान बेचने के लिए दो प्रतिशत ट्रांसफर फीस देने की शर्त बिल्डर-बायर एग्रीमेंट में लगा दी गई है. फीस देने के बाद अगर सौदा न हो तो खरीदार के लिए बिल्डर से फीस वापस लेना लगभग नामुमकिन है.
वैसे, सभी बिल्डर एक जैसे नहीं होते. दिल्ली की रियल एस्टेट डेवलपर फर्म त्रेहन आइरिस के डायरेक्टर अभिषेक त्रेहन कहते हैं, ''सुपरटेक के मामले में बिल्डर और अफसरों दोनों की गलती थी. इसमें नियमों का पालन नहीं किया गया. अफसरों ने नियमों के खिलाफ जाकर अनुमति दी.
इस जमीन के इस्तेमाल के बारे में आवंटियों की अनुमति नहीं ली गई. इससे उनकी क्वालिटी ऑफ लाइफ पर असर पड़ा.’’ अभिषेक कहते हैं कि अफसर हमेशा सही काम करने के लिए कहते हैं लेकिन इस मामले में अफसरों ने गलत काम क्यों किया इसका मुझे अंदाजा नहीं है. वे बताते हैं, ''एनसीआर के इतने हाइ मनी मार्केट में बिल्डर को ऐसी सजा देने का शायद यह पहला उदाहरण है.’’
देश में बिल्डरों की शीर्ष संस्था क्रेडाई ने नोएडा ट्विन टॉवर गिराए जाने के बाद बयान जारी कर कहा है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला नए भारत का प्रतीक है जिसमें बेहतर काम, गवर्नेंस और नियमों का पालन बुनियादी शर्त है. अच्छे डेवलपर्स नियमों के मुताबिक चलते हैं और जो नहीं चल रहे हैं उनके लिए यह एक सबक सीखने जैसा वाकया है.
देश का 74वां संविधान संशोधन स्थानीय स्वशासन और शहरों के आर्थिक, सामाजिक विकास की योजना बनाने तथा उसे लागू करने के लिए नगर निगमों, नगर पालिकाओं की स्थापना की बात कहता है. लेकिन राज्य सरकारों ने इस काम के लिए विकास प्राधिकरण बनाने और उनसे ये काम करवाने का निर्णय किया. अब विकास प्राधिकरण जनता के लिए और शहर की बेहतरी के हिसाब से योजना बनाने के बजाय राजनैतिक आकाओं की इच्छापूर्ति के लिए काम कर रहे हैं.
इस बात से जाने-माने वकील और राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा भी सहमत हैं. तन्खा कहते हैं, ''विकास प्राधिकरण शहर नियोजन, हरियाली जैसी चीजों के बारे में सोचने में असमर्थ हैं. कोई नयापन नहीं ला रहे हैं. स्मार्ट सिटी के नाम पर शहरों में कुछ चुनिंदा इलाकों में ही काम हो रहा है. इमेजिनेशन नाम की चीज नहीं है.
टाउन प्लानिंग में आजकल एक्सपर्ट इनपुट कम और पॉलिटिकल इनपुट ज्यादा होता है. सभी शहरों का यही हाल है. नगर निगम सिर्फ नालियों और सफाई का काम करते हैं. विकास प्राधिकरणों में बिल्डर, बाबू और नेताओं का नेक्सस काम कर रहा है. ये सब तय करते हैं कि मास्टर प्लान कैसे बनेगा. शहर की प्राथमिकताओं के हिसाब से मास्टर प्लान नहीं बनता. इसी वजह से ऊटपटांग निर्णय होते हैं.’’
सुपरटेक केस में सुप्रीम कोर्ट में न्याय मित्र रहे गौरव अग्रवाल कहते हैं, ''जो काम गलत हो रहा है, वह करप्शन से हो रहा है यह अनुमान है. सही तथ्य तो जांच से ही पता चलेगा. बिल्डिंग अवैध थी, इसे गिराने के अलावा कोई विकल्प नहीं था.’’
लेकिन अवैध बिल्डिंग बन कैसे जाती है? इस पर ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल, इंडिया के डायरेक्टर सुभाष चंद्र अग्रवाल कहते हैं, ''हमारे सिस्टम की एक कुरीति है कि बड़े अफसरों को नेताओं तक पैसा पहुंचाना होता है और बिना नेताओं की शह के इतनी बड़ी धांधली नहीं हो सकती. इस फैसले से भ्रष्ट लोगों में भय का माहौल बना है. बिल्डर यह कहकर सुप्रीम कोर्ट की तौहीन कर रहा है कि मैंने कोई गलत काम नहीं किया.
गलत काम हुआ है, तभी तो तोड़ा गया है. सोशल मीडिया पर मांग उठ रही है कि बिल्डर कंपनी के डायरेक्टरों और नोएडा के रिटायर्ड अफसरों को जेल में डाला जाए और उनसे उगलवाया जाए कि किस-किस को पैसा दिया गया है. उत्तर प्रदेश सरकार को सुपरटेक मामले में सख्त रुख अपनाना चाहिए. आरोपियों पर बुलडोजर पॉलिसी अपनानी चाहिए.’’
अग्रवाल बताते हैं कि रियल एस्टेट में भ्रष्टाचार गहरे पैठ गया है. वे अपने इलाके चांदनी चौक की मिसाल देते हैं. ''मेरे घर से लाल किला साफ नजर आता था लेकिन अब नहीं दिखता. भगीरथ पैलेस एक वक्त पॉश रिहायशी कॉलोनी थी लेकिन आज बमुश्किल ही कोई वहां रहता है. चांदनी चौक इलाका पूरा बिल्डरों और अफसरों की मिलीभगत के कारण इतना ज्यादा घना बस चुका है. यहां पर भी नियमों का जमकर उल्लंघन हुआ है.’’
इस भ्रष्टाचार की कीमत खरीदार और इलाके के लोगों को चुकानी पड़ती है. रियल एस्टेट में मकान की कीमत का कुछ प्रतिशत घूस में जाता है. अग्रवाल और वकील अश्विनी उपाध्याय का मोटा अनुमान है कि यह रकम 20 से 25 प्रतिशत होती है. यानी आप जो मकान खरीद रहे हैं उसके मूल्य में 20 प्रतिशत रिश्वत का पैसा जुड़ा हुआ है.
लेकिन लोन पर मकान लेने वालों की मुश्किल बहुत ज्यादा है. शालीमार बाग के रहने वाले 40 साल के मनीष पांडे इंजीनियर हैं और उन्होंने ग्रेटर नोएडा वेस्ट के मैस्कॉट मनोरथ में 2015 में 2,800 वर्ग फुट का फ्लैट 95 लाख रुपए में बुक किया. उसके लिए 70 लाख रु. का लोन लिया तो 20 साल के लिए 60 हजार रु. की ईएमआइ बनी.
अभी तक ग्राउंड पर मात्र 50 प्रतिशत काम हुआ है. काम लगभग ठप चल रहा है और मकान मिलने की उम्मीद बहुत क्षीण है. उन्होंने अब ईएमआइ देना बंद कर दिया है. बैंक ने आरसी (रिवॉल्विंग क्रेडिट) निकाल दी है और अब वे हाइकोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं. दरअसल, बिल्डर खरीदारों से पैसा उगाहने के बाद चंपत हो जाते हैं या फिर खुद को दिवालिया घोषित कर देते हैं.
नोएडा तो जैसे रियल एस्टेट गबन का गढ़ बन चुका है. आम्रपाली में 11,000 करोड़ रु. का तो यूनिटेक में करीब 4,000 करोड़ रु. का गबन है. आम्रपाली के फोरेंसिक ऑडिट में पता चला कि उसने जेपी मॉर्गन के जरिए पैसा विदेश भेजा. साथ ही यहां भी संपत्तियां खरीदीं लेकिन उसकी नीलामी से वसूली करना कोर्ट के लिए भी टेढ़ी खीर है. लाहौटी बताते हैं कि आम्रपाली से वसूली की रकम का 25 प्रतिशत भी अभी नहीं उगाहा गया है. उसके मामले में 180 से ज्यादा सुनवाइयां सुप्रीम कोर्ट में हो चुकी हैं.
बिल्डर से लड़ना फ्लैट मालिकों के लिए बहुत मुश्किल है. सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी उपाध्याय कहते हैं कि ट्विन टावर का मामला मिसाल है कि रियल एस्टेट में भ्रष्टाचार कितना गहरा है. बहरहाल, प्रॉपइक्विटी.इन और एनॉराक की रिपोर्ट के मुताबिक, देश के 44 शहरों में 5.23 लाख यूनिट मकान के प्रोजेक्ट औसतन 56 महीनों से ठप चल रहे हैं जबकि तय समय से 28 महीने के औसत विलंब से इन शहरों की 11.13 लाख इकाइयों के प्रोजेक्ट चल रहे हैं. एनॉराक की रिपोर्ट कहती है कि अकेले नोएडा और ग्रेटर नोएडा में ही 1.65 लाख फ्लैट का निर्माण तय समय से लेट हो चुका है.
हर प्रोजेक्ट के साथ अलग तरह की समस्याएं हैं. ज्यादातर लेट हुए फ्लैट रेरा से पहले के हैं. रेरा के दायरे से बाहर रहने वाले छोटे बिल्डर जो एक प्लॉट पर कई घर बनाकर बेच रहे हैं, उनके खिलाफ शिकायत विकास प्राधिकरण या संबंधित स्थानीय निकाय से लेकर जिला प्रशासन और राज्य सरकार के संबंधित विभाग में की जा सकती है. हालांकि असली सवाल यह है कि इस गोरखधंधे और खुल्लमखुल्ला लूट कब और कैसे रोक लगेगी?