आवरण कथाः जरूरत है एक अदद वॉर रूम की

कोविड के खिलाफ लड़ाई में यह बात साफ हुई कि हम इसमें टेक्नॉलोजी का कोई कारगर राष्ट्रीय समाधान न खोज सके.

कमान यहां से मुंबई के एक कोविड वार रूम में डॉन्न्टर और मेडिकल छात्र लोगों की कॉल लेते हुए
कमान यहां से मुंबई के एक कोविड वार रूम में डॉन्न्टर और मेडिकल छात्र लोगों की कॉल लेते हुए

कल्पना करें कि एक ओला या उबर ऐप जिसमें पूरे शहर में कारें दिख रही हैं पर उनमें से कोई भी विकल्प आपके पास नहीं, कोई भुगतान गेटवे और कोई एनालिटिक्स भी आपके लिए नहीं. यह प्रणाली काम करेगी? नहीं. यही कोविड की दूसरी लहर की परिभाषा है जिसमें अराजकता की स्थिति बन गई है. बेड, ऑक्सीजन और गहन देखभाल सुविधाओं की तलाश कर रहे रोगियों ने अस्पतालों को घेर लिया है.

राज्यों के कोविड कॉल सेंटरों में कॉल की बाढ़ है. कॉल सेंटरों से अस्पतालों को निर्देशित कई रोगियों ने पाया कि कोई बिस्तर उपलब्ध नहीं. अस्पताल के बिस्तरों के आवंटन और दवाओं और ऑक्सीजन सिलेंडरों की कालाबाजारी में भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद की खबरें आई हैं.

दूसरी लहर से सबसे ज्यादा प्रभावित शहर दिल्ली में राज्य सरकार ने 4 मई को एक हेल्पलाइन स्थापित की—ऑक्सीजन की कमी और अस्पतालों में बिस्तर को लेकर गंभीर संकट के लगभग दो सप्ताह बाद. हाइ कोर्ट की बेंच को दिल्ली सरकार को यह सुझाव देना पड़ा कि एक मोबाइल ऐप विकसित किया जाए जहां लोग विवरण अपलोड कर सकें और डॉक्टरों का एक समूह परामर्श दे सके.

SARS-CoV-2 वायरस न तो केंद्र और राज्य सरकार के बीच राजनैतिक सीमाओं की हद मानेगा और न ही भारत की संघीय संरचना की दोहरी राजनीति की बंदिशें, जहां स्वास्थ्य एक राज्य का विषय है. एक एकीकृत कमान संरचना स्पष्ट रूप से समय की आवश्यकता थी. फिर भी न तो राज्य सरकारों और न ही केंद्र ने महामारी की दो लहरों के बीच अंतराल का इस्तेमाल एक राष्ट्रव्यापी आपदा प्रबंधन प्रणाली स्थापित करने के लिए किया, जो अस्पतालों में पहुंच रहे बीमार लोगों को भीड़ का प्रबंधन कर सके या डॉक्टरों के एक पूल का निर्माण कर सके जो दूर से मरीजों की निगरानी कर सकें.

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत केंद्रीय निगरानी नियंत्रण इकाई से जुड़े नोड्स के साथ प्रत्येक राज्य में एक केंद्रीकृत प्रौद्योगिकी आधारित वास्तविक समय सूचना प्रसार प्रणाली, संभवत: एक आदर्श समाधान होगा. हालांकि यह सबसे बड़ी समस्या—अस्पताल के बेड और ऑक्सीजन की कमी—को हल तो नहीं करेगा फिर भी यह इन दुर्लभ संसाधनों के प्रवाह को सुव्यवस्थित करने और हेराफेरी को रोकने में मदद करेगा. इसके बजाय हमारे पास क्या है—सिचुएशन रूक्वस, कॉल सेंटर और मंत्रालय, विभागों और राज्य की राजधानियों में कमरे में बैठे अधिकारियों के सामने बने डैशबोर्ड.

अप्रैल की शुरुआत में, जैसे ही कोविड-19 मामलों ने आसमान छूना शुरू किया, उद्योग और आंतरिक व्यापार को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न राज्यों में डिलीवरी तक जीपीएस-टैग किए गए ऑक्सीजन ट्रकों की आवाजाही की निगरानी के लिए 24&7 नियंत्रण कक्ष स्थापित किया गया. विवरण में ट्रक का पंजीकरण नंबर, चालक का नाम और संपर्क विवरण, आरंभ समय, आगमन का अनुमानित समय और यदि कोई हो तो शामिल हैं.

28 अप्रैल को उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने आइटी-सक्षम प्रणाली की मदद ली जिससे वह ऑक्सीजन के अपने कोटे की आवाजाही को को ट्रैक करती है. यूपी ने जिला मजिस्ट्रेटों के अधीन जिला स्तरीय मांग और आपूर्ति निगरानी युद्ध कक्ष स्थापित किए हैं. वॉर रूक्वस अस्पतालों और घरों में ऑक्सीजन की आवश्यकताओं के साथ-साथ महत्वपूर्ण दवाओं, प्लाज्मा और एम्बुलेंस की आवश्यकता की निगरानी करते हैं. चुनौती जनता के बीच जागरूकता की कमी की है और तथ्य यह है कि इन सेट अप्स से अपर्याप्त सूचनाएं मिल रही हैं.

पंजाब में कोविड रोगियों के एक डेटाबेस के साथ एक नियंत्रण कक्ष है और उन्हें दवाओं, खाद्य सहायता और चौबीसों घंटे सलाह देने के लिए दरवाजे पर डिलीवरी प्रदान करता है. कर्नाटक में एक वार रूम है जो सरकारी और निजी अस्पतालों में ऑक्सीजन और महत्वपूर्ण दवाओं की मांग और आपूर्ति पर नजर रखता है.

पिछले साल अप्रैल में, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक डिजिटल डैशबोर्ड स्थापित किया, जो देश भर में महामारी हॉटस्पॉट, विभिन्न एजेंसियों के बीच लॉकडाउन प्रोटोकॉल और समन्वय दिखा रहा है. डैशबोर्ड को कम से कम 20 शहरों में दोहराया गया है. ये, हालांकि, बी 2 बी समाधान हैं—ऐसे डैशबोर्ड और कॉल सेंटर के लिए चुनौती उन लोगों से जुडऩा है जिन्हें वास्तव में मदद की आवश्यकता है.

टेली-मेडिसिन का उपयोग करने वाला एक एकीकृत पैन-इंडिया डेटाबेस अस्पतालों में कुछ अराजकता को खत्म करने में उपयोगी साबित होगा. डॉक्टरों ने रोगियों को दूर से स्कैन किया होगा और अंदाजा लगाया होगा कि उन्हें एक शारीरिक जांच और अस्पताल में भर्ती होने या घरेलू संगरोध की आवश्यकता है. एआई-संचालित बॉट्स केंद्रीय डेटाबेस में सूचनाएं देने और आवश्यकताओं के साथ उपलब्ध संसाधनों से मेल खाने के लिए सोशल मीडिया पर उपलब्ध जानकारी के माध्यम से सूचनाएं एकत्र करने में मदद कर सकते थे.

यह राज्यों को जियोटैग्ड ऑक्सीजन ट्रकों की आवाजाही की निगरानी करने या ऑक्सीजन पुनर्वितरण और दवाओं जैसे पुनर्वितरण संसाधनों की मदद करने और स्वास्थ्य पेशेवरों को स्थानांतरित करने की अनुमति देगा. थिएटर कमान की सैन्य अवधारणा से सीखते हुए सभी संसाधनों को थिएटर कमांडर के अधीन किया जा सकता हैं.

इस तरह के सिस्टम स्थापित करना भारत के आइटी-आइटीइएस क्षेत्र के लिए बहुत मामूली टास्क होंगे, जो कि वित्त वर्ष 2021 में $ 194 बिलियन (14 लाख करोड़ रुपये) के राजस्व को छूने को तैयार है. भारतीय आईटी फर्मों ने इन्फोसिस के पूरी तरह से स्वचालित वैश्विक बैंकिंग प्रक्रियाएं फिनेक्ल जैसे जटिल समाधान या टीसीएस की पासपोर्ट सेवा परियोजना जिसने पूरे देश में पासपोर्ट के वितरण को सुव्यवस्थित किया, जैसे समाधान तैयार किए हैं. 

इस तरह के सॉफ्टवेयर-संचालित समाधानों के अभाव में, उस तरह के कॉल सेंटर बनाए जा सकते हैं जैसे बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) ने स्थापित किए हैं. बीएमसी प्रमुख आइ.एस. चहल के दिमाग की उपज यह मॉडल जिसे दो चरणों (मई 2020 और अप्रैल 2021) में स्थापित किया गया, यह जांचने से कि क्या रोगी को बेड के आवंटन के लिए अस्पताल में भर्ती की आवश्यकता है से लेकर कोविड प्रबंधन के हर पहलू से संबंधित है. ये केंद्र 36 बीएमसी जोन में संचालित होते हैं. प्रत्येक जोन कम से कम दो उपनगरों को संभालता है, जिसमें संयुक्त रूप से पांच लाख आबादी है. 

विशेषज्ञों का कहना है कि राज्यों के पास जो व्यवस्था है उन्हें बीपीओ केंद्र कहा जा सकता है, न कि वॉर रूम. उनके पास एक वास्तविक समय सूचना प्रसार प्रणाली (RIDS) का अभाव है. एक बीपीओ कॉल सेंटर संकट में थोड़ा मददगार भर हो सकता है जबकि एक स्वचालित प्रणाली चीजों को कुशलता से संभाल लेगी. बेंगलूरू स्थित क्यूगेट्स टेक्नॉलोजी द्वारा विकसित इस तरह के एक RIDS, कोविड स्वास्थ्य संबंधी आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति की निगरानी के लिए एक वास्तविक समय डिजिटल निगरानी तंत्र का प्रस्ताव करता है. क्यूगेट्स के सीईओ एस. सुधाकरन, कहते हैं, ''इस तरह की प्रणाली में क्षैतिज (क्षमता और पहुंच) और लंबवत (सेवाओं) दोनों तरह से विस्तृत करने की क्षमता होती है.            

क्या करने की जरूरत 

आपदा का प्रबंधन करने वाली एक रियल-टाइम प्रणाली लागू की जाए

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय में एक राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन नियंत्रण कक्ष बने जो मंत्रालयों को जोड़ता हो और जिसके शहरों में नोड्स हों

ऑक्सीजन सिलेंडर जैसे संसाधनों की क्रस्नढ्ढष्ठ टैगिंग, ऑन्न्सीजन ट्रकों की जियोटैगिंग/ ट्रैकिंग हो.

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