आवरण कथाः ऑक्सीजन की आपूर्ति में भयंकर भूलें
एकांगी सोच वाली सरकार कोविड 1.0 से यह अहम सीख नहीं ले पाई कि भारत को मेडिकल ऑक्सीजन की युद्धस्तर पर जरूरत है.

कोविड-19 महामारी की पहली लहर से चिकित्सा संस्थानों के लिए सबसे बड़ा सबक यह था कि गंभीर रूप से बीमार रोगियों के इलाज के लिए वेंटिलेटर और आइसीयू बेड से अधिक जरूरी है, अस्पतालों में ऑक्सीजन की पर्याप्त आपूर्ति बनी रहे.
बहरहाल, जब इस वर्ष की शुरुआत में महामारी की दूसरी लहर आई तो भारत का चिकित्सा ऑक्सीजन आपूर्ति नेटवर्क ध्वस्त हो गया. इस विफलता के लिए कई कारण थे, उनमें से पहली वजह ऑक्सीजन की मांग में भारी वृद्धि रही क्योंकि मामले तेजी से बढ़े थे. हालांकि उत्पादन फरवरी में 700 मीट्रिक टन (एमटी) से बढ़कर 9,000 मीट्रिक टन रोजाना हो गया लेकिन भारत अब भी मांग पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहा है क्योंकि 25 अप्रैल के बाद से रोज 3,00,000 से ज्यादा मामले आ रहे हैं.
27 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में दिए केंद्र के हलफनामे में छह राज्यों—महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और तमिलनाडु—में रोज लगभग 1,765 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की संचयी किल्लत का अनुमान लगाया गया था. एक शीर्ष चिकित्सा पेशेवर ऑक्सीजन की अग्रिम आपूर्ति की व्यवस्था करने में विफल केंद्र की इस विफलता को ''सत्ता के शिखर पर बैठे लोगों की लापरवाही’’ के रूप में बताते हैं.
अपर्याप्त उत्पादन, लॉजिस्टिक्स की बाधाएं, परिवहन की समस्याएं और अंतिम छोर पर वितरण जैसी कई परेशानियों ने इस संकट को बढ़ाया है. मसलन, भारत की प्रमुख ऑक्सीजन उत्पादन सुविधाएं देश के पूर्व में स्थित हैं, जहां से पूरे देश में आपूर्ति की जाती है. समस्याओं में ट्रक, क्रायोजेनिक कंटेनर और यहां तक कि पोर्टेबल सिलेंडर की कमी शामिल है.
हालांकि इन समस्याओं की जानकारी पहले से ही अच्छी तरह थी—और पिछले साल अक्तूबर में पहली लहर के अंत और इस साल मार्च की शुरुआत में दूसरी लहर के आने के दौरान निबटा जा सकता था—अधिकारियों ने आपूर्ति नेटवर्क को सुधारने की योजना यह मानते हुए टाल दी कि कोविड-19 संकट खत्म हो चुका है. पिछले अक्तूबर में केंद्र ने देश भर में 162 ऑक्सीजन उत्पादन संयंत्रों की स्थापना के लिए निविदा जारी की, पर जब तक दूसरी लहर आई, इनमें से केवल 30 ही चालू थीं.
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा मेडिकल ऑक्सीजन के वॉर रिजर्व का निर्माण करने में विफलता के कारण सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है. पिछले साल के अंत में यह चेतावनी दी गई थी कि सर्दियों में मामलों में वृद्धि हो सकती है. मंत्रालय ने घोषणा की थी कि वह मेडिकल ऑक्सीजन का इतना बफर स्टॉक बनाएगा, जो कम से कम एक महीने तक चले.
14 अक्तूबर को, मंत्रालय के तिरुवनंतपुरम-स्थित सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम एचएलएल लाइफकेयर ने 1,00,000 मीट्रिक टन मेडिकल ऑक्सीजन की आपूर्ति के लिए एक वैश्विक निविदा जारी की. निविदा में 90 दिनों तक रुक-रुककर आपूर्ति की बात थी लेकिन 15,000 मीट्रिक टन की पहली शिपमेंट ऑर्डर जारी किए जाने के एक महीने बाद मिलने की उम्मीद थी और उसके हर 10 दिनों के बाद नई शिपमेंट.
यहां तक कि अगर ऑर्डर दिसंबर में दिया गया था, तो भी इससे भारत को मार्च 2021 तक पर्याप्त स्टॉक बनाने की अनुमति मिल जाती, जिसने अल्पावधि में रोगियों और उत्पादकों दोनों के लिए महत्वपूर्ण गुंजाइश बनाई होती. उद्योग के विशेषज्ञों का अनुमान है कि सरकार को इस स्टॉक निर्माण के लिए लगभग 100 करोड़ रुपये देने थे- तरल मेडिकल ऑक्सीजन की लागत लगभग 11,000 रुपए प्रति मीट्रिक टन है, जिसमें परिवहन या ऑक्सीजन टैंक की लागत शामिल नहीं है.
हालांकि, एचएलएल के एक अधिकारी के अनुसार, बोलीदाताओं के बोली लगाने के बाद निविदा रद्द कर दी गई थी क्योंकि उनके द्वारा मांगी गई रकम उससे अधिक थी जो सरकार भुगतान करने के लिए तैयार थी. मंत्रालय की नींद देर से खुली और लागत की परवाह किए बिना इस तरह के भंडार को बनाने की अपरिहार्य आवश्यकता उसे केवल अप्रैल के मध्य में समझ आई, जब कोविड-19 मामलों में जबरदस्त उछाल आ चुका था.
16 अप्रैल को एचएलएल लाइफकेयर ने 50,000 मीट्रिक टन मेडिकल ऑक्सीजन के लिए एक नया टेंडर जारी किया, लेकिन अब तक इसकी आपूर्ति के लिए ऑर्डर नहीं दिया गया है. (प्रेस में जाने तक इस विषय पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन और स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अधिकारियों को जो सवाल भेजे गए थे, उन्होंने जवाब नहीं दिए.)
अप्रैल के अंत में जब संकट गहरा गया, भारत ने चिकित्सा उद्देश्यों के लिए उपलब्ध आपूर्ति बढ़ाने को ऑक्सीजन के औद्योगिक उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया. यह सिद्धांत में एक अच्छा कदम था पर खराब कार्यान्वयन ने और परेशानी पैदा की है. संक्षेप में, हालांकि प्रतिबंध ने विशिष्ट उद्योगों को छूट दी है जो चिकित्सा उपयोग से संबंधित हैं—जैसे कि ऑक्सीजन टैंक के निर्माता—मीडिया रिपोर्ट कहती हैं कि गुजरात में बड़े उत्पादकों सहित कई उत्पादकों को उत्पादन रोकने के लिए मजबूर किया गया है.
हालांकि यह सीधे ऑक्सीजन की उपलब्धता को प्रभावित नहीं करता लेकिन यह बाजार में सिलेंडर की आपूर्ति को कम करता है, जिससे परोक्ष रूप से स्थिति बिगड़ती जा रही है.
कई देशों ने ऑक्सीजन कंसंट्रेटर्स से लेकर सिलेंडर तक बहुत जरूरी राहत सामग्री भेजी है. 3 मई को केंद्र ने कहा कि वह ऑक्सीजन का उत्पादन करने के लिए लगभग 37 मौजूदा नाइट्रोजन संयंत्रों को परिवर्तित करने की व्यवहार्यता की जांच कर रहा था. इन प्लांट्स को या तो पास के अस्पतालों में स्थानांतरित किया जा सकता है या टैंकरों से ऑक्सीजन की आपूर्ति की जा सकती है
क्या करने की जरूरत
अस्पतालों में ऑक्सीजन भंडारण क्षमता को अतिरिक्त भंडारण टैंक के माध्यम से बढ़ाने की जरूरत है. इससे हल्के कोविड मामलों में घरेलू उपचार को जनता के उपयोग के लिए सिलिंडर भी फ्री होंगे, जिससे अस्पतालों पर भार भी कम होगा.
ऑक्सीजन का उत्पादन करने के लिए मौजूदा नाइट्रोजन संयंत्रों को परिवर्तित करने की व्यवहार्यता का पता लगाएं. सरकारी सूत्रों का कहना है कि इस पर पहले से काम चल रहा है
नए ऑक्सीजन संयंत्रों को युद्धस्तर पर स्थापित किया जाना चाहिए, जिसमें बड़े निवेश की आवश्यकता होगी. लेकिन यह दीर्घकालिक महत्वपूर्ण संसाधन है.