आवरण कथाः मुश्किल दौर बीत गया क्या?
कोविड का ग्राफ भले गिर रहा हो और इसके टीके खुशी की वजह हों, लेकिन संक्रमण की नई लहर का खतरा तथा वायरस के नए ज्यादा घातक रूपों का उभरना बताता है कि महामारी अब भी हमारे बीच मौजूद है.

अग्रिम मोर्चे की सुरक्षा दिल्ली में चाचा नेहरू अस्पताल में कोविड का टीका लगवाते दिल्ली पुलिस के एसआइ राजेश चौहान
सोनाली आचार्जी
भारत अब जब 24 मार्च 2020 को पहले लॉकडाउन में जाने के करीब एक साल बाद, अनलॉक 9 में प्रवेश कर रहा है और अपने सिनेमाहॉल, मॉल और स्वीमिंग पूल फिर खोल रहा है, तब यह पूछने का सही वक्त है कि कोविड-19 के खिलाफ के जंग में हम कहां खड़े हैं. सरकारी आंकड़े जरूर उत्साह बढ़ाने वाले दिखाई देते हैं. स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में 9 फरवरी को 24 घंटों में 9,000 से भी कम नए मामले दर्ज हुए.
यह नवंबर में दर्ज 90,000 दैनिक मामलों के मुकाबले जबरदस्त गिरावट है. भारत में कुल मामले अब 1.08 करोड़ और मौतें 1,55,195 पर पहुंच गई हैं. इसकी तुलना अमेरिका मे 9 फरवरी को 2.7 करोड़ मामलों और 4,65,000 मौतों से कीजिए. यही नहीं, वह महज 32 करोड़ लोगों का देश है. प्रति व्यक्ति आधार पर अमेरिका में संक्रमणों की संख्या भारत के मुकाबले 12 गुना थी.
बेशक कई लोग भारत के कोविड से जुड़े सरकारी आंकड़ों की सच्चाई पर शक करते हैं और मामले तथा मौतें कम बताए जाने का हवाला देते हैं. दूसरे लोग कोविड के कम आंकड़ों की वजह लक्षणविहीन और इसलिए जांच से नहीं गुजरे लोगों को बताते हैं. तिस पर भी आम सर्वानुमति यह है कि भारत ने अमेरिका और कुछ यूरोपीय देशों के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया है और अब इसका कोविड का ग्राफ उतार पर है.
जाने-माने वायरोलॉजिस्ट जैकब जॉन कहते हैं, ‘‘वायरस भारत में अपनी मियाद पूरी कर चुका है और महामारी अब स्वाभाविक रूप से नीचे आती मालूम देती है.’’ अगर हम मान भी लें कि सरकारी आंकड़े महामारी की असल तस्वीर बयान नहीं करते, तब भी तथ्य यही है कि स्वास्थ्य का हमारा बुनियादी ढांचा बहुत ज्यादा बोझ से दबा मालूम नहीं देता और यह बताता है कि संकट शायद उतना गंभीर नहीं है जितना दूसरे देशों में है. दिल्ली के लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज के डायरेक्टर डॉ एन.एन. माथुर बताते हैं, ''हम अस्पताल में भर्ती होने की वैसी मांग नहीं देख रहे हैं जैसी पिछले साल थी. जो लोग आ भी रहे हैं वे या तो बुजुर्ग हैं या दूसरी बीमारियों से भी ग्रस्त लोग हैं.’’
दो महीने पहले राजधानी के निजी अस्पतालों से कहा गया था कि बढ़ती कमी को पूरा करने के लिए वे अपने 80 फीसद बिस्तर कोविड के मरीजों के लिए अलग रखें. आज उनसे केवल 25 फीसद बिस्तर अलग रखने के लिए कहा जा रहा है, और तो भी शहर में 6,000 से ज्यादा बिस्तर उपलब्ध हैं.
मामलों और मौतों की घटती तादाद या तो हर्ड इम्यूनिटी यानी सामूहिक रोग प्रतिरोधक क्षमता या सरकार के कोविड प्रबंधन की कामयाबी का संकेत है, और उसके साथ 16 जनवरी से कोविड के टीके लगाने के कार्यक्रम की शुरुआत ने उम्मीद जगाई है कि शायद भारत कोविड के संकट से पार पा चुका है. लोग मास्क पहनने और शारीरिक दूरी रखने के नियमों में जिस तरह ढिलाई बरत रहे हैं और कामकाज सामान्य होने लगा है, उससे भी यह जाहिर है.
लेकिन दूसरी लहर का खतरा कायम है, जैसा कि कुछ यूरोपीय देशों में हुआ है. सार्वजनिक यातायात और बड़े जमावड़ों की मंजूरी मिलते ही मुंबई में 10 फरवरी से 14 फरवरी के बीच मामलों में (फरवरी की शुरुआती 9 दिन के मुकाबले) 39 फीसद का उछाल आया है. केरल और दिल्ली में, जहां जुलाई तक कोविड का ग्राफ सपाट हो चुका था, नवंबर में जबरदस्त उछाल आता दिखा. मुंबई के जसलोक अस्पताल में संक्रामक रोग विभाग के प्रमुख डॉ. ओम श्रीवास्तव कहते हैं, ‘‘यह बेहद संक्रामक, चतुर वायरस है. जैसे ही आपने सतर्कता में ढिलाई की, यह फिर उठ खड़ा होगा.’’
अब जब जिम, स्वीमिंग पूल, सिनेमा हॉल, मॉल, दफ्तर और यहां तक कि स्कूल भी खुल रहे हैं, ऐसे में जन स्वास्थ्य विशेषज्ञों के सामने सबसे बड़ी चुनौती वायरस को फैलने से रोकना है. वायरस के नए रूप, जो ब्रिटेन, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील में सामने आए हैं, नई ताकत के साथ कहीं ज्यादा घातक प्रकोप का खतरा पैदा कर रहे हैं. टीकों ने जो उम्मीदें पैदा की हैं, उन्हें आजमाया जाना अभी बाकी है, क्योंकि उनके असर को लेकर पर्याप्त डेटा मौजूद नहीं है और यह भी नहीं पता है कि वे (खासकर ज्यादा नए रूपों के खिलाफ) कितने लंबे वक्त तक सुरक्षा देती हैं. बहुत सारे लोगों में टीके के प्रति हिचकिचाहट की तो बात ही क्या करें.
अब जब भारत कोविड ग्राफ की एक अहम कगार पर है, उसे यह जरूर पक्का करना चाहिए कि महामारी के इस अगले दौर को इतनी एहतियात से संभाले कि इसकी वापसी को रोका जा सके. हमें न केवल अपनी स्थिति का सच्चा आकलन करने की जरूरत है, बल्कि हमें महामारी के खिलाफ सतर्कता बनाए रखते हुए दूसरे देशों के अनुभव से भी सीखना चाहिए.
भारत कोविड के बदतरीन नतीजों से बच गया है?
सेरोलॉजी के सर्वेक्षण संक्रमण के फैलाव का आकलन करने में लंबे समय से शोधकर्ताओं की मदद करते आए हैं. उन्होंने यह जानने में भी मदद की है कि किसी आबादी के बड़े हिस्से ने प्रतिरोधक क्षमता हासिल कर ली है या नहीं. इसके लिए तयशुदा लोगों के खून के नमूनों की जांच करके ऐंटीबॉडी का पता लगाया जाता है, जिससे फिर संकेत मिलता है कि संक्रमण किस हद तक मौजूद है.
भारत में बायोमेडिकल अनुसंधान की शीर्ष संस्था भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) ने मार्च 2020 में महामारी की शुरुआत के बाद तीन राष्ट्रीय सेरोलॉजी सर्वेक्षण किए हैं. इनमें से मई में हुए पहले सर्वे से यह पता चला था कि 0.73 फीसद भारतीय इस वायरस के संपर्क में आए थे, वहीं सितंबर 2020 में यह आंकड़ा बढ़कर 7 फीसद पर पहुंच गया था और 7 फरवरी को जारी सर्वे के नवीनतम संस्करण के मुताबिक अब यह 21 फीसद है. इसका मतलब है कि हर पांच में से एक भारतीय इस वायरस के संपर्क में आ चुका है.
बेशक क्षेत्रीय भिन्नताएं मौजूद हैं और हर्ड इम्यूनिटी के सिद्धांत की जांच के लिए यह काफी नहीं है, पर सेरो सर्वे से इतना तो पता चलता ही है कि बहुत सारे अन्य लोग (2.08 करोड़) संक्रमित हुए थे पर उन्होंने जांच नहीं करवाई क्योंकि उनमें कोई लक्षण दिखाई नहीं दिए. इसके नतीजतन कोविड के मामलों का सरकार आंकड़ा 1.09 करोड़ तक सीमित है.
तो भी, जैसा कि दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया बताते हैं, ''सेरो सर्वे के नतीजे भारत में महामारी के स्वरूप को समझने के लिए बेहद अहम हैं. वे बताते हैं कि भारत में बड़ी संख्या में मामले हल्के और ज्यादातर बगैर लक्षणों वाले थे.’’ वे इसकी वजह किसी किस्म की ‘भीतर छिपी रोग प्रतिरोधक क्षमता’ बताते हैं. माना जा रहा है कि साफ-सफाई की खराब स्थितियों और बहुत सारे पैथोजन के संपर्क में आने के कारण निम्न और मध्यम आमदनी वाले देशों में, जिनमें भारत भी है, कोविड के गंभीर प्रभावों की कम संभावना है.
कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश के डॉ. राजेंद्र प्रसाद सरकारी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल का एक अध्ययन बताता है कि प्रति व्यक्ति कोविड मौत उन देशों में कम हैं जहां लोग कई अलग-अलग किस्म के माइक्रोब और बैक्टीरिया के संपर्क में आए हैं. डॉ. गुलेरिया कहते हैं, ‘‘ज्यादातर दक्षिणपूर्व एशिया में कोविड के खिलाफ किसी किस्म की इम्यूनिटी है जो पश्चिमी दुनिया में नहीं है.’’ दूसरे लोग मानते हैं कि भारत की युवा जनसांख्यिकी—उसकी आधी आबादी 25 की उम्र से कम है और इसलिए वायरस के विरुद्ध उनकी रोग प्रतिरोधक प्रतिक्रिया कहीं ज्यादा मजबूत है—ने इसमें कुछ भूमिका निभाई है.
फिर भी बगैर लक्षण वाले लोगों के संक्रमण के वाहक होने की संभावना को खारिज नहीं किया जा सकता. नौजवान और सामाजिक तौर पर गतिशील समूह बनिस्बतन हल्के लक्षणों के साथ खुद तो जरूर बच निकल सकते हैं, लेकिन वे बुजुर्गों और पहले से ही बीमारियों से ग्रस्त लोगों सरीखे ज्यादा कमजोर समूहों को संक्रमित कर सकते हैं, जिन्हें हो सकता है कि फिर ज्यादा गंभीर नतीजे भुगतने पड़ें.
असल में, कई अध्ययन निर्णायक प्रमाण पेश करते हैं कि भारत और विदेशों में बुजुर्गों तथा दूसरी बीमारियों से घिरे लोगों को कोविड का खतरा बना हुआ है. स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में कोविड से मरने वाले 88 फीसद जितनी बड़ी तादाद में लोग, या हर 10 में से 8 भारतीय कोविड मृतक, 45 साल से ऊपर के थे और इन मरने वाले में 70 फीसद दूसरी बीमारियों से ग्रस्त थे.
अलबत्ता भारत में वायरस से वाकई संक्रमित होने वालों के मामले में ये आंकड़े बिल्कुल उलट हैं—कोविड से संक्रमित पाए गए हर 10 में से केवल चार लोग 45 से ऊपर थे. यह अमेरिका के देखे गए रुझान के अनुरूप ही है, जहां मरने वालों में 97 फीसद 45 साल से ऊपर के थे, पर संक्रमित होने वालों में महज 47 फीसद इस आयु समूह के थे. भारत में 45 से कम उम्र के 83.5 करोड़ लोग हैं. इस वायरस को अनियंत्रित फैलने देने का मतलब देश की 45 साल से ऊपर की 18.8 करोड़ आबादी को खतरे में डालना है.
वायरस के नए रूप
फिर इस वायरस के नए रूपों का खतरा भी है. सेंटर फॉर सेल्यूलर ऐंड मॉलीक्यूलर बायोलॉजी (सीसीएमबी) के डायरेक्टर डॉ. राकेश के. मिश्र कहते हैं, ‘‘हर बार जब एक वायरस संक्रमण करता है, उसके रूप बदलने की भी संभावना होती है. इसलिए अगर आप सोचते हैं कि कोई भी कोविड से बीमार नहीं पड़ रहा है और आप सुरक्षित हैं, तो आप गलत हैं. हो सकता है कि आप कोविड के मौजूद रूप से बीमार न हों, पर अगर आप इसे फैलने देते हैं तो आप इसके ज्यादा मजबूत रूप से संक्रमित होने का जोखिम उठा रहे हैं, क्योंकि आखिर में यह वायरस एक जीता-जागता जीव है; यह जिंदा रहना चाहता है.’’
बताया जाता है कि ब्राजील में पाए गए इस वायरस के नए रूप को खत्म करने के लिए भारत में प्रचलित कोविड के रूप के मुकाबले 10 गुना ज्यादा ऐंटीबॉडी की जरूरत होती है. डॉ. मिश्र कहते हैं, ‘‘कोविड किसी भी वक्त रूप बदल सकता है और हम नहीं जानते कि किसी ढंग से बदल सकता है.’’
पिछले साल तक देश में केवल चार प्रयोगशालाएं भिन्न और बदले हुए रूपों की जांच के लिए कोविड संक्रमण का अनुक्रम तैयार कर रही थीं. ब्रिटेन में कोविड का नया रूप—जिसके लक्षण तो अपने से पहले वाले से मिलते-जुलते ही थे पर जो ज्यादा संक्रामक था—पकड़े जाने के बाद, यह बिल्कुल साफ हो गया कि इसके नए रूपों से सावधान रहने का अकेला तरीका लगातार निगरानी करना ही है. आज देश भर में 10 प्रयोगशालाएं भारत में लिए गए सभी नमूनों में से करीब पांच फीसद के अनुक्रम का पता लगाने में जुटी हैं.
फिलहाल कोविड ज्यादातर वायरसों के मुकाबले कहीं धीमी रफ्तार से रूप बदल रहा है. यह पुन:संक्रमण की कम संख्या से जाहिर है. दुबारा संक्रमण होना आम तौर पर इस बात का संकेत होता है कि शरीर की ओर से विकसित प्रतिरोध बीमारी के विरुद्ध अब और काफी नहीं रह गया है. यह आम तौर पर वायरस के रूप बदलने के नतीजतन होता है. डॉ. मिश्र कहते हैं, ‘‘आपको सामान्य सर्दी-जुकाम इसीलिए होता रहता है क्योंकि यह वायरस असाधारण तेज रफ्तार से रूप बदलता है.
आपकी ऐंटीबॉडी की स्मृति वायरस की एक निश्चित किस्म के खिलाफ होती है, लेकिन आपको दूसरी बार संक्रमित करने वाला वायरस अलहदा हो सकता है और इसलिए आप दुबारा बीमार पड़ जाते हैं. कोविड के साथ ऐसा नहीं हुआ है. फिर से संक्रमण होने के मामले विरले हैं और हमारा अपने जीनोम अनुक्रमण से पता चलता है कि यह सामान्य सर्दी-जुकाम के मुकाबले कहीं धीमी गति से रूप बदलता है.’’ इसके बाद भी भारत में करीब 5,000 बदले हुए रूपों का नक्शा तैयार किया गया है.नए रूप का खतरा न केवल मौजूद है बल्कि हर नए संक्रमण के साथ बढ़ता जाता है. इसलिए भारत में भले ही कोविड का ग्राफ उतार पर देखा जा रहा हो, पर हम अब भी खतरे से बाहर नहीं आए हैं.
टीकाकरण में भारत की स्थिति
डॉ. गुलेरिया का कहना है कि आने वाला साल अहम होगा, ''लोग अभी भी कोविड से मर रहे हैं. वायरस भी उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) कर रहा है. हमें निगरानी करनी है, टीका अनुसंधान में निवेश करना है और इस वायरस से आगे रहना है.’’
टीकाकरण इस दिशा में अहम प्रयास साबित होगा. भारत ने 16 जनवरी से शुरू अपने टीकाकरण कार्यक्रम के बाद से 24 दिनों में करीब 70 लाख लोगों को टीका लगाया. अमेरिका को यह लक्ष्य प्राप्त करने में 26 दिन लगे और ब्रिटेन को 46 दिन. वैसे दो टीकों—कोवैक्सीन और कोविशील्ड—की व्यापक उपलब्धता के बावजूद टीकाकरण के लिए पंजीकरण करने वालों में से सिर्फ 65 फीसद ही इसे लगवाने आगे आए और 17 फरवरी तक पहली खुराक लेने वालों में से 37.5 फीसद ही दूसरी खुराक के लिए आए.
टीकाकरण कार्यक्रम के शुरुआती दिनों में यह आंकड़ा और भी कम था. सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के टीके के पहले से ही लगभग 5.5 करोड़ खुराक उपलब्ध हैं और मौजूदा स्टॉक खत्म होने तक उसने अस्थायी रूप से उत्पादन रोक दिया है. इस बीच डब्ल्यूएचओ के नेतृत्व वाले गठबंधन कोवैक्स ने भारत को करीब 9.7 करोड़ वैक्सीन खुराक का वादा किया है.
दिल्ली स्थित सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ चपल मेहरा पूछते हैं, ''पिछले साल, हर कोई वैक्सीन के बारे में पूछ रहा था कि यह कब उपलब्ध होने वाला है, क्या हमारे पास पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होगा? अब जब आपूर्ति हो रही है, तो काफी हिचकिचाहट दिखती है. हमसे कहां चूक हुई?’’ नीति आयोग के सदस्य और वैक्सीन पर विशेषज्ञ समिति के अध्यक्ष डॉ. वी.के. पॉल बताते हैं कि लगभग 90 लाख स्वास्थ्य और फ्रंटलाइन वर्करों के टीकाकरण के साथ, वैक्सीन को लेकर पहले से ही व्यापक स्वीकृति है.
उन्हें लगता है कि बाकी लोगों को इसके बारे में समझाने की जरूरत है. वे कहते हैं, ''ये लोग वैक्सीन लेने से इसलिए हिचकिचा रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि महामारी खत्म हो गई है और अब हर कोई सुरक्षित है. आशा ने ढिलाई को जन्म दिया है और लोगों के मन से डर निकल गया है. टीकाकरण सिर्फ अपने और अपने परिवार के लिए नहीं है, यह एक सामाजिक जिम्मेदारी है. जब आपको टीका लगाया जाता है, तो आप वायरस के संचरण की शृंखला को रोकने के लिए एक दीवार की तरह खड़े हो जाते हैं, जिससे उन लोगों की रक्षा हो जाती है जो गंभीर रूप से बीमार हो सकते हैं, यहां तक कि वायरस से मर भी सकते हैं.’’
अधिकतर विशेषज्ञ इससे सहमत हैं कि संचार, विशेष रूप से सोशल मीडिया में घूम रही तत्काल मौतों से लेकर जीन में परिवर्तन की अंतहीन अफवाहों को देखते हुए, बहुत अहम हो जाता है. मेहरा, जिन्होंने भारत में तपेदिक और एचआइवी के कलंक से लडऩे के लिए व्यापक काम किया है, उन दिनों को याद करते हैं जब टीबी और पोलियो को लेकर फैली गलत सूचनाओं का सामना करने के लिए सार्वजनिक रूप से प्रयास किए गए थे.
वे याद करते हैं, ''कोविड वैक्सीन को लेकर जो हो रहा है वह संचार के सभी नियमों के विरुद्ध है—आपको पारदर्शिता, सार्वजनिक संदेह का जवाब देने की क्षमता, वैज्ञानिक समुदाय के सवालों के जवाब देने और सही सूचना को सुलभ कराने की जरूरत है. जनता के साथ संवाद के खराब स्तर ने वैक्सीन पर भरोसा कम कर दिया है.’’
नाम न छापने की शर्त पर, दिल्ली के लोक नायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल में टीकाकरण केंद्र की एक नर्स ने खुलासा किया, ''बहुत सारे फ्रंटलाइन कर्मचारियों का कहना कि अगर परीक्षण अभी पूरा ही नहीं हुआ तो फिर वैक्सीन लेने का कोई लाभ नहीं. वे कोवैक्सीन भी नहीं लेना चाहते (सरकार ने अपने टीकाकरण कार्यक्रम के पहले और दूसरे चरण के लिए कोवैक्सीन की 55 लाख खुराक और कोविशील्ड की लगभग 1 करोड़ खुराक का ऑर्डर दिया है). वे उस सहमति फॉर्म को लेकर भी चिंतित हैं जो किसी भी दुष्प्रभाव के मामले में उन्हें उनके अधिकारों से वंचित करता है.’’
टीके को लेकर हिचकिचाहट को दूर करने के लिए, राज्य सरकारों ने कई जागरूकता अभियान चलाए हैं. कई डॉक्टरों और प्रमुख राजनेताओं ने दूसरों को यह समझाने के लिए वैक्सीन लगवाया है कि यह टीका पूरी तरह सुरक्षित है. कुछ क्लिनिकों ने सेल्फी बूथ स्थापित किए हैं, जबकि अन्य लोगों ने फोन कॉल और सार्वजनिक सेवा के माध्यम से वैक्सीन के लिए पंजीकृत लोगों तक पहुंचना शुरू कर दिया है.
वैसे अधिक संख्या में टीकाकरण के लिए, निजी क्षेत्र को इस काम में सक्रिय रूप से लगाना होगा. कई निजी अस्पतालों ने रुचि व्यक्त की है, उनमें से फोर्टिस, अपोलो और मणिपाल अस्पताल शामिल हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि कोविड के लिए आरटी-पीसीआर जांच की तरह निजी क्लिनिकों के माध्यम से एक निश्चित कीमत में टीके बेचना, कोविड टीकाकरण में तेजी लाने में मदद करेगा. वैसे, अभी तक कोई स्पष्टता नहीं है कि कब टीके निजी खिलाडिय़ों के माध्यम से उपलब्ध कराए जाएंगे.
वैक्सीन अनुसंधान का एक दूसरा पक्ष भी है. भारत सात और स्वदेशी कोविड टीकों पर शोध कर रहा है और गृह मंत्री अमित शाह के अनुसार, हम दुनिया की कोविड वैक्सीन की 70 फीसद जरूरतों को पूरा करने की तैयारी कर रहे हैं. डॉ. त्रेहन कहते हैं कि वैक्सीन अनुसंधान, एक साझा वैश्विक अनुभव बन रहा है और हम उन अन्य देशों की सुरक्षा और प्रभावकारिता अनुभव से बहुत कुछ हासिल कर सकते हैं जिन्होंने हमारे जैसे वैक्सीन प्लेटफॉर्मों का उपयोग करके टीका विकसित किया है.
इस बीच, ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआइ) ने भारत में आपातकालीन उपयोग के लिए दवा दिग्गज फाइजर के आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि यूरोप में इस टीके के ऌगंभीर प्रतिकूल प्रतिक्रियाओं को लेकर कुछ आशंकाएं बनी हुई हैं. उन्होंने यह भी कहा है कि कंपनी ने अपने उत्पाद का भारत में अभी तक पर्याप्त परीक्षण नहीं किया है, ताकि भारतीय प्राप्तकर्ताओं पर इसका प्रभाव सुनिश्चित हो सके.
पूरे इत्मिनान के साथ यह कहना जल्दबाजी होगी कि कोविड वैक्सीन इस महामारी का अंत कर देगी. डॉ. गुलेरिया कहते हैं, ‘‘दूसरी खुराक लेने के कुछ दिनों के बाद, आपके शरीर में गंभीर कोविड से बचाने वाले पर्याप्त ऐंटीबॉडी विकसित होते हैं. फिर भी इस बात के लिए पर्याप्त डेटा उपलब्ध नहीं है जिसके आधार पर कहा जा सके कि टीका आपको कब तक सुरक्षित रखेगा. आपके शरीर में जब तक ऐंटीबॉडी विकसित नहीं होते उस दौरान आप किसी को संक्रमित भी कर सकते हैं.’’
डॉ. त्रेहन कहते हैं, ‘‘टीके हमारी रक्षा किस तरह करेंगे और इसकी आदर्श खुराक कितनी होनी चाहिए, इसे जानने के लिए अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है. मेदांता में, हम लगभग 4,000 लोगों का अध्ययन कर रहे हैं जिन्होंने वैक्सीन लिया है और उनके ऐंटीबॉडी की निगरानी की जा रही है. अब तक, हमने देखा है कि जिन लोगों को टीका लगने से पहले कोविड संक्रमण हुआ था, वे टीका के बाद तेजी से ऐंटीबॉडी विकसित कर रहे हैं. अगर शोध निर्णायक है, तो ऐसे लोगों के लिए टीके की सिर्फ एक खुराक भी पर्याप्त होगी क्योंकि यह उनके शरीर में पहले पहले से मौजूद प्रतिरक्षा के लिए एक प्रकार के बूस्टर का काम करेगी.’’
वायरस के क्वयूटेंट स्ट्रेन (उत्परिवर्ती स्वरूपों) के लिए भी टीकों का प्रभावी साबित होना होगा. वैक्सीन विशेषज्ञ डॉ. गगनदीप कंग कहती हैं, ‘‘अगर कोई ऐसा वैरिएंट आता है जो कोविड के खिलाफ हमारी मौजूदा प्रतिरक्षा को प्रभावित करता है तो हम फिर से वहीं पहुंच जाएंगे.’’ कोवैक्सीन और कोविशील्ड के निर्माता आश्वस्त हैं कि उनका उत्पाद नए म्यूटेशन पर भी प्रभावी होगा, पर डॉ. कंग कहती हैं, ''हम भरोसे के साथ यह दावा नहीं कर सकते क्योंकि इसका नए क्वयूटेशन पर परीक्षण हुआ ही नहीं है.
हम यह भी नहीं जानते हैं कि भारत में मौजूदा स्ट्रेन के लिए प्रतिरक्षा कितनी देर तक रहती है. हमें अगले साल ही पता चलेगा कि क्या हमें हर साल एक नए कोविड वैक्सीन की जरूरत होगी या एक केवल एक बार का टीकाकरण जीवनभर सुरक्षा प्रदान करेगा.’’
तब तक मास्क, हाथों और सतहों को साफ करना तथा शारीरिक दूरी के प्रोटोकॉल का पालन ही बचाव का सबसे अच्छा तरीका बना रहेगा.
‘‘बीते साल अस्पताल में भर्ती होने की जैसी मांग थी वैसी मांग इस साल नहीं है. अधिकतर उम्रदराज लोग ही आ रहे हैं’’
डॉ. एन.एन माथुर
डायरेक्टर, एलएचएमसी
‘‘सीरो सर्वे हमें महामारी की प्रकृति को समझने में मदद करता है. वे संकेत करते हैं कि अधिकतर मामले लक्षणविहिन थे’’
डॉ. रणदीप गुलेरिया
डायरेक्टर, एम्स
‘‘हर बार जब एक वायरस का प्रसार होता है उसके म्यूटेट होने की संभावना होती है. आप एक स्ट्रेन से सुरक्षित हो सकते हैं पर दूसरे से खतरा रहता है’’
डॉ. राकेश मिश्र
डायरेक्टर, सीसीएमबी
''हम यह अगले साल ही जान पाएंगे कि क्या हमें हर साल वेक्सीन की एक नई खुराक की जरूरत पड़ेगी या फिर खुराक के एक ही सत्र से पूरे जीवन भर की सुरक्षा मिल जाएगी.’’
डॉ. गगनदीप कंग
टीका विशेषज्ञ