आवरण कथाः नया गणतंत्र

बीते 71 सालों में गर्व करने लायक बहुत कुछ है तो परेशान करने वाली भी बहुत-सी चीजें हैं. गणतंत्र के 75 वर्ष के लिए हमें जरूरत है ग्रोथ को तेज रफ्तार करने के आमूलचूल नए एजेंडे की.

नया सवेरा  प्रधानमंत्री मोदी 72वें गणतंत्र दिवस कार्यक्रम के दौरान राजपथ पर
नया सवेरा  प्रधानमंत्री मोदी 72वें गणतंत्र दिवस कार्यक्रम के दौरान राजपथ पर

हम, भारत के लोग, भारत को संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता; प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने का दृढ़ संकल्प लेते हैं.’’

उदात्त लक्ष्यों की इस प्रस्तावना के साथ भारत ने एक राष्ट्र के रूप में स्वयं को गणराज्य घोषित करते हुए 26 जनवरी 1950 को औपचारिक रूप से संविधान अंगीकार किया था. 71 साल बाद अब, जब भारत की शक्ति और सांस्कृतिक विविधता का चौंधियाने वाला प्रदर्शन करते हुए हमने इस दिन का उत्सव मनाया (हालांकि बाद में किसानों के विरोध प्रदर्शन के दौरान हुए उपद्रवों से इसे चोट पहुंची), यह न केवल पीछे मुड़कर देखने और यह आंकने का वक्त था कि हमने अब तक क्या हासिल किया और कहां कितनी कमी रह गई बल्कि यह आगे की तरफ देखने और यह जांचने का वक्त भी था कि हम चीजों को बेहतर और ज्यादा तेज कैसे कर सकते हैं.

चूंकि कोविड-19 महामारी ने देश और दुनिया को हमेशा के लिए इस तरह बदल दिया है कि यह वहीं नहीं रह गई है जिसे हम जानते थे, लिहाजा जिंदगी और हमारी सेहत उतनी क्षणभंगुर कभी नहीं दिखी जितनी वे अब हैं. महामारी ने चिंता और बेचैनी के एक नए युग का सूत्रपात भले किया हो, लेकिन इसने राष्ट्र की क्षमता और संभावनाओं को बहुत जल्द से जल्द साकार करने के लिए नए संकल्प और अत्यावश्कता की भावना को भी जन्म दिया है. जवाहरलाल नेहरू के शब्दों में थोड़ा उलट-फेर करते हुए कहें, तो एक क्षण आता है, जो इतिहास में बहुत कम ही मगर आता तो है, जब हम पुराने से बाहर निकलकर नए में कदम रखने को विवश हो जाते हैं. ऐसा ही एक क्षण अब आ गया है.

ऐसा बहुत कुछ है जिस पर एक राष्ट्र को तौर पर हम गर्व कर सकते हैं, लेकिन ऐसा भी बहुत कुछ है जो परेशान करने वाला है. बीते दशक में हमने करीब 27.1 करोड़ लोगों को बहुआयामी गरीबी से बाहर निकाला है पर लगभग 7 करोड़ गरीब अब भी हमारे यहां हैं, जो किसी भी दूसरे देश से ज्यादा हैं. हमने अनाज के मामले में शानदार आत्मनिर्भरता हासिल की है और अगर हमें लगातार दो सूखे झेलने पड़ें तब भी अपने लोगों को खिलाने के लिए काफी बफर स्टॉक हमारे पास है. तिस पर भी हाल का एक सर्वे बताता है कि हमारे यहां ऐसे बच्चों की बड़ी तादाद है जिनकी वृद्धि कुपोषण की वजह से अवरुद्ध हो गई है. हमने काफी गांव-चौबारों में नलकूप लगाकर पीने का पानी पहुंचाने में कामयाबी हासिल की है, फिर भी महज एक-तिहाई परिवारों को अपने घरों में नल का पानी नसीब है.

और भी कई क्षेत्र हैं जिनमें उजले और काले का फर्क इतना ही तीक्ष्ण है. रिकॉर्ड समय में हर घर में शौचालय बनाने के केंद्र सरकार के विशालकाय कार्यक्रम के जरिए पिछले साल हमने खुले में शौचमुक्त (ओडीएफ) होने का दर्जा हासिल किया. मगर जब स्वास्थ्य सेवाओं की बात आती है, तो हमारा डॉक्टर-मरीज अनुपात विकासशील देशों में सबसे कम है.

हमारे यहां 102 से ज्यादा डॉलर अरबपति हैं और इस लिहाज से हम सबसे ज्यादा अरबपति वाले दुनिया के चौथे देश हैं पर जब प्रति व्यक्ति आमदनी की बात आती है, तो 1,876 डॉलर के आंकड़े के साथ भारत 193 अर्थव्यवस्थाओं में 148वीं पायदान पर है. हमारे यहां 1.17 अरब सेलफोन इस्तेमाल करने वाले हैं जो चीन के बाद दूसरे सबसे ज्यादा हैं, फिर भी 40 करोड़ लोगों यानी एक-तिहाई आबादी के पास इंटरनेट कनेक्शन नहीं है.

तो प्रगति के बावजूद कई और खाइयां अभी हमें भरनी हैं. तिस पर भी महामारी ने दिखा दिया है कि राष्ट्र के तौर पर हम कितने धुनी तथा लगनशील हैं और संकट में एकजुट होकर हमने अपना अच्छे से अच्छा प्रदर्शन किया. हमारा गणराज्य जब 75वें साल की तरफ बढ़ रहा है, हमें अपनी सारी कमियों और खामियों को अत्यावश्यक मानकर उन्हें तेजी से दूर करने के कदम उठाने चाहिए.

नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत कहते हैं कि इनमें पहला और सर्वोपरि काम मानव विकास सूचकांक और खासकर स्वास्थ्य तथा शिक्षा में भारत की रैंकिंग सुधारना है. वजह चाहे जो हों, लेकिन इन क्षेत्रों पर जीडीपी के प्रतिशत के तौर पर हमारा खर्च मायूस करने की हद तक हरेक में 2 फीसद से भी कम है. बजट 2021 चीजों को दुरुस्त करने और इन दो क्षेत्रों में पैसा लगाने का मौका है.

तो भी अहमियत केवल इसकी नहीं है कि कितनी धनराशि आवंटित की जाती है बल्कि इसकी भी है कि उसे कैसे खर्च किया जाता है. इसमें लीक से हटकर समाधान खोजना भी शामिल है. मसलन, स्वास्थ्य में, जैसा कि नारायणा हेल्थ के संस्थापक डॉ. देवी शेट्टी बताते हैं, जहां प्रशिक्षण की नई सुविधाएं स्थापित की जा रही हैं, वहीं उनके साथ ही साथ इंटर्नशिप या छोटी अवधि के कोर्स के माध्यम से कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने के लिए मौजूदा अस्पतालों की सेवाएं हासिल करके हुनरमंद स्वास्थ्य कर्मियों की कमी को दूर किया जा सकता है.

जहां तक शिक्षा की बात है, तो महामारी की वजह से ऑनलाइन पढ़ाई को फौरन स्वीकार कर लिया गया. वर्चुअल विश्वविद्यालय और स्कूल जल्द ही सामन्य बन सकते हैं, फिर भले ही हम मांग को पूरा करने के लिए ईंट और गारे की नई संस्थाओं का निर्माण करते रहें. टेलीकॉम क्षेत्र इसकी अच्छी मिसाल है कि सरकारी सहूलतों की मदद से निजी उद्यम किस तरह देश में संचार क्रांति का सूत्रपात कर सके. महज तीन दशक पहले टेलीफोन कनेक्शन लेने के लिए हमें कतार में इंतजार करना पड़ता था. अमेरिका और दूसरे उन्नत देशों के उलट भारत को यह लाभ हासिल है कि उसे विरासत में मिले पुराने इन्फ्रास्ट्रक्चर में नहीं फंसना पड़ता और वह विकास की राह पर लंबी छलांगें लगाते हुए आगे बढ़ सकता है.

नए गणराज्य की सर्वोच्च प्राथमिकता बेरोजगारी झेल रहे लाखों लोगों के लिए नौकरियां पैदा करना होनी चाहिए. महामारी ने स्थिति और बिगाड़ दी जब 9 करोड़ लोगों को रोजगार से हाथ धोना पड़ा. भारतीय किसान अगर मोदी सरकार के नए कृषि कानूनों का तीखा विरोध कर रहे हैं तो इसलिए कि वे गहरे शको-शुबहे से भरे हैं कि जिन सुधारों का वादा किया जा रहा है वे उन्हें लाभदायक ढंग से अपने काम-धंधों में लगा रहने देंगे या नहीं.

यह भी एक वजह है कि 50 फीसद से ज्यादा कार्यबल अब भी कृषि में लगा हुआ है और वह भी तब जब जीडीपी में इस क्षेत्र का योगदान महज 17 फीसद है. लिहाजा, जवाब नए कानून बनाने में नहीं बल्कि कोल्ड चेन और फूड पार्क सहित जरूरी बुनियादी ढांचा मुहैया करने में है, जो बागबानी की उपज का प्रसंस्करण करने और उससे उतना ही स्थिर प्रतिफल कमाने में किसानों की मदद कर सके जितना वे अनाज उगाने से हासिल करते हैं. अगर एग्रो-प्रोसेसिंग या कृषि प्रसंस्करण को घरेलू बाजार और निर्यात दोनों के लिए बहुत ऊंची छलांग लगानी है, तो सरकार को चाहिए कि वह जरूरी सुविधाएं स्थापित करने और उन्हें कामयाब बनाने के लिए धन लगाने में कोई कसर न छोड़े.

अलबत्ता बहुत बड़े पैमाने पर नौकरियों के सृजन के लिए मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र का हिस्सा बढ़ाने पर जोर देना होगा, जो जीडीपी के 16 फीसद पर अटका है. महामारी वैश्विक आपूर्ति शृंखला में व्यवधान पैदा कर रही और देशों तथा कंपनियों को भरोसेमंद वैकल्पिक स्रोत खोजने को मजबूर कर रही है. ऐसे में भारतीय कंपनियों के सामने फार्मास्यूटिकल, ऑटोमोबाइल या खाद्य प्रसंस्करण सरीखे कई दूसरे क्षेत्रों में पैर पसारने का मौका है.

इसका यह भी अर्थ है कि हमारे सूक्ष्म, छोटे और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को सहारा देकर ऊंचा उठाया जाए, जो अब तक हमारे सबसे बड़े नियोक्ता हैं, लेकिन महामारी की चोट से कराह रहे हैं और कर्ज ने उन्हें निचोड़ लिया है. बैंकों का बुनियादी ढांचा कमजोर बना हुआ है और सरकार को जो चीजें तत्काल करने की जरूरत है, उनमें हमारी वित्तीय प्रणाली को मजबूत बनाकर उद्यमियों के लिए कर्ज की ज्यादा सुलभता पक्का करना भी है. यह हमारे एमएसएमई को ज्यादा उत्पादक, दक्ष और आधुनिक बनाने का मौका भी है, बजाए इसके कि उन्हें कर चुकाने से बचकर जिंदा रहने के लिए मजबूर किया जाए.

निर्यात में लगातार और टिकाऊ वृद्धि के बगैर कोई देश विकसित नहीं हुआ है. बीते कुछ सालों में भारतीय निर्यात की वृद्धि में ठहराव की वजह यह है कि हमारे 75 फीसद सामान जिस वैश्विक बाजार की जरूरतें पूरी करते हैं, वह सिकुड़कर महज 25 फीसद रह गया है. इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, 5जी, बैटरी स्टोरेज, इलेक्ट्रॉनिक्स और जेनोमिक्स सहित अत्याधुनिक उन्नत टेक्नोलॉजी में वैश्विक निर्यात तेजी से बढ़े हैं. भारत को डूबते क्षेत्रों के बजाए उदीयमान क्षेत्रों पर ध्यान देने की जरूरत है.

केंद्र सरकार का चाहिए कि वह अपनी आत्मनिर्भर भारत नीति को साफ परिभाषित करे और अतीत की संरक्षणवादी व्यवस्थाओं पर जोर देने के बजाए भारतीय उद्योग का वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी बन पाना पक्का करे. जहां प्रतिद्वंद्वी चीन क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) पर दस्तखत कर रहा है जिसमें हिंद-प्रशांत के देश भी शामिल हैं, वहीं भारत को बड़े व्यापारिक समूहों से नहीं जुडऩे की अपनी नीति पर फिर से विचार करने की जरूरत है. उसके ताकत दिखाने वाले व्यवहार को लेकर उनके विरोध के बावजूद उसे यूरोप के साथ भी जुडऩे की जरूरत है. दुनिया भर के वैश्विक व्यापार में इन व्यापार समूहों की आधे से ज्यादा हिस्सेदारी है. भारत के निर्यात कुल वैश्विक निर्यातों के मुश्किल से 2 फीसद हैं और ऐसे में अलगावादी नीति पर चलना महंगा पड़ सकता है.

भारतीय अर्थव्यवस्था को मंदी के मौजूदा ढर्रे से उबारने के लिए मोदी सरकार को चाहिए कि कुछ उसी किस्म की एक न्यू डील लेकर आए जो फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट ने अमेरिका को महामंदी से निकालने के लिए पेश की थी. 2021 का बजट देश में विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचे के निर्माण पर खुलकर खर्च करने का शानदार मौका है. मगर ‘बिग गवर्नमेंट’ की वापसी और पीएसयू को टेका लगाने के बजाए न्यू डील की कमान निजी क्षेत्र के हाथों में होनी चाहिए.

हवाई यातायात में निजी क्षेत्र को अनुमति देने के बाद जिस तरह दक्षता के स्तर में उछाल आया, उसी तरह रेलवे भी निजीकरण की जबरदस्त खुराक के लिए तैयार है, फिर चाहे वह रेलवे स्टेशनों या पटरियों का रखरखाव हो या निजी क्षेत्र के हाथों संचालित रेलों के लिए मार्गों की संख्या में बढ़ोतरी. संक्षेप में, इस एजेंडे की अगुआई निजी क्षेत्र के हाथों में ही होनी चाहिए ताकि अर्थव्यवस्था की बहाली तेजी से हो सके. सरकार को सालाना 7.5 फीसद जीडीपी दर पाने के लिए भी पूरा जोर लगाना चाहिए. इसके लिए सरकार और निजी क्षेत्र दोनों की तरफ से जबरदस्त निवेश की जरूरत होगी.

भारत संघीय देश है. लिहाजा अगला बड़ा सुधार राज्यों के स्तर पर होना चाहिए, जहां उद्यमियों के लिए अनुपालन का भार और लॉजिस्टिक्स की लागत अब भी बहुत ज्यादा है. मसलन, बिजली आपूर्ति में भारत को उन इने-गिने देशों में होना चाहिए जहां औद्योगिक बिजली की लागत घरेलू इस्तेमाल की लागत से दोगुनी है. राज्यों को भारत की वृद्धि का केंद्रबिंदु बनाने के लिए इसे बदलना ही होगा. किसान आंदोलन ने दिखाया कि आमूलचूल सुधार अध्यादेश के रास्ते नहीं बल्कि सभी हितधारकों की भागीदारी के साथ लोकतांत्रिक बहस और राजनैतिक प्रक्रिया के जरिए लाए जाने की जरूरत है ताकि वे कामयाब हो सकें.

अगले पन्नों में हम विकास के कुछ प्रमुख क्षेत्रों का आकलन कर रहे हैं और त्वरित बदलाव का एजेंडा सामने रख रहे हैं. जो बात बिल्कुल साफ है वह यह कि नया गणराज्य समृद्ध हो और लोकतंत्र फले-फूले, इसके लिए जरूरी है कि हम उन आदर्शों का, खासकर न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के चार स्तंभों का, दृढ़ता से पालन करें जिनके प्रति हमने भारतीय संविधान की प्रस्तावना में स्वयं को वचनबद्ध किया है. 

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