प्रधान संपादक की कलम से
हालांकि नए कानूनों ने केंद्र और विपक्ष शासित प्रदेशों में दरार पैदा कर दी है. पंजाब और छत्तीसगढ़ केंद्र के कानूनों के खिलाफ विधोयक पास कर चुके हैं.

अरुण पुरी
कहते हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुधारों की बात पर कभी किसी से कहा था कि ''भारत एक लंबी माल गाड़ी जैसा है, जिसे सावधानी से मोडऩा जरूरी है, वरना गाड़ी पलट जाएगी.’’ मैं पक्के तौर पर तो नहीं कह सकता कि उन्होंने ऐसा ही कहा था, मगर इससे बेहतर मिसाल और हो नहीं सकती. देश की अर्थव्यवस्था लोकलुभावन और विचारधारा संबंधी विरासत से लदी हुई है और उसे तरह-तरह के बेमानी नियम-कायदे और पेचीदा बनाते हैं.
इनमें कई तो आर्थिक समझदारी पर खरे नहीं उतरते और आर्थिक वृद्धि के लिए नुक्सानदेह हैं. प्रधानमंत्री मोदी अपने शासन के छठे साल में उनमें कुछ को बदल रहे हैं, कुछ तो अर्थव्यवस्था के दायरे के बाहर के भी हैं. उन्होंने ग्रामीण भारत के जीवन-स्तर में सुधार लाने पर खासा जोर दिया है, जहां देश की 70 फीसद आबादी बसती है.
उन्होंने 2022 तक खेती की आमदनी को दोगुना करने का वादा किया है, जब देश आजादी की 75वीं सालगिरह मनाएगा. कृषि क्षेत्र को समाजवादी दौर के बर्बादी लाने वाली जकड़न से मुक्त करने की उनकी ताजा पहल इसी दिशा में उठा कदम है. इस सितंबर में संसद के मॉनसून सत्र में जो तीन विधेयक पारित हुए, उन पर ठीक से अमल हुआ तो देश में कृषि क्षेत्र के लिए अपार संभावनाओं के दरवाजे खुल सकते हैं.
किसानों की उपज के लिए राज्य के भीतर और राज्यों के बीच आवाजाही के रास्ते खोलने वाले इन कानूनों का मकसद पूरे देश को एक बाजार में तब्दील करना और राज्य सरकारों के तहत आने वाली कृषि उपज बाजार समितियों (एपीएमसी) के साथ आढ़तियों के एकाधिकार को खत्म करना है.
ये कानून ठेके पर खेती की रूपरेखा भी तैयार करते हैं और आवश्यक वस्तु अधिनियम में फेरबदल करके सरकारी हस्तक्षेप को आपाद स्थितियों तक सीमित करते हैं. महत्वपूर्ण यह भी है कि सरकार ने एपीएमसी या न्यूनतम समर्थन मूल्य के मौजूदा मददगार ढांचे को खत्म नहीं किया है, बल्कि किसानों को अपनी उपज बेचने का एक और जरिया मुहैया करा दिया है.
तीन दशक पहले देश ने आर्थिक उदारीकरण की ओर कदम बढ़ाया. अर्थव्यवस्था खस्ताहाल थी और खजाना खाली था, इसलिए सरकारी नियंत्रण ढीला करने और बाजार की ताकतों को खेलने की इजाजत देने के अलावा कोई चारा भी नहीं था.
तकरीबन 30 साल बाद, जिस साल आर्थिक वृद्धि शून्य है, देश कृषि क्षेत्र को खोलने के सुधार की दूसरी राह पर चल पड़ा है. करीब आधी सदी से कृषि क्षेत्र बदलाव से अछूता है. इसलिए इस क्षेत्र को खोलने और प्रतिस्पर्धी कीमत के लिए बाजार की ताकतों को खेलने देने की खातिर नई कानूनी पहल देश के कृषि क्षेत्र में 1991 जैसा पल है.
देश में इस साल सबसे अधिक तकरीबन 10 करोड़ टन गेहूं की पैदावार हुई है. हम पहले ही दुनिया में दूध और दलहन की पैदावार में सबसे आगे हैं और गेहूं, गन्ना, मूंगफली, सब्जियों, फल और कपास की पैदावार में दूसरे नंबर पर हैं. हालांकि अच्छी फसल के वर्ष भी कृषि की बदहाली दूर करने में नाकाम हैं. कृषि में हमारी आबादी के 54 फीसद लोग जुड़े हैं लेकिन जीडीपी में उसका योगदान महज 17 फीसद है.
खेती ज्यादातर गेहूं और धान उगाने तक ही सीमित है, जबकि हमें पाम ऑयल और सोयाबीन ऑयल जैसे खाद्य तेलों का आयात करना पड़ता है. हमारी प्रति हेक्टेयर पैदावार दुनिया में सबसे कम है, जिसकी बड़ी वजह छोटी-छोटी जोत है. तकरीबन 80 फीसद किसानों के पास दो हेक्टेयर से कम जमीन है. हम कई कृषि उपज के मामले में दुनिया में अव्वल हैं लेकिन उसके निर्यात में दुनिया में हमारी हिस्सेदारी महज 2.5 फीसद है. हम कुल उपज का सिर्फ 7 फीसद ही निर्यात करते हैं और हमारा कृषि उपज निर्यात पिछले पांच साल से स्थिर है. गेहूं,
1960 के दशक के आखिरी वर्षों की हरित क्रांति से देश की कृषि उपज में भारी बढ़ोतरी हुई, जो कीटरोधी बीजों, मशीनीकरण और खाद के इस्तेमाल के जरिए हुई थी. 'जहाज से मुंह तक दाना’ के उस अपमानजनक दौर से सुधारों ने देश को दुनिया के बड़े खाद्यान्न उत्पादक देश में बदल दिया.
तब से ही सरकार का फोकस आपूर्ति या उपज बढ़ाने पर रहा है. किसानी मुनाफे का सौदा बने और किसान को उपज का बेहतरीन दाम मिले, यह न कर पाने से एक विचित्र स्थिति पैदा हो गई है. हमारे गोदाम अनाज से भरे पड़े हैं लेकिन भारी कर्ज में डूबे किसान अपनी जान ले रहे हैं, किसानी निपट अवैज्ञानिक बनी हुई है, हमारा भू-जल स्तर पाताल छू रहा है और हम दुनिया में खाद्य पदार्थों की बर्बादी में अव्वल हो गए हैं.
गलत सरकारी नीतियां किसानों को गलत क्षेत्रों में गलत फसल उगाने पर मजबूर करती हैं, जैसे पानी के अकाल वाले पंजाब में धान की खेती. एमएसपी बढ़ाने, खाद सब्सिडी, मुफ्त बिजली-पानी या कृषि कर्ज जैसे पैबंद जोड़ने वाले उपायों ने सरकार के खजानों को खाली किया है और किसानों की दशा सुधारने में नाकाम रहे हैं.
हालांकि नए कानूनों ने केंद्र और विपक्ष शासित प्रदेशों में दरार पैदा कर दी है. पंजाब और छत्तीसगढ़ केंद्र के कानूनों के खिलाफ विधोयक पास कर चुके हैं और राजस्थान भी उसी राह पर है. पंजाब में सरकार को डर है कि वह गेहूं और धान की खरीद में एफसीआइ से मिलने वाले सालाना 3,000 करोड़ रु. गंवा बैठेगी, बिचौलियों को डर है कि वे 1,200 करोड़ रु. गंवा बैठेंगे. ये निहित स्वार्थ पूरे क्षेत्र के लिए लाभकारी बदलाव को अपनी जेब खाली होने के डर से अटका रहे हैं.
हमारी आवरण कथा 'कृषि क्रांति’ दशकों से सुधार से अछूते क्षेत्र में इन कानूनों के असर का आकलन करती है. इसे ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर (पब्लिशिंग) राज चेंगप्पा ने कलमबंद किया है. इस क्षेत्र पर बारीक नजर रखने वाले चेंगप्पा का मानना है कि नई सरकारी पहल कृषि को मांग आधारित बनाकर उसमें आमूलचूल बदलाव लाएगी. हालांकि वे चेताते हैं, ''स्पष्ट दिशा की जरूरत है, वरना यह पहल मुंह के बल गिर सकती है और सरकार अपने हाथ जला सकती है.’’
प्रधानमंत्री मोदी सुधारों की माल गाड़ी को बढ़ा चुके हैं, और अब मुड़ना नहीं है. 1991 के सुधारों ने देश को 3.5 फीसद हिंदू वृद्धि दर से मुक्त किया और 2018 तक उसे 7 फीसद के मुकाम पर पहुंचाया. अगर कृषि सुधार 2.0 पटरी पर कायम रहता है तो वह जरूर ग्रामीण भारत को हमेशा के लिए बदल सकता है.