आवरण कथाः कोविड विजेताः हार न मानने के संकल्प से मिली ताकत

''हमने खांसी के खिलाफ दिमागी लड़ाई लड़ी, डॉक्टरों की बात सुनी और दो सप्ताह से कम समय में ठीक हो गए. इसमें फंसे लोगों को चाहिए कि वे मुश्किल लड़ाई के लिए तैयार रहें और हार न मानें.''

बंदीप सिंह
बंदीप सिंह

दवा व्यवसायी नरेश भाटी याद करते हैं, ''मुझे इतनी ज्यादा खांसी आ रही थी कि गले और सीने में जलन होने लगी थी.'' बीती 30 अप्रैल को उनकी पत्नी और गाजियाबाद नगर निगम पार्षद आशा को कोविड-संक्रमित पाए जाने के बाद नरेश को भी जांच करवाने के लिए कहा गया.

नरेश बताते हैं, ''मेरी पत्नी को कुछ दिनों से बुखार था, लेकिन कोविड के कोई और लक्षण शुरू में नहीं थे. ऐसे में मुझे अपने कोविड संक्रमित होने पर थोड़ा आश्चर्य हुआ था.'' आशा को लगता है कि उन्हें संभवत: तब संक्रमण हुआ जब वे सार्वजनिक कार्यों के लिए घर से बाहर निकली थीं.

गंभीर खांसी और बुखार की शिकायत के बाद भाटी दंपती को गाजियाबाद के राजेंद्र नगर में ईएसआइसी अस्पताल में ले जाया गया. वहां उन्हें 12 दिनों तक रखा गया. इस दौरान कोरोना संक्रमण से मुक्त पाए गए उनके बच्चों—14 साल की बेटी और 18 साल का बेटा—को अकेले घर पर रहना पड़ा. नरेश बताते हैं, ''आप उस अपराध-बोध की कल्पना नहीं कर सकते जो मुझे महसूस हो रहा था. बच्चों की देखभाल करने वाला कोई नहीं था. पहली बार उन्हें अपने लिए भोजन की व्यवस्था करनी पड़ी.''

अस्पताल में वे किताबें पढ़ते थे और फोन पर लगे रहते थे, लेकिन ज्यादातर वे सोते रहते थे. उनका कहना है, ''बीमारी ने काफी कमजोर कर दिया था. हम भाग्यशाली थे कि हमारे फेफड़े संक्रमित नहीं थे.

कई रोगियों को आइसीयू में भेजे जाते हुए देखने वाले नरेश का संकल्प था कि वह अपने साथ ऐसी स्थिति नहीं आने देंगे.'' उनका कहना है, ''हमने खांसी के खिलाफ दिमागी लड़ाई लड़ी, डॉक्टरों की बात सुनी और ठीक हो गए.'' मरीजों को उनकी सलाह है, ''खुद को मुश्किल लड़ाई के लिए तैयार करें और हार न मानें.''

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