लॉकडाउन: बिन खिले मुरझा गईं किसानों की उम्मीदें
कोराना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए हुए लॉकडाउन ने किसानों को बुरी तरह प्रभावित किया है. आम और फूल की खेती करने वाले उत्तर प्रदेश के किसानों के सामने भी संकट के बादल घिर गए हैं.

लखनऊ से हरदोई रोड पर 40 किलोमीटर दूर मलिहाबाद के बड़ी कसमंडी इलाके के सैदासपुर गांव में रहने वाले कलिका रावत इस बार बसंत पंचमी के बाद अपने दो बीघा बाग में आम के बौर देखकर बहुत खुश थे. लेकिन उनकी खुशी ज्यादा दिनों तक नहीं रह सकी. फरवरी के अंतिम हफ्ते में बारिश से जमीन में नमी आ गई और आम पर कीड़ों का प्रकोप बढ़ गया. होली आते-आते मौसम साफ हुआ तो कलिका को आस बंधी कि वे कीटनाशक दवाओं का स्प्रे कर आम की फसल को बचा लेंगे.
कलिका ने 15-15 दिन पर दो बार दवाओं का स्प्रे भी किया लेकिन कोरोना का प्रकोप बढ़ते ही अचानक हुए लॉकडाउन से कलिका की सारी तैयारियां धरी रह गईं. वे कहते हैं, ''लॉकडाउन के चलते न केवल कीटनाशक दवाएं लाना मुश्किल है बल्कि आम के बाग की धुलाई करने के लिए मजदूर भी नहीं मिल रहे हैं. रही-सही कसर आम के छोटे किसानों की लगातार गिरती माली हालत ने पूरी कर दी है.'' पिछले साल कलिका ने अपने दो बीघा बाग में 300 कैरेट आम पैदा किया था. एक कैरेट में 30 किलो आम होता है और इस तरह कलिका ने 9,000 किलो आम पैदा कर साल भर के लिए अपने संयुक्त परिवार का पेट भरने का इंतजाम कर लिया था. लेकिन, इस बार कोरोना वायरस के खतरे के बीच चल रहे लॉकडाउन ने आम के किसानों के माथे पर पसीना ला दिया है.
उत्तर प्रदेश में कुल मिलाकर 15 'मैंगो बेल्ट' हैं जहां 45 लाख मीट्रिक टन आम की पैदावार होती है. इसमें 80 फीसद से ज्यादा दशहरी आम का हिस्सा है. इस दशहरी आम की सबसे ज्यादा पैदावार लखनऊ के मलिहाबाद-माल-रहीमाबाद-काकोरी इलाके में होती है, जिसे मैंगो बेल्ट के नाम से भी जाना जाता है. लखनऊ के पश्चिम में 20 हेक्टेयर में फैली इस मैंगो बेल्ट में हर वर्ष औसतन छह लाख मीट्रिक टन आम का उत्पादन होता है. इस बार भी मैंगो बेल्ट में खूब आम के बौर आए हैं लेकिन लॉकडाउन की वजह से किसान चिंतित हैं.
माल के बागबान विजय कुमार बताते हैं कि आम के बागों को कीटों से बचाने के लिए अप्रैल में दो बार धुलाई करनी पड़ती है. इस बार लॉकडाउन के चलते बड़ी संख्या में किसानों को छिड़काव के लिए जरूरी दवाएं नहीं मिलीं, जिससे आम में दहिया और जाला रोग लगने की आशंका बढ़ गई है. विजय कुमार का कहना है, ''अगर आम में रोग लग गया तो किसानों को बहुत घाटा उठाना पड़ेगा और बहुत कम मात्रा में आम बाजार में आ पाएगा.'' लॉकडाउन की स्थिति में किसानों को सबसे ज्यादा समस्या दवाओं का इंतजाम करने में हो रही है. मलिहाबाद में आम के किसान मदन बहादुर सिंह बताते हैं, ''प्रमुख सचिव, कृषि ने आदेश दिया है कि कृषि का सामान ले जाने वाली गाड़ियों को नहीं रोका जाए लेकिन सड़क पर हो रही चेकिंग में कृषि विभाग का कोई कर्मचारी होता नहीं है, यहां पुलिस होती है जो गाड़ियों को नहीं आने देती है. इससे किसानों को बहुत समस्या हो रही है. आम की फसल खराब होने की कगार पर पहुंच गई है.''
लखनऊ के रहमानखेड़ा में स्थित केंद्रीय उपोष्ण बागबानी संस्थान के निदेशक डॉ. शैलेंद्र राजन आम के किसानों की समस्याओं को दूर करने में जुटे हैं. डॉ. राजन ने संस्थान में रजिस्टर्ड आम के किसानों का एक व्हाट्सऐप ग्रुप बना रखा है, जिसमें वे लॉकडाउन के दौरान किसानों को मिलने वाली सहूलियतें और सरकार के महत्वपूर्ण आदेशों की जानकारी दे रहे हैं. डॉ. राजन बताते हैं, ''इस वर्ष देर तक ठंड पडऩे की वजह से आम के बागों में देर से कीड़े लगने शुरू हुए. किसानों को अब बागों में दवा का छिड़काव करने की बहुत जरूरत है. इसके लिए प्रयास किया जा रहा है कि पुलिस किसानों को उनका काम करने से न रोके.''
कोरोना प्रकोप के चलते हुए लॉकडाउन में किसानों को भीषण आर्थिक समस्याओं का भी सामना करना पड़ रहा है. सामान्य स्थितियों में दिल्ली और अन्य प्रदेशों से आढ़ती लखनऊ आकर बौर देखकर पूरे बाग का आम किसानों को एडवांस पैसा देकर खरीद लेते थे. लॉकडाउन के चलते ऐसे आढ़ती लखनऊ नहीं आ पाए हैं और 15 अप्रैल तक एक भी किसान का आम एडवांस में नहीं बिका है. जबकि पिछले वर्ष इस समय तक 80 फीसद किसानों के आम के बाग बिक चुके थे. इससे बागबान काफी परेशान हैं. इनके पास पैसा नहीं है. अगर आम के बाग नहीं बिके तो इन्हें औने-पौने दाम पर बेचना पड़ सकता है. लखनऊ के मैंगो बेल्ट में पैदा होने वाला आम सबसे ज्यादा गल्फ देशों में निर्यात किया जाता है. इस बार इन देशों में भी कोरोना का प्रकोप होने के चलते एक भी निर्यातक ने लखनऊ की मैंगो बेल्ट के किसानों से आम खरीदने के लिए संपर्क नहीं किया है.
ऐसे में इस वर्ष आम का निर्यात अपने न्यूनतम स्तर पर रहने की आशंका है. अखिल आम उत्पादक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष इंसराम अली बताते हैं, ''अब हम निर्यात की सोच ही नहीं रहे हैं. हमारा पूरा ध्यान किसी तरह आम के किसानों को बचाना है. हम सरकार से निवेदन करेंगे कि वह पल्प फैक्ट्रियों से बात करके आम बिकवाए ताकि किसानों को होने वाले नुक्सान में कुछ कमी की जा सके. सरकार किसानों के संगठनों को अनुमति दे कि वह सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखते हुए आम की आढ़त लगवाए.'' उधर, प्रदेश के कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही कहते हैं कि आम किसानों को नुक्सान नहीं हो इसके लिए सरकार पूरा प्रयास कर रही है. जल्द ही आम के किसानों से बातचीत करके कोई रास्ता निकाला जाएगा.
लॉकडाउन में कुम्हला गए फूल
कोरोना वायरस की मार फूलों की खेती पर भी पड़ी है. माल में फूल के किसान मुन्नीलाल यादव ने इस बार अपने तीन बीघा खेत में गेंदा और डेढ़ बीघा खेत में गुलाब की खेती की थी. इस बार पिछले एक महीने से खरीददार न होने से खेत में खड़ी गेंदा और गुलाब की फसल सूख रही है. नवरात्र शुरू होते ही लॉकडाउन लागू हो गया. फूलों की बिक्री के लिए सबसे अच्छा समय नवरात्र माना जाता है. इस दौरान फूलों की मांग बढ़ती है तो किसानों को दाम भी अच्छा मिलता है. मुन्नीलाल बताते हैं, ''पिछले वर्ष नवरात्र में 100 रुपए प्रति किलो तक गेंदा बिका था. गुलाब भी 250 रुपए प्रति किलो तक बिक गया था लेकिन इस बार तो फूल बेचने का मौका ही नहीं मिला.'' इस बार फूल न बिकने से गेंदा की खेती में प्रति बीघा 50 हजार रुपए से एक लाख रुपए जबकि गुलाब में करीब दो लाख रुपए प्रति बीघा के नुक्सान का आकलन लगाया जा रहा है. वाराणसी के राजाकातालाब इलाके के वीरभानपुर गांव के मनीष विश्वकर्मा कृषि विज्ञान से स्नातक की पढ़ाई कर रहे हैं. पिछले वर्ष इन्होंने अपने पिता के 15 बिस्वा खेत में गुलाब की खेती की थी जिससे इन्हें एक लाख रुपए तक की आमदनी हो गई थी. मनीष बताते हैं, ''एक पौधे पर 30 से 40 रुपए का खर्चा आता है. इस बार भी मैंने अपने खेत में 14 सौ पौधे रोप रखे हैं."
लॉकडाउन के चलते गुलाब के फूल बिक नहीं पाए लिहाजा पौधों को बचाने के लिए फूलों को तोडऩा पड़ रहा है. फूलों को खेत के किनारे ही फेंका जा रहा है ताकि यह खाद में तब्दील हो जाए.'' प्रयागराज में गंगा-यमुना का कछारी बेल्ट फूलों की खेती के लिए उपजाऊ माना जाता है. यहां करीब 35 हेक्टेयर क्षेत्र में फूलों की खेती की जाती है. इनमें गेंदा, गुलाब, सफेदा, सूरजमुखी और चमेली के फूलों की खेती होती है. इस बार लॉकडाउन के चलते यहां फूलों की खेती सूख रही है. मुन्नीलाल बताते हैं, ''नवारात्र में घाटा सहने वाले किसानों को उम्मीद थी कि 15 अप्रैल से लॉकडाउन हटने के बाद शादी समारोह शुरू होंगे और फूलों की डिमांड बढ़ेगी लेकिन लॉकडाउन जारी रहने से अप्रैल और मई में होने वाले शादी समारोह टाल दिए गए हैं जिसने फूल के किसानों को भारी घाटे में ला दिया है. खेती में हजारों रुपए लगाने के बाद भी किसानों को एक रुपए की आमदनी नहीं हुई है.'' फूलों की मंडी बंद होने के कारण किसानों ने खेतों में खड़े फूलों की तुड़ाई ही नहीं की है. गुलाब को तो तोड़कर किसान सुखा रहे हैं लेकिन अन्य फूल खेतों में ही सूखकर खराब हो रहे हैं. कृषि विभाग फूल के किसानों को राहत देन के लिए एक योजना बना रहा है जिसमें फूलों से अगरबत्ती या अन्य सामान बनाने के लिए किसानों को प्रशिक्षित किया जाएगा. लेकिन, फिलहाल तो ये किसान गंभीर संकट में घिरे नजर आ रहे हैं.