लॉकडाउन: बेचारा गोवंश!

एक नजर नांद पर और दूसरी भूसे के स्टॉक पर. लॉकडाउन ने काउबेल्ट की गोशालाओं के प्रबंधकों की पेशानी पर बल डाल दिए हैं. चारे की आवक ठप, मजदूरों की किल्लत, दानदाताओं ने फिलहाल मुंह मोड़ा, सरकारों की प्राथमिकताएं भी बदलीं.

यहां भी संकट: जयपुर के पास हिंगोनिया गोशाला में चारे का इंतजार करतीं गायें (फोटोः पुरूषोत्तम दिवा
यहां भी संकट: जयपुर के पास हिंगोनिया गोशाला में चारे का इंतजार करतीं गायें (फोटोः पुरूषोत्तम दिवा

जयपुर जिले की बस्सी तहसील में पडऩे वाली हिंगोनिया गोशाला गायों की मौत को लेकर अक्सर विवादों के घेरे में रही है. यह करीब 2,500 गोशालाओं वाले राजस्थान की 4-5 बड़ी गोशालाओं में से एक है. इन दिनों यहां करीब 15,000 गोवंश का पालन-पोषण होता है. लॉकडाउन से पहले प्रबंधकों को कतई अंदाजा नहीं था कि आगे क्या संकट खड़ा होने वाला है. गोशाला का संचालन करने वाले श्री कृष्ण बलराम सेवा ट्रस्ट के सचिव राधाप्रिय दास की पेशानी पर बल पड़ने लगा है. वे बताते हैं, ''स्टॉक में 31 मार्च तक का भूसा था. जैसे तैसे कुछ दिन और काट रहे हैं लेकिन अब अगर जल्दी ही चारे ही व्यवस्था न हुई तो गायों की जान पर बन आएगी.'' चारे के लिए यह गोशाला पूरी तरह से पंजाब, हरियाणा और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के भरोसे है. और लॉकडाउन के चलते ट्रकों की आवाजाही ठप है. चारे का जुगाड़ हो भी तो कैसे?

तनाव का माहौल सिर्फ हिंगोनिया में ही नहीं. वहां से करीब 600 किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में हालात और बदतर हैं. वहां सीतापुर रोड पर एक सरकारी गोशाला में सौ से ज्यादा निराश्रित गायें हैं. इनकी देखभाल करने वाले रमेश चंद्र की दिक्कतें पारा चढ़ने के साथ बढ़ती जा रही हैं. वे कहते हैं, ''लॉकडाउन में पशुओं का चारा चार से पांच रुपए प्रति किलो महंगा हो गया है. ट्रैफिक पर रोक के चलते भूसे-चारे की गाड़ियां शहर के भीतर नहीं आ पा रही हैं. और तो और! वे दानदाता भी नहीं आ पा रहे जो नियमित आकर अपनी तरफ से गायों के चारे का इंतजाम करते थे. नतीजा यह है कि यहां की गायों की सेहत काफी गिर गई है.'' लखनऊ के उपनगरीय क्षेत्र मड़ियांव में भूसे का गोदाम चलाने वाले ब्रजेश यादव का धंधा भी इन दिनों काफी मंदा है. वे बताते हैं, ''लॉकडाउन के पहले आम दिनों में दस गाड़ी भूसा लखनऊ जिले में चल रही गोशालाओं के लिए आता था लेकिन अब बमुश्किल एक गाड़ी ही आ पा रही है. भूसे की कमी तो हो ही गई है साथ में खली-चूनी का स्टॉक भी खत्म होने के कगार पर है.''

गाय के चारे के आढ़तियों के अनुसार, लॉकडाउन से पहले जो चोकर 2,100-2,200 सौ रुपए प्रति क्विंटल बिकता था. वह अब 2,600 रुपए तक चढ़ गया है. अरहर, मसूर और चना चूनी के दाम भी 2,200 से चढ़कर 2,500 रुपए क्विंटल पर जा टिके हैं. पर भूसे का भाव तो तेजड़ियों की मानिंद दौड़ पड़ा है. वह 400 रुपए से सीधे 800 रुपए क्विंटल पर पहुंच गया है.

निराश्रित पशुओं को पूरे साल भरपेट भोजन देने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार अभी से भूसा खरीदकर उसका भंडारण करेगी क्योंकि इस समय कीमत काफी कम रहती है. सरकार ने इसके लिए 200 करोड़ रुपए का इंतजाम किया है. प्रदेश की पंजीकृत गोशालाओं के लिए भी सरकार ने 5.73 करोड़ रुपए की व्यवस्था की है, जिससे कि उनमें पल रहे गोवंश का पालन-पोषण किया जा सके. उत्तर प्रदेश मंडी परिषद गोशालाओं में रह रहे पशुओं के लिए धन देता है. यह धन उसे मंडियों से मिलने वाले सेस के जरिए मिलता है. इस समय 'राज्य गोसेवा आयोग' में करीब 500 पंजीकृत गोशालाएं हैं.

उत्तर प्रदेश में करीब पांच लाख निराश्रित गोवंश पशु अलग-अलग जिलों में पल रहे हैं. अब तक इनके पेट भरने के लिए सरकार अलग-अलग मदों से भोजन की व्यवस्था करती रही है. इसके तहत प्रति पशु 30 रुपए रोज की दर से खर्च का प्रावधान था. पर चारा काफी महंगा हो जाने के कारण यह कम पड़ रहा था. ऐसे में पशुपालन विभाग ने प्रति पशु 50 रुपए मुहैया करने का प्रस्ताव वित्त विभाग को भेजा था और बताते हैं, उच्च स्तर पर मिले निर्देशों के बाद वित्त विभाग उससे सहमत भी हो गया था. पर तभी आ पहुंचे कोरोना संकट और उसकी वजह से प्रदेश के खजाने पर पड़ रहे भारी दबाव को देखते हुए यह प्रस्ताव ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है. हां, अभी से भूसा खरीद कर उसका भंडारण करने का निर्णय जरूर लिया गया है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने निराश्रित गोवंश के लिए गोवंश अश्रयस्थलों पर मनरेगा मजदूरों के माध्यम से भूसा बैंक स्थापित करने का निर्देश दिया है.

उत्तर प्रदेश में निराश्रित गोवंशों की देखरेख और पालन-पोषण में कई महकमे लगे हैं. इसमें नगर विकास, पशुपालन और पंचायती राज विभाग प्रमुख हैं. इन विभागों ने गोवंशीय पशुओं की देखभाल के लिए अलग से भी धन का इंतजाम किया है. प्रमुख सचिव, पशुधन, भुवनेश कुमार बताते हैं, ''प्रदेश में करीब 5,000 'काऊ शेल्टर' बनवाए गए हैं, जिसमें पांच लाख से ज्यादा आवारा पशु रखे गए हैं. उनके चारे-पानी की व्यवस्था की निगरानी हर जिले के जिलाधिकारी खुद कर रहे हैं.''

उधर, हरियाणा की गोशालाओं में चारे से ज्यादा संकट मजदूरों का आ खड़ा हुआ है. करनाल जिले में तरावड़ी मंडी के पास शांतिवन गोपाल गोशाला चलाते हैं राम सिंह चौधरी. वे बताते हैं, ''लॉकडाउन की घोषणा के बाद मजदूर रुकने को बिल्कुल भी तैयार नहीं. एडवांस में पैसा देकर उन्हें रोकना पड़ रहा है.'' गोशालाएं चलाने के लिए आय के जो भी स्रोत थे, सब एक साथ बंद हो गए. लॉकडाउन में इनसान पहले अपनी चिंता कर रहा है. ऐसे में गोदान के नाम पर निकलने वाला दान-दक्षिणा भी रुक गया है. इसके अलावा, पशु मेले, प्रदर्शनी, और उन पर होने वाले सेमिनार वगैरह सब बंद हैं, जिनमें पहले विज्ञापन करके गोशाला के लिए फंड की व्यवस्था कर ली जाती थी. सरकार की ओर से कोई मदद पहले भी नहीं मिलती थी और लॉकडाउन ने आय के अन्य विकल्पों को भी लगभग खत्म कर दिया. चौधरी स्वीकार करते हैं, ''अभी पैसों की व्यवस्था नहीं हो पाई तो भूसे का बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा. अभी जो भूसा 350-400 रुपए क्विंटल मिल जाएगा, उसी के दाम चार महीने बाद 800 से 900 रुपए क्विंटल होंगे.''

चारे-पानी की कमी, ठप हुई आमदनी और प्रवासी मजदूरों की बेचैनी जैसे पहलू लॉकडाउन में गोशालाओं के संचालन में बड़ी बाधा बन रहे हैं. समय रहते सरकारें नहीं चेतीं तो समस्या के विकराल होने का खतरा है. हालांकि, केंद्र सरकार ने लॉकडाउन संबंधी नई गाइडलाइन्स में 20 अप्रैल के बाद गोशालाओं को लेकर भी छूट देने की बात कही है.

मध्य प्रदेश की भी ज्यादातर गोशालाओं में चारा लगभग न के बराबर बचा है. सरकार भी ज्यादा कुछ कर पाने की स्थिति में है नहीं है. प्रदेश में कुल 627 गोशालाएं पंजीकृत हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इनमें से 625 काम कर रही हैं और इनमें कुल 1,66,967 गोवंश है. गोशालाओं में मौजूद चारे का स्टॉक खत्म होने को है. राजधानी भोपाल की ज्यादातर गोशालाओं में गायों को एक समय ही भूसा दिया जा रहा है. शहर में आम लोग गरीबों की मदद के लिए तो आगे आए हैं लेकिन गोशालाओं की सुध लेने वाला कोई नहीं है.

भोपाल की राधाकृष्ण गोशाला के संचालक पुरुषोत्तम शर्मा बताते हैं, ''आम दिनों में हमारे लिए भूसे का इंतजाम करना मुश्किल नहीं था. लेकिन अब जैसे हालात बन गए हैं उसमें ऐसा कर पाना आसान नहीं रहा.'' वैसे, मध्य प्रदेश में गोशालाओं और गायों की देखरेख के लिए गोसंवर्धन बोर्ड भी है लेकिन जिस तरह के हालात बन रहे हैं, उसमें उन्हें काम करना मुश्किल हो रहा है. भोपाल संभाग के पशुपालन विभाग के संयुक्त संचालक ओ.पी. ओढ़ का कहना है कि फरवरी में पंजीकृत गोशालाओं को अनुदान दे दिया गया था. उनका कहना है, ''बेहतर यही है कि पशुधन को पंजीकृत गोशालाओं में छोड़ दिया जाए. वहीं पर उनकी व्यवस्था कर दी जाएगी.''

मध्य प्रदेश के सभी जिलों में यही हाल है. सागर जिले में कुल 20 जगह गोशालाएं हैं. इन 20 में 14 तो पानी की कमी के चलते लगभग बंद हो गईं हैं. यहां गायें न के बराबर हैं. देवरी खकरिया की गोशाला में अब गायें नहीं हैं. यहां पानी के साथ भूसे की व्यवस्था भी नहीं की जा सकी. समाजसेवी पवन घुआरा कहते हैं, ''कमलनाथ सरकार ने जो गोशालाओं की दशा सुधारने को लेकर अच्छी पहल शुरू की थी वह उनकी सरकार के गिरने के बाद धराशायी हो गई. अब किसी भी गोशाला में जानवरों को चारा नसीब नहीं हो रहा है.'' आपदा की घड़ी में गोशालाओं की चारदीवारी में गोवंश का कोई पुरसाहाल नहीं लगता.

—साथ में आशीष मिश्र, शुरैह नियाजी और संतोष पाठक

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