सिर पर मंडराती चुनौतियां

तीन महत्वपूर्ण हिंदी प्रदेशों में हार के बाद 2019 के लोकसभा चुनावों के मद्देनजर पार्टी में दोबारा जोश भरने के लिए भाजपा को क्या सीखने की जरूरत

चंद्रदीप कुमार
चंद्रदीप कुमार

दिसंबर की 11 तारीख, दोपहर 2 बजे. ज्यों ही राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा की चुनावी हार साफ हो गई और मध्य प्रदेश में एक और झटके की आशंका तेज हुई, तो नई दिल्ली में पार्टी के राष्ट्रीय मुख्यालय में उदासी छा गई. इसके विपरीत मार्च 2018 में त्रिपुरा में भारी जीत से खुश केंद्रीय मंत्रियों और भाजपा नेताओं का यहां तांता लग गया था. इस बार पार्टी प्रवक्ता ही यहां दिख रहे थे.

चुनावी उलटफेरों का संदेश साफ है कि भाजपा को 2019 के लोकसभा चुनावों में हिंदी पट्टी के इन तीन राज्यों में चुनौती का सामना करना पड़ेगा, जहां पार्टी ने 2014 में 65 में से 62 संसदीय सीटें जीतकर सबका सूपड़ा साफ कर दिया था. पार्टी का आधिकारिक बयान हालांकि इससे अलहदा है. भाजपा प्रवक्ता गौरव भाटिया ने कहा, "हम जनादेश को स्वीकार करते हैं. मगर यह कहना कि इससे 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए सवाल खड़े हो गए हैं, बहुत दूर की कौड़ी है.'' उन्होंने यह भी कहा, "छत्तीसगढ़ पर हमें गहराई से आत्ममंथन करने की जरूरत है, पर मध्य प्रदेश में हमारे चौथे कार्यकाल के लिए चुनाव में कांग्रेस बमुश्किल ही हमसे आगे निकल सकी. राजस्थान में हमने विरोधियों की उम्मीद से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया.''

भाजपा के भीतरी सूत्रों के मुताबिक, राजस्थान में वसुंधरा राजे के खिलाफ जबरदस्त सत्ता विरोधी भावना को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने खोई जमीन दोबारा हासिल करने में खासी मदद की और मध्य प्रदेश में 15 साल से सत्ता में होने के बाद भी हार बहुत कम फासले से हुई है.

फिर भी मोदी-शाह जोड़ी के लिए यह आत्ममंथन का वक्त है. साफ है कि इन तीन राज्यों में भाजपा के कार्यकर्ता बढ़ती सत्ता-विरोधी भावना के आगे मतदाताओं का मन बदलने में नाकाम रहे. छत्तीसगढ़ में मोदी-शाह के धुआंधार चुनाव अभियान और केंद्र सरकार की योजनाओं का असर भी रमन सिंह की सरकार को नहीं बचा सका, जो भ्रष्टाचार और लचर राजकाज के आरोपों से जूझ रही थी. कांग्रेस के एक बड़े नेता स्वीकार करते हैं, "राजस्थान में भाजपा ने कम से कम 20 सीटें मोदी और शाह के प्रचार अभियान और चतुर बूथ प्रबंधन की बदौलत जीतीं.''

लोकलुभावन मुद्दों का दबाव

2008 और 2013 के विधानसभा चुनावों में भाजपा के स्टार कैंपेनर मोदी ने इन तीन राज्यों में केंद्र की यूपीए सरकार की नाकामियों के दम पर कांग्रेस को धूल चटाई थी. मगर इस बार उन्हें यह खुशकिस्मती हासिल नहीं थी, क्योंकि केंद्र में खुद उन्हीं की हुकूमत है. भाजपा की बड़ी चूक शायद यह थी कि वह किसानों की कर्ज माफी और बेरोजगार नौजवानों को नकद खैरात का वादा करने में नाकाम रही. इस मामले में कांग्रेस कहीं अधिक चतुर निकली. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के पूर्व कार्यकर्ता और भाजपा समर्थक कुलदीप रत्नू कहते हैं, "इसका एक नतीजा यह होगा कि 2019 का लोकसभा चुनाव जीतने की गरज से मोदी सरकार पर लोकलुभावन रास्ता अपनाने का दबाब बढ़ेगा. सुशासन को इसकी बड़ी कीमत चुकानी होगी क्योंकि मोदी ने कभी खैरात बांटने के कार्ड का इस्तेमाल करना पसंद नहीं किया.''

मध्य प्रदेश में कांग्रेस ने वोट हिस्सेदारी में पिछले चुनाव का 9 फीसदी का फासला मिटा लिया और सीटों के मामले में भाजपा से आगे निकल गई. हालांकि कुछ जानकार मानते हैं कि इसे 2019 में भाजपा के पतन का संकेत नहीं मानना चाहिए, क्योंकि मोदी अब भी बड़ी ताकत हैं और चतुर रणनीतिकार शाह गलतियों से तेजी से सीखते हैं. भाजपा के एक शीर्ष नेता कहते हैं, "ये नतीजे भाजपा के लिए बिल्कुल सही वक्त पर आए हैं और 2019 के चुनाव से पहले बड़ा सुधार लाने के लिए हमें बाध्य और प्रेरित करेंगे.''

आत्ममंथन का वक्त

हालांकि मोदी और शाह ने तीनों सत्तारूढ़ मुख्यमंत्रियों को खुद अपनी चुनावी रणनीति बनाने की काफी छूट दी थी, पर पार्टी में यह भी महसूस किया जा रहा है कि इस शीर्ष जोड़ी को अपनी व्यक्तिवादी कार्यशैली से निजात पानी चाहिए और पार्टी के वरिष्ठ साथियों और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सहयोगियों को विश्वास में लेकर ज्यादा सर्वानुमति पर आधारित तरीका अपनाना चाहिए.

कई भाजपा नेता लोकसभा चुनाव की तैयारी की खातिर एनडीए के भीतर तालमेल के लिए इसे बेहद अहम मानते हैं—इसकी तस्दीक इस बात से भी होती है कि एनडीए के कई घटक दल, मसलन, तेलुगु देशम पार्टी, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी, मरुमलार्ची द्रविड़ मुनेत्र कडग़म, हरियाणा जनहित कांग्रेस और पट्टाली मक्काल काचि, या तो गठबंधन छोड़कर जा चुके हैं या सरकार से नाराज हैं. एनडीए के सहयोगी जनता दल (यूनाइटेड) के नेता के.सी. त्यागी कहते हैः "एनडीए की एक भी बैठक नहीं हुई है. हमारे नेता नीतीश कुमार को इन तीन राज्यों में चुनाव प्रचार के लिए बुलाया जाना चाहिए था.

आखिर वे राष्ट्रीय नेता हैं.'' भाजपा के एक शीर्ष नेता अपना नाम उजागर न करने की शर्त पर कहते हैं, "यह उनके (मोदी-शाह के) लिए बेशक आत्ममंथन का लम्हा है.''

एक राय यह है कि अगर भाजपा ने इस साल फरवरी में हुए तीन उपचुनावों की हार से यह बात समझी ली होती कि राजे के खिलाफ सत्ता विरोधी भावना जोर पकड़ रही है और उन्हें वहां से हटाकर केंद्र में ले आती, तो राजस्थान को हाथ से निकलने से रोका जा सकता था.

इसलिए अब वक्त आ गया है कि दूसरे राज्यों में भी कमजोर कामकाज कर रहे मुख्यमंत्रियों के बारे में सोचा जाए. मसलन, मोदी-शाह को देर-सवेर हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर और झारखंड के रघुबर दास के भविष्य का फैसला करना होगा, जो लचर राजकाज के मुद्दों से दरपेश हैं.

अयोध्या की ऊहापोह

भाजपा के लिए तीन-शून्य की यह पराजय ऐसे समय आई है जब पार्टी के भीतर और संघ परिवार से जुड़े संगठनों के बीच भी अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का रास्ता साफ करने लिए कानूनी हस्तक्षेप की मांग जोर पकड़ रही है. आरएसएस मोदी सरकार पर दबाव डाल रहा है कि वह मंदिर निर्माण को मुमकिन बनाने के लिए अध्यादेश लाए. आरएसएस के एक नेता कहते हैं, "इस किस्म का अध्यादेश ज्यों ही वोटिंग के लिए (संसद में) आएगा, नरम हिंदुत्व के रास्ते पर चलने वालों का फौरन पर्दाफाश हो जाएगा.'' अलबत्ता भाजपा के सूत्र इशारा करते हैं कि मोदी की राय लोकसभा चुनाव अच्छे राजकाज और स्वच्छ छवि के दम पर लड़े जाने के पक्ष में है, न कि अयोध्या जैसे भावनात्मक मुद्दे को तूल देकर.

फिर भी तीन अहम राज्यों की हार से प्रधानमंत्री पर अयोध्या के मामले में अध्यादेश का रास्ता अपनाने का दबाव बढ़ जाएगा. अगर वे इसके आगे झुकते हैं तो उन्हें चुनावी फायदे के लिए धार्मिक मुद्दे का सहारा लेने के आरोप का सामना करना पड़ेगा. दूसरी तरफ, विपक्ष के इस आरोप का सामना करना होगा कि अयोध्या में मंदिर बनाने का उसका वादा खोखला है और इस मुद्दे को वह केवल तभी उठाती है जब चुनाव करीब होते हैं. कांग्रेस नेता सी.पी. जोशी ने हाल ही में कहा था कि अयोध्या में राम मंदिर को केवल कांग्रेस ही साकार कर सकती है, जबकि भाजपा इस मुद्दे का सियासी फायदा उठाती रहेगी.

कुछ खोया, कुछ पाया

उम्मीद की जा रही है कि विधानसभा चुनावों के नतीजे लोकसभा के चुनावों को प्रभावित कर सकते हैं. इन तीन राज्यों में भाजपा की सीटों की संख्या अच्छी-खासी घट सकती है. ऐसे में पार्टी को इन संभावित नुक्सान की भरपाई के लिए दोगुनी कोशिश करनी होगी. उसे पश्चिम बंगाल में, जहां 27 फीसदी से ज्यादा आबादी मुस्लिम है, ओडिशा में, जहां आदिवासी असंतोष कमोबेश वैसा ही हो सकता है जैसा इन चुनाव में छत्तीसगढ़ में देखा गया है, और दक्षिणी राज्यों में कहीं ज्यादा सीटें जीतनी होंगी.

अहम बात यह है कि भाजपा ने इस बात का मूल्यांकन करना पहले ही शुरू कर दिया है कि दलितों की नाराजगी ने मध्य प्रदेश में उसकी हार में किस हद तक योगदान दिया हो सकता है. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (उत्पीडऩ रोकथाम) कानून के कुछ सख्त प्रावधानों को हल्का करने को लेकर इस साल देश भर में दलितों में नाराजगी देखने को मिली थी. इससे भाजपा सरकार को उत्पीडऩ रोकथाम कानून को सख्त बनाने पर मजबूर होना पड़ा था. दूसरी तरफ सवर्ण जाति समूहों में, खासकर मध्य प्रदेश में, इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई. साफ है कि 2019 में सत्ता में दोबारा लौटने की उम्मीद कर रही पार्टी के सामने करने को बहुत काम हैं और अब संतुष्ट होकर बैठने की उसके लिए कोई गुंजाइश नहीं रह गई है.

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