छत्तीसगढ़ः बदलाव की लहर

लगातार काशिशों और भाजपा के खिलाफ सत्ता-विरोधी रुझान से कांग्रेस को मिली उम्मीदों से बड़ी जीत, लेकिन अब ऊंचे वादों को निभाने की चुनौती

अरिजित सेन गेट्टी इमेजेज
अरिजित सेन गेट्टी इमेजेज

कई बार ऐसा होता है कि बनिस्बतन नौसिखुए अदाकारों के साथ मजबूत पटकथा पर बनी फिल्म बड़े और धांसू सुपरस्टारों की अदाकारी से सजी फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर धूल चटा देती है. छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनावों के नतीजे आए, तो कांग्रेस ने अपने राज्य स्तर के नेताओं की अगुआई में भाजपा के सितारा मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को पछाड़ दिया.

18 साल पुराने इस राज्य के अब तक के सबसे निर्णायक जनादेश में कांग्रेस ने भाजपा को सत्ता से बेदखल कर दिया और वह भी उसने अपने जनाधार वाले नेता अजित जोगी के बगैर किया. तो कांग्रेस की जीत की यह पटकथा आखिर कैसे लिखी गई?

आइए, पहले जनवरी, 2016 में चलते हैं. अजीत जोगी के बेटे और कांग्रेस विधायक अमित को पार्टी से निकाल दिया जाता है, क्योंकि 2014 का एक टेप सामने आया जिसमें उन्हें एक उपचुनाव में कथित तौर पर भितरघात और सौदेबाजी करते सुना गया था.

प्रदेश कांग्रेस के प्रमुख भूपेश बघेल, जो जोगी के धुर विरोधी और कांग्रेस की मौजूदा जीत के दो सूत्रधारों में से एक हैं, ने अमित के खिलाफ तेजी से कदम उठाया और नतीजतन उनके पिता को भी पार्टी छोडऩे को मजबूर कर दिया. बघेल ने बड़े जोगी के असर और रसूख में काम कर रहे केंद्रीय नेतृत्व को बताया कि उन्होंने 2008 और 2013 में भी पार्टी के कई उम्मीदवारों के साथ भितरघात की थी जिससे ये उम्मीदवार वोटों के बहुत थोड़े अंतर से हार गए थे. उन्होंने कहा कि पार्टी जोगी के बगैर ज्यादा अच्छी रहेगी. राहुल गांधी ने, जो तब पार्टी के उपाध्यक्ष थे, उन पर रोसा किया. उन पर वह फैसला आज कारगर साबित हुआ.

दिलचस्प बात यह है कि जोगी पर रमन सिंह की "बी टीम'' होने का आरोप लगाया जा रहा था और अब लगता है कि उन्होंने आखिरकार भाजपा को ही नुक्सान पहुंचाया. पार्टी की वोट हिस्सेदारी 2013 की 41.2 फीसदी से घटकर इस बार 33 फीसदी पर आ गई है जो 8.2 फीसदी अंकों की गिरावट है. दूसरी तरफ कांग्रेस की वोट हिस्सेदारी 2013 की 40.4 फीसदी से बढ़कर इस बार 43 फीसदी पर पहुंच गई, जो 2.6 फीसदी अंकों का इजाफा है. जोगी की पार्टी जोगी कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जेसीसी) को 7.6 फीसदी वोट मिले, जबकि उसकी सहयोगी बहुजन समाज पार्टी ने 3.9 फीसदी वोट हासिल किए, जो 2013 में उसे मिले 4.3 फीसदी वोटों से कम हैं.

ये वोट आखिर आए कहां से, खासकर तब जब मतदान का औसत प्रतिशत 2013 के 77.1 फीसदी से घटकर 2018 में 76.4 फीसदी पर आ गया? पूरी संभावना है कि ये वोट भाजपा की झोली से आए. विडबंना है कि जब जोगी बीमार थे, तब भाजपा के नेता बृजमोहन अग्रवाल ने इंडिया टुडे  के राज्यों की दशा-दिशा कॉन्क्लेव में कहा था, "भाजपा अजीत जोगी के जल्दी अच्छे होने की प्रार्थना करती है. आखिरकार वही भाजपा के लिए चौथा कार्यकाल पक्का करेंगे.'' जाहिर है, उनकी प्रार्थना का सार्थक, मगर कांग्रेस को हक में!

बड़ी तादाद में सीटों पर तिकोना मुकाबला देखा गया. 90 में से 43 सीटों पर भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला हुआ. 14 सीटों पर विजेता की जीत का अंतर जेसीसी को मिले वोटों से कम था; दो सीटों पर जीत का अंतर गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के उम्मीदवारों को मिले वोटों से कम था; जबकि पांच सीटों पर जीत का अंतर बसपा के उम्मीदवारों को मिले वोटों से कम था. अजीत जोगी ने कहा, "हम बहुत कम वक्त में तीसरी ताकत बनने में कामयाब रहे और छत्तीसगढ़ की भावी राजनीति में अहम भूमिका अदा करेंगे.''

इस आदिवासी राज्य में कांग्रेस के अभियान को चार प्रमुख नेताओं ने सहारा दिया. उनके अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र हैं, मगर इतने भी नहीं कि एक दूसरे को नुक्सान पहुंचा पाएं, जैसा जोगी ने कथित तौर पर पहुंचाया था. चुनाव पर असर डालने वाली कुछ निश्चित बातों को देखते हुए हरेक के समर्थन आधार को लगा कि उनके नेता के शिखर पर पहुंचने की अच्छी संभावना है.

लिहाजा तकरीबन 10 फीसदी वोट रखने वाले कुर्मी मजबूती से बघेल के पीछे खडे रहे, तो छत्तीसगढ़ के उत्तरी इलाकों ने विपक्ष के नेता टी.एस. सिंहदेव का पक्का समर्थन किया. इसी तरह छत्तीसगढ़ से कांग्रेस के इकलौते लोकसभा सांसद ताम्रध्वज साहू के समर्थकों को लगा कि उन्हें पार्टी के ओबीसी सेल का मुखिया और सीडब्ल्यूसी का सदस्य बनाकर और आखिरी मौके पर दुर्ग ग्रामीण विधानसभा सीट से चुनाव में उतारकर पार्टी समुदाय को यह संदेश दे रही है कि राज्य की सबसे ऊंची कुर्सी के लिए वे भी दावेदार हैं. साहू चुनाव के लिहाज से छत्तीसगढ़ का सबसे ताकतवर समुदाय हैं, जिनके 8 सदस्यों को कांग्रेस ने और 14 को भाजपा ने चुनाव मैदान में उतारा था.

कांग्रेस के पुराने नेता और कार्यकर्ता चरणदास महंत के पीछे एकजुट हो गए, जो खुद भी पिछड़ा वर्ग समुदाय से आते हैं. वे अविभाजित मध्य प्रदेश में और केंद्र में यूपीए की सरकार के दूसरे कार्यकाल में मंत्री रह चुके हैं, लिहाजा त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में विधायकों को एकजुट रखने में उनका तजुर्बा खासा काम आया होता. दिलचस्प बात यह भी है कि इन चारों नेताओं ने अपनी-अपनी सीटें आसानी से अच्छे अंतर से जीत लीं. कांग्रेस ने उत्तर छत्तीसगढ़ की सभी 14 सीटें जीतीं, जहां से सिंहदेव आते हैं.

नतीजों से बिल्कुल साफ है कि छत्तीसगढ़ में वोट बदलाव के लिए और सत्ता के खिलाफ दिया गया है. जोगी ने चुनाव अभियान के दौरान ही भांप लिया कि लोग जानना चाहेंगे कि कांग्रेस और जेसीसी में से सच्चा विपक्ष कौन-सी पार्टी होगी और इसलिए उन्होंने मतदाताओं को यह बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि वे भाजपा की श्बी टीम्य नहीं हैं. उन्होंने धर्मग्रंथों पर हाथ रखकर कसम खाई कि चुनाव के बाद त्रिशंकु विधानसभा का फैसला आने पर वे भाजपा के साथ किसी भी कीमत पर नहीं जाएंगे.

कांग्रेस के घोषणापत्र के मुक्चय शिल्पकार होने के नाते सिंहदेव तकरीबन 900 सामाजिक धड़ों के साथ विचार-विमर्श के बाद एक समावेशी दस्तावेज लेकर आए. उसकी मुख्य खासियतों में सार्वभौम खाद्य योजना भी थी जिसके तहत प्रत्येक परिवार को 1 रु. प्रति किलो की दर से 35 किग्रा चावल दिया जाएगा, जबकि अभी उन्हें 7 किग्रा चावल मिल रहा है और 25 किलो देने का वादा किया गया था.

लगता है कि किसानों से किए वादों ने भी इस समुदाय में पसरे असंतोष और विरोध का फायदा उठाने में कांग्रेस की मदद की. इनमें कर्ज माफी, धान के लिए 2,500 रुपए का खरीद मूल्य और साथ ही धान के किसानों को 2015 और 2016 के टलते आ रहे बोनस के भुगतान का वादा प्रमुख है. पार्टी ने राज्य में बेरोजगार नौजवानों को 2,500 रुपए महीने का भत्ता देने का वादा भी किया है, जिनकी तादाद तकरीबन 24 लाख आंकी जाती है. यह भी वादा किया गया कि राज्य में बाहर से आउटसोर्सिंग पर भी पाबंदी लगाई जाएगी.

भाजपा की हार के संभावित कारणों के बारे में रायपुर में रहने वाले राजनैतिक विश्लेषक अशोक तोमर कहते हैं, "यह साफ तौर पर बदलाव का वोट है. बोनस का भुगतान, ज्यादा खरीद मूल्य और कर्ज माफी ने किसानों को आकर्षित किया. इसके विपरीत सेलफोन सरीखी रेवडिय़ां बांटना, जिसे गेमचेंजर बताया जा रहा था, भाजपा के काम नहीं आया.''

लगता है, जेसीसी-बसपा को जाने वाले एससी वोटों में सेंध लगाने की कांग्रेसी रणनीति भी कारगर रही है. पार्टी ने सतनामी गुरु रूद्रकुमार को मैदान में उतारा, जो जीत गए, और समुदाय के एक और प्रमुख नेता बालदास को चुनाव के ऐन पहले अपने पाले में ले आई. कांग्रेस ने 10 एससी सीटों में 2013 की एक के मुकाबले इस बार 6 सीटें जीतीं और इसमें उसकी मदद एससी सीटों के गैर-एससी वोटों ने भी की.

पार्टी ने एसटी के लिए आरक्षित सीटों पर भी ज्यादा निर्णायक जनादेश हासिल किया और 29 में से 25 सीटें जीत लीं; वहीं जेसीसी को एक और भाजपा को (2013 की 11 के मुकाबले) तीन सीटें मिलीं, जबकि उसकी रणनीति का बड़ा हिस्सा इन सीटों की तादाद बढ़ाने को समर्पित था. बस्तर इलाके में कांग्रेस ने सबका सूपड़ा साफ कर दिया. वहां पार्टी 12 में से 11 सीटें जीत गई जो उसकी 2013 की सीटों से तीन ज्यादा हैं. वह भी तब जब रमन सरकार तेंदू पत्ता बीनने का बोनस, प्रेशर कुकर और टिफिन बांट रही थी.

दिलचस्प है कि राज्य की 32 फीसदी आबादी आदिवासी है, जबकि भाजपा के पास राज्य में एक भी कद्दावर आदिवासी नेता नहीं है. भाजपा ने सबसे ज्यादा गफलत अलबत्ता टिकट बंटवारे में की. यहां तक कि यह बात अकेले में उसके नेता भी स्वीकार करते हैं. दूसरी तरफ कांग्रेस ने 25 नए चेहरे मैदान में उतारे, जिनमें से कई जीत गए.

आम धारणा थी कि छत्तीसगढ़ में अंधाधुंध भ्रष्टाचार का बोलबाला है और भाजपा को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी. रमन अपने मंत्रियों पर लगाम नहीं कस पाए. रायपुर के एक बड़े अफसर कहते हैं, "डॉ. रमन सिंह आयुर्वेद के डॉक्टर हैं और सियासी दोस्तों और विरोधियों से निपटने का उनका तरीका भी आयुर्वेद में अपनाए जाने वाले गैर-आक्रामक उपचार से मिलता-जुलता है.''

11 दिसंबर की शाम को राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंपने से पहले रमन सिंह ने कहा, "मैं जनादेश के लिए कांग्रेस को बधाई देता हूं और आग्रह करता हूं कि वह लोगों से किए गए अपने वादे पूरे करे. मैं खुशकिस्मत हूं कि राज्य के लोगों ने मुझे 15 साल तक अपनी सेवा करने का मौका दिया. ये चुनाव मेरे नेतृत्व में लड़े गए थे. मैं पराजय की नैतिक जिम्मेदारी लेता हूं और जिम्मेदार तथा मजबूत विपक्ष के तौर पर काम करूंगा.'' ठीक उसी दौरान किसी दूसरी जगह बघेल मीडिया से कह रहे थे, "मैंने भाजपा की सरकार को उखाड़ फेंकने की कसम खाई थी और मैंने अपना वादा पूरा कर दिया है.''

कांग्रेस ने लड़ाई जीत ली है, पर युद्ध अभी बाकी है, खासकर राज्य के खजाने को उलीचे बगैर ऊंचे चुनावी वादों को पूरा करना आसान नहीं हो सकता है. 2018-19 में छत्तीसगढ़ के बजट में 83,000 करोड़ रु. की कुल आमदनी आंकी गई है, जिसमें 32,000 करोड़ रु. राज्य के राजस्व से आने वाले हैं. रमन सिंह ने चुनावों से पहले शिक्षाकर्मियों की तनख्वाह में जबरदस्त बढ़ोतरी का ऐलान किया था, जो धान के बोनस के साथ मिलकर गैर-योजना खर्च को आसमान पर पहुंचा देगा. धान के बढ़े हुए खरीद मूल्य, कर्ज माफी और पिछले बकाया बोनस को भी जोड़ लें, शराबबंदी से होने वाले राजस्व के नुक्सान का तो खैर कहना ही क्या, तो राज्य के पास बुनियादी ढांचे पर होने वाले खर्च में कटौती करने के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा.

अच्छी रणनीति और सत्ता विरोधी भावना ने कांग्रेस की झोली उम्मीद से कहीं ज्यादा वोटों से भर दी. अब उसे चुनावी वादे पूरे करने हैं.

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