स्त्री और ईश्वरः पितृसत्ता का इतिहास
उमा चक्रवर्ती (नारीवादी इतिहासकार और जेंडरिंग कास्टः थ्रू अ फेमिनिस्ट लेंस की लेखिका)

जब हम आधुनिक हिंदू धर्म की बात करते हैं तो हमारा क्या तात्पर्य होता है? हमें इस बात को लेकर स्पष्ट होने की जरूरत है कि सबरीमाला का संबंध ऐसे भगवान से जुड़ी धार्मिक प्रथा से है जिन्हें ब्रह्मचर्य सिद्धांत से महत्वपूर्ण माना जाता है. इसी कारण एक परंपरा लंबे समय से चलती आ रही है कि इस मंदिर में पूजा के लिए आने से पहले श्रद्धालुओं को एक नियत समय तक "यौन शुचिता'' अपनाना जरूरी था. उन्हें कई संकल्प लेने होते थे और इसी आधार पर उन्होंने महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा रखे थे.
हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि ब्रह्मचर्य से प्रेरित धर्म अधिक नारी-विद्वेषी होने लगता है. आपका ब्रह्मचर्य के प्रति आग्रह है, तो जाहिर है कि महिलाओं के प्रति गहरा संदेह होगा. सबरीमाला में तो ब्रह्मचर्य के आयाम के साथ-साथ महिलाओं को अशुद्ध मानकर उनके साथ भेदभाव की बात भी थी. यहां 10 से लेकर 50 साल तक की महिलाओं के लिए प्रवेश बस इस कारण वर्जित था क्योंकि उन्हें मासिक धर्म होता है. इसके पीछे कोई दार्शनिक या मूल आध्यात्मिक सिद्धांत नहीं है.
हिंदू धर्म ने पवित्र और अपवित्र के बीच की जैसी रेखा खींच रखी है, वैसा किसी भी अन्य धर्म में नहीं है. यहां स्पष्ट रूप से एक तरफ महिलाओं के प्रति तो दूसरी तरफ पर दलितों के प्रति पक्षपातपूर्ण आचरण रहा है. भगवान की परिकल्पना से इसका क्या सरोकार है? कोई सरोकार नहीं है. यह सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं का हिस्सा है जो "हिंदू धर्म'' को परिभाषित करने के तरीकों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
बहरहाल, पितृसत्ता तो पहले से ही मौजूद है और इसी विचार से ग्रस्त है कि पुरुष का स्त्री पर अधिकार होता है और पुरुष ही विचारों की दुनिया को नियंत्रित करता है. हर कोई वैदिक दार्शनिक गार्गी की कहानी सुनाकर कहता है, "ओह, शानदार. यही एक महिला थी जो याज्ञवल्क्य के साथ शास्त्रार्थ कर सकती थी.'' लेकिन गौर से देखें तो पाएंगे कि गार्गी अकेली छह लोगों के साथ शास्त्रार्थ कर रही थी. याज्ञवल्क्य के साथ शास्त्रार्थ करने वालों में पांच पुरुष हैं, गार्गी अकेली स्त्री है.
याज्ञवल्क्य से प्रश्न पूछने का साहस भी सिर्फ वही कर पा रही है. और आखिरकार हुआ क्या? याज्ञवल्क्य ने अपने उत्तर से संतुष्ट करके शास्त्रार्थ समाप्त नहीं किया, बल्कि बोल पड़े, "हे स्त्री! इतने ज्यादा प्रश्न न करो कि तुम्हारा मस्तिष्क टुकड़े-टुकड़े न हो जाए.'' क्या यह शास्त्रार्थ की परंपरा के अनुकूल था? बेशक, गार्गी विदुषी थी, लेकिन यह भी गौर करना चाहिए कि आखिरकर उसे कैसे चुप करा दिया गया था. फिर उसे कहना ही पड़ा, "हां, निस्संदेह आप सबसे महान हैं.'' इसलिए, महिलाओं को अंततोगत्वा यही कहना होता है कि वे प्रचलित परंपराओं से पूर्णतः सहमत हैं.
उमा चक्रवर्ती (नारीवादी इतिहासकार और जेंडरिंग कास्टः थ्रू अ फेमिनिस्ट लेंस की लेखिका से बातचीत पर आधारित
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