अब नहीं मंजूर हमारा वजूद
स्वीकार्यता बेहतर शब्द है. सहिष्णुता में पराए को बर्दाश्त करना होता है जबकि स्वीकार करना स्वाभाविक क्रिया है

जब दिल्ली हाइकोर्ट ने 2009 में एलजीबीटीक्यू अधिकारों के पक्ष में फैसला सुनाया तब हफ्तेभर बाद ही मैं फिल्म आइ एम की शूटिंग की तैयारी कर रहा था. सो, मैंने उस फैसले के हिसाब से कहानी में थोड़ा फेरबदल कर दिया. लेकिन जब मैं केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) के पास पहुंचा तो कहा गया कि फिल्म में गे अधिकारों से जुड़े 23 मिनट के प्रसंग से 21 मिनट का प्रसंग काट दिया जाए. ये कुछ इस तरह थे, "अरे, दो गे एक-दूसरे को रोमांटिक नजरों से देख रहे थे. भला यह कैसे बर्दाश्त किया जा रहा है?'' पर हम अड़ गए क्योंकि कानून हमारे हक में था.
फिर 2017 में मैं फिल्म शब लेकर सीबीएफसी गया तो उन्होंने टिप्पणी की, "आपने तो इनको नॉर्मल दिखा दिया.'' 2013 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला उन्हें अधिकार दे रहा था कि वे किसी गे को उसके मुंह पर अपमानित कर सकें.
बतौर कलाकार, मैं पहले ही समझौता कर रहा था क्योंकि मैंने वे अंतरराष्ट्रीय दृश्य नहीं दिखाए जिनमें गे ट्रैक हों. आखिर फिल्म प्रमाणन अपीली पंचाट के दो बार दौरे और छह महीने बाद यू/ए सर्टिफिकेट मिला. जब मैंने नए फैसले को सुना तो कुछ पल तो मेरी आंखों में आंसू आ गए, मैं चीख पड़ा क्योंकि 2013 के फैसले के बाद मुझे ये दिन देखने की सारी उम्मीदें टूट चुकी थीं. मैं सोचने लगा कि अब शायद मुझे खुद को सेंसर न करना पड़े.
बतौर कलाकार मैं अब इस पर समझौता नहीं करूंगा कि अपनी बिरादरी को कैसे दिखाऊं. इस फैसले ने मुझे ताकत भी दी है कि मैं चुपचाप अपमान को पी न जाऊं. मैं ईश्वर का शुक्रिया अदा करता हूं कि सुप्रीम कोर्ट वैसा लोकलुभावन नजरिया नहीं रखता, जिसका दोषी हमारा फिल्मोद्योग है, न सिर्फ गे बिरादरी के मामले में बल्कि औरतों के मामले में भी वह तंग नजरिए का शिकार है. वहां समलैंगिकों से घृणा हावी है और सामाजिक जागरूकता का अभाव है.
कुछ दिन पहले ही मैं इस फैसले को ध्यान में रखकर एक टीवी चैनल से शब दिखाने के लिए गिड़गिड़ा रहा था, आप इतनी सारी फिल्में दिखाते हो, इस छोटी-सी फिल्म के लिए मौका नहीं निकाल सकते? यह सोचकर मेरा दिल बैठ जाता है कि मेरी फिल्म दुनिया भर में घूम आई पर मेरे अपने ही देश में उसे नहीं दिखाया जा सका. बतौर गे फिल्मकार, मुझे सीबीएफसी की बकवास के अलावा फिल्मोद्योग में कोई भेदभाव नहीं सहना पड़ा.
मेरी फिल्म माइ ब्रदर निखिल को बिना किसी काट-छांट के श्यू्य सर्टिफिकेट मिला था. यशराज फिल्स इसका डिस्ट्रिब्यूटर था. लेकिन वक्त गुजरने के साथ मैंने पाया कि हालात मुश्किल होने लगे. कोई पैसा लगाने को भी तैयार नहीं होता क्योंकि आम धारणा है कि ऐसी फिल्मों के दर्शक नहीं होते. पुरुष को अभी भी ताकत का पर्याय माना जाता है. मैं हमेशा कहता हूं कि मेरी फिल्मों के दर्शकों में औरतें ज्यादा होंगी क्योंकि वे भेदभाव का दर्द ज्यादा महसूस करती हैं.
आप समाज को कैसे बदलेंगे? यह सामूहिक प्रयास से ही संभव है. इसकी शिक्षा स्कूल स्तर से दी जानी चाहिए, जहां सबको प्रेम और सम्मान देने की सीख मिले. पाठ्यक्रम में लैंगिक भेदभाव के खिलाफ बातें और सेक्स एजुकेशन शामिल होनी चाहिए. मुझे सहिष्णुता शब्द से नफरत है, स्वीकार्यता बेहतर शब्द है. सहिष्णुता में पराए को बर्दाश्त करना होता है जबकि स्वीकार करना स्वाभाविक क्रिया है.
मुझे मालूम है कि बॉक्स ऑफिस पर कमाई मायने रखती है पर क्या हमें जिम्मेदार और दूसरों के अधिकारों का समर्थन करने की जरूरत नहीं है. जितने ज्यादा लोग हमारी फिल्में देखेंगे, उनमें ऐसे भाव उतने ही मजबूत होंगे. मेरा यही संघर्ष है और मैं कभी-कभी इसमें थक जाता हूं. अभी कल तक ऐसे लोगों का वजूद ही नहीं माना जाता था. चीजें रातोरात नहीं बदलतीं. यह तो शुरुआत भर है.
(सुहानी सिंह से बातचीत पर आधारित)
लेखक राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्मकार हैं

