ये मलिकाएं हैं खास क्योंकि....
दिन में सामान्य कामकाजी, रात में महारानी. बदलते भारत के कई ठिकानों पर ड्रैग आयोजनों की धमक, जहां पुरुष महिलाओं का रूप धारण कर मनाते हैं जश्न

यकीनन औरत की तरह सजना-संवरना आजादी है.'' दिल्ली के युवा डांसर प्रतीक सचदेव अपने हाव-भाव से भी इसे जाहिर करते हैं. हॉस्पिटैलिटी मैनेजमेंट के डिग्रीधारी सचदेव सप्ताहांत की रातों में मेकअप करते हैं, ग्लैमरस ड्रेस और ऊंची हील में क्लबों में पहुंच जाते हैं.
ये नए जमाने की ड्रैग क्वीन या महिलाओं को धरने वाले पुरुष हैं. यह नया फैशन है मगर इस देश में आदमियों के औरतों का रूप धरकर मंच पर प्रदर्शन करने की लंबी परंपरा रही है. यह परंपरा लोक रंगमंच से आई है. मसलन, बंगाल में नौटंकी जात्रा में मर्द ही औरतों के किरदार अदा करते रहे हैं क्योंकि औरतों को मंच पर आने की मनाही थी.
लेकिन शहरी भारत की यह नई नस्ल इस नए फैशन के लिए पुरानी लोक-नाट्य परंपरा से कहीं अधिक शायद अमेरिकी सुपरस्टार रूपॉल की एहसानमंद है. 57 बरस के रूपॉल की किसी मलिका सरीखी अदाकारी इतनी लोकप्रिय हुई कि उसने खुद के रियलिटी शो रूपॉल्स ड्रैग रेस शुरू कर दिया है.
मगर यह आसान तो नहीं है. लिपस्टिक और मस्कारा से सजे चेहरों के ग्लैमर, कायापलट के रोमांच के बावजूद इन मर्द मलिकाओं को भारी जद्दोजहद करनी पड़ती है ताकि लोग उन्हें कलाकार की तरह पहचानें, उनकी कला को मान्यता मिले.
मध्यमवर्गीय, पारंपरिक परिवारों और प्रवासियों की बस्ती दिल्ली के लाजपत नगर के एक-कमरे के किराये के घर में युवा बिनैरा वैष्णो पवार रहते हैं.
उनके पड़ोसी सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वायरनमेंट में लीगल रिसर्चर 27 वर्षीय इशाकु बेजबरुआ के भीतर एक ड्रैग क्वीन बसती है जिसका नाम है खुशबू.
बिनैरा की बहन तान्या खुशबू की पहली हमराज हैं. बिनैरा कहते हैं, "औरतों के वेश में मर्द मुझे आकर्षित करते हैं. मुझे उस (इशाकु) पर बहुत नाज है.''
मगर बेजबरुआ जानते हैं कि उनके बाकी पड़ोसी भी उन्हें इतनी ही आसानी से स्वीकार नहीं करेंगे, इसलिए वे अलग-थलग ही रहते हैं.
फिर भी वे कहते हैं, "ड्रैग एक कला है और मेरी देह मेरा कैनवस है, मेकअप और कपड़े मेरा पेंट हैं और मंच मेरे प्रदर्शन की जगह है. अगर मैं खुद अपनी मर्दानगी को चुनौती नहीं देता, तो फिर भला क्या मतलब है?''
बेजबरुआ कहते हैं कि उनके माता-पिता ने उनकी समलैंगिकता को तो किसी तरह स्वीकार कर लिया, पर वे इस बात से नाखुश थे कि उनका बेटा मर्द मलिका है. उन्हें पता चल ही गया जब उन्होंने देखा कि इशाकु ने अपने अमेजन अकाउंट से विग, पैडेड ब्रा और मेकअप के सामान का ऑर्डर दिया है.
वे कहते हैं, "लोग भड़क उठे, न केवल परिवार में बल्कि दोस्तों को भी रास नहीं आया कि कोई मर्द औरत की तरह पेश आए.'' मगर बेजबरुआ रूपॉल का हवाला देते हैं कहते हैं, "खुद को प्यार नहीं कर सकते तो कमबख्त दूसरे से कैसे करोगे.''
पिछले साल 31 अक्तूबर को खुशबू ने दिल्ली के कनॉट प्लेस से सटे आलीशान ललित होटल के एलजीटीबीक्यू के लिए दोस्ताना क्लब किट्टी सू में हैलोवीन नाइट के साथ पदार्पण किया. टाइट और ब्लॉन्ड विग में सजे-धजे उन्होंने मैगी रोजर के उदास गाने अलास्का पर लिप-सिंक किया.
उन्होंने गाया, मानो खुद अपने को सुना रही हो. "ऐंड आइ वॉक्ड ऑफ यू, ऐंड आइ वॉक्ड ऑफ एन ओल्ड मी.'' किट्टी सू राजधानी के ड्रैग फलक का केंद्र है.
एक परफॉर्मेंस के लिए 5,000 रु. सरीखी छोटी-सी रकम में देश भर की और कभी-कभी दुनिया भर की मर्द मलिकाएं आधी रात के बाद तक नाचती रहती हैं.
ललित एक किस्म की प्रयोगशाला बन गया है जो हिंदुस्तानी ड्रैग फलक की परवरिश करने बल्कि उसका सृजन करने में मदद कर रहा है. यहां आने वाले उत्सुक लोगों के लिए किट्टी सू इन रातों में शोर-शराबे से भरे, केवल वयस्कों के लिए बहुरूपिया नाचघरों की तरह होता है.
अपनी ऊंची हील और लंबे बालों में बदलाव के ये अविश्वसनीय हरकारे अपने दिन के अवतारों में वकील, तरक्की करते एमबीए, कंसल्टेंट—यानी उबाऊ सफेदपोश नौकरियों में सफेदपोश पेशेवर होते हैं.
उनमें से कई के लिए ड्रैग एक कला है, न कि कोई अश्लील प्रदर्शन. मसलन, कई मर्द मलिकाएं जोर देकर कहती हैं कि उन्हें ट्रांससेक्सुअल या ट्रांसवेस्टाइट कहना गलत है.
सुप्रीम कोर्ट ने आइपीसी की धारा 377 पर जब फैसला दिया, उसी रात ड्रैग क्वींस किट्टी सू में जमा हुईं. दिन में कॉर्पोरेट ट्रेनर और रात में ड्रैग क्वीन रॉबिन कहते हैं, "इस लड़ाई को ड्रैग ने काफी प्रसिद्धि और ताकत दी. हम एलजीबीटीक्यू में सबसे ज्यादा दिखने वाले लोग हैं.
लेकिन जब फैसला आया तो किसी ने हम पर ध्यान नहीं दिया.'' दिल्ली जैसे शहर में जिसे मर्दानगी भरी अक्रामकता का पर्याय माना जाता है, किट्टी सू का ड्रैग एकदम उलट बात है.
कुछ नारीवादी जरूर यह सवाल उठा सकती हैं कि खास किस्म के औरताना ग्लैमर पर अजीबोगरीब और अतिरंजित फोकस के साथ ड्रैग लैंगिक रूढिय़ों (या, दूसरे कहेंगे, पैरोडियों) के बारे में भला क्या बयान करता है. मगर किट्टी सू में मर्द मलिकाओं को इसमें कोई शर्मिंदगी नहीं है. उन्होंने अपने वास्ते यह जगह बनाने के लिए कई लड़ाइयां लड़ी हैं.
आगरा के एक नौजवान शख्स का जिक्र करते हुए प्रतीक कहते हैं, "वह मुझे मैसेज भेजता, बेधड़क सुझाव और टिप्स मांगता. यह बड़ी बात है क्योंकि यह बताता है कि हम कितनी दूर आ गए हैं.'' प्रतीक अपने गृहनगर रांची के फिजिकल ट्रेनिंग टीचर को याद करते हैं जिसने बहुत पहले उन्हें "सिसी'' (दब्बू और डरपोक) कहा था.
यह तंज उनके मन में चुभ गया, वे खासे शर्मिंदा हुए. फिर 2014 में उन्होंने रूपॉल का ट्रैक सिसी दैट वॉक सुना.
यह वह गीत था जिसने बेइज्जती को अच्छाई में बदल दिया, ऐसे तमगे में बदल दिया जिसे नाज से पहना जा सकता है. इसके बोल हैं, "ऐंड इफ आइ फ्लाइ ऑर इफ आइ फॉल, लीस्ट आइ कैन से आइ गेव इट ऑल... आइ एम ऑन माइ वे, आइ एम ऑन माइ वे.''
26 वर्षीय ऐश्वर्य आयुष्मान उर्फ लश मॉनसून के मुताबिक ड्रैग "परफॉर्मेंस के जरिए लैंगिकता के नियमों से खेलता है, कभी उन्हें तोड़ देता है तो कभी गले लगाता है.''
वे यह भी कहते हैं कि अक्सर "समाज हमें बताता है कि कुछ निश्चित जिंदगियां, "दूसरों'' की जिंदगियां अहम नहीं हैं. ड्रैग मुझे महसूस करवाता है कि मेरी जिंदगी की भी अहमियत है, कि मैं भी खुद अपनी कहानी का सितारा हो सकता हूं, भले ही ऐसा थोड़ी-सी देर के लिए होता हो.''
लश खुशबू को जानते हैं. कोलकाता में नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ ज्यूरिडिकल साइंसेज में अपने दिनों से ही वे दोस्त हैं.
लाजपत नगर में उन्होंने साथ मिलकर सस्ता मेकअप और भड़कीले विग खरीदे, खुद को शॉल में लपेटा और डांस किया. वे खूबसूरत दिखते और महसूस करते थे.
किट्टी सू में गुरुवार की रातों ने उन्हें बताया कि वे एक समुदाय के हिस्से हैं. बेंगलूरू, मुंबई, दिल्ली और चंडीगढ़ चैप्टर के साथ यह क्लब पिछले साल अगस्त से ड्रैग नाइट आयोजित कर रहा है.
ये नाइट इतनी लोकप्रिय हैं कि क्लब के स्टाफ में आठ मर्द मलिकाएं हैं जो "परिवार'' का हिस्सा हैं.
मगर किट्टी सू ऑनलाइन परफॉर्मरों पर भी नजर रखता है और ड्रैग दिल्ली में लोकप्रिय बनता जा रहा है, कई मर्द मलिकाओं की सोशल मीडिया प्रोफाइल हैं और उनकी अच्छी-खासी फॉलोइंग भी है. ललित सूरी हॉस्पिटेलिटी ग्रुप के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर केशव सूरी को खुद को समलैंगिक बताने में कोई झिझक नहीं होती है और किट्टी सू की ड्रैग नाइट उन्हीं की शुरू की हुई है.
वे कहते हैं, "यह शो और बॉलरूम का मिला-जुला रूप है. मगर हमें अपना रास्ता खोजना होता है, लोगों को दिखाना होता है कि हम क्या हैं. हिंदुस्तान में ट्रांस कम्यूनिटी बड़ी है इसलिए इतना कन्फ्यूजन है.''
सूरी की स्कूल की पढ़ाई सेंट कोलंबस से हुई. वहां वे क्रिसमस पर खेले जाने वाले बच्चों के नाटक में मदर मैरी बनते थे और एक बार तो उन्होंने समलैंगिक का किरदार भी निभाया था. हालांकि वे आगे की पढ़ाई के लिए लंदन गए, तब उनका वास्ता तर्कसंगत प्रर्दशन के बतौर ड्रैग से पड़ा. वे इसके मुरीद और परफॉर्मर बन गए.
उनके क्लब का नाम भी उनकी बहन के पसंदीदा जापानी कार्टून चरित्र हेलो किट्टी और उनके उपनाम के पहले दो अक्षरों का जोड़ है.
सूरी को दिल्ली में ड्रैग नाइट की संभावनाएं तब समझ में आईं जब वे ड्रैग क्वीन या मर्द मलिका और हास्य डांसर वायलेट चाच्की को अपने क्लब में लेकर आए. इसे देखने 1,900 लोग आ गए. चाच्की ड्रैग रेस सेवन के विजेता थे.
धीरे-धीरे दूसरे ठिकाने भी सूरी के नक्शेकदम पर चलने लगे हैं. आर्टिस्ट कलेक्टिव फ्री द वर्स के संस्थापक आदित्य भंडारी ने हाल ही में दिल्ली की एनआइवी आर्ट गैलरी में लश और खुशबू का परफॉर्मेंस आयोजित किया.
वे कहते हैं, "उनका परफॉर्मेंस खालिस ड्रैग था. वे भड़कीले ढंग से सज-धजकर तैयार हुईं, उनका मेकअप बेमिसाल था. मेरी समझ में हिंदुस्तान में ड्रैग कल्चर बढ़ रहा है, उसी तरह जैसे कई समलैंगिक कला रूप बढ़ रहे हैं.''
रात के 11.30 बज रहे हैं और किट्टी सू के ड्रेसिंग रूम में धुएं के छल्ले ऊपर उठ रहे हैं. तैयार होने के अलग-अलग चरणों में मर्द मलिकाएं घनी भौंहों को तराश रही हैं, मेकअप की परतें लगा रही हैं और कसी हुई ड्रेसें चढ़ा रही हैं. एक कुर्सी पर खास आकृतियों में कटे हुए फोम के एक जोड़ी कुशन रखे हैं.
लश मॉनसून कहते हैं, "ये कुशन मेरे पिता जी मेरे लिए लाए थे और मैंने उन्हें काटकर अपने "बम पैड'' बना लिए.''
प्रतीक कहते हैं, "यह पूरा का पूरा मैं हूं, बस बहुत ज्यादा मेकअप और चमक के साथ.'' उन्होंने बाएं हाथ में आईना थाम रखा है और लाइनर से अपनी आंखों को लंबा कर रहे हैं और पलकों पर नीली चमक लगा रहे हैं.
"हैरी पॉटर की याद है?'' वे सवाल करते हैं. फिर कहते हैं, "यह ड्रेसिंग रूम क्वीन की अपनी मिनिस्ट्री ऑफ मैजिक है.''
यहां मौजूद मलिकाओं में सबसे छोटी शबनम बेवफा अपने पूरे दल-बल के साथ अभी-अभी आई हैं. अपनी पलकों और फूले हुए होठों पर चमक लगाते हुए वे अपनी पलकें झपकाती हैं और पूछती हैं, "क्या मैं हॉट नहीं हूं?''
शो के शुरू होने का वक्त हो गया है. लश मॉनसून पीला बॉडीसूट पहनते हैं.
खुशबू ने कांच के चमकीले टुकड़ों से सजी सफेद ड्रेस पहनी है, जो उन्हें सरोजनी नगर के कपड़ा बाजार में मिली थी. वे एनी लेनॉक्स के गाने पर मंच पर चहलकदमी कर रही हैं.
गुलाबी और नीली रोशनियों ने उन्हें ढक लिया है जिनमें वे मानो शाम के धुंधलके की तरह लिपटी हैं.
जगमगाती सफे ब्लॉन्ड बनी इशाकू बेजबरुआ कहते हैं, "मंच पर मुझे लगता है कि वे देख पाते हैं कि भीतर से असल में मैं कौन हूः खूबसूरत शख्स जो बस मुहब्बत बांटना चाहता है.''
रात के खत्म होने पर मेकअप उतारने के बाद मर्द मलिकाएं अपने भविष्य के बारे में बात कर रही हैं.
खुशबू बेंगलूरू में जाकर बसने वाली है. प्रतीक को नौकरी की तलाश है, क्योंकि कोरियोग्राफी से जरूरी खर्च भी पूरे होने से रहे.
लश रूपॉल का अपनी पंसदीदा बयान दोहराते हैं, "हम सब नंगे पैदा हुए हैं, बाकी सब तो ड्रैग है.''
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