2019 चुनावः कांग्रेस के लिए करो या मरो की स्थिति
2019 में मोदी को चुनौती देनी है तो कांग्रेस को कर्नाटक के सबक से सीखना होगा और क्षेत्रीय पार्टियों के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन करना होगा लकिन उससे पहले उसे तीन राज्यों के सीधे मुकाबले में भाजपा को पछाड़ना पड़ेगा.

अगले लोकसभा चुनाव में एक साल से भी कम समय रह गया है लेकिन देश की सबसे पुरानी राष्ट्रीय पार्टी बेहद परेशान करने वाले आंकड़ों से मुकाबिल है. देश की कुल 31 विधानसभाओं में से कांग्रेस अब महज तीन राज्यों में ही बहुमत में रह गई है—पंजाब, पुदुच्चेरी और मिजोरम.
देशभर में कुल 4,120 विधानसभा सीटें हैं जिनमें से मात्र 727 सीटों पर कांग्रेस के विधायक हैं. पांच विधानसभाओं में कांग्रेस का एक भी विधायक नहीं है. 15 राज्यों से लोकसभा में फिलहाल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व तक नहीं है और देश के कुल क्षेत्र के मात्र दो फीसदी हिस्से पर कांग्रेस की सरकारें रह गई हैं.
इससे उलट दूसरी राष्ट्रीय पार्टी भाजपा देश के 19 राज्यों में सत्ता पर काबिज है. 224 सदस्यीय कर्नाटक विधानसभा में 104 सीटें जीतकर वह सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की अपराजेय समझी जाने वाली जोड़ी के लिए यह एक ताजातरीन उपलब्धि है, जिसने 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद से लेकर अब तक, 16 राज्यों में भाजपा की सरकारें बनवाने में कामयाबी पाई है.
फिर भी, कांग्रेस अध्यक्ष 2019 में मोदी को चुनौती देने की ख्वाहिश पाले बैठे हैं. कर्नाटक की हार इस बात का इशारा है कि कांग्रेस ने या तो पिछली कई शिकस्त से भी कोई खास सबक नहीं लिया या जो सबक लिया है, उसे अमल में लाने में ढिलाई बरतती रही.
कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व का चुनाव के पूर्व और चुनाव के बाद का नजरिया इसका एक उदाहरण है. जिस दिन कर्नाटक के चुनाव परिणाम घोषित हो रहे थे उस दोपहर यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी, राहुल गांधी से मिलने उनके दिल्ली स्थित सरकारी आवास पर पहुंचीं.
यह इस बात का संकेत है कि कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व उस दिन किस कदर चिंतित था. वे गोवा, मणिपुर और मेघालय को दोहराना नहीं चाहते थे, जहां भाजपा ने बहुमत का आंकड़ा हासिल करने के लिए गठबंधन बनाने में फुर्ती दिखाई थी. राहुल के आवास से सोनिया ने जनता दल (सेकुलर) के नेता एच.डी. देवेगौड़ा से बात की जबकि गुलाम नबी आजाद देवेगौड़ा के बेटे कुमारस्वामी से मिलने उनके घर पहुंचे थे.
कांग्रेस ने कर्नाटक में 78 सीटें जीती हैं जबकि जद (एस) को उससे आधे से भी कम, मात्र 37 सीटें मिली हैं. फिर भी, कांग्रेस ने जद (एस) को बिना शर्त समर्थन देकर एच.डी. कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री पद का प्रस्ताव देने में कोई हिचक नहीं दिखाई.
सोनिया ने सिद्धरामैया को सख्त निर्देश दिया कि वे देवेगौड़ा के घर जाएं और उनसे हाथ मिलाएं. कांग्रेस में कई लोग दबी जबान से यह कह रहे हैं कि काश! सोनिया ने सिद्धरामैया को देवेगौड़ा से हाथ मिलाने वाला आदेश चुनाव के पहले दे दिया होता तो हालात आज कुछ और होते.
प्रदेश में पार्टी के वरिष्ठ नेता भी चाहते थे कि कांग्रेस जद (एस) के साथ चुनाव-पूर्व गठबंधन करे लेकिन राहुल ने सिद्धरामैया को पूरी छूट दे रखी थी. सिद्धारमैया को अपने पर इतना भरोसा था कि वे किसी की नहीं सुन रहे थे. राहुल वैसा ही करते गए, जैसा-जैसा मुख्यमंत्री उन्हें कहते गए.
इस बारे में कांग्रेस के एक महासचिव कहते हैं, ''एक जुनियर नेता के.सी. वेणुगोपाल को राज्य का प्रभारी महासचिव नियुक्ति करने के साथ ही स्पष्ट हो गया था कि सिद्धरामैया के गलत निर्णयों पर उंगली उठाने वाला कोई नहीं है. हम त्रिकोणीय मुकाबले में पराजित हो गए. चुनावपूर्व गठबंधन करके इसे रोका जा सकता था. देवेगौड़ा के साथ अपनी निजी खुन्नस के चलते सिद्धरामैया ने ऐसा होने ही नहीं दिया.''
राज्य के कई प्रमुख नेता असंतुष्ट थे क्योंकि उनकी जमकर अनदेखी हुई थी और वे खुद को हाशिए पर महसूस कर रहे थे. टिकट बंटवारे से पहले मल्लिकार्जुन खडगे (हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्र के बड़े दलित नेता), प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डी.के. शिवकुमार और दलित नेता जी.
परमेश्वरा और लिंगायत नेता श्यामानुर शिवशंकरप्पा जैसे वरिष्ठ नेताओं को अपने क्षेत्र से बाहर चुनाव प्रचार करते कम ही देखा गया. कांग्रेस का हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्र और मुंबई-कर्नाटक क्षेत्र में बहुत खराब प्रदर्शन रहा और इसने भाजपा के हाथों 24 सीटें गंवा दीं.
वोक्कालिगा समुदाय के प्रभावशाली नेता शिवकुमार कहते हैं, ''उनके अति-आत्मविश्वास ने हमारा बेड़ा गर्क कर दिया.'' हालांकि उन्होंने 2017 में राज्यसभा चुनावों के दौरान गुजरात के कांग्रेस विधायकों को एक साथ एक रिसॉर्ट में रखने में बड़ी भूमिका निभाई थी.
राजनैतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि सिद्धरामैया वनमैन शो करते रहे और दूसरे नेता अलग-थलग हो गए. बेंगलूरू के राजनैतिक विश्लेशक ए. वीरप्पा कहते हैं, ''पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में गहरा असंतोष था लेकिन उन्होंने खुलकर कुछ नहीं कहा. चुनाव अभियान में कांग्रेस का सामूहिक नेतृत्व भाव नजर ही नहीं आया.''
कई पुराने कांग्रेसियों का कहना है कि कर्नाटक में भी वही हुआ जो दो साल पहले असम में हुआ था. तरुण गोगोई को राहुल का समर्थन प्राप्त था और उन्होंने भी अकेले दम पर चुनाव अभियान चलाया था, किसी भी क्षेत्रीय दल के साथ गठजोड़ से साफ मना कर दिया था और अपने पूर्व डिप्टी हेमांता बिस्वा शरमा के साथ मतभेदों को खत्म करने की कोई कोशिश नहीं की.
शरमा ने भाजपा की सदस्यता ले ली और दो क्षेत्रीय दलों के साथ तालमेल करके गोगोई को धूल चटा दी. और बस अगले दो साल में ही भाजपा क्षेत्रीय दलों के साथ अच्छी साझेदारी की बदौलत मणिपुर, त्रिपुरा, नगालैंड और यहां तक कि मेघालय में भी जहां सिर्फ उसके दो विधायक थे, वहां भी सरकार बनाने में कामयाब रही.
कांग्रेस को जो बात बहुत चुभ रही है वह यह है कि असम और कर्नाटक दोनों ही जगह पार्टी का वोट शेयर भाजपा से अधिक रहा है. जले पर नमक छिड़कते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 15 मई को अपने एक ट्वीट में लिखा, ''कांग्रेस ने जद (एस) के साथ समझौता किया होता तो नतीजे अलग होते.
बहुत अलग.'' ममता ने राहुल को संदेश स्पष्ट रूप से दिया है. राहुल को 2019 के लोकसभा चुनावों में मोदी को चुनौती देनी है तो उन्हें क्षेत्रीय पार्टियों के साथ बहुत समझदारी के साथ चुनावपूर्व गठबंधन पर काम करना होगा. गुजरात और कर्नाटक के चुनाव परिणामों से जाहिर है कि राहुल अकेले चुनावी रणकौशल में मोदी के आगे कहीं नहीं टिकते.
2019 में अंतिम मुकाबले से पहले कांग्रेस को भाजपा के साथ इसी साल दिसंबर महीने में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में दो-दो हाथ करना होगा. पिछली सर्दियों में सरकार विरोधी माहौल और एकजुट होकर लड़ी गई चुनावी जंग के बूते कांग्रेस ने गुजरात में भाजपा को कड़ी टक्कर दी थी. कर्नाटक में मिले सबक से पार्टी शायद संभल गई है.
वह मायावती की बहुजन समाज पार्टी के साथ गठजोड़ की संभावनाएं तलाशने में जुट गई है. 2013 में हुए विधानसभा चुनाव में मध्य प्रदेश में बसपा को 6.29 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ में 4.27 प्रतिशत और राजस्थान में 3.77 प्रतिशत वोट मिला था.
यह परिणामों का रुख कांग्रेस के पक्ष में कर सकता है. कांग्रेस इन तीनों राज्यों में क्रमशः 36.38 प्रतिशत, 40.29 प्रतिशत और 33 प्रतिशत वोट पाई थी. मध्य प्रदेश में भी कांग्रेस गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के संपर्क में है.
कर्नाटक से उलट इन राज्यों में राहुल ने पार्टी के बुजुर्ग और युवा नेताओं के बीच तालमेल की कोशिश की है. मध्य प्रदेश में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया तथा राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट का संयोजन प्रस्तुत करके उन्होंने पार्टी की एकजुटता दर्शाने की कोशिश की है. वे समझते हैं कि उन्हें इस बार जीतना ही होगा क्योंकि कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में अपनी महत्ता साबित करने का यह उनके पास अंतिम मौका है.
***

