मौके को माकूल बनाने में माहिर 'मैंक्रों'
फ्रांस के सबसे युवा राष्ट्रपति एक नई भूमिका के लिए पूरी तरह तैयार, जर्मनी में सत्ता की अस्थिरता का फायदा उठाकर उन्होंने फ्रांस को यूरोपीय संघ का अगुआ बनाने की कवायद तेज की.

फ्रांस के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की 25 मई 2017 की ब्रसेल्स में नाटो (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन) शिखर सम्मेलन के दौरान गर्मजोशी से भरी मुलाकात को भला कौन भूल सकता है?
39 वर्षीय फ्रांसीसी राष्ट्रपति को पद पर आसीन हुए बमुश्किल 10 दिन ही हुए थे जब वे जीवन के 70 बसंत देख चुके अमेरिका के राष्ट्रपति के साथ कैमरों की मौजूदगी में हाथ मिला रहे थे. ट्रंप से नजरें चुराते हुए मैक्रों उनका हाथ जकड़े टीवी कैमरों की ओर मोहक मुस्कान बिखेरते रहे.
हाथ मिलाने, हाथ झटकने और भेंट-मुलाकात में सामने वाले पर हावी हो जाने में माहिर ट्रंप के लिए, मैक्रों के पंजे से अपना हाथ छुड़ाना उतना आसान नहीं रहा. बाद में पत्रकारों से बातचीत में मैक्रों ने कुटिल मुस्कान के साथ कहा, ''यह अनजाने में नहीं हुआ.''
मैक्रों ने ट्रंप पर फिर से चुटकी ली. सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो में मैक्रों अच्छी अंग्रेजी में कहते हैं, ''हमारी धरती को फिर से हरा-भरा बनाइए.'' अमेरिकी राष्ट्रपति ने 1 जून को यह घोषणा कि अमेरिका दिसंबर 2015 के पेरिस जलवायु समझौते से खुद को अलग कर रहा है.
ट्रंप के फैसले से नाराज लोगों ने इस वीडियो को सोशल मीडिया में खूब उछाला. पिछले दिसंबर में धरती सम्मेलन में अमेरिका के जलवायु विज्ञानियों को लुभाने की नीयत से मैक्रों यह कहते दिखे कि पेरिस को आप अपना दूसरा घर समझें. उन्होंने पर्यावरण पर शोध के लिए 18 जलवायु विज्ञानियों (जिसमें अमेरिका के 13 जलवायु विज्ञानी हैं) के लिए तीन करोड़ यूरो के फंड की भी घोषणा की.
नौ महीने पहले फ्रांस के इतिहास में सबसे युवा राष्ट्रपति बनने के बाद से ही मैक्रों राजनैतिक जोखिम उठाने और न सिर्फ यूरोप, बल्कि विश्व मंच पर नेतृत्व करने की अपनी उत्सुकता का बार-बार परिचय दे रहे हैं.
जर्मनी में एंजेला मर्केल का चौथा कार्यकाल पहले के मुकाबले कमजोर और अस्थिर दिखता है, ब्रिटेन ब्रेग्जिट को लेकर असमंजस के दौर में है, स्पेन आंतरिक अलगाववादियों के साथ संघर्ष में उलझा है, बर्लुस्कोनी की वापसी से इटली में असहज स्थिति है और हंगरी, पोलैंड तथा ऑस्ट्रिया ने चरम दक्षिणपंथी राह पकड़ ली है. यूरोपीय संघ में अचानक बने इस नेतृत्व शून्यता को मैक्रों मौका बनाना चाहते हैं और अंतरराष्ट्रीय पटल पर बड़ी भूमिका निभाने को आतुर दिखते हैं.
पिछले आम चुनाव के बाद दबाव में दिख रहीं एंजेला मर्केल जब न चाहते हुए भी सरकार बनाने के लिए गठबंधन की ओर बढ़ रही थीं, मैक्रों सॉरबोन से टेलीविजन पर राष्ट्र के नाम संदेश दे रहे थे. उन्होंने यह जताने की कोशिश की कि यूरोपीय संघ को वैचारिक नेतृत्व अब बर्लिन की जगह, पेरिस बेहतर दे सकता है.
वास्तव में गठबंधन सरकार बनाने के लिए तथाकथित जमैका वार्ता (समझौता वार्ता में शामिल दलों का रंग हरा, काला और पीला है जो जमैका के ध्वज का रंग बनता है) के लिए अपने प्रतिद्वंद्वी और पूर्व सोशल डेमोक्रेट नेता मार्टिन शुल्ज के साथ बातचीत में मर्केल ने मैक्रों से मध्यस्थता का अनुरोध किया था.
जर्मनी के कमजोर पड़ने से परंपरागत फ्रांस-जर्मनी जोड़ी, जो यूरोपीय संघ की धुरी है, और जिसमें फ्रांस हमेशा कमजोर साझीदार की तरह देखा जाता रहा है, वह अचानक मजबूत होकर उभरा है. जो लोग ऐसा मानते हैं कि वृहद यूरोपीय संघ की बात आगे बढ़ाना अभी जल्दबाजी होगी उनकी आशंकाओं पर मैक्रों ने कहा, ''यूरोप भी एक विचार है. कुछ लोग कहेंगे कि अभी सही वक्त नहीं है. ऐसे तो सही वक्त कभी आता ही नहीं. आप नए महत्वाकांक्षी विचारों के साथ सामने नहीं आएंगे, आप उनके लिए सारे रास्ते खोल देंगे जो यूरोप को लेकर सशंकित रहते हैं. इसलिए मैं यूरोप के लोगों से कहूंगा कि 'झिझक छोड़ें.'' आप यूरोप को लेकर झिझकेंगे तो आप बर्बाद हो जाएंगे.''
मैक्रों के सुझावों में एक संयुक्त यूरोपीय सैन्य बल का गठन, एक एकीकृत सुरक्षा सिद्धांत, आतंकवाद विरोधी रणनीति और सामूहिक खुफिया सेवा, पूरे यूरोप के लिए शरणार्थियों को शरण देने की एक प्रक्रिया और वित्तीय लेनदेन पर कर प्रस्ताव शामिल हैं. ये प्रस्ताव सबको रास तो नहीं आ रहे. पूर्वी यूरोप के देश शरणार्थियों से जुड़े प्रस्ताव पर असहमत और पश्चिमी लोकतांत्रिक मॉडल को लेकर सशंकित हैं.
उनके भाषण साहित्यिक उल्लेखों, गीतों, प्रभावशाली उक्तियों और नीतियों से भरे होते हैं. वे यह मानकर चलते हैं कि श्रोता बुद्धिमान हैं इसलिए अपनी बात को सरल बनाने की कोशिश नहीं करते. उनका यही अंदाज लोगों को भाता है.
मसलन, यूनान में उन्होंने यूरोप को इतिहास में फंसने के बदले भविष्य की सोचकर जरूरी कदम उठाने का आह्वान करते हुए हेगेल की प्रसिद्ध उक्ति का उदाहरण दिया, ''उल्लू अंधेरा घिरने पर उड़ान भरता है.'' मैक्रों यूं तो अपेक्षाकृत शांत और सीमामुक्त यूरोप में जन्मी पीढ़ी से ताल्लुक रखते हैं मगर उनमें इतिहास की गहरी समझ है. वे हर भाषण में युद्ध की विभीषिकाओं की याद दिलाते हैं, जो यूरोप ने झेली है और बढ़ते लोकलुभावनवाद और आतंकवाद को देखते हुए यूरोप की पुनस्र्थापना की आवश्यकता पर जोर देते हैं.
अनोखे लचीलेपन के साथ उन्होंने अंतरराष्ट्रीय बिसात पर कई तेज चालें चली हैं. ट्रंप का उपहास उड़ाने के बाद 14 जुलाई के बैस्तिल डे परेड में अमेरिकी राष्ट्रपति को विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित करने वाले पहला यूरोपीय देश बनकर फ्रांस ने ब्रिटेन को भी थोड़ा असहज किया.
इस शानदार परेड से प्रभावित ट्रंप ने वतन वापसी के साथ ही अमेरिका में भी ऐसे ही परेड के आयोजन की घोषणा की. इसके फौरन बाद मैक्रों येरूशलम को इज्राएल की राजधानी बताने के ट्रंप के निर्णय की आलोचना करके फिर टकराव वाले अंदाज में आ गए.
इसी तरह उन्होंने वरसाय शेतेओ में व्लादिमीर पुतिन के शाही स्वागत के बाद साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में रशिया टुडे टीवी नेटवर्क और स्पूतनिक मीडिया को फर्जी खबरों और मॉस्को का प्रचार तंत्र बता दिया.
पूर्व बैंकर जितनी कुशलता से योजनाएं बनाते हैं, वैसे ही उस पर अमल भी करते हैं. कराधान और श्रम पर उनकी नव-उदार नीति ने देश में उनकी लोकप्रियता 65 फीसदी से घटाकर 30 फीसदी कर दी है. उनके पक्के समर्थकों की संख्या में भी 31 फीसदी की गिरावट आई है.
देश के चोटी के दस प्रतिशत लोगों पर लगे कर को घटाना और तंबाकू तथा इंधन पर सरचार्ज बढ़ाना उनका पहला घरेलू नीतिगत निर्णय था. इस निर्णय से उन्हें 'अमीरों का राष्ट्रपति' भी बताया जा रहा है. न्यूनतम मजदूरी और बेरोजगारी लाभों में सालाना वृद्धि को रोकने के राष्ट्रपति के निर्णय से काम की तलाश में दूर-दराज के गावों और छोटे शहरों से महानगरों की ओर रुख करने वालों में सबसे ज्यादा बेचैनी है.
बहरहाल, विदेश नीति के लिहाज से मैक्रों की रेटिंग ऊंची है. फ्रांस को उनमें ऐसा नेता दिखता है जो एक दिन फ्रांस को फिर से बड़े शक्तिशाली राष्ट्र का गौरव वापस दिलाएगा. उन्हें लीक से हटकर चलने वाला, प्रयोगधर्मी और तकनीक प्रेमी राष्ट्रपति के रूप में देखा जाता है.
चरमपंथियों को औकात में रखने की जोरदार वकालत करने वाले मैक्रों को भारत में बढ़ते हिंदुत्वादी राष्ट्रवाद को लेकर कुछ चिंतित बताया जाता है. फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने अरुंधति राय के साथ निजी बातचीत के लिए सहमति दिखाई है.
वे छात्रों के साथ टाउन हॉल बातचीत भी करने वाले हैं, जिसमें दर्शकों से भी प्रश्न लिए जाएंगे. मैक्रों भी ओबामा की तरह सहिष्णुता और बहुलता पर कोई उपदेश करते दिखे तो हमें हैरान नहीं होना चाहिए.
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