वाल्मिक रामायण को लेकर थोपी जा रही हैं बंदिशेंः अर्शिया सत्तार
हम एक अरब बार कह सकते हैं कि हिंदू धर्म बहुलतावादी है, लेकिन हिंदुत्व विचित्र है. लेकिन क्या मौजूदा दौर में दोनों के बीच यह भेद निरर्थक होता जा रहा है?

मैं हिंदू नहीं हूं और संभवतः कभी बनूं भी नहीं. उसी तरह मैं मुस्लिम, ईसाई, यहूदी, बौद्ध, जैन या सिख भी नहीं हूं. इस बात की भी संभावना नहीं है कि मैं कभी इनमें से कोई एक बन जाऊंगी. लेकिन मैं मानती हूं कि मुझे इन महान परंपराओं के विषय में जानने, इनकी प्रशंसा और इन पर विचार मंथन करने का अधिकार है.
ये महान परंपराएं मुझे सिखाती हैं कि इनसान होने का क्या मतलब है, दुनिया में अपना जीवन कैसे जीना चाहिए, हमारे कर्म कैसे होने चाहिए. वे मृत्यु के विषय में और मृत्यु के बाद क्या होगा, उसके बारे में मुझे जो सिखाते हैं, मुझे उसमें रुचि है.
मैं ईमानदारी से कह सकती हूं मुझे हर उस धर्म ने समृद्ध बनाया है जिसका मैं पालन नहीं करती, शायद उनमें से सबसे ज्यादा योगदान हिंदू धर्म का रहा है. यह सत्य है कि यहां-वहां जो कुछ भी मुझे आकर्षित करता है, मैं उसे ग्रहण कर लेती हूं (बौद्ध धर्म से करुणा, यहूदी धर्म से न्याय के लिए आग्रह, इस्लाम से अपनी आमदनी का एक हिस्सा अनिवार्य रूप से गरीबों में बांटना). इस प्रकार अपना जीवन जीने का एक सामंजस्यपूर्ण और नैतिक मार्ग चुनने का प्रयास करती हूं. लेकिन यह सब तो मैंने कहीं न कहीं से बेर की तरह चुना है.
हिंदू धर्म मुझे मेरे अस्तित्व के साथ साक्षात्कार को बाध्य करता है—यह मुझे इस बात पर विचार के लिए विवश करता है कि मैं अपने रोजमर्रा के जीवन में कैसा बनना चाहती हूं.
जब मुझे लगने लगता है कि मैं सर्वश्रेष्ठ हूं, तब कर्म और धर्म का विचार मुझे मेरे कर्मों से अवगत कराकर मुझे उस पर मंथन को प्रोत्साहित करता है. इनमें से ज्यादातर मुझे इस बात का स्मरण कराते हैं कि मैं जो कर्म कर रही हूं, उसके जो परिणाम होंगे उनका असर, मेरे अलावा दूसरों पर भी होगा.
कर्म और धर्म के बीच का उत्कृष्ट लोच, हिंदू धर्म के हृदय में बसता है. हर कर्म के कुछ परिणाम होंगे. इसलिए हम जो कर रहे हैं वह क्यों कर रहे हैं, उसका आधार क्या है, इन बातों पर हिंदू धर्म गहन मंथन करता है.
हालांकि हमें इस बात की जानकारी नहीं भी हो सकती है कि जैसे ही हम अपने लिए जो कोई कर्म चुनते हैं, उसके साथ ही हमारे जीवन में हर पल कई नए उत्तरदायित्व जुड़ते चले जाते हैं. उदाहरण के लिए हम एक ही समय पर माताएं और बेटियां और बहनें और पत्नियां, मित्र और शिक्षिकाएं और नौकरी देने वाली, सब कुछ हैं.
इस तरह हमारी सामाजिक, पारिवारिक, पेशागत भूमिकाएं हैं. इनमें से हर भूमिका के लिए हमें एक निश्चित व्यवहार का अनुसरण करने की जरूरत होती है, साथ ही हमसे कुछ खास अपेक्षाएं भी होती हैं. अगर हमें ''अच्छा" कहलाने की लालसा है तो हर भूमिका हमें किसी खास तरीके से चलने को विवश करेगी.
रामायण में दशरथ एक राजा थे, एक पिता थे और एक पति भी थे. श्रीराम के राज्याभिषेक से पहले की उस दुखदायी रात को कैकयी ने जो वरदान मांगा, उससे दशरथ के जीवन के इन सभी पक्षों के बीच एक ही समय पर जबरदस्त टकराव हुआ. अगर दशरथ एक भूमिका का उचित निर्वहन करते हैं, तो दूसरी भूमिका में वह जिन उत्तरादायित्वों से बंधे थे, उनका अतिक्रमण होना तय था.
दशरथ ने अपनी पत्नी की इच्छाएं पूरी करते हुए राम को 14 साल का बनवास देकर खुद को एक ''अच्छा" पति कहे जाने का विकल्प चुना. उसी समय वह एक राजा और एक पिता के रूप में अपने कर्मों से मुंह मोड़ गए. दशरथ अपने कर्मों के साथ लंबे समय तक जी नहीं पाए. अपने प्रिय पुत्र के वन जाने के तुरंत बाद दशरथ ने प्राण त्याग दिए. दूसरी तरफ, राम ने अयोध्या से लौटने के बाद अपनी पत्नी का त्याग करके वन में भेजने का जो कर्म किया, उसके परिणामों के साथ उन्होंने जीवनकाल बिताया.
हम जो करना चाहते हैं और हमें जो करना चाहिए, उसके बीच एक संतुलन स्थापित करना, मनुष्य होने का सबसे बड़ा धर्मसंकट है. हिंदू धर्म में इस संकट की बौद्धिक, पौराणिक और दार्शनिक व्याख्या है. महाकाव्यों में देवगण हमें इन मौलिक मानवीय भ्रमों से बाहर निकालते हैं.
मैं भगवद्गीता में कृष्ण के अर्जुन के साथ सारगर्भित संवाद के बारे में सोचती हूं जो भगवान के अपने सर्वाधिक शोभायमान दिव्यरूप को प्रकट करने और किसी मनुष्य के भगवान के इस दिव्यरूप के साक्षात् दर्शन के साथ एक उचित निष्कर्ष पर पूर्ण होता है.
गीता मानव कर्म की दुविधा को सबसे अधिक प्रमुखता देती है, हालांकि इसके कुछ अंशों को मैं पूरी तरह से समझ नहीं पाई हूं और मैं सामान्य व्यवहार के ऐसे किसी भी नियम का समर्थन नहीं करती जो सामाजिक अनुक्रमों (क्षत्रिय धर्म) के आधार पर तय किए जाएं.
फिर भी मैं अर्जुन की उस दुविधा के बारे में सोचकर द्रवित हो जाती हूं जब उसके समक्ष एकसमान पीड़ादायक दो विकल्प रखे गए होंगे तब उनके मन में क्या चल रहा होगा. कृष्ण अर्जुन को उनके बारे में बोध कराते हैं, अर्जुन से जिन कर्मों की अपेक्षा है उनके बारे में आभास कराकर कृष्ण, एक अर्थ में अर्जुन को धर्मसंकट से बाहर निकालते हैं.
जब मैं अपने व्यक्तिगत जीवन में कठिन परिस्थितियों का सामना कर रही होती हूं, तब मैं अपने लिए उसी प्रकार की स्पष्टता चाहती हूं—अपने वर्तमान से ऊपर उठकर खुद को विराट परिदृश्य में रखकर देखने की क्षमता. यह जानकर मुझे ढाढस मिला है कि ऐसी स्पष्टता संभव है, चाहे वह ईश्वर की ओर से मिले अथवा अपने भीतर उपजी एक नई समझ से आए.
पिछले दशकों में हमारे साथ जो हुआ है उसके बारे में सोचकर भी अब क्रोध के स्थान पर बेहिसाब पीड़ा होती है. जिस वाल्मीक रामायण के साथ मैंने तीस वर्ष बिताए हैं, इस ग्रंथ को लेकर कौन बात कर सकता है और क्या बात कर सकता है, ऐसी बंदिशें थोपी जा रही हैं.
हम अक्सर और ज्यादा जोरदार आवाज में यही बात सुन रहे हैं कि बस एक ही रामायण है (और, जैसा कि होता रहा है, यह वाल्मीक नहीं है); भारतीयों के अलावा और किसी को इसके विषय में कहने का अधिकार नहीं है; हिंदू के अतिरिक्त और किसी को यह सोचने-विचारने की अनुमति नहीं दी जा सकती कि कथा और इसके पात्रों का तात्पर्य क्या हो सकता है; राम और सीता एवं अन्य को मानवीय संसार में रहने के दौरान किस प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ता है, इसकी कल्पना करके भावुक होने का अधिकार एक आस्तिक हिंदू के अलावा और किसी को नहीं, एक भक्त के अलावा और किसी को राम से सच्चा प्रेम करने का अधिकार नहीं है.
राजनैतिक रूप से प्रेरित शहरी ठग जो संस्कृति के पहरुए बन बैठे हैं, वे धमकियों और शारीरिक हिंसा से ऐसी बंदिशें बलपूर्वक थोप रहे हैं. सबसे विचलित करने वाली बात तो बौद्धिक जगत में राष्ट्रवादियों का बढ़ता वह कुनबा है जो पाश्चात्य विद्वानों पर हिंदुत्व का द्वारपाल होने (कथित रूप से भारत के स्थान और दृष्टिकोण को हीनभाव में प्रदर्शित करते हैं) का आरोप लगाता रहा है, अब वही धर्म और उससे जुड़ी चीजों का अभिभावक बन बैठा है. ये आक्रामक सांस्कृतिक राष्ट्रवादी, हिंदू धर्म के स्वयंभू रक्षक बन बैठे हैं.
हम1.3 अरब कह सकते हैं कि हिंदू धर्म बहुलतावादी हैं लेकिन हिंदुत्व विचित्र है. यह भेद तब अर्थहीन हो जाता है जब हिंदू धर्म के नए स्थानीय द्वारपाल और हिंदू राष्ट्र के प्रबल समर्थक यह ऐलान कर देते हैं कि मानव विचारों और अनुभवों के उस विशाल खजाने तक पहुंचकर उसका लाभ केवल वही ले सकता है जिसे वे अनुमति देंगे.
मैं वह कहानी सुनते हुए बड़ी हुई हूं जिसमें मुझे बताया गया कि चांद को गौर से देखोगी तो उसमें किसी आदमी का अक्स नजर आएगा. जब मैंने संस्कृत पढऩा शुरू किया तो मैंने जाना कि चंद्रमा तो मृगांक है, उसकी गोद में मृगों का वास है. लेकिन 2018 की पूर्णिमा पर अब मैं केवल मृग ही देख सकती हूं. वह पुरुष तो लुप्त हो चुका है.
अर्शिया सत्तार लेखिका और अनुवादक हैं. उत्तरः द बुक ऑफ ऐन्सर्स उनकी नवीनतम रचना है

