'हिंदुत्व और हिंदू धर्म एक दूसरे के धुर विरोधी'

हिंदू धर्म अनेकता का दर्शन है, जबकि हिंदुत्व अपनी एकेश्वरवादी और एकरूपता की विचारधारा में पश्चिम की अब्राहमी मान्यताओं के करीब

इलेस्ट्रशनः सिद्धांत जुमडे
इलेस्ट्रशनः सिद्धांत जुमडे

अपने मिथकीय तंत्र में हिंदू दुनिया में कुछ अलग-से हैं. इसके विपरीत हिंदुत्व मौजूदा दौर में दुनिया में प्रभावी विचारों के काफी करीब है. इसका एहसास दो मिथकों—समानता और आहत भावना—पर गौर करने से होता है.

समानता का मिथक

प्रकृति में विविधता है. इसमें इस मायने में समानता भी है कि प्रकृति किसी भी प्राणी को खास नहीं समझती. हर जीवित प्राणी को अपनी क्षमताओं और ताकत के जरिए अस्तित्व की रक्षा करनी होती है और अपनी कमजोरियों से उबरकर खतरों से जूझते हुए मौके तलाशने होते हैं. समानता का सांस्कृतिक विचार बहुत अलग है. यह वह मिथक है जो अब्राहम से जुड़ी मान्यताओं को आकार देता है.

अब्राहमी मान्यता का ईश्वर अपने सभी अनुयायियों को समान रूप से प्यार करता है. वह बेहद ईर्ष्यालु है और बाकी देवों को बर्दाश्त नहीं करता. ईश्वर की नजर में कोई ऊंचा या नीचा नहीं है. उसकी दुनिया में किसी भी मतभेद, यानी अनूठेपन को उजागर करने की हर कोशिश को घमंड या कौमपरस्ती के रूप में देखा जाता है.

यही वजह है कि अब्राहमी मान्यताएं एकरूपता लाने की कोशिश में रहती हैं. वे किसी भी भटकाव को लेकर असहिष्णु होती हैं. वे एक ही सच को तलाशने का प्रयास करती रहती हैं.

हिंदू धर्म इससे काफी अलग है. वह विविधता को महत्व देता है. यहां हर समुदाय को अनूठा समझा जाता है. हरेक के अपने देवी-देवता, अपनी मान्यताएं और रीति-रिवाज हैं. जंगल में पेड़ों और जानवरों की ही तरह समुदायों के भीतर भी तनाव होता है क्योंकि वे संसाधनों के लिए होड़ करते हैं.

नतीजतन, एक अनिश्चित किस्म का पदानुक्रम बन जाता है. ऐसे में, कुछ समुदाय और नतीजतन कुछ भगवान भी बाकियों से ज्यादा महत्वपूर्ण बन जाते हैं. लेकिन ऐसा हमेशा के लिए नहीं रहता. कोई न कोई तो हमेशा केंद्र में रहता है और हमेशा कोई न कोई हाशिए पर. लेकिन यह सचल प्रक्रिया है.

विविधता ही पदानुक्रम को जन्म देती है लेकिन जब वह जड़ हो जाती है तो उससे असमानता को संस्थागत रूप मिल जाता है. लिहाजा, हकीकत यह है कि हिंदू धर्म विविध समुदायों से भरापूरा है जहां हजारों जातियां सत्ता के लिए लड़ती हैं. हर कोई सैद्धांतिक वैदिक चतुर्वर्ण व्यवस्था में अपनी जगह बनाने की कोशिश करता है. यहां समानता आत्मा के सिद्धांत से आती है जो किसी देह का देही होती है. यह देह ही विविध समाज में स्थापित होती है.

वैश्विक गांव का मौजूदा मानवतावादी सिद्धांत मानवाधिकारों के सिद्धांत के साथ-साथ अब्राहमी मान्यताओं से उपजा है. इसमें सिर्फ इतना हुआ है कि ईश्वर का स्थान राज्य ने ले लिया है और मान्यता की जगह देशभक्ति ने ले ली है.

अच्छा संविधान ऐसे नियमों का पुंज है जिनमें सभी नागरिक समान होते हैं और उनके अधिकार बराबर होते हैं और संसाधनों तक बराबर पहुंच मुहैया कराने की बात होती है. समान अधिकारों का यह सिद्धांत विविधता को नहीं पहचानता. मौजूदा वैश्विक संकट इसी वजह से है.

आखिर अपने सभी नागरिकों को समान अधिकार देने वाला कोई राज्य कैसे उन धर्मों को जगह दे, जिनका भगवान उन्हें महिलाओं को पुरुषों के बराबर मानने की इजाजत नहीं देता या जिनकी संस्कृति में समलैंगिकों को बराबर नहीं माना गया है या जो अपनी महिलाओं को जनजाति के बाहर विवाह करने की इजाजत नहीं देता या पुरुषों को अपनी मान्यताएं बदलने नहीं देता या जो जातियां अन्य जातियों को अछूत मानती हैं?

''भारत विचार्य समानता के सिद्धांत के इर्द-गिर्द बुना गया. भारत का विविधता से वास्ता लंबे समय से रहा है लेकिन विकसित देशों को अब जाकर इसका सामना करना पड़ रहा है जब उनके देशों में बड़ी संक्चया में प्रवासी आ रहे हैं, अर्थव्यवस्था धीमी पड़ रही है और समान अधिकारों और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप पलने वाली एकरूपता में असहज स्थितियां दिखाई देने लगी हैं. लिहाजा, यह स्वाभाविक ही है कि ''भारत विचार" और अब्राहमी मान्यताओं वाले राष्ट्र-राज्यों का हिंदू धर्म से विरोध का रिश्ता होगा, जो अपनी जाति, विविधता और ऊंच-नीच में सहज बना रहता है.

पीड़ा का मिथक

शुरू में दुनिया दुरुस्त थी. उसके बाद उसमें पीड़ा जुडऩी शुरू हुई. फिर उपचार आया. अब्राहमी मान्यताओं का यही प्रमुख मिथक है. इनसान को ईश्वर की अवज्ञा करने का दोषी नहीं ठहराया जाता. वे तो पीड़ित हैं जो शैतान के बहकावे में आ गए हैं. ऐसे में पैगंबर उनके लिए उद्धारक है जो शैतान से लड़ता है और मानवता को बचाता है.

पीड़ा का मिथक और उसके परिणामस्वरूप उद्धार ही आज आधुनिक वैश्विक चिंतन को निर्धारित करता है. निर्वासन, और विध्वंस को यहूदीवाद की ही पीड़ा माना जाता है. अली का इंतकाल शिया इस्लाम की पीड़ा है. खिलाफत का खत्म होना जेहादी इस्लाम की पीड़ा है.

जाति दलितों की पीड़ा है. पितृसत्ता नारीवाद की पीड़ा है. गरीबी साम्यवाद और पूंजीवाद की पीड़ा है. ''अपमान की सदी" चीन की पीड़ा है. ये सारे वैश्विक विचार पराजय, अन्याय और याद रखने के संकल्प की धारणा से आगे बढ़ते हैं. वे स्मृतिलोप को सबसे बड़ी त्रासदी के रूप में देखते हैं.

हिंदुत्व का तो पूरा वास्ता ही पीड़ा और आहत भावना से है. वह हिंदुओं का अपमान और हिंदू सभ्यता की पराजय को ''कभी नहीं भूलेगा" जो आक्रांताओं के हाथों हजार साल की ''गुलामी" से मिली है, पहले मुसलमानों, फिर ईसाई मिशनरियों और अंत में अंग्रेजों से.

भारत के बौद्धिक एलीट या आधुनिक विशेषज्ञ इस बात को फासीवाद कहकर खारिज कर देंगे. लेकिन यह तो सारी ''पीड़ाओं" के ही संदर्भ में है. हर राजनेता जानता है कि संस्कृति का किसी घटना विशेष के प्रति जुनूनी, रणनीतिक और छेड़छाड़पूर्ण लगाव तार्किकता को परे रखकर समाज में हरकत पैदा कर देता है.

हालांकि पीड़ा और आहत भावना के ये मिथक हिंदू धर्म के बिल्कुल विपरीत हैं जहां शिव को स्मरंतका यानी स्मृतियों का विनाश करने वाले का ही नाम दिया गया है. जो जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति चाहता है, जो सद् चित्त आनंद की कामना करता है, जो शांतचित्त चाहता है, उसे ''जाने दो" के तरीके को सीखना होगा.

हिंदुत्व एकेश्वरवादी है क्योंकि वह एक ही आराध्य भारत माता को मानता है. वे राष्ट्र-राज्य का प्रतीक हैं. लेकिन जहां हम उसके बच्चों यानी इस देश के लोगों से वाकिफ हैं, यह नहीं जानते कि पति कौन हैं. यह थोड़ी अजीब बात है कि क्योंकि हिंदू धर्म की तमाम देवियों जैसे सरस्वती, लक्ष्मी और दुर्गा के अपने पतियों ब्रह्मा, विष्णु, शिव के साथ प्रगाढ़ और उथल-पुथल भरे संबंध रहे हैं.

हिंदुत्व के पोस्टरों में कृष्ण को राधा के बिना, राम को सीता के बिना और शिव को पार्वती के बिना दिखाया जाता है. उनकी बहसों में शंकराचार्य के ब्रह्मचर्य का गुणगान किया जाता है जिनके बारे में वे यह दावा करते हैं कि उन्होंने एक हजार साल पहले लड़ाकू नागाओं का जत्था तैयार किया था ताकि विदेशी हमलावरों से विनम्र साधुओं को बचाया जा सके.

यही वह दावा है जिससे हिंदुत्व गुंडों या ''हाशिये के समूहों" के अस्तित्व को वाजिब ठहराता है. हालांकि वे उस किंवदंती को नजरअंदाज कर देंगे जब उसी शंकराचार्य ने मंडन मिश्र की पत्नी उभया भारती की सलाह पर अपनी गुप्त शक्तियों का इस्तेमाल करके राजा अमारु के शरीर में जाकर यौन अनुभव लिया था.

हिंदुत्व का स्त्रैण भाव और कामुकता को खारिज करना उन अब्राहमी मिथकों को ही प्रतिध्वनित करता है जिनमें ईश्वर स्पष्ट रूप से पुरुष है, उसके दूत भी पुरुष हैं और जहां उसका पुत्र बिना किसी यौन संबंध के किसी कुंआरी महिला से पैदा होता है.

अब्राहमी मान्यताओं की ही तरह हिंदुत्व में निष्ठा महज एक संस्था (संघ, विहिप, भाजपा) के प्रति अनुपालन, अनुशासन और समर्पण में है और उसका परमात्मा को पाने के लिए परा जीव के साथ प्रेम, शृंगार, माधुर्य से कोई लेना-देना नहीं है जो कि वास्तव में हिंदू भक्ति की विशिष्टताएं रही हैं.

जब हिंदुत्ववादी वेलेंटाइन डे, महिला शक्ति और विरासत को लेकर हल्ला मचाते हैं और हिंदू धर्म की काम संस्कृति को सिरे से खारिज कर देते हैं तो उससे यह समझ में आता है कि ये रक्षक उसी को नष्ट करने जा रहे हैं जिसे वे बचाना चाहते हैं.

मिथकों की समसामयिक प्रासंगिकता पर 30 से ज्यादा किताबों के लेखक

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