आवरण कथाः फूलों का संदेसा

अंकित ने लंदन की वारविक यूनिवर्सिटी से बिजनेस एनालिटिक्स की पढ़ाई की है और सिमैनटेक के साथ काम कर रहे थे; करण ने पुणे के सिंबायोसिस से इनोवेशन मैनेजमेंट में मास्टर्स की डिग्री ली और फूटवियर का पारिवारिक कारोबार संभाल रहे थे.

अंकित अग्रवाल, करण रस्तोगी,  संस्थापक हेल्प अस ग्रीन
अंकित अग्रवाल, करण रस्तोगी, संस्थापक हेल्प अस ग्रीन

आप ज्यों-ज्यों कानपुर के जिला मुख्यालय से 25 किमी पश्चिम में एक छोटे-से गांव भौंती के नजदीक पहुंचते हैं, फूलों की खुशबू आने लगती है. यह उस इमारत से आ रही है, जिसमें ''हेल्प अस ग्रीन्य  का दफ्तर है. यह वह कंपनी है जो कानपुर के 29 मंदिरों से रोज 800 किलो बेकार फूल इकट्ठा करती है, उन्हें अगरबत्तियों और जैविक वर्मिकंपोस्ट में बदलती है. इसके संस्थापक अंकित अग्रवाल और करण रस्तोगी ने इसके लिए ''फ्लावरसाइकल" शब्द को ट्रेडमार्क करवा लिया है.

यह जोड़ी 2015 में बिठूर, कानपुर में गंगा के किनारे बने मंदिरों के दर्शन को निकली थी. तभी उन्हें कचरे के फूलों को रिसाइकल करने का विचार कौंधा. अग्रवाल कहते हैं, ''पवित्र गंगा के सफाई में फूलों से पैदा प्रदूषण को नजरअंदाज कर दिया जाता है." बात सिर्फ नदी में सड़ रहे फूलों की ही नहीं, बल्कि उन पर इस्तेमाल किए गए कीटनाशकों की भी है, जो जल जीवन पर अपना असर डाल सकते हैं.

दोनों ने अपनी नौकरी छोड़कर हेल्प अस ग्रीन लॉन्च की. रस्तोगी कहते हैं, ''हमने शुरू किया, हर किसी ने सोचा हम पागल हैं." उन्होंने 72,000 रु. के निवेश से शुरुआत की और दो महीने बाद अपना पहला उत्पाद वर्मिकंपोस्ट लेकर आए जिसे उन्होंने ''मिट्टी" कहना चुना. वर्मिकंपोस्ट में 17 कुदरती चीजों का मेल है, जिनमें एक कॉफी चेन की स्थानीय दुकानों की फेंकी हुई कॉफी की तलछट भी है.

बाद में आइआइटी कानपुर भी कुछ रकम के साथ इससे जुड़ गया. कुछ वक्त बाद उनकी कंपनी कानपुर के सरसौल गांव में पर्यावरण अनुकूल अगरबत्तियां भी बनाने लगी. अगरबत्ती के डिब्बों पर भगवान की तस्वीरें होने की वजह से उन्हें कूड़ेदानों में फेंकने में श्रद्धालुओं को दिक्कत होती थी, लिहाजा हेल्प अस ग्रीन ने अगरबत्तियों को तुलसी के बीज युक्त कागजों में बेचना शुरू किया.

अंकित और करण की जोड़ी ने अगस्त में एक और कंपनी फ्लावर साइकल बनाई और भौंती में 20,000 वर्ग फुट में कारखाना लगाया. एक और प्रोडक्ट आने वाला हैः क्रलोराफोम जो थर्मोकोल की जगह लेगा. हेल्प अस ग्रीन ने 200 से ज्यादा ''कचरा बीनने वालों" को—जो निचली जातियों की औरतें होती हैं—इज्जत और सम्मान दिलावाया है. पहले वे महज 10 रु. रोज कमाती थीं, आज कम से कम 200 रु. 

अंकित अग्रवाल,  28 वर्ष, करण रस्तोगी,  29 वर्ष,  संस्थापक हेल्प अस ग्रीन

एक दिन ऐसा हुआ

हमने तय किया कि हम किसी भी किस्म के प्रदूषण को धर्म से नहीं जुडऩे देंगे.

समाधान की तलाश

कचरा बीनने वाली औरतों पर लगे दाग को धोना और उन्हें सुरक्षा तथा सम्मान देना, और ऐसा करते हुए हमने नदियों को साफ-सुथरा भी रखा.

मिली खुशी

प्रदूषण मुक्त पर्यावरण में योगदान देना.

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