विदेशी निवेश मुबारक हो
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए नरेंद्र मोदी सरकार ने अपना साहसिक कदम आगे बढ़ाया. उसने रक्षा, विमानन, रिटेल तथा दवा के क्षेत्र में नए रास्ते खोल दिए हैं. मगर क्या इससे आर्थिक वृद्धि और रोजगार में कोई इजाफा हो सकेगा?

सोमवार, 20 जून की सुबह 10 बजे केंद्रीय वित्त और वाणिज्य मंत्रालय के अहम नौकरशाह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बैठक के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय में इकट्ठा हुए. यह घटना रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन के उस ऐलान के महज दो दिन बाद की थी जिसमें उन्होंने इस पद पर दूसरे कार्यकाल में बने न रहने की बात की थी. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) पर सरकार की नई नीति की समीक्षा के लिए पीएमओ की बैठक मंगलवार के लिए तय की गई थी लेकिन उसे एक दिन पहले ही बुला लिया गया. बैठक शुरू होने तक शेयर बाजार कमजोर खुला था. निफ्टी और सेंसेक्स ने मामूली गोता लगाया था तो डॉलर के मुकाबले रुपया अपना 0.8 फीसदी मूल्य गंवा बैठा था.
सुधारों पर बड़े फैसलों का ऐलान
रघुराम राजन के विदा होने के संदेश के बाद सरकार नुकसान की भरपाई के मूड में थी. दिन में 2 बजे प्रधानमंत्री मोदी ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडिल से दो ट्वीट करते हुए बैठक में लिए गए फैसलों का खुलासा कियाः 'उच्चस्तरीय बैठक में आर्थिक सुधार से संबंधित अहम फैसले लिए गए जिससे एफडीआई के मामले में भारत दुनिया की सबसे खुली अर्थव्यवस्था बना गया है.'
कई क्षेत्र खुले FDI के लिए
दिन में साढ़े तीन बजे केंद्रीय वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमन ने नई नीति का विवरण सार्वजनिक कियाः भारत ने विदेशी निवेश के लिए अपने दरवाजे और खोल दिए हैं. अब विदेशियों का एयरलाइनों पर स्वामित्व हो सकता है, वे खाद्य प्रसंस्करण कंपनियां डाल सकते हैं, रक्षा उत्पादन इकाइयां खोल सकते हैं और दवा कंपनियों को खरीद सकते हैं. सरकार ने पहली बार जब अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए विदेशी पूंजी का सहारा लिया था, उसके बाद से पिछले 20 साल में यह एफडीआइ से जुड़ा सबसे आकर्षक फैसला था.
वैश्विक असर से बचाने की कोशिश
नौकरशाह इन विशाल एफडीआई प्रस्तावों पर महीने भर से काम कर रहे थे. यह तय पाया गया था कि अनिश्चय से भरे इस सप्ताह में एफडीआइ दर्दनिवारक की भूमिका निभा पाएगा—ये दो चिंताएं थीं दुनिया भर में मशहूर आरबीआइ गवर्नर के विदा होने के संदेश यानी 'रेग्ज़िट' और 23 जून को यूरोपीय संघ से अलग होने पर ब्रिटेन के वोट यानी 'ब्रेग्ज़िट' का आर्थिक प्रभाव. छह क्षेत्रों—दवा, खाद्य प्रसंस्करण, सूचना और प्रसारण, हवाई परिवहन, एकल ब्रांड खुदरा व्यापार और रक्षा में 100 फीसदी एफडीआइ को मंजूरी दे दी गई.
अब स्वत: मंजूरी की सीमा 95 फीसदी से ऊपर
नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कान्त ने इंडिया टुडे को बताया, 'पहले भारत में आने वाले 91 फीसदी निवेश स्वतः मंजूरी प्राप्त थे, अब यह सीमा 95 फीसदी से ऊपर हो गई है.'
आर्थिक तस्वीर बदलने की कोशिश
दो साल बाद मोदी सरकार ने पूरे जोर के साथ अपने आर्थिक दर्शन को एक शक्ल दे डाली है और इन चिंताओं को दरकिनार कर दिया है कि उनका संरक्षणवादी राज्य की अवधारणा से भी कोई लेना-देना है. मुंबई के एक अर्थशास्त्री कहते हैं, ''वे अब अपेक्षाओं और आरएसएस के विचार से आगे बढ़ चुके हैं."
कारोबार के लिए खुला मैदान
विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने 19 जून को मीडिया से कहा था, 'एफडीआइ घर बैठे नहीं आती.' वे सरकार के कूटनीतिक प्रयासों को समझा रही थीं कि कैसे उसे उम्मीद है कि साल के अंत तक दुनिया के सभी देशों के साथ भारत का संपर्क स्थापित हो जाएगा. इनमें पिछले दो साल के दौरान हुई मोदी की 38 विदेश यात्राओं समेत मेडिसन स्क्वायर, वेंबली स्टेडियम और यूएई में रोड शो भी शामिल रहे. स्वराज ने इन प्रयासों के पहले लक्ष्य को इंगित करते हुए कहा कि ऐसा भारत में एफडीआइ को बढ़ाने के लिए किया गया है, जो कि 25 साल पहले आर्थिक उदारीकरण के प्रवेश के बाद आई तमाम सरकारों का घोषित लक्ष्य रहा है. इन सरकारों ने एफडीआइ को आकर्षित करने की कोशिश की है ताकि घरेलू पूंजी, प्रौद्योगिकी और कौशल को सहारा मिल सके, जिससे आर्थिक वृद्धि में तेजी आ सके. सबके नतीजे मिश्रित रहे हैं. भारत में 2005 तक एफडीआइ का प्रवाह वैश्विक आंकड़ों का सिर्फ 0.8 फीसदी था. बाद में आई यूपीए समेत तमाम सरकारों ने एफडीआइ में इजाफे के लिए अहम कदम उठाए, लेकिन मोदी सरकार के तहत एफडीआइ को एक अभियान के स्तर पर बरता गया है. भारत ने 2015 में 44 अरब डॉलर का विदेशी निवेश आकर्षित किया जो वैश्विक एफडीआइ प्रवाह में 2.5 फीसदी बैठता है.
संकट ने दिखाया रास्ता
सरकार का एफडीआई को लेकर यह उत्साह दरअसल संकट से पैदा हुआ है. भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष विश्व बैंक के एक अध्ययन के मुताबिक तितरफा संकट है. बीते 20 जून को जारी यह रिपोर्ट कहती है कि भारत को अपने ठप पड़े इंजन को सक्रिय करने की आवश्यकता है—कृषि में वृद्धि और ग्रामीण मांग, व्यापार और निजी निवेश—साथ ही यह भी सुनिश्चित करने की जरूरत है कि सक्रिय इंजन, औद्योगिक गतिविधियों में आई तेजी और सेवा क्षेत्र ईंधन की कमी के चलते फिर से बैठ न जाएं. सकल पूंजी निर्माण 2009-10 में अपने शिखर 24 फीसदी को छूने के बाद पिछले साल शून्य फीसदी पर आ गया. कमजोर निजी निवेश के चलते सरकार एक बार फिर निवेश के लिए दुनिया का मुंह ताकने को मजबूर हुई है.
क्या कहते हैं आर्थिक विशेषज्ञ?
आर्थिक मामलों के सचिव शक्तिकांत दास कहते हैं, 'यह फैसला निवेश को प्रोत्सहित करने के लिए है, जो रोजगार सृजन का रास्ता बनाएगा. यह न्यूनतम सरकार और अधिकतम सुशासन के सरकार के दर्शन के अनुरूप है.'
पैसा कमाने की कवायद
मोदी सरकार का सबसे मुखर फैसला रक्षा क्षेत्र में था. सरकार के शपथ लेने के सिर्फ दो महीने के भीतर जुलाई 2014 में उसने रक्षा क्षेत्र में एफडीआइ की सीमा को 26 फीसदी से बढ़ाकर 49 फीसदी कर दिया था. इसका मतलब था कि अब विदेशी कंपनियां अपनी भारतीय इकाइयों में 49 फीसदी हिस्सेदारी ले सकती हैं, बशर्ते वे 'अत्याधुनिक तकनीक' लेकर आएं. सरकार को भरोसा था कि इस फैसले से देश में विदेशी कंपनियों का सैलाब आ जाएगा, जो लड़ाकू जेट, टैंक और लड़ाकू जहाज बनाने की ख्वाहिश रखती हों. ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, तो आंशिक तौर पर इसलिए क्योंकि रक्षा क्षेत्र में सरकार ही इकलौती खरीदार होती है.
व्यापार में हिस्सेदारी बढ़ाने की कवायद
इसके अलावा विदेशी कंपनियां ऐसी कंपनी में बहुमूल्य प्रौद्योगिकी को दांव पर नहीं लगाने की इच्छुक थीं जहां उनकी अल्प हिस्सेदारी हो. सरकार को इस बात का एहसास होने में दो साल से भी कम का वक्त लगा, जब रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर ने 29 अप्रैल को एक बयान में यह स्वीकार किया कि वह नीति कितनी कमजोर थी. पर्रीकर ने लोकसभा में लिखित जवाब में सरकार की नई उदारीकृत नीति के बाद रक्षा क्षेत्र में एफडीआई प्रवाह पर कहा, 'अगस्त 2014 से फरवरी 2016 के बीच कुल 112.35 लाख रु. की राशि देश के रक्षा क्षेत्र में एफडीआइ के रास्ते आई है.'
पॉलिसी में अहम बदलाव
नई नीति विदेशी रक्षा कंपनियों के लिए इस मायने में आकर्षक है कि वे भारत को अपने विनिर्माण का केंद्र बना सकती हैं, यहां के कार्यबल और कौशल का दोहन कर सकती हैं और किसी तीसरे देश को यहां बने हथियारों का निर्यात कर सकती हैं. फिलहाल सरकार के पास 100 फीसदी एफडीआइ का सिर्फ एक प्रस्ताव लंबित है जो फ्रेंच नौसैनिक जहाज निर्माता डीसीएनएस की ओर से आया है जो पनडुब्बियों के लिए एयर इंडिपेंडेंट प्रॅपल्शन यूनिट बनाने का संयंत्र यहां लगाना चाहती है. नए एफडीआइ मानकों के साथ उम्मीद है कि कुछ और प्रस्ताव शक्ल ले सकेंगे. भारतीय नौसेना के लिए परंपरागत पनडुब्बियां बनाने की इच्छुक कंपनी थाइसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स इंडिया के एमडी गुरनाद सोढी एफडीआइ के फैसले को ''रक्षा उत्पादन मंर सशक्त और समग्र वृद्धि के भारत के लक्ष्य की ओर एक बड़ी छलांग" मानते हैं.
बड़े सुधारों पर जोर
पर्रिकर ने रक्षा मंत्रालय में बड़े पैमाने पर सुधारों का फैसला किया था जिसके तहत छोटे और मंझोले उद्योगों को फंड करना और युद्धक जहाज, युद्धक जेट तथा पनडुब्बियां बनाने जैसी अहम रक्षा परियोजनाओं के लिए भारतीय कंपनियों के साथ रणनीतिक साझीदारी कायम करना शामिल था. यह कदम एक सशक्त रक्षा-औद्योगिक आधार निर्मित करने के सरकारी प्रोत्साहन का हिस्सा था ताकि आयात पर हमारी निर्भरता का अंत हो सके—भारत अब भी 60 फीसदी से ज्यादा सैन्य हार्डवेयर का आयात करता है. नई एफडीआइ नीति में विदेशी कंपनियों को उनकी भारतीय इकाइयों में 100 फीसदी स्वामित्व के फैसले ने विदेशी रक्षा कंपनियों के बीच आशा की लहर का संचार किया है, खासकर इसलिए कि नीति में 'कटिंग एज टेक्नोलॉजी' की जगह अब ''हाइ टेक्नोलॉजी" का इस्तेमाल किया गया है. एयरबस ग्रुप इंडिया के प्रेसिडेंट पियरे डी बोसे कहते हैं, ''पिछली नीति में ''स्टेट ऑफ द आर्ट्" टेक्नोलॉजी को परिभाषित नहीं किया गया था और जिस तरह से उसका उपयोग किया गया था, वह इस बारे में एक आयामी नजरिए का संदेश देता था कि आखिर किसी विदेशी ओईएम (मूल घटकों के निर्माता) को ज्यादा हिस्सेदारी की जरूरत क्यों पड़ सकती है." बोसे सरकार की नई एफडीआइ नीति को व्यावहारिक बताते हुए उसका स्वागत करते हैं.
घरेलू यात्रा पर सब्सिडी
नागरिक विमानन में सरकार ने ब्राउनफील्ड हवाई अड्डों को विदेशी कंपनियों के 100 फीसदी स्वामित्व के लिए खोल दिया है. यह फैसला नई विमानन नीति की घोषणा के सिर्फ पांच दिन बाद लिया गया है जिसमें घरेलू यात्रा को सब्सिडी दी गई है, एक किफायती ''ओपेन स्काइ" नीति लागू की गई है और तकरीबन 350 निष्क्रिय हवाई पट्टियों पर नो-फ्रिल हवाई अड्डों के निर्माण को मंजूरी दी गई है. सरकार को उम्मीद है कि विदेशियों को घरेलू एयरलाइनों की खरीद की छूट देने से पैसा आएगा जो उसकी नागरिक विमानन नीति को और प्रोत्साहित करेगा.
दवा क्षेत्र पर दांव
फार्मा क्षेत्र में एफडीआइ का फैसला बहुत उत्साह के साथ स्वीकार किया गया है. यह ऐसा क्षेत्र है जहां भारतीय कंपनियों ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों की ऑफ-पेटेंट दवाओं के किफायती संस्करण लाकर दुनिया भर में अपनी छाप छोड़ी है. मौजूदा मानकों में ब्राउनफील्ड या मौजूदा परियोजनाओं में 100 फीसदी एफडीआइ की छूट थी लेकिन यह सरकारी मंजूरी से ही संभव था. नए मानकों में 74 फीसदी एफडीआइ ऑटोमैटिक रूट से आएगा और उससे ज्यादा निवेश के लिए सरकारी मंजूरी लेनी होगी. रेटिंग फर्म क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री डी.के. जोशी कहते हैं, ''फार्मा क्षेत्र को हमें और बढ़ावा देना चाहिए क्योंकि इसमें निर्यात की संभावना ज्यादा है." भारतीय फार्मा क्षेत्र का निर्यात 2014-15 में 96,000 करोड़ रु. था जो 2015-16 में 10 फीसदी बढ़ गया जिसमें अकेले अमेरिकी बाजार के भीतर इसकी वृद्धि 33 फीसदी थी. यह जानकारी इस साल अप्रैल में वाणिज्य मंत्रालय ने दी थी. परामर्शदाता फर्म मैकिंजे के मुताबिक भारतीय फार्मा क्षेत्र मौजूदा 20 अरब डॉलर से 2020 तक 55 अरब डॉलर के कारोबार में तब्दील होने की क्षमता रखता है.
कंपनियों के लिए भारी प्रोत्साहन
इस क्षेत्र की चुनौतियां हालांकि अपने किस्म की हैं, चाहे वह मूल्य नियंत्रण का बढ़ता जाल हो या फिर अमेरिका में जेनेरिक दवा के बाजार की धीमी वृद्धि, जो कि ज्यादा प्रतिस्पर्धी हो चला है. ऐसे में ब्राउनफील्ड परियोजनाओं के लिए एफडीआई की सीमा में इजाफा उन कंपनियों के लिए भारी प्रोत्साहन होगा जो निजी इक्विटी के रास्ते विदेशी पूंजी तलाश रही हैं. ब्रोक्रेज फर्म एंजेल ब्रोकिंग में वीपी, रिसर्च सरबजीत कौर नांगरा कहते हैं, 'यह कदम इस क्षेत्र में विलय और अधिग्रहण के रास्ते और निवेश लेकर आएगा."
भारतीय में बाजार में विदेशी दिलचस्पी
भारत के बाजार में विदेशियों की काफी दिलचस्पी है, लेकिन नांगरा का कहना है कि भारतीय कंपनियों का उच्च मूल्यांकन एक समस्या है. बीते दिनों विदेशी कंपनियों से जुड़ी बड़ी कंपनियों की बिक्री में यह बात सामने आई थी. जापानी कंपनी दाइची सैंक्यो ने 2008 में रैनबैक्सी लैबोरेटरीज को 4.6 अरब डॉलर में खरीदा था जबकि अमेरिकी कंपनी एबट लैब्स ने पिरामल हेल्थकेयर के घरेलू कारोबार के अधिग्रहण के लिए 3.7 अरब डॉलर चुकाए थे. उच्च मूल्यांकन भले ही एक अवरोध का काम करेगा, लेकिन ज्यादा निवेश का रास्ता अब खुल चुका है. ईवाइ में टैक्स ऐंड रेगुलेटरी सेवाओं के कार्यकारी निदेशक देवराज सिंह कहते हैं, 'एफडीआई नीति में हुए बदलाव निश्चित तौर से फार्मा क्षेत्र में विदेशी एमऐंडए में लगने वाले वक्त को कम करेंगे जिससे भारत में इस क्षेत्र में और पैसा आएगा."
एफडीआइ में इस फैसले के बाद मोदी सरकार सीधे तौर पर अपने वैचारिक मातृसंगठन के साथ टकराव की स्थिति में आ गई है. आरएसएस के आर्थिक थिंकटैंक स्वदेशी जागरण मंच ने ई-कॉमर्स में ट्रेडिंग के लिए खाद्य प्रसंस्करण में 100 फीसदी एफडीआइ को देश के किसानों और व्यापारियों के साथ ''विश्वासघात" बताया है.
कारोबार और विचारधारा का पेच
मोदी सरकार अब तक बहुब्रांड रीटेल में एफडीआइ को मंजूरी देने पर संघ और बीजेपी के बीच चल रहे एक असहज शीतयुद्ध के बीच में फंसी रही है. ऐसा इसलिए क्योंकि आरएसएस और पार्टी व्यापारियों को अपने मूल समर्थकों के बीच गिनते रहे हैं. यह तबका अब सीधे उदारीकृत एफडीआइ के मानकों के निशाने पर होगा. वह लंबे समय से इसकी आशंका में था लेकिन इस साल उसका भय हकीकत में सामने आ चुका है. इस साल की शुरुआत में पेश अरुण जेटली का बजट रीटेल में एफडीआइ पर काफी सतर्क था. बजट में खाद्य रीटेल में 100 फीसदी एफडीआइ को मंजूरी दे दी गई थी. अब नई नीति खाद्य प्रसंस्करण में 100 फीसदी एफडीआइ को छूट दे चुकी है जो आरएसएस के लिए बिलकुल अप्रिय है. यही वजह है कि निवेशक अभी इस इंतजार में हैं कि आखिर वे भारत में निर्मित और उत्पादित खाद्य पदार्थों को बेचने की दिशा में किस हद तक आगे जा सकते हैं. यह समझने के बाद ही वे इस क्षेत्र में निवेश करना चाहेंगे.
सिस्टम में आएगी पारदर्शिता
स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय संयोजक कश्मीरी लाल ने इंडिया टुडे को बताया कि यह कदम हमें खाद्य क्षेत्र के केंद्रीकरण की ओर ले जाएगा और अंततः उपभोक्ता खाद्य पदार्थों का चुनाव अपने हिसाब से नहीं कर पाएंगे. वे कहते हैं, ''यह आरएसएस और उसके विचारकों के मूल दर्शन के विरुद्ध है."
संघ का रवैया भी हैरान करने वाला
वित्त मंत्री अरुण जेटली ने संघ के नेतृत्व पर कुछ मरहम लगाने की कोशिश की है लेकिन वे नाकाम रहे हैं. संघ का रवैया निवेशकों को निराश कर रहा है. वे कहते हैं कि खाद्य पदार्थों की बिक्री में एफडीआइ पहला अच्छा कदम हो सकता था, लेकिन उसे आखिरी कदम नहीं होना चाहिए. उन्हें सबसे ज्यादा डर इस बात का है कि कहीं केंद्र सरकार आरएसएस के दबाव में इसका फैसला राज्य सरकारों पर न छोड़ दे. बीजेपी के कई मंत्री खुद इस मामले को लेकर असहज हैं. यही वजह है कि कई बड़े रीटेलर ''राज्य सरकार की मंजूरी" से छूट का दबाव बना रहे हैं जो कि निवेश की एक पूर्व शर्त है.
पूरे फैसले का इंतजार
इस क्षेत्र को खोले जाने की अगुआई करने वाली अमेरिकी रीटेल कंपनी वालमार्ट भी सतर्क है. वालमार्ट इंडिया के प्रेसिडेंट और सीईओ कृश अय्यर कहते हैं, ''हम नीति दस्तावेज का इंतजार कर रहे हैं और कोई भी वादा करने से पहले उसे पढऩा चाहेंगे." वालमार्ट अब तब बहुब्रांड रीटेल में निवेश करने से बचता रहा है, लेकिन कैश एंड कैरी कारोबार में वह एक अहम खिलाड़ी है.
नई कंपनियां आ सकती हैं
अधिकतर मौजूदा खिलाड़ियों के लिए इन नए फैसलों का कोई खास कारोबारी मतलब नहीं है, लेकिन उनमें से कई मानते हैं कि बहुब्रांड रीटेल को पूरी तरह खोलने की दिशा में यह एक अहम मील का पत्थर है. नाम न छापने की शर्त पर एक शीर्ष बहुब्रांड रीटेल कंपनी के सीईओ कहते हैं, ''नए फैसलों के चलते कुछ कंपनियां पैसा लेकर आएंगी और पहले कदम उठने का उन्हें लाभ भी मिलेगा, लेकिन रातोरात उन्हें अपने निवेश पर अच्छे रिटर्न की उम्मीद नहीं करनी चाहिए."
अंकटाड की ''विश्व निवेश रिपोर्ट 2016" कहती है कि भारत द्वारा घोषित ग्रीनफील्ड निवेशों में बड़े पैमाने पर इजाफा एफडीआइ को और प्रोत्साहन दे सकता है. वैश्विक और क्षेत्रीय मंदी के बीच भारत, चीन, म्यांमार और वियतनाम अपवाद साबित हो सकते हैं. विश्व बैंक द्वारा 20 जून को जारी अध्ययन कहता है कि 2015-16 में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचे एफडीआइ के मजबूत रहने की संभावना है. रिपोर्ट कहती है, ''सरकार जिस तरह अर्थव्यवस्था के अतिरिक्त क्षेत्रों को खोल रही है, एफडीआइ के इतना जरूर रहने की उम्मीद है जो अनुमानित अवधि में चालू खाता घाटे को वित्तपोषित कर सके (जहां आयात का मूल्य निर्यात से ज्यादा होता है)."
धीमी प्रगति भी है चुनौती
इसके बावजूद एफडीआइ आकर्षित करना चुनौतियों का एक छोटा-सा हिस्सा है. समस्या बुनियादी है. पिछले नवंबर सरकार ने एफडीआइ को जो धक्का दिया था, वह रक्षा क्षेत्र, बहुब्रांड और एकल ब्रांड रीटेल में मुश्किल से आगे बढ़ पाया जिसके कई कारण थे. वैश्विक एफडीआइ प्रवाह अप्रत्याशित है और निवेश पर तीव्र रिटर्न की चाह रखता है. विदेशी कंपनियों ने राज्य नियंत्रित रेलवे के इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश नहीं किया है. प्रौद्योगिकी कंपनी ऐपल इंक ने एकल ब्रांड रिटेल कारोबार में घरेलू स्रोतों से 30 फीसदी माल जुटाने के प्रावधान पर चिंता जताई है (जिसे नई नीति में ''कटिंग एज टेक्नोलॉजी" के मामले में रियायत दी गई है). सरकार को जहां इन सुधारों से ज्यादा रोजगार सृजित करने और निवेश आकर्षित करने का भरोसा है, वहीं तमाम ऐसी चुनौतियां हैं जो भारत में एफडीआइ की इबारत को लिखने में अपनी भूमिका निभाएंगी.
लक्ष्य बड़ा रखना होगा
अमिताभ कान्त कहते हैं, ''भारत को 100 अरब डॉलर एफडीआइ का लक्ष्य रखना चाहिए. मामला सिर्फ क्षेत्रों को खोलने भर का नहीं है, यह भारत को एक बाजार के तौर पर प्रचारित करने का भी मसला है, एक टिकाऊ बाजार. हमें भारत में कारोबार करने को सहज बनाना होगा. कर में प्रत्याशा बहुत महत्वपूर्ण चीज है."
निवेश को लेकर कंपनियां सतर्क
भारत के बाजार से निकलना या यहां से मुनाफे को बाहर ले जाना जरा जटिल मसला है. निवेशक और कंपनियां भारत में प्रवेश करने से पहले यहां के नियम-कायदों को जरूर संज्ञान में लेती हैं. एक विशाल बियर निर्माता अपने 50 करोड़ डॉलर के निवेश को बढ़ाकर 3 अरब डॉलर करना चाहता है बशर्ते भारत सरकार अल्कोहल के उत्पादन में कर को और ज्यादा पारदर्शी बनाने को तैयार हो. यह कंपनी चीन में 10 अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश कर चुकी है. वह चाहती है कि प्रस्तावित माल और सेवा कर के दायरे में अल्कोहल को भी लाया जाए.
मुनाफे में नीतियां अवरोधक
विदेशी कंपनियों को भारत में निवेश पर परामर्श देने वाले जानकार कहते हैं कि ऐसी कई कंपनियां अपने कदम थामे हुए हैं क्योंकि उनके मुनाफा कमाने की राह में यहां की नीतियां अवरोधक हैं. सरकार को अब भी पिछली तारीख से कर रोपण और हस्तांतरण मूल्य पर अपना पक्ष स्पष्ट करना बाकी है.
खुली अर्थव्यवस्था का संदेश
कुल मिलाकर देखें तो सरकार की ओर से यह संदेश दिया जा चुका है कि भारत अब एक है लेकिन उसे बुनियादी मसले हल करने ही होंगे. सीआइआइ के प्रेसिडेंट नौशाद फोर्ब्स कहते हैं, ''यह कारोबार सहज बनाने के व्यापक कार्यक्रम का एक हिस्सा भर है. हमारे यहां कारोबार करना वाकई बहुत कठिन हो चला है. अब वह आसान हुआ है, लेकिन हमें काफी आगे जाना है. राज्यों के बीच परस्पर प्रतिस्पर्धा एक सशक्त प्रक्रिया है जिसे अब सामने लाया जा रहा है." पिछले साल डीआइपीपी द्वारा जारी कारोबार करने में सहजता से जुड़ी रैंकिंग में एक भी राज्य ऐसा नहीं था जो हर कसौटी पर खरा उतरा हो. जाहिर है, और ज्यादा विदेशी पूंजी आकर्षित करने से पहले भारत को घरेलू स्थितियों को दुरुस्त करना अभी बाकी है.
—साथ में श्वेता पुंज, एम.जी. अरुण और अनिलेश एस. महाजन