सेक्स सर्वेक्षणः दिल है कि भरता नहीं
समूह के सेक्स सर्वेक्षण 2016 में तीन अहम खासियतों—प्यार, वासना और बेताबी—के इर्दगिर्द देश की शहरी आबादी के रवैए, व्यवहार और जीवनशैली को समझा गया है. इसमें शामिल तकरीबन 20 फीसदी हिंदुस्तान ने कहा है कि उन्हें इससे कोई दिक्कत नहीं है कि उनका पार्टनर रिश्ते से बाहर जाकर कुछ तलाश करता है.

मेरे प्यारे पाखंडी हिंदुस्तानी,
तुम जो बसों और मेट्रो में पीछे दिखने वाले शीशों में अपने होंठों के उभार को सहेजते हुए अपने चेहरों पर प्रेम के बाद की चमक के साथ नजर आते हो. तुम जो चट्टान सरीखे मजबूत कंधों और शानदार ऐब्स के लिए जिम में भीड़ लगा देते हो, वही ऐब्स जिन्हें देखकर नए से नए ढंग से अपनी लटें संवारने के लिए सैलूनों में उमड़ पड़ने वाली तुम्हारी संगिनियां उत्तेजित हो उठती हैं.
तुम जो जिवामी, Masalatoys.com और ThatsPersonal.com सरीखे ई-रिटेलरों के मोबाइल ऐप्स के जरिए गुपचुप फड़कते हुए अंतर्वस्त्रों का ऑर्डर देते हैं. तुम सेक्स के लिए रिश्ते तोड़ देते हो, चरमसुख की आकांक्षा करते हो और कुछ ज्यादा ही जोशो-खरोश पर भी तुम्हें ऐतराज नहीं होता. तुम छुपे रुस्तम हो. तुम जानते हो कि तुम कौन हो. तुम्हारी तादाद भी अच्छी-खासी है. तुम गुवाहाटी और पटना से लेकर मुंबई तक फैले हो, जिनमें से 75 फीसदी मानते हैं कि रिश्ते में सेक्स बेहद अहम है, तुम में से 64 फीसदी अपनी सेक्स की इच्छा और ताकत को बहुत ऊंचा आंकते हो, तुम में से 71 फीसदी बिस्तर में अपने साथी के प्रदर्शन को 'अच्छा' के दर्जे में रखते हो और तुममें से 55 फीसदी बिस्तर में खिलदड़ और चुलबुलेपन से भरे हो.
तुम जो मस्तीजादे फिल्म के प्रोमोज पर चीं-चीं करने लगते हो, लेकिन उस 100 करोड़ रु. की फिल्म ग्रैंड मस्ती के साथ तुमने अश्लील कॉमेडी के जुंए को बॉक्स ऑफिस पर जायज बना दिया. तुम जो ऑल इंडिया बकचोद रोस्ट के सेक्सी इशारों और तंज से भरे शो में शुरू से आखिर तक बैठे रहने के लिए दीपिका पादुकोण को 'बेशर्म' कहते हो, लेकिन पूर्व पोर्न स्टार सनी लियोनी को 2015 में लगातार दूसरे साल गूगल पर सबसे ज्यादा सर्च की जाने वाली सेलेब्रिटी बना देते हो.
बेवफाई का मौका देने वाली साइट AshleyMadison.com पर साइन-इन करने वालों में भारत शिखर पर है और शादी तथा डेटिंग साइटों पर युवक-युवतियां किसी भी गोत्र पर बात नहीं कर रहे हैं. यहां तक कि तुम में से 36 फीसदी ने कौमार्य या कुंआरेपन का लबादा भी उतार फेंका है, जिसे तुमने इज्जत के ढोंग की तरह पहन रखा था और तुम्हें अब इस बात की परवाह नहीं है कि तुम्हारी संगिनियां कुंआरी हैं या नहीं (28.3 फीसदी औरतें असल में नहीं हैं).
तुम खुद अपनी तरफ देखो, जो सेक्स के पहले तजुर्बे को आनंद के तजुर्बे की शुरुआत भर मानते हो. काम में मसरूफ होने के नाते तुमने जो बेशकीमती औसत अपने लिए तय किया है, वह हफ्ते में कुछेक बार 30 मिनट का सेक्स है, जिसे तुममें से 37.7 फीसदी चरम सुख को परम आनंद बताते हो.
तुम जिसका चार अक्षर का पसंदीदा शब्द अब 'टाक' है, जैसा केईएम अस्पताल के सेक्स विशेषज्ञ डॉ. प्रकाश कोठारी कहते हैं. तुम जिसकी सेक्स लाइफ इस काम में औरतों को कभी औजार के तौर पर इस्तेमाल किया करती थी, आज उन्हें बदलाव की वाहक के तौर पर देखती है. कोठारी कहते हैं, ''एक वक्त था जब आदमी सेक्स करते थे, करवट बदलते थे और सो जाते थे. आज जोड़े आपस में बात करते हैं.'' उनके क्लिनिक में कतार लगाए खड़ी औरतें या जो उन्हें फोन या व्हाट्सऐप या स्काइप करती हैं, बिल्कुल बुनियादी सवाल पूछती हैं, मसलन, ''मुझे संभोग के दौरान दर्द क्यों होता है?'' या ''मुझे वह मल्टीपल ऑर्गेज्म (चरम सुख) कैसे मिल सकता है जिसके बारे में पढ़ती रहती हूं? ''
तृप्त यौन जिंदगी का नया बुनियादी फलसफा है कभी संतुष्ट न होना, और तुम सब इंटरनेट, टेलीविजन और फिल्मों में और ज्यादा विकल्पों की तलाश में निकल पड़े हो. तुममें से 40.3 फीसदी पोर्न देखते हो, मगर मेट्रो शहरों में बेंगलूरू ही है, जहां ऐसे लोगों की तादाद सबसे ज्यादा 20.9 फीसदी है. सेक्स के दौरान आवाजें निकालने ने तो राष्ट्रीय शक्ल अख्तियार कर ली है, जब तुममें से 38 फीसदी आवाजों से अपने साथी को इशारा करते हो कि तुम्हें उत्तेजित करने का सबसे अच्छा तरीका क्या है और 57 फीसदी पारंपरिक लाड़-प्यार को तरजीह देते हो, जबकि 4 फीसदी कृत्रिम चीजों का सहारा लेते हो. फिर भी तुममें से ज्यादातर जज्बाती हैं, 34 फीसदी जज्बातों से उत्तेजित होते हैं (हां, तुम, कमजोर दिल वाले भोंदू, तुम). निहलानी के बावजूद, तुम, पूरा मुल्क, जानना चाहता है कि बिस्तर में और खुश कैसे हुआ जा सकता है.
फिर यह भी तुम आदमी ही हो जो इसमें बढ़-चढ़कर सक्रिय रहते हो. हैदराबाद में रहने वाले एंड्रोलॉजिस्ट डॉ. सुधाकर कृष्णमूर्ति कहते हैं, ''समाज में खुलापन आया है और उसने सेक्स को किसी पोर्नोग्राफिक फैंटेसी के तौर पर नहीं, बल्कि खुशहाल जिंदगी के बेहद जरूरी हिस्से के तौर पर स्वीकार करने की इजाजत दे दी है.'' तुम इसमें बेहतर हाथ आजमाना चाहते हो और चुपचाप तुम्हारी बात मानने वाली संगिनी चाहते हो. बात यह है कि तुम्हारे परिवार ने तुम्हें अपनी परेशानियों, मसलन ठंडापन, सेक्स को लेकर फिक्र या नामर्दी का इलाज करवाने की गुंजाइश दे दी है, जबकि कभी ये परेशानियां केवल शर्म का ही सबब होती थीं. अगर 22.7 फीसदी को सेक्स करने में गड़बड़ी से दोचार होना पड़ रहा है, तो तुम इसका इलाज भी करवा रहे हो. सेक्स की परेशानियों का इलाज खोजकर तुम अपनी सेक्स जिंदगी को बेहतर भी बना रहे हो.
तुम्हारी सफेद और स्याह पक्षों में भी अब बेहतर तालमेल है, क्योंकि न केवल औरतें पहल कर रही हैं और आदमी बात कर रहे हैं, बल्कि दोनों एक दूसरे को भरपूर सहारा भी दे रहे हैं. सेक्स की वजह से एक दूसरे से दूर रहने वाले जोड़ों में से 74 फीसदी में प्यार बना रहता है. इसे कारगर बनाने के लिए तुम खुद अपने कायदे भी गढ़ रहे हो, प्रदीप और नेहा नैयर की तरह. बेंगलूरू के इस जोड़े को रिश्ते में बंधे चार साल हुए हैं.
इतने साल तक सर्वे में शामिल एक चौथाई लोग शादी की सामाजिक स्वीकृति के बगैर आसानी से एक दूसरे के साथ रह रहे थे. तुम्हारे लिए यह अच्छा ही है कि तुम वह सब कर रहे हो, जो अपने संग-साथ को बनाए रखने के लिए जरूरी है और तुमने उसूलों की किताबों को ताक पर रख दिया है.
नई दिल्ली में योग सिखाने वाली मिनी शास्त्री बताती हैं कि उन्हें अपने शिष्यों के जीवनसाथी ज्यादा खुश दिखाई देते हैं. वे कहती हैं, ''उनके साथी अब जिम्मेदारी उठाने, बच्चों को संभालने, खाना पकाने और अपने पार्टनर से यह कहने के लिए तैयार हैं कि जाओ, अपने लिए, अपनी सेहत के लिए, अपनी शारीरिक और मानसिक चुस्ती के लिए वक्त निकालो, सेहतमंद चीजें खाओ. अब जब हमने पैसा कमा लिया है, आओ जिंदगी में संतुलन की तलाश करें.''
यह वह साल भी रहा है, जब तुमने छींटाकशी को भी ताक पर रख दिया. फॉर्चून 500 कंपनी में एक्विजिशन मैनेजर प्रिया वेंकटेश्वरन कहती हैं, ''सेक्स हॉलीडे चलन में हैं.'' वे बताती हैं कि रोमांच इस बात में नहीं कि हफ्ते में कितनी बार, बल्कि इस बात में है कि काम के ढेर सारे बोझ के बीच ही बगैर किसी तैयारी के सेक्स की मौज-मस्ती के लिए अपने पार्टनर के साथ एक कमरे में बंद हो जाओ. वे और उनके शौहर गाहे-बगाहे अपने दो बच्चों को ससुराल में छोड़ देते हैं और खुद को सप्ताहांत की मौजमस्ती के लिए छुट्टी दे देते हैं. अगर वे शहर से बाहर नहीं जा पाते, तो शहर के ही एक पांच सितारा होटल में चेक-इन करते हैं, रूम सर्विस को हुक्म देते हैं और 'बस सेक्स करते' हैं.
वेंकटेश्वरन दंपती कहते हैं कि दोहरी आमदनी वाले परिवार में काम के जबरदस्त बोझ, घर चलाने और बच्चों की परवरिश के तकाजों का यही मतलब है कि वे जरूरी तौर पर बार-बार तो सेक्स नहीं कर पाते, मगर जब भी करते हैं तो उसे यादगार बना देते हैं.
शुक्रिया अदा करें सोशल मीडिया का और टिंडर तथा ट्रूली मैडली डीपली सरीखे ऐप्स का भी कि जिन्होंने रिश्ते कायम करने को आसान और अनौपचारिक बना दिया है—तुममें से 17.2 फीसदी उन लोगों के साथ मौज-मस्ती कर रहे हो, जिन्हें तुम जानते भी नहीं. 67 फीसदी के साथ हैदराबाद इस फेहरिस्त में अव्वल है. और तुम घर चलाने वाली 3.8 फीसदी गृहणियों, तुमने अपने सदविवाहिता घर के पके खाने और बेदाग गृहस्थी की आड़ में सेक्स के लिए रकम भी चुकाई है.
सेक्स के लिए ऐप्स को उलटते-पलटते रहने वाले बांद्रा के रेस्तरां संचालक सुनील सिंह बताते हैं कि वह खुद भी तब शर्मसार हो जाते हैं, जब उनसे मिलने वाली उनकी पार्टनर कहती है कि डिनर को गोली मारो, ''चलो, चलकर सेक्स करते हैं.'' यह सब एकदम दुरुस्त है, हर कोई एक दूसरे के राज को राज रख रहा है. यहां तक कि रंगरेलियों में डूबे पटना, भुवनेश्वर और कोच्चि में भी, जहां ग्रुप सेक्स चरम पर है.
तुमने प्यार और सेक्स में फर्क करने की बेहद परिपक्व काबिलियत भी हासिल कर ली है, इसलिए सेक्स करना और जरूरतें पूरी करना दो पूरी तरह अलग-अलग बातें हैं—32.1 फीसदी आदमी और 22.9 फीसदी औरतें यह फर्क कर पाती हैं और इन दोनों में कोई घालमेल नहीं करतीं.
तकरीबन 20 फीसदी हिंदुस्तान ने कहा है कि उन्हें इससे कोई दिक्कत नहीं है कि उनका पार्टनर रिश्ते से बाहर जाकर कुछ तलाश करता है. यह वह हकीकत है, जिसे मुंबई में रहने वाली सोनाली गुप्ता जैसी मनोवैज्ञानिक एक छोटी-सी तादाद में जोड़ों के बीच बढ़ती आपसी रजामंदी का समझौता कहती हैं. वे बताती हैं, ''अगर बेवफाई आज रिश्ते टूटने की वजह है भी तो यह रिश्तों के टूटने की अकेली वजह नहीं है, बल्कि बहुत सारी बातों का नतीजा ज्यादा है. कुछ जोड़ों को उनके रिश्ते के भीतर प्रयोग करना ठीक लगता है.''
और तुम, सेंसरशिप लगाने वालो, नाक-भौं सिकोडऩे वालो, तुम जो शिकायतें करते हो कि ये नौजवान इंटरनेट और टीवी और 35एमएम के बड़े पर्दे के एक कामुक चुंबन के जरिए आने वाले बाहरी असर से नापाक हो रहे हैं, और कभी इस पर, कभी उस पर पाबंदी की लगातार रट लगाए रहते हो, याद रखो कि तुम अल्पमत में हो, तुममें से 28 फीसदी शादियों से ऊब चुके हो, 16.6 फीसदी अपनी सेक्स जिंदगी से नाखुश हो, तुममें से 43.4 फीसदी पुणे में और 38 फीसदी हैदराबाद में हो, जो सेक्स के बाद अपने बिस्तर पर छत को निहारते हुए लेटे रहते हो. तुम हमारे ऊपर एक मेहरबानी करो, एक कंडोम उठाओ और हिंदुस्तान की इन रंगरेलियों में में शामिल हो जाओ.
हमने ऐसे सर्वेक्षण किया
इंडिया टुडे समूह के सेक्स सर्वेक्षण 2016 का मकसद तीन अहम खासियतों—प्यार, वासना और बेताबी—के इर्दगिर्द देश की शहरी आबादी के रवैए, व्यवहार और जीवनशैली को समझना था. सर्वेक्षण मार्केटिंग ऐंड डेवलपमेंट रिसर्च एसोसिएट्स (एमडीआरए) ने किया. इसमें 20 से 69 साल की उम्र के बीच के छात्रों, गृहणियों, कारोबारियों और पेशेवरों सहित कुल 4,042 लोगों के इंटरव्यू किए गए, जो भारत भर के 17 शहरों—हैदराबाद, जयपुर, मुंबई, गुडग़ांव, नोएडा, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नै, चंडीगढ़, लखनऊ, रांची, बेंगलूरू, कोच्चि, पुणे, अहमदाबाद, पटना, भुवनेश्वर, इंदौर और गुवाहाटी—में फैले थे.