‘दुपहिया’ को मॉडर्न ‘मालगुड़ी डेज’ क्यों मानते हैं गजराज राव?

इन दिनों अभिनेता गजराज राव की अभिनय वाली वेब सीरीज दुपहिया के सीजन 2 को काफी पसंद किया जा रहा है. धुरंधर और मिर्जापुर जैसी फिल्मों के बीच वे चाहते हैं कि उन्हें ऋषिकेश मुखर्जी और सई परांजपे जैसी फिल्मों का हिस्सा बनने का मौका मिलता रहे

गजराज राव
गजराज राव

हिंसा और उत्तेजना से भरे दौर में गजराज राव सादगी, सकारात्मकता और सार्थक कहानियों वाले किरदार करने के लिए जाने जाते हैं. 'दुपहिया'की सफलता से लेकर अभिनय, थिएटर, साहित्य और मुंबई की भागदौड़ आदि पर पढ़िए इंडिया टुडे हिंदी के सीनियर एसोसिएट एडिटर शिवकेश से उनकी बातचीत ः

आपके अभिनय वाली वेब सीरीज दुपहिया का दूसरा पार्ट भी आ गया. हमारे गांव-कस्बों की रोजमर्रा की जिंदगी के किस्से दिखाने वाली यह एक एंटरटेनिंग फ्रेंजाइज सीरीज बन गई दिखती है.

आपको याद होगा, एक जमाने में मालगुड़ी डेज सीरियल आया करता था. आर.के. नारायण की कथा शृंखला पर बनाया गया. एक छोटे तहसील-कस्बे की कहानी. उसमें स्वामी की लाइफ, उसके परिवार में, नितांत साधारण से इश्यूज होते थे. उसमें ऐसा कुछ बहुत भागदौड़ या ड्रामा करने की कोशिश नहीं की जाती थी.

हमारे शो दुपहिया की कहानी 2025-26 का मॉडर्न मालगुड़ी डेज है. कथ्य को लेकर हमारे राइटर्स, क्रिएटर्स और डायरेक्टर ने बहुत ईमानदारी बरती है. पहले सीजन (2025) में जब उनसे मुलाकात हुई थी तभी से वे इस बात को लेकर बहुत क्लीयर थे कि हिंसा, उत्तेजना या चुटकुलेबाजी का जो फार्मूला चल रहा है, हम वैसा कोई प्रयास नहीं करेंगे.

मतलब एक पारिवारिक कहानी...

बिल्कुल. हिंदी हार्टलैंड की कहानी. बनवारी और उनके बच्चे भूगोल झा और रोशनी झा जैसे साधारण लोग छोटे शहरों में भी होते हैं, तहसील में भी और बड़े शहरों में भी. सरल-सहज लोग. ऋषिकेश मुखर्जी, बासु चटर्जी या सई परांजपे की फिल्मों के किरदारों की तरह. मेरा मानना है कि हिंदुस्तान में बहुत बड़ी आबादी ऐसे ही लोगों की होती है.

बनवारी झा जैसे लोग परिवार के लिए सीधे और ईमानदार रास्ते पर चलना चाहते हैं. नौकरी पक्की करवाना चाहते हैं, लेकिन उनकी इसी मजबूरी को जज्बाती किया जाता है कि बेटी की शादी करना चाहते हो तो उसके लिए दुपहिया अरेंज करो. बच्चों के अपने सपने हैं. बेटी को बड़े शहर जाना है, बेटे को मुंबई जाकर स्टार बनना है. वह बच्चों के सपनों के रास्ते में रोड़ा नहीं बनता.

सीजन दो में भी रोशनी की कोचिंग के लिए वह मोबाइल टावर की योजना से पैसे लेने की कोशिश करता है. उसकी मंशा किसी को नुकसान पहुंचाना नहीं, सिर्फ बेटी का सपना पूरा करना है. बनवारी न बहुत चतुर है, न कूढ़मगज. उसे भरोसा है कि अंततः अच्छाई जीतेगी. वह युधिष्ठिर की तरह है. नरो वा, कुंजरो वा...अर्धसत्य बोल भी दिया अगर और उससे परिवार का, बेटी का भला होता है, तो शायद वह भी गलत नहीं.

दुपहिया के दृश्य में (बाएं से) गजराज राव, अंजुमन सक्सेना, शिवानी रघुवंशी और स्पर्श श्रीवास्तव

बनवारी झा के किरदार में आप कहानी और पूरे कॉन्फ्लिक्ट को लीड कर रहे हैं. उसके लिए आपने किस तरह से खुद को तैयार किया? प्रोसेस क्या रहा?

आप अगर सिनेमा और ओटीटी पर आ रहे कंटेंट देखें तो पाएंगे कि उसमें हिंसा का बोलबाला है. हिंसा या उत्तेजना वाले सब्जेक्ट्स की तरफ दर्शक जल्दी आकर्षित होते हैं. आप लावारिस  देखिए...सत्तर के दशक का एंग्री यंग मैन हमें लुभाता है. ऐसा नहीं कह रहा कि मैं संत हूं. मिर्जापुर  या धुरंधर मुझे भी रोमांचित करता है लेकिन इस तरह की किसी कहानी का हिस्सा बनना मेरे लिए मुश्किल होगा. मैं उसको एंडोर्स नहीं कर सकता. बतौर दर्शक एंजॉय कर सकता हूं. और जो दर्शक उसको एंजॉय कर रहे हैं, उसके लिए मेरा कोई विरोध भी नहीं.

आप कह रहे हैं कि आप ऐसी फिल्में नहीं करेंगे जो हिंसा या उत्तेजना वाले विषयों पर आधारित हों?

मैं चाहूंगा कि उम्र के जिस पड़ाव पर हूं, आधी शताब्दी पार कर ली है...तो कुछ ऐसी चीजें करूं जिनका कथानक ऋषि दा, सई परांजपे की फिल्मों जैसा हो. जिसमें जीवन की कुछ पॉजिटिविटी निकलकर आए. कुछ सार्थकता हो. निगेटिविटी तो पहले ही चारों तरफ है. दुपहिया के पहले सीजन के बाद से दुनिया भर से लोगों की प्रतिक्रियाएं मिली हैं. न्यूजीलैंड से, यूरोप से...किन-किन जगहों से भारतीय इंस्टा और टेलीग्राम के जरिए मैसेज कर रहे हैं.

मैं सोचता हूं कि अपने ग्रोइंग ईयर्स में मुझे जिस तरह का सिनेमा पसंद आता था, वैसा सिनेमा मैं कैसे करूं? कैसे उसका हिस्सा बनूं? पर मेरे चाहने से तो कुछ होगा नहीं. मुझे तो जो पात्र मिलेंगे उसी में से चुनना है.

जब दुपहिया ऑफर हुई तो आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या थी?

इस शो का कॉन्सेप्ट नोट और एपिसोड आते ही 3-4 दिन में मैंने पूरा पढ़ डाला और प्रोड्यूसर शुभ और सलोना को मैसेज किया कि यह बेहद प्रभावशाली ढंग से लिखा गया है, इसने दिल को छू लिया है. मैं इसका हिस्सा बनना चाहता हूं. ऐसा नहीं कि सिर्फ बनवारी झा अच्छा है. भूगोल, भुवन, रोशनी, दरोगा जी...सारे ही इतने प्यारे. फिर उसके अंदर आपके लिए खाली जगह. ईमानदारी से बताऊं कि जो लिखा गया था, मैंने उसे बाइबल की तरह इस्तेमाल किया.

आप किसी कैरेक्टर के ग्रे एरियाज को, उसकी झिझक, उसके संकोच को...जिसको कहें कि ईमां मुझे रोके है औ खींचे है मुझे कुफ्र...वहां जो बीच में खड़ा होता है...इस झिझक और संकोच को आप कैसे इतनी बारीकी से भीतर बांधते हैं?

पहली चीज तो यह कि बहुत स्ट्रेट लाइन पर चलने वाला कैरेक्टर मुझे नहीं लुभाता. चाहे वो नेगेटिव हो या पॉजिटिव. (मेरा करिअर) आप शुरू से...बैंडिट क्वीन  या ब्लैक फ्राइडे  से देखिए, जो नेगेटिव थे. या मैदान (2024) में न्यूजपेपर का रॉयचौधरी...वह चाहता है कि उसकी टीम अच्छे से खेले. उसके लिए वह लड़ रहा है. वह विलेन नहीं है लेकिन उसके अंदर कॉन्फ्लिक्ट है, कंट्राडिक्शन है.

ऐसे ही जॉली एलएलबी3 का मेरा किरदार...बहुत ओपनमाइंडेड है...शुभ मंगल ज्यादा सावधान में भी आप देखें. एक बाॅटनी का प्रोफेसर. उसे पता चलता है कि बेटे की सेक्सुअल प्रेफरेंस क्या है. वहां वह जिस तरह से बिफरता है, एक फार्स के माध्यम से उसको किया गया था. बड़े अच्छे से निकल कर आया था. थाई मसाज देखें. उसमें भी यही है. फिर डब्बा कार्टेल का पाठक भी लीक पर चलने वाला पात्र नहीं है. वह सरप्राइज करता है.

उसी तरह से दुपहिया. पहले लगेगा कि बनवारी झा क्या ही कर लेगा लेकिन मौका पड़ने पर अपने परिवार, अपनी जमीन के लिए वह कुछ भी कर सकता है, किसी भी हद तक जा सकता है.

यह सीरीज अभी भी बहुत ओपन लगती है...

बिल्कुल. अभी तो एक्सप्लोर होना शुरू हुआ है. अभी तो इंट्रोडक्शन हुआ है. संभ्रांत तबके के लोगों को भी यह पसंद आ रही है. यह मेरे लिए बड़ा सरप्राइजिंग है. बड़ा सुखद लगता है कि हर तबके के लोग इसे देख रहे हैं. उन्हें दुपहिया की कहानी आर के लक्ष्मण के कॉमन मैन जैसी लगती है.

इस सीरीज के जरिए एक बैलेंस बन रहा है. एक तरफ मिर्जापुर जैसी चीजें आ रही हैं जिसका एक दर्शक है और दूसरी ओर यह, जिसे एक इजी वाच बोलते हैं, जिसे पूरे परिवार के साथ आप एक भी जगह पर देख सकते हैं. 

रेणुका (शहाणे) जी वाले हिस्से के बारे में क्या कहेंगे?

रेणुका जी की जबरदस्त फैन फॉलोइंग है. पिछले सीजन की बात है. हम लोग ओरछा के पास एक गांव में शूट कर रहे थे. वहां दो-चार लड़कों ने आकर पूछा कि भौजी नहीं हैं? कब आ रही हैं? मैंने सोचा कि भाभी का कैरेक्टर तो किसी और का है. फिर किसी ने स्पष्ट किया कि वो (आशुतोष) राणा भैया की पत्नी है ना...रेणुका जी, हम तो उनको देखने आए हैं.

मैंने देखा कि 40-50 का पूरा झुंड रोज सुबह आकर खड़ा हो जाता कि भाभी आई हैं. उनका कोई और पारिवारिक लेनदेन नहीं. ऐसा जलवा था रेणुका जी का. और जो उनकी गरिमा है, सेट पर पूरा आचार-बर्ताव. इतनी बड़ी अदाकार. वे जैसे राह दिखाती हैं सब ऐक्टर्स को कि सेट पर कैसे बर्ताव करना है.

इसमें दोराय नहीं कि इसकी लिखावट में जो डीटेल्स हैं, वे ध्यान खींचने वाले हैं.

जी. इसमें कहीं पर भी चुटकुले बोलने की, लतीफा सुनाने की कोशिश नहीं की गई.

आपने इसमें बिहारी डाइलेक्ट को उसके पूरेपन में बड़े करीने से पकड़ा है. उसके अभ्यस्त कैसे हुए?

बंगाल और बिहार मेरे बहुत नजदीक रहा है. दिल्ली की मेरी रेलवे कॉलोनी में अलग-अलग प्रांतों के भाषाभाषी लोग थे. पंजाब, बंगाल, बिहार, हिमाचल की भाषाओं से मेरा स्नेह बचपन से ही रहा है. थिएटर करते हुए बंगाल और यूपी-बिहार के लोग मेरे सबसे करीबी रहे.

मुजफ्फरनगर के हमारे मित्र निखिल वर्मा टाइम्स ऑफ इंडिया में होते थे. अनीश वर्मा से मेरे पारिवारिक संबंध रहे. मनोज (वाजपेयी) के जो भाई हैं, उनके जमुना पार्क वाले घर जाता तो 7-8 मुस्टंडे एकदम लपक के आके पैर छूते. ‘कैसे हैं भैया? क्या लेंगे? चाय बना दें;’ तो वो टोन वहां से आया. वह जो आदर, स्नेह, बातचीत. वह आप सीख नहीं सकते. जो साउंड होती है न ! ‘क्या जी!’ उसे सीखने की कोशिश करेंगे तो कैरिकेचर हो जाएगा.

मेरा 8-10 साल का थिएटर का जो वक्फा रहा, वहां बांग्ला और बिहारी आसपास बोली जा रही होती तो मुझे लगता कि मेरी ही भाषा है. भोजपुरी मेरी ही भाषा है. या जैसे इलाहाबाद का जो टोन है, तिग्मांशु या बाकी तमाम लोगों की वजह से वो मुझे बहुत कर्णप्रिय लगता है.

किसी डायलेक्ट विशेषज्ञ की मदद भी ली?

शो में हमारे भाषा विशेषज्ञ थे रविकांत. उन्होंने बहुत बारीक बातें बताईं, जैसे 'बड़ा' को 'बरा' बोलना. ऐसी चीजें बताने के लिए कोई एक कोच, मेंटॉर होना चाहिए, जो निगरानी रखे. हम लोगों ने 'अय्यैय्यो' करके हिंदी सिनेमा में जो किया, तमिल, तेलुगु में कोई वैसा नहीं बोलता. बहुत बाद में हमने जाना कि दक्षिण में लोग 'अय्यैय्यो' नहीं करते.

हाल ही आपने एक्ट वन थियेटर समूह के आपके साथी अरविंद बब्बल के साथ जयप्रकाश की प्रतिभा  फिल्म की है. उसके बारे में थोड़ा-सा कुछ बताएं.

यह अरविंद जी की पहली फिल्म है. उसका फाइनल टचअप चल रहा है. बहुत अच्छी कहानी है. अस्सी-नब्बे के दौर की. उसमें मैं, साक्षी तंवर और राजेश तैलंग हैं. ज्ञान चतुर्वेदी का लिखा हुआ है. बहुत मजेदार संवाद लिखे हैं उन्होंने. ज्ञान जी का मुंबई में न होना, मेरा मानना है कि फिल्म वालों का नुक्सान है. ऐसे साहित्यिक लोग मनमौजी और अपने सम्मान को लेकर बहुत सजग होते हैं.

साहित्यकार मुंबई में बहुत नहीं टिक पाते. ऐसा क्यों होता है, क्या लगता है आपको?

मुंबई आपको पालतू बना देती है. आपको आपके टर्म्स ऐंड कंडीशंस बता देती है कि यहां रहना है तो ऐसे बिहेव करना होगा. ज्यादातर लोग फिर ओबिडिएंट हो जाते हैं, समझ जाते हैं.

मैं जब तक दिल्ली में था ओबिडिएंट नहीं था. कहता था कि जैसा मेरा मन होगा वैसा करूंगा. कोई मेरा क्या बिगाड़ लेगा. लेकिन मुंबई आते ही आपकी ईएमआइज आ जाती हैं और आप एक चूहा दौड़ का हिस्सा बन जाते हैं.

गोपालदास नीरज, संतोष आनंद और राहत इंदौरी ने हमेशा अपने शहरों में रहके काम किया. कमलेश्वर जी भी कुछ साल मुंबई में रहने के बाद वापस दिल्ली चले गए. मनोहर श्याम जोशी भी टिके नहीं.

मेरे ख्याल से अरविंद इसलिए ज्ञान जी के साथ काम कर पाए क्योंकि अरविंद की पारिवारिक विरासत साहित्यिक है. उनके पिता राधेश्याम प्रगल्भ कवि थे. बड़े भाई अशोक चक्रधर कवि हैं. अशोक जी के ससुर काका हाथरसी. बब्बल टेलीविजन इंडस्ट्री के सिरमौर माने जाते रहे हैं. उनको साहित्यिक लोगों का मान-सम्मान करना आता है.

मुंबई में जमने के बाद अब थिएटर से किसी तरह की वाबस्तगी रह पाती है?

महीने दो महीने में एक प्ले जरूर देखने जाता हूं. स्टेज पर न जाने का जो मेरा रोष और तकलीफ है उसको दर्शकदीर्घा में बैठकर निकालता हूं. रंगमंच के अपने मित्रों को 3-4 साल से बोला हुआ है कि कभी कोई छोटा-मोटा पात्र हो और कोलैबोरेट किया जा सके तो मैं करना चाहता हूं. रंगमंच मेरा पहला प्रेम है. उसी की वजह से जीवन में यहां पहुंचा हूं. उसके आनंद का आप कोई मुकाबला नहीं कर सकते.

इधर कौन से नाटक देखे?

अभी अमितोष (नागपाल) का एक नाटक देखा, रो मत जूलियट. ओह हो हो! इतना बढ़िया म्यूजिकल. मुझे लगा कि काश ! मुझे एक एंट्री मिल जाए इसमें. अमितोष बहुत सुंदर लिखता है. उसके अंदर एक सूफीज्म है. उसमें, नेहा (सराफ, उनकी पत्नी) में और उनकी पूरी टीम में. लीक से हटकर काम करता है.

एक और देखा, रजत कपूर का नथिंग लाइक लियर. सिंगल पर्सन शो है. विनय पाठक करते हैं. शेक्सपियर के नाटक पर आधारित. किंग लियर जैसे एक बूढ़े आदमी की कहानी. बहुत सारा जिबरिश में. देख के रोमांचित हो गया. जादू था. विनय (पाठक) ने डेढ़-दो घंटे दर्शकों को जैसे अपनी उंगलियों पर नचाया पृथ्वी थिएटर में.

आप जो शूट करते हैं, उसके साल, दो साल बाद वह दिखता है. अच्छा लगता है. उसे पूरी दुनिया देखती है. सब कुछ अच्छा है. लेकिन लाइव परफॉर्मेंस का अगर मैं फर्क बताऊं तो यह शा‌ॉपिंग मॉल के नकली फूल और मंडी हाउस के बगीचे के ताजे फूल जैसा है, जिसकी खुशबू आप महसूस करते हैं.

सिनेमा में एआइ को लेकर बातें होने लगी हैं. इस बारे में आप क्या सोचते हैं?

यह भी प्लास्टिक के और असली फूलों जैसा मसला है. एक को आप देखना बंद कर देते हैं. और दूसरा जो अंदर पानी बदल-बदल के गमले में रखा जाता है, उसका आनंद अलग ही है. रजनीगंधा. क्या बात है. आप खुद को प्रकृति के नजदीक महसूस करते हैं और हमारे जैसे लोग तो खास तौर पर इन इमारतों के बीच में फंसे हुए हैं.

कंक्रीट का जंगल है तो कहीं थोड़ी बहुत हरियाली दिख जाए. जैसे दिल्ली में हाल ही सुंदर नर्सरी गया. अद्भुत. वहां कविताएं पढ़ी जाती हैं. नाटक होते हैं. वहां गया तो मेरी आंखें फटी की फटी रह गई. इतना बढ़िया सुंदर बगीचा, दरख्त, बैठने की सुंदर जगह. अलग-अलग जगह कपल्स बैठे हुए हैं. रोमांस में तल्लीन, बातें कर रहे हैं. एक दूसरे को रूठ-मना रहे हैं. परिवार जा रहे हैं, बड़े बुजुर्ग हैं. गोधूलि की वेला थी और मैं मुझे ईर्ष्या हुई सारे दिल्ली वालों से. यार ! ऐसी एक भी जगह नहीं है मुंबई में.

इधर हाल के समय में आपने कुछ नई किताबें पढ़ी हों?

अनिमेष मुखर्जी कॉउबेल्ट के बंगाली लेखक हैं. उनकी दो किताबें पढ़ीं मैंने, ठाकुरबाड़ी और दूसरी इतिहास की थाली. हिंदी में है. जो भाषा है इस लड़के की...जिसको बोलते हैं रोजमर्रा की भाषा. प्रभाष जोशी जी वाली भाषा.

पिछले महीने प्रभाष जी का एक संकलन लेकर आया. उनका मुरीद रहा हूं. दिल्ली में थिएटर करते वक्त गाहे-बगाहे जनसत्ता में लिख लेता था. उनके कमरे के आसपास मंडराते हुए मैंने बहुत बार उनको देखा है. राजनीति, क्रिकेट, सामाजिक सरोकार पे. क्या अद्भुत लिखते थे.

भाषा के लिहाज से मेरे लिए यह सब बहुत जरूरी है. क्योंकि अभी यहां तो 'ऑफ हो गया था'. 'किधर को जाना है'. सब खो जाता है तो अपनी भाषा को बचाए रखने के लिए पढ़ना जरूरी है.

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