राजनीतिक वफादारी और सैन्य अनुभव के बीच उलझी चीनी सेना?
शी जिनपिंग के भ्रष्टाचार और अनुशासन के खिलाफ अभियान में PLA के दो बेहद अनुभवी कमांडर बाहर हो गए हैं. अब सवाल है कि राजनीतिक वफादारी पर जोर के बीच चीनी सेना अपने युद्ध अनुभव और पेशेवर सैन्य सलाह की क्षमता कैसे बनाए रखेगी

PLA की परेड (सांकेतिक फोटो)
चीन ने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के दो सबसे वरिष्ठ और अनुभवी कमांडरों जनरल झांग यूशिया और लियू झेनली को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) और सेना से निकाल दिया है. बीजिंग ने इसे भ्रष्टाचार, निष्ठा में कमी और CCP के अनुशासन के उल्लंघन के खिलाफ जारी अभियान का हिस्सा बताया है.
लेकिन इस ताजा कार्रवाई से एक बड़ा सवाल भी उठता है: पूर्ण राजनीतिक वफादारी की कोशिश में सैन्य पेशेवर क्षमता से कितना समझौता किया जा सकता है?
केंद्रीय सैन्य आयोग (CMC) के पूर्व उपाध्यक्ष और पोलित ब्यूरो के सदस्य रहे झांग और संयुक्त स्टाफ विभाग के पूर्व प्रमुख लियू उन कुछ वरिष्ठ PLA नेताओं में शामिल थे, जिन्हें सीधे युद्ध का अनुभव था.
इनकी विदाई चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की सेना को नए सिरे से ढालने की कोशिश के सामने मौजूद एक बुनियादी चुनौती को उजागर करती है. वे ऐसी PLA बनाना चाहते हैं जो राजनीतिक रूप से वफादार हो और जिस पर कड़ा नियंत्रण हो लेकिन साथ ही वह स्वतंत्र और पेशेवर सलाह देने और युद्ध के दबाव में सही फैसले लेने में भी सक्षम रहे.
भारत के लिए PLA की इस कार्रवाई का महत्व इस बात में ज्यादा है कि इन बदलावों का वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीन के सैन्य फैसलों पर क्या असर पड़ सकता है. 2020 में पूर्वी लद्दाख में दोनों देशों के बीच हुआ गतिरोध दिखा चुका है कि हिमालयी सीमा पर तनाव कितनी तेजी से बढ़ सकता है और ऐसे समय में कमांड की निरंतरता, सटीक खुफिया जानकारी और तेजी से सैन्य फैसले लेना कितना महत्वपूर्ण हो जाता है.
इसलिए भारत की नजर PLA के पश्चिमी थिएटर कमांड के नेतृत्व और उसके कामकाज में होने वाले बदलावों पर रहेगी. यही कमांड LAC की जिम्मेदारी संभालता है. सैन्य अभियानों का अनुभव रखने वाले वरिष्ठ अधिकारियों को हटाने से सेना के कामकाज में निरंतरता को लेकर सवाल उठ सकते हैं.
हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि इससे PLA की सैन्य क्षमता पर कोई असर पड़ा है. शीर्ष स्तर पर अधिकारियों में बदलाव का मतलब यह जरूरी नहीं कि जमीन पर चीन की सैन्य तैनाती या रुख भी बदल जाएगा.
शी जिनपिंग के राष्ट्रपति बनने के बाद PLA में बड़े पैमाने पर पुनर्गठन हुआ है और इसके केंद्र में CCP के प्रति राजनीतिक वफादारी रही है. पहले चरण में उन वरिष्ठ अधिकारियों को निशाना बनाया गया, जिनके नेटवर्क चीन के पिछले नेतृत्व के दौरान बने थे.
2014 और 2015 में CMC के पूर्व उपाध्यक्ष गुओ बोशियोंग और शू कैहोउ को हटाए जाने से सेना के भीतर मौजूद शक्तिशाली संरक्षण नेटवर्क खत्म हुए. इसके बाद जनरल फांग फेंगहुई समेत कई अन्य वरिष्ठ कमांडरों की भी व्यापक भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के तहत जांच हुई.
शुरुआत में चीन पर नजर रखने वाले कई विशेषज्ञों ने इन कार्रवाइयों को प्रतिद्वंद्वी शक्ति केंद्रों को खत्म करने और PLA पर शी का नियंत्रण मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा. लेकिन बाद में यह अभियान उन अधिकारियों से आगे बढ़ गया जो पुराने गुटों से जुड़े थे.
पूर्व रक्षा मंत्रियों वेई फेंगहे और ली शांगफू को हटाया जाना और रॉकेट फोर्स के वरिष्ठ कमांडरों की जांच से साफ हुआ कि शी के कार्यकाल में ऊंचे पदों पर पहुंचे अधिकारी भी इस कार्रवाई से अछूते नहीं हैं.
झांग का मामला खास तौर पर महत्वपूर्ण है. शी के सैन्य नेटवर्क से उनके लंबे जुड़ाव के कारण उन्हें शीर्ष नेतृत्व के करीबी और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली वरिष्ठ कमांडरों में गिना जाता था.
झांग को हटाया जाना दिखाता है कि किसी अधिकारी का शीर्ष नेतृत्व से करीबी संबंध उसे हमेशा सुरक्षा नहीं दे सकता. एक बार भ्रष्टाचार, वफादारी या अनुशासन को लेकर उस पर संदेह हो जाए तो यह संबंध भी उसे नहीं बचा सकता.
लेकिन ऐसी कार्रवाई का असर सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं है. PLA ने आधुनिक हथियारों, प्रशिक्षण, तकनीक और सैन्य आधुनिकीकरण पर काफी निवेश किया है. इसके बावजूद युद्ध का वास्तविक अनुभव हासिल करना आसान नहीं है. झांग और लियू उस पीढ़ी के कमांडरों में शामिल हैं जिन्हें 1979 के चीन-वियतनाम युद्ध का जमीनी अनुभव था.
झांग को चीन के सबसे अनुभवी सैन्य अधिकारियों में माना जाता है. उन्होंने रणनीतिक और सैन्य अभियानों से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण सलाहकार की भूमिका निभाई. वहीं संयुक्त स्टाफ विभाग के प्रमुख के तौर पर लियू सैन्य योजना, समन्वय और संयुक्त सैन्य अभियानों के लिए जिम्मेदार थे.
जटिल और बड़े पैमाने के सैन्य अभियानों की तैयारी कर रही सेना के लिए यह अनुभव खास मायने रखता है. उदाहरण के लिए, ताइवान को लेकर किसी संभावित सैन्य संघर्ष में सेना, नौसेना, वायुसेना, रॉकेट फोर्स और दूसरे सहायक बलों को कई मोर्चों पर मिलकर काम करना होगा.
समुद्री इलाकों में युद्ध की स्थिति में चीन को ऐसे कमांडरों की जरूरत होगी जो बड़ी सैन्य टुकड़ियों के बीच समन्वय कर सकें, युद्ध की अनिश्चित परिस्थितियों के बीच तेजी से बदलाव कर सकें और जब योजनाएं पटरी से उतरने लगें तो मुश्किल फैसले ले सकें.
इसलिए झांग और लियू को हटाए जाने के बाद PLA के शीर्ष कमांड ढांचे में ऐसे दो अधिकारी नहीं रहेंगे जिनके पास युद्ध का व्यावहारिक अनुभव था. चीन ज्यादा उन्नत हथियार बना सकता है, अपनी सैन्य ताकत बढ़ा सकता है और तेजी से जटिल सैन्य अभ्यास कर सकता है.
लेकिन सैन्य मामलों पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि वास्तविक युद्ध का अनुभव रखने वाले कमांडरों को तैयार करना कहीं लंबी प्रक्रिया है.
PLA पर करीबी नजर रखने वाले एक सैन्य विशेषज्ञ ने कहा कि बार-बार होने वाली ऐसी कार्रवाइयों का असर संस्थागत भरोसे और फैसले लेने की प्रक्रिया पर भी पड़ सकता है. उन्होंने कहा, "किसी संकट के समय कमांडरों को अधूरी जानकारी और बदलती परिस्थितियों के बीच तेजी से फैसला लेने में सक्षम होना चाहिए. उतना ही जरूरी यह भी है कि वे राजनीतिक नेतृत्व को यह बताने का साहस रखें कि कोई सैन्य अभियान सफल होने की संभावना कम है, उपकरण पर्याप्त नहीं हैं, रसद व्यवस्था कमजोर है या दुश्मन की क्षमता को कम करके आंका गया है."
यहीं शी का राजनीतिक विश्वसनीयता पर जोर एक मुश्किल संतुलन पैदा करता है. बीजिंग का तर्क हो सकता है कि भ्रष्टाचार, गुटबाजी और अनुशासनहीनता को खत्म करने से PLA मजबूत होगी.
राजनीतिक वफादारी और वैचारिक एकजुटता शी की उस सोच के केंद्र में हैं जिसमें सेना पर CCP का मजबूत नियंत्रण हो. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि बहुत ज्यादा दंडात्मक राजनीतिक माहौल कमांडरों को ऐसी रिपोर्ट देने से हतोत्साहित कर सकता है जो नेतृत्व को पसंद न आए.
एक अन्य सैन्य विशेषज्ञ ने कहा कि अगर अधिकारियों को डर हो कि नाकामी की जानकारी देना राजनीतिक निष्ठा में कमी माना जा सकता है तो वे प्रशिक्षण, रसद, उपकरण या सैन्य योजना की कमजोरियों को सामने रखने से बच सकते हैं.
एक पेशेवर सेना में ऐसे कमांडर जरूरी होते हैं जो समस्याओं की पहचान उन्हें युद्ध में नाकामी में बदलने से पहले कर सकें. इसके लिए ऐसा माहौल भी जरूरी है जिसमें वरिष्ठ अधिकारी स्थापित धारणाओं पर सवाल उठा सकें और वैकल्पिक आकलन सामने रख सकें.
एक सैन्य विशेषज्ञ के मुताबिक, "अगर राजनीतिक रूप से सुरक्षित बने रहना पेशेवर सैन्य फैसले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाए तो शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचने वाली जानकारी अधूरी या विकृत हो सकती है. इसके बाद रणनीतिक योजना सैन्य क्षमता के वास्तविक आकलन के बजाय राजनीतिक अपेक्षाओं से प्रभावित हो सकती है."
बड़े पैमाने के संभावित युद्ध की तैयारी कर रही सैन्य शक्ति के लिए यह गंभीर कमजोरी बन सकती है. PLA की बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान चलाने की क्षमता सिर्फ इस बात पर निर्भर नहीं करेगी कि उसके पास कितनी मिसाइलें, विमान, जहाज या सैनिक हैं.
यह कमांडरों के अनुभव, आपसी समन्वय और नेतृत्व की क्षमता पर भी निर्भर करेगी. किसी सैन्य अभियान में सेना, नौसेना, वायुसेना, रॉकेट फोर्स और अन्य सहायक इकाइयों के बीच करीबी तालमेल जरूरी होगा.
इसके लिए बहुत बड़ी रसद व्यवस्था, चुनौतीपूर्ण संचार परिस्थितियों, तेजी से बदलते युद्धक्षेत्र और अलग-अलग सैन्य शाखाओं के बीच संयुक्त अभियानों का समन्वय करना होगा. ऐसे में जमीनी अनुभव रखने वाले वरिष्ठ अधिकारियों का हटना कमांड की निरंतरता और संस्थागत विशेषज्ञता बनाए रखने में चुनौती पैदा कर सकता है.
बड़ा सवाल यह है कि राजनीतिक निष्ठा पर बीजिंग का जोर चीन के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचने वाली सैन्य सलाह की गुणवत्ता को कितना प्रभावित करता है. सीमा पर किसी संकट की स्थिति में कमांडरों को रसद, भू-भाग, सैनिकों की तैयारी और तनाव बढ़ने के संभावित परिणामों का वास्तविक आकलन देना होगा.
अगर राजनीतिक विचार पेशेवर सैन्य आकलन पर हावी होने लगें तो खतरा सिर्फ कमजोर सैन्य प्रदर्शन का नहीं बल्कि गलत आकलन का भी होगा.
भारतीय सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि नई दिल्ली को सिर्फ इस कार्रवाई पर ध्यान देने के बजाय इसके बाद होने वाले बदलावों पर नजर रखनी चाहिए. इनमें LAC पर सैनिकों की तैनाती, सैन्य अभ्यास, बुनियादी ढांचे का विकास, रसद नेटवर्क और वरिष्ठ कमांड ढांचे में अधिकारियों की नियुक्तियां शामिल हैं.
इन बातों से ज्यादा साफ तस्वीर मिलेगी कि यह ताजा घटनाक्रम सिर्फ नेतृत्व में अस्थाई परिवर्तन है या PLA के संभावित संघर्ष की तैयारी और उसे संभालने के तरीके में कोई गहरा बदलाव हो रहा है.
बड़ी चिंता रणनीतिक फैसले लेने की प्रक्रिया को लेकर है. अगर कमांड ढांचे में ऐसे अधिकारियों का दबदबा बढ़ता है जो मुख्य रूप से अपनी वफादारी साबित करने पर ध्यान देते हैं तो रणनीतिक गलत आकलन का खतरा बढ़ सकता है.
समस्या हथियारों या संसाधनों की कमी की नहीं, बल्कि इस बात की हो सकती है कि PLA के शीर्ष नेतृत्व को युद्ध की स्थिति में उनकी वास्तविक क्षमता की पूरी जानकारी न मिले.
झांग और लियू को हटाया जाना PLA पर अपना नियंत्रण बनाए रखने की शी की कोशिश की गहराई को दिखाता है. बीजिंग ऐसी कार्रवाइयों को भ्रष्टाचार खत्म करने, अनुशासन लागू करने और राजनीतिक विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए जरूरी मान सकता है.
लेकिन इससे चीन की सेना के सामने मौजूद एक बुनियादी चुनौती भी सामने आती है: राजनीतिक निष्ठा और पेशेवर क्षमता के बीच संतुलन बनाए रखना.
PLA का तेजी से आधुनिकीकरण हुआ है. विशेषज्ञों का मानना है कि उसके पास उन्नत तकनीक, बढ़ती सैन्य क्षमताएं और बड़े संसाधन हैं. लेकिन सैन्य ताकत सिर्फ इन चीजों पर निर्भर नहीं करती. अनुभवी कमांडर, सटीक आकलन, संस्थागत भरोसा और दबाव में सही फैसले लेने की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं.
शी ने एक दशक से ज्यादा समय PLA को अपनी सोच के मुताबिक ढालने में बिताया है. अब बड़ी परीक्षा यह है कि क्या राजनीतिक रूप से एकजुट यह सेना वास्तविक युद्ध लड़ने के लिए जरूरी पेशेवर विशेषज्ञता को बनाए रख सकती है.
इस ताजा कार्रवाई का दीर्घकालीन असर इस बात पर निर्भर करेगा कि चीन अपनी सशस्त्र सेनाओं के शीर्ष स्तर पर राजनीतिक निष्ठा और वास्तविक सैन्य क्षमता, दोनों को बनाए रख पाता है या नहीं.