ट्रंप का यू-टर्न, NATO का सस्पेंस और ईरान की बमबारी
पिछले तीन सप्ताह से जो अस्थाई युद्धविराम पश्चिम एशिया को कुछ राहत दे रहा था, वह अब टूटता दिखाई दे रहा है. कम से कम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ताजा बयान तो यही संकेत देते हैं

अयातुल्ला अली खामेनेई को सुपुर्द-ए-खाक किए जाने की रस्म अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि खाड़ी देशों पर ड्रोन और मिसाइलों का साया फिर मंडराने लगा. ईरान का पूरा राजनीतिक और धार्मिक नेतृत्व मशहद में अपने सर्वोच्च नेता को अंतिम विदाई देने में व्यस्त है लेकिन उसी समय कुवैत, बहरीन और कतर में सायरन बज रहे हैं.
पिछले तीन सप्ताह से जो अस्थाई युद्धविराम पश्चिम एशिया को कुछ राहत दे रहा था, वह अब टूटता दिखाई दे रहा है. कम से कम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ताजा बयान तो यही संकेत देते हैं.
अब यह केवल दो देशों के बीच का सैन्य टकराव नहीं रह गया है बल्कि पश्चिम एशिया की पॉवर पॉलिटिक्स, वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री व्यापार के भविष्य का प्रश्न बन चुका है.
चिंगारी कहां से भड़की?
इस नए संघर्ष की शुरुआत 7 जुलाई को हुई जब होरमुज से गुजर रहे तीन कमर्शियल जहाजों पर हमला हुआ. इनमें कतर और सऊदी अरब के तेल टैंकर भी शामिल थे. अमेरिका ने बिना देर किए इसका आरोप ईरान पर लगा दिया.
जवाब में अमेरिकी सेना ने ईरान के दर्जनों सैन्य ठिकानों पर व्यापक हवाई हमले शुरू कर दिए. अगले दिन यह अभियान और तेज हो गया. अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने लगातार दूसरी रात कार्रवाई करते हुए लगभग 90 और ठिकानों को निशाना बनाया. दो दिनों में कुल मिलाकर लगभग 170 ठिकाने हमलों की ज़द में आए.
इनमें वायु रक्षा प्रणाली, तटीय निगरानी नेटवर्क, मिसाइल और ड्रोन भंडार, नौसैनिक अड्डे आदि शामिल थे. अमेरिका का दावा है कि उसका उद्देश्य ईरान की हर उस क्षमता को कमजोर करना है जिससे वह होरमुज से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों को निशाना बना सकता है. लेकिन इस बार हमलों की प्रकृति पहले से अलग थी.
पहली बार अमेरिकी हमलों में पुल जैसे सिविल इन्फ्रास्ट्रक्चर भी निशाने पर दिखाई दिए. ईरानी सरकारी मीडिया के अनुसार गोलिस्तान प्रांत का एक रेलवे पुल क्षतिग्रस्त हुआ जबकि इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) का कहना है कि मशहद जाने वाले रास्ते पर दो पुलों पर हमला किया गया.
यही वह रास्ता था जिससे खामेनेई के अंतिम संस्कार का जुलूस गुजरने वाला था. ईरान का आरोप है कि अमेरिका ने जानबूझकर ऐसा किया ताकि अंतिम यात्रा बाधित हो सके. इस आरोप ने ईरान के भीतर राष्ट्रवादी भावना को और अधिक मजबूत बना दिया.
इसके अलावा कई तटीय शहरों से भी विस्फोटों की खबरें आईं.
ईरान ने भी देर नहीं की. रिवोल्यूशनरी गार्ड और ईरानी सेना ने दावा किया कि उन्होंने कुवैत, कतर और बहरीन में अमेरिकी अड्डों को बड़ी संख्या में ड्रोन से निशाना बनाया.
बहरीन में अमेरिकी नौसेना का पांचवां बेड़ा तैनात है. वहां में एक ही दिन दो बार एयर-रेड सायरन बजाने पड़े. कुवैत ने दावा किया कि उसकी वायु रक्षा प्रणाली ने दो बैलिस्टिक मिसाइलें और 13 ड्रोन मार गिराए.
ईरान का साफ कहना है कि अगर अमेरिका ने हमले जारी रखे तो खाड़ी में मौजूद हर अमेरिकी सैन्य अड्डा उसका लक्ष्य होगा.
नाटो सम्मेलन और ट्रंप का यू-टर्न
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक मोड़ अंकारा में आयोजित नाटो शिखर सम्मेलन में आया. ट्रंप ने इस दौरान पत्रकारों से कहा कि ईरान और अमेरिका के बीच जून में हुआ समझौता अब खत्म हो चुका है और वे ईरान के साथ आगे बातचीत नहीं करना चाहते.
उन्होंने ईरानी वार्ताकारों पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि अब उनसे बातचीत करना समय की बर्बादी है. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि यदि दोनों पक्ष चाहें तो बातचीत जारी रख सकते हैं. यानी एक बार फिर वही रणनीति, कठोर बयान के साथ बातचीत का अधखुला दरवाजा.
बीते कुछ महीनों में ट्रंप कई बार युद्धविराम के अंत की घोषणा के कुछ ही समय बाद नरम रुख अपनाते दिखे हैं. इसी बीच उन्होंने ईरान के बिजली संयंत्रों और समुद्री जल को मीठा बनाने वाले संयंत्रों को भी निशाना बनाने की चेतावनी दी है. यहां तक कि खार्ग द्वीप पर नियंत्रण की संभावना भी जताई है. खार्ग से ईरान के लगभग 90 प्रतिशत कच्चे तेल का निर्यात होता है.
ट्रंप के इस पेंडुलमनुमा बयानों के बीच नाटो ने अपने संयुक्त वक्तव्य में एक बार फिर होरमुज में फ्रीडम ऑफ नेविगेशन के सम्मान करने की बात दोहराई. साथ ही तेहरान कभी परमाणु हथियार हासिल न कर सके, यह भी सुनिश्चित करने की बात कही.
दिलचस्प बात यह है कि नाटो ने सैन्य रूप से किसी एक पक्ष का खुला समर्थन नहीं किया. यह इतनी संतुलित और सावधानीपूर्वक चुनी गई भाषा है कि कोई यह संकेत न निकाल सके कि कहीं नाटो खुद खाड़ी क्षेत्र में किसी प्रत्यक्ष या परोक्ष सैन्य भूमिका में तो नहीं खड़ा.
लेकिन सवाल तो है. क्या यह अब भी यह केवल अमेरिका और ईरान के बीच का संघर्ष है, जिसे वॉशिंगटन अपनी सेना और खाड़ी में मौजूद सैन्य ठिकानों के सहारे लड़ रहा है? या फिर नाटो अपने हर नए बयान के साथ, धीरे-धीरे उस युद्ध का भी हिस्सा बनता जा रहा है जिसे उसने खुद शुरू नहीं किया?
दरअसल, सम्मेलन के दौरान यूरोपीय सहयोगी देशों की अपनी चिंताएं भी साफ दिखाई दीं. एक ओर डेनमार्क, ग्रीनलैंड पर ट्रंप के दोबारा किए गए दावे का विरोध कर रहा था, वहीं दूसरी ओर ट्रंप स्पेन के साथ व्यापार रोकने की धमकी दे रहे थे. यह सब इस बात की याद दिलाता है कि ईरान के प्रश्न पर नाटो की एकजुटता को स्वतःसिद्ध मान लेना भूल होगी, भले ही ट्रंप ने कह दिया हो कि काम पूरा करने का समय आ गया है.
इस बीच ईरान ने भी अपना रुख नरम नहीं किया. ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ ने सोशल मीडिया पर लिखा कि अमेरिका अब भी यह नहीं समझ पाया है कि धमकी और वादाखिलाफी की कीमत चुकानी पड़ती है. उन्होंने कहा कि होरमुज खुला रहेगा लेकिन अमेरिकी दबाव से नहीं बल्कि ईरान की शर्तों पर.
विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने भी चेतावनी दी कि धमकियों की छाया में कोई नई बातचीत संभव नहीं है.
इस युद्ध में अब नया क्या?
अब तक यह संघर्ष मुख्यतः सैन्य ठिकानों और ऊर्जा ढांचों तक सीमित था लेकिन पुलों, परिवहन नेटवर्क और सिविल इन्फ्रा पर हमले संकेत देते हैं कि युद्ध की सीमाएं बदल रही हैं. यदि बिजली संयंत्र, जल संयंत्र और परिवहन तंत्र लक्ष्य बनने लगे तो यह व्यापक मानवीय संकट का रूप ले सकता है.
ईरान के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार पिछले दो दिनों में कम से कम 14 लोगों की मौत हो चुकी है और 78 लोग घायल हुए हैं. साथ ही पहली बार कुवैत, बहरीन और कतर तीनों खाड़ी देशों पर लगभग एक साथ हमले हुए हैं. लेबनान पहले से इसकी चपेट में है. यानी यह अब केवल अमेरिका और ईरान का द्विपक्षीय संघर्ष नहीं रह गया; पूरा खाड़ी क्षेत्र इसकी चपेट में आता दिखाई दे रहा है.
विश्व के समुद्री व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा होरमुज से होकर गुजरता है. तनाव बढ़ते ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें बढ़ गईं जबकि अमेरिकी कच्चे तेल की कीमत दो दिनों में सात प्रतिशत से अधिक उछल चुकी है.
संयुक्त राष्ट्र की समुद्री एजेंसी के अनुसार लगभग छह हजार नाविक अब भी इस क्षेत्र में फंसे हुए हैं और उनकी निकासी लगातार टल रही है. यूरोपीय संघ की विमानन सुरक्षा एजेंसी ने एयरलाइनों को अगस्त के अंत तक ईरान और इराक के हवाई क्षेत्र से बचने की सलाह दी है.
भारत पर असर
भारत के सामने इस संकट के कई प्रत्यक्ष-परोक्ष प्रभाव हैं. सबसे पहला है ऊर्जा सुरक्षा. भारत अपने कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है. यदि होरमुज बाधित होता है या तेल फिर से महंगा होता है तो इसका असर सीधे महंगाई, परिवहन लागत और भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है.
दूसरा, भारतीय जहाज़ भी इस संकट से प्रभावित हो रहे हैं. कुवैत से लगभग 20 लाख बैरल तेल लेकर आ रहा भारतीय टैंकर लीला वाडिनार को ओमान के तट के पास से वापस लौटना पड़ा. तीसरा, बहरीन, कुवैत और कतर जैसे देशों में लाखों भारतीय काम करते हैं. यदि संघर्ष और बढ़ता है तो उनकी सुरक्षा और संभावित निकासी भारत सरकार की बड़ी प्राथमिकता बन सकती है.
चौथा, समुद्री मार्गों में व्यवधान आने से माल ढुलाई महंगी होगी, बीमा प्रीमियम बढ़ेंगे और इसका असर भारत के आयात-निर्यात पर भी दिखाई दे सकता है.
आगे क्या?
इस समय सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या यह केवल जवाबी हमलों का एक और दौर है या पश्चिम एशिया किसी बड़े क्षेत्रीय युद्ध की दहलीज पर खड़ा है. डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अब जो भी होगा, बहुत तेजी से होगा लेकिन उन्होंने बातचीत की संभावना को पूरी तरह बंद भी नहीं किया है. इतिहास बताता है कि पश्चिम एशिया में युद्ध अक्सर गोलियों से नहीं बल्कि गलत आकलनों से फैलते हैं. और आज, जब होरमुज की लहरों पर युद्धपोत, ड्रोन और तेल टैंकर एक साथ मौजूद हैं तब पूरी दुनिया की निगाहें इसी जलडमरूमध्य पर टिकी हैं.
इस पूरे संकट में सबसे बड़ा और सबसे अप्रत्याशित कारक अब भी डोनाल्ड ट्रंप ही हैं. वे ऑक्सीजन लेते जो बात कहते हैं, कार्बन डायऑक्साइ़ड छोड़ते उसे काट देते हैं. एक ही सांस में दो बात करने में माहिर. यही विरोधाभास अप्रैल से अब तक उनकी रणनीति की पहचान रहा है और यही कारण है कि आगे की दिशा को लेकर गहरी अनिश्चितता बनी हुई है.
आने वाले दिनों में तीन संभावनाएं सामने दिखाई देती हैं. पहली, कुछ दिनों तक सीमित जवाबी हमले हों और फिर तनाव धीरे-धीरे कम हो जाए, जैसा ट्रंप पहले भी अनुमान जताते रहे हैं.
दूसरी, स्थिति धीरे-धीरे उसी व्यापक युद्ध की ओर लौट जाए, जिसकी शुरुआत फरवरी में हुई थी.
और तीसरी, दोनों पक्ष अपनी-अपनी घरेलू राजनीति के लिए शक्ति-प्रदर्शन करने के बाद सम्मानजनक तरीके से फिर बातचीत की मेज़ पर लौट आएं.
इन तीनों रास्तों में से कौन-सा रास्ता चुना जाएगा, इसका फैसला शायद नाटो के घोषणापत्र से कम और तेहरान की आंतरिक राजनीति से ज्यादा होगा. यह इस बात पर निर्भर करेगा कि ईरान में कट्टरपंथी नेतृत्व हावी होता है या व्यावहारिक-समझौतावादी धड़ा, और इस पर भी कि 'जो होगा बहुत तेजी से होगा' या 'समझौता अब खत्म हो चुका है' का ट्रंप वास्तव में शाब्दिक अर्थ निकालते हैं या यह बस उनकी बातचीत की रणनीति का हिस्सा भर है.