ईरान पर जोरदार हमले का इरादा बदलने को क्यों मजबूर हुए ट्रंप?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप फिर से बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान शुरू करने के पक्ष में थे लेकिन 23 जुलाई की शाम से उनकी सोच बदलने लगी. 24 जुलाई तक ट्रंप होर्मुज में बमबारी रोकने के फैसले पर पूरी तरह सहमत हो गए

28 फरवरी को अमेरिका और ईरान के बीच जंग शुरू होने के करीब 39 दिनों के बाद 8 अप्रैल को दोनों देशों में सीजफायर हुआ. यह सीजफायर ज्यादा दिन नहीं चला. होर्मुज में हमले के बाद जुलाई 2026 की शुरुआत (8-9 जुलाई 2026) में दोनों देशों के बीच दोबारा जंग शुरू हो गई.
23 जुलाई को अमेरिका लगातार 13वीं रात ईरान पर जोरदार हमला करने की तैयारी कर रहा था. उससे कुछ घंटे पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि तेहरान को अभी तक पर्याप्त सबक नहीं मिला है. इससे साफ संकेत मिला कि अमेरिका और तेज हमले कर सकता है.
इसी प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने कहा, "मैं बहुत बड़े हमले पर विचार कर रहा हूं. पहले से भी बड़ा हमला. मैं फैसला लेने के बहुत करीब हूं. हम पूरी तरह तैयार हैं." इसके बाद अमेरिका ने लगातार 13वीं रात ईरान के कई ठिकानों पर हमला किया, जिन्हें अमेरिकी सेना ने सैन्य लक्ष्य बताया.
हालांकि, इस हमले के बाद हर बार की तरह ट्रंप ने अगले ही दिन अपना रुख पूरी तरह बदल लिया और आगे के हमलों पर रोक लगा दी जबकि अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने 14वीं रात के हमले की पूरी योजना उनके सामने रख दी थी. ऐसे में सवाल उठने लगा कि आखिर 24 घंटे में ऐसा क्या बदल गया कि ईरान पर जोरदार हमला करने की वकालत करने वाले ट्रंप अचानक हमले रोकने पर राजी हो गए?
कई अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के हवाले से पहले ही यह बात सामने आ गई थी कि ट्रंप कूटनीति के लिए ज्यादा गुंजाइश देना चाहते थे. साथ ही उन्हें यह भी बताया गया था कि इंटरसेप्टर मिसाइलों का भंडार तेजी से कम हो रहा है.
ज्यादातर लक्ष्यों को पहले ही बर्बाद कर दिया जा चुका है: अमेरिकी कमांडर
इन कारणों के अलावा, अमेरिकी मीडिया Axios की एक नई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मध्य पूर्व में अमेरिकी सेना के सबसे वरिष्ठ कमांडर एडमिरल ब्रैड कूपर ने जमीनी स्थिति का आकलन किया. रिपोर्ट में बताया गया है कि इस दौरान सेना अधिकारी ने क्या महसूस किया और कैसे उनकी राय ने ट्रंप का फैसला बदल दिया.
Axios ने इस सेना अधिकारी के करीब रहने वाले दो सूत्रों के हवाले से बताया कि एडमिरल कूपर ने राष्ट्रपति ट्रंप को ब्रीफिंग में सलाह दी कि होर्मुज स्ट्रेट के आसपास बमबारी रोक दी जाए क्योंकि यह अभियान अपनी प्रभावशीलता की सीमा तक पहुंच चुका है.
सूत्रों ने Axios को बताया कि अमेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रमुख की यह सलाह उन कई कारणों में शामिल थी, जिनकी वजह से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 24 जुलाई को ईरान पर अमेरिकी हमले रोकने का फैसला किया. यह फैसला इस बात को स्वीकार करने जैसा था कि सैन्य और नागरिक सलाहकारों के मुताबिक आगे की सैन्य कार्रवाई, खासकर हवाई हमले, अब अमेरिकी उद्देश्य की सीमा तक पहुंच चुके हैं.
दो सप्ताह में पहली बार ट्रंप ने सेना को आदेश दिया कि वह ईरान के दक्षिणी तट और होर्मुज स्ट्रेट के आसपास स्थित ठिकानों पर हमला न करे. यह फैसला वरिष्ठ सलाहकारों और सैन्य अधिकारियों के साथ हुई बैठक के बाद लिया गया, जिसमें उस दिन के हमलों की नई योजना ट्रंप के सामने रखी गई थी.
Axios के मुताबिक, बैठक से पहले के दिनों में ट्रंप बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान फिर से शुरू करने के पक्ष में थे लेकिन 23 जुलाई की शाम से उनकी सोच बदलने लगी. 24 जुलाई तक ट्रंप होर्मुज में बमबारी रोकने के फैसले पर पूरी तरह सहमत हो गए.
Axios की रिपोर्ट के मुताबिक, इससे पहले सप्ताह में एडमिरल कूपर ने पेंटागन, ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ और व्हाइट हाउस को आगे की रणनीति पर अपनी सलाह दी थी. उन्होंने कहा कि होर्मुज क्षेत्र में दो सप्ताह तक चले हमलों से जहाजों पर हमला करने की ईरान की क्षमता काफी कमजोर हो गई है. उन्होंने यह भी बताया कि जिन ठिकानों को निशाना बनाया जाना था, उनमें से ज्यादातर पर पहले ही हमला हो चुका है.
कूपर ने कहा कि अगला विकल्प यह हो सकता है कि ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के दौरान चिह्नित और अब तक नष्ट नहीं हुए बाकी 20 फीसद टारगेट्स पर हमले का बड़ा सैन्य अभियान फिर से शुरू किया जाए. हालांकि, अगर ऐसा फैसला नहीं लिया जाता तो बमबारी जारी रखने का कोई मतलब नहीं है.
Axios को सूत्रों ने यह भी बताया कि ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के अध्यक्ष जनरल डैन केन ने निजी तौर पर रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ और ट्रंप को चेतावनी दी थी कि एयर डिफेंस इंटरसेप्टर मिसाइलों की कमी से क्षेत्र में अमेरिकी सैनिकों और सहयोगी देशों की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है. जनरल केन की यह चेतावनी सबसे पहले द न्यूयॉर्क टाइम्स ने प्रकाशित की थी.
एक नाजुक शांति की खामोशी
ईरान और ओमान अब भी ऐसे नए समझौते पर बातचीत कर रहे हैं जिससे होर्मुज से जहाजों की आवाजाही बिना हमलों के फिर से शुरू हो सके. हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि दोनों देशों के बीच होने वाला कोई भी समझौता ट्रंप को स्वीकार होगा या नहीं.
फिलहाल स्थिति शांति के बदले शांति जैसी दिखाई दे रही है, जहां दोनों पक्षों ने हमले रोक रखे हैं. संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका के राजदूत माइक वॉल्ट्ज ने रविवार को NBC के 'मीट द प्रेस' कार्यक्रम में कहा, "ट्रंप ने अभी भी सभी विकल्प खुले रखे हैं." वॉल्ट्ज ने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच हर स्तर पर बातचीत जारी है.
अमेरिका और ब्रिटेन इस सप्ताह के आखिर में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित करने पर भी विचार कर रहे हैं. इसका उद्देश्य होर्मुज की सुरक्षा और वहां बिछाई गई बारूदी सुरंगों को हटाने के लिए देशों का एक गठबंधन बनाना है. हालांकि, इस बैठक की अंतिम तारीख अभी तय नहीं हुई है. कूटनीतिक बातचीत, सैन्य विराम और टकराव के अगले चरण को लेकर अनिश्चितता अभी भी बनी हुई है.