ऑपरेशन सिंदूर से कैसे उजागर हुईं चीनी हथियारों की खामियां?

ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय हमलों के सामने पाकिस्तान के चीनी हथियारों से लैस एयर डिफेंस सिस्टम की सीमाएं उजागर हुई थीं और अब वह चीन से नए सिस्टम चाहता है

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना ने पाकिस्तानी एयर डिफेंस को निष्क्रिय कर दिया था (फोटो : AI)

ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान के एयर डिफेंस सिस्टम की कमजोरियां उजागर होने के बाद चीन के सैन्य उपकरणों पर उसकी बढ़ती निर्भरता की नए सिरे से समीक्षा हो रही है. भारतीय हमलों ने दिखाया कि चीनी रडार, मिसाइलों और लड़ाकू विमानों पर आधारित कई स्तरों वाली व्यवस्था भी महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को भारत के सटीक हमलों से बचाने में भरोसेमंद साबित नहीं हो सकी.

इसी पृष्ठभूमि में पाकिस्तान की ओर से चीन का एलडी-2000 क्लोज-इन वेपन सिस्टम खरीदने की संभावनाएं तलाशने की खबरें अहम हैं. यह ऐसे हथियार में एक और निवेश होगा जिसकी लंबे वक्त तक चलने वाले युद्ध में प्रभावशीलता अब तक बड़े पैमाने पर साबित नहीं हुई है. साथ ही इसे बेचने वाले देश की वायु सेना ने भी दशकों से कोई बड़ा पारंपरिक हवाई युद्ध नहीं लड़ा है.

एलडी-2000 को लू-दुन-2000 या लैंड शील्ड 2000 के नाम से भी जाना जाता है. यह चीन की नॉरिन्को कंपनी का ट्रक पर लगाया जाने वाला डिफेंस सिस्टम है. इसमें 30 मिमी की सात नलियों वाली गैटलिंग गन लगी होती है. इसका मकसद ड्रोन, रॉकेट, लक्ष्य पर हमला करने से पहले कुछ समय तक हवा में मंडराने वाले हथियारों और कम ऊंचाई पर उड़ने वाली क्रूज मिसाइलों से बचाव की आखिरी परत मुहैया कराना है.

एलडी-2000 को शामिल करने की कोशिश से संकेत मिलता है कि पाकिस्तान वायु सेना के रणनीतिकार अब अपने संवेदनशील हवाई ठिकानों की सुरक्षा पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं. आधुनिक युद्ध में सटीक हमलों से हवाई अड्डों जैसे स्थिर सैन्य ठिकानों को ज्यादा खतरा है, जबकि लड़ाकू विमानों को अलग-अलग जगहों पर तैनात किया जा सकता है. रूस-यूक्रेन युद्ध में भी ऐसा देखने को मिला है.

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के नूर खान एयर बेस को भी निशाना बनाया गया था (फाइल फोटो)

यह सिस्टम अहम है लेकिन इसकी अपनी सीमाएं भी हैं. यह उस हवाई अड्डे, रडार सेंटर या कमांड पोस्ट के आसपास के छोटे से इलाके की ही रक्षा कर सकता है जहां इसे तैनात किया जाता है. इसके इस्तेमाल के बावजूद पाकिस्तानी सैन्य ठिकानों को पूरी तरह सुरक्षित नहीं किया जा सकता.

एलडी-2000 नौसेना में इस्तेमाल होने वाले चीनी टाइप-730 क्लोज-इन वेपन सिस्टम का जमीन पर इस्तेमाल होने वाला वर्जन है. इसकी सात नलियों वाली 30 मिमी की तोप एक मिनट में लगभग 4,200 से 5,800 गोलियां दाग सकती है. हालांकि बताया जाता है कि इसमें दो मैगजीन में करीब 1,000 रेडी राउंड रखे जा सकते हैं. व्यावहारिक रूप से इसका मतलब है कि गोला-बारूद दोबारा भरने से पहले यह लगभग 40 से 50 बार रुक-रुककर गोलियां दाग सकता है.

इसे बनाने वाली कंपनी के मुताबिक सिस्टम की अधिकतम मारक दूरी लगभग 2.5 से 3.5 किलोमीटर है. लेकिन इसकी प्रभावी मारक दूरी आम तौर पर 1 से 1.5 किलोमीटर मानी जाती है. यह सिस्टम लगभग मैक-2 की गति से उड़ने वाले लक्ष्यों को निशाना बनाने के लिए बनाई गया है. 

इससे जुड़े निगरानी रडार की छोटे रडार प्रतिबिंब क्षेत्र वाले लक्ष्यों का पता लगाने की क्षमता लगभग 12 किलोमीटर बताई जाती है. वहीं, ट्रैकिंग रडार की दूरी करीब 9 किलोमीटर है. इसके साथ इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड सेंसर भी लगे हैं.

इस सिस्टम का रिएक्शन टाइम अलग-अलग आकलनों में चार से पांच सेकंड से लेकर लगभग 10 सेकंड तक बताया गया है. इसके अलावा, सटीक निशाना लगाने के लिए वाहन को हाइड्रोलिक स्टेबलाइजर तैनात करने पड़ते हैं. इससे एक बार लक्ष्य पर हमला करने की स्थिति में आने के बाद उसकी गतिशीलता कम हो जाती है.

इन विशेषताओं से कई व्यावहारिक समस्याएं पैदा होती हैं. मुश्किल से एक या दो किलोमीटर का मारक क्षेत्र तेज गति से कम ऊंचाई पर उड़ने वाले लक्ष्य को रोकने में गलती की गुंजाइश बहुत कम छोड़ता है. कोई खतरा कुछ ही सेकंड में यह दूरी पार कर सकता है. 

ड्रोन के झुंड या एक साथ बड़ी संख्या में किए गए हमले इसका गोला-बारूद तेजी से खत्म कर सकते हैं. लगातार तेज गति से गोलियां चलाने पर तोप गर्म होती है और उसकी नलियां भी घिसती हैं. ऐसे में क्रू को लगातार गोलीबारी करने के बजाय नियंत्रित अंतराल पर गोलियां चलानी पड़ती हैं.

पाकिस्तान चीन के HQ9 एयर डिफेंस सिस्टम का पहले से इस्तेमाल कर रहा है (फाइल फोटो)

30 मिमी के गोलों की भी अपनी सीमाएं हैं. आने वाले खतरों को नष्ट करने के लिए इनका सटीक निशाने पर लगना बहुत जरूरी है. मजबूत या तेजी से दिशा बदलने वाले हथियारों के वॉरहेड पर इनका विनाशकारी प्रभाव भी सीमित हो सकता है. 

इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड सेंसर लगे होने के बावजूद, रडार की मदद से निशाना लगाने वाली यह प्रणाली इलेक्ट्रॉनिक हमलों, रडार पर दूसरी चीजों के संकेत मिलने और दुश्मन के नकली लक्ष्यों से धोखा खाने के खतरे से पूरी तरह सुरक्षित नहीं है. इसके अलावा इसमें सिर्फ एक तोप है. ऐसे में अलग-अलग दिशाओं से एक साथ आने वाले कई खतरों से निपटना मुश्किल हो सकता है.

दूसरे शब्दों में कहें तो एलडी-2000 को उसी रूप में समझना चाहिए जिसके लिए इसे बनाया गया है. यह आखिरी मौके पर किसी खास ठिकाने की रक्षा करने वाली प्रणाली है, न कि व्यापक वायु रक्षा कवच. लगातार भीषण हमलों के दौरान इसका वास्तविक प्रदर्शन अब तक बड़े पैमाने पर परखा नहीं गया है.

इस सौदे, खरीदी जाने वाले सिस्टम की संख्या, कीमत या तैनाती को लेकर इस्लामाबाद या बीजिंग की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है. लेकिन पाकिस्तान की इस प्रणाली में कथित दिलचस्पी अपने आप में महत्वपूर्ण है. ड्रोन और सटीक निशाना लगाने वाले हथियारों से स्थिर सैन्य ठिकानों को होने वाला खतरा लगातार बढ़ रहा है. इसे नजरअंदाज करना मुश्किल हो गया है. ऐसे में पाकिस्तान एक बार फिर इसका समाधान तलाशने के लिए चीन की ओर देख रहा है.

ऑपरेशन सिंदूर ने चीन में तैयार पाकिस्तान के मिलेटरी सिस्टम को वास्तविक युद्ध के दबाव में ला दिया. इस संघर्ष में लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाला मिसाइल सिस्टम एचक्यू-9, मध्यम दूरी का एयर डिफेंस सिस्टम एलवाई-80, जे-10सीई और जेएफ-17 लड़ाकू विमान तथा पीएल-15 हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलें शामिल थीं.

सैन्य विश्लेषकों के मुताबिक नुकसान और मिसाइलों को बीच में ही नष्ट करने से जुड़े दोनों पक्षों के दावों पर बहस जारी रहेगी. लेकिन एक व्यापक तथ्य को खारिज करना मुश्किल है. पाकिस्तान का एयर डिफेंस सिस्टम भारतीय सेना को महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों पर हमले करने से नहीं रोक सका. 

इसे केवल किसी एक रडार, मिसाइल बैटरी या विमान की विफलता बताकर नहीं टाला जा सकता. इस घटना ने विभिन्न सिस्टम्स के बीच तालमेल, हमलों के बावजूद टिके रहने की क्षमता, परिस्थितियों की सही जानकारी और लगातार सैन्य दबाव में प्रदर्शन जैसे व्यापक सवाल खड़े किए.

भारतीय सेना को चीन की पीएल-15 मिसाइल का मलबा मिलने से चीनी हथियारों की अचूक होने की छवि को भी नुकसान पहुंचा. किसी एक मिसाइल का लक्ष्य तक न पहुंच पाना पूरे हथियार परिवार को बेकार साबित नहीं करता. लेकिन इससे तकनीकी श्रेष्ठता के दावों पर सवाल जरूर उठते हैं.

चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी एयर फोर्स (PLAAF) शाहीन सीरीज जैसे संयुक्त सैन्य अभ्यासों के जरिये पाकिस्तानी क्रू को डेटा लिंक, रडार संचालन, वॉर स्ट्रेटजी और ज्वाइंट ऑपरेशन की प्रक्रियाओं का व्यापक प्रशिक्षण दे सकती है. लेकिन वह पाकिस्तान को युद्ध का वह अनुभव नहीं दे सकती जो उसके पास खुद नहीं है.

विशेषज्ञों का मानना है कि PLAAF के पास अत्याधुनिक विमान हैं और उसने प्रशिक्षण तथा आधुनिकीकरण पर भारी निवेश किया है. लेकिन उसने हाल के दशकों में ऐसा कोई बड़ा पारंपरिक हवाई अभियान नहीं लड़ा है जिसमें रनवे नष्ट हुए हों, लगातार नुकसान झेलना पड़ा हो, इलेक्ट्रॉनिक हमले हुए हों और बड़े पैमाने पर मिसाइलों का इस्तेमाल हुआ हो. सैन्य अभ्यास कितने भी कठिन क्यों न हों वे नियंत्रित परिस्थितियों में होते हैं. युद्ध ऐसा नहीं होता.

दरअसल चीन के सरकारी मीडिया ने भी माना है कि संयुक्त सैन्य अभ्यासों में पाकिस्तानी पायलटों को ज्यादा अनुभव होता है. इससे संकेत मिलता है कि दोनों देशों के बीच सीखने की प्रक्रिया पूरी तरह एकतरफा नहीं है.

दूसरी ओर भारत की मिलेटरी सिस्टम की विश्वसनीयता एक अलग वजह से बढ़ रही है. उन्हें वास्तविक सैन्य परिस्थितियों में परखा जा रहा है. ऑपरेशन सिंदूर के बाद रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के नेतृत्व ने भारतीय उपकरणों को युद्ध में परखा हुआ बताया. 

भारतीय हथियारों में विदेशों की दिलचस्पी भी बढ़ रही है. ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल फिलीपींस की सेना में शामिल हो चुकी है और दक्षिण-पूर्व एशिया के दूसरे देशों का भी ध्यान खींच रही है. आर्मेनिया ने पिनाका रॉकेट प्रणाली और उससे जुड़े तोपखाने के उपकरण खरीदे हैं. अपनी सुरक्षा संबंधी चुनौतियों से निपटने के लिए उसने एटीएजीएस होवित्जर तोपों में भी दिलचस्पी दिखाई है.

ये घटनाक्रम इस बढ़ते भरोसे को दर्शाते हैं कि भारतीय वेपन सिस्टम कठिन सैन्य परिस्थितियों में भी प्रभावी प्रदर्शन कर सकती हैं. वैश्विक हथियार बाजार में यह एक महत्वपूर्ण अंतर है.

चीन डिफेंस से जुड़े उद्योगों का एक असरदार ढांचा तैयार कर चुका है और कई तरह के उन्नत हथियारों का निर्यात करता है. लेकिन उसकी कई वेपन सिस्टम का वास्तविक प्रदर्शन आंकना अब भी मुश्किल है. इसकी वजह यह है कि उनका सामना किसी तकनीकी रूप से सक्षम प्रतिद्वंद्वी के साथ लंबे समय तक चलने वाले भीषण युद्ध से नहीं हुआ है. इसके उलट भारत की सैन्य प्रणालियों को अब वास्तविक परिस्थितियों में परखा जा रहा है.

चीन के लिए पाकिस्तान की निर्भरता स्पष्ट रणनीतिक फायदे लेकर आती है. हथियारों की बिक्री से उसे मुनाफा होता है. इससे यह जानने का मौका भी मिलता है कि युद्ध के मैदान में हथियार कैसा प्रदर्शन करते हैं. साथ ही, पाकिस्तान की सैन्य योजना और खरीद संबंधी फैसलों पर बीजिंग का प्रभाव बढ़ता है.

हालांकि इस्लामाबाद के लिए स्थिति इतनी सरल नहीं है. एलडी-2000 जैसी एक और प्रणाली शामिल करने से अलग-अलग सैन्य ठिकानों को उपयोगी सुरक्षा मिल सकती है. लेकिन इससे प्रशिक्षण, पूरे नेटवर्क की मजबूती, गोला-बारूद के भंडार, सेंसर के बीच तालमेल या व्यापक युद्धक तैयारी की कमजोरियां दूर नहीं होंगी.

पाकिस्तान अपने हथियारों के जखीरे में चीन के सिस्टम लगातार जोड़ सकता है. लेकिन कोई एक मिसाइल बैटरी या क्लोज-इन वेपन सिस्टम पूरे सैन्य तंत्र की कमजोरियों की भरपाई नहीं कर सकता. 

किसी ठिकाने की रक्षा करने वाली तोप तभी प्रभावी होगी जब उसे समय पर खतरे की सूचना मिले, उसके पास पर्याप्त गोला-बारूद हो, वह खतरे की सही पहचान कर सके और उसका संपर्क मजबूत कमांड एवं कंट्रोल नेटवर्क से बना रहे. इसलिए चीन की ऐसी तकनीक पर बढ़ती निर्भरता, जिसकी प्रभावशीलता अभी साबित नहीं हुई है, युद्ध के लिए तैयार और मजबूत सैन्य क्षमता विकसित करने की कठिन प्रक्रिया के बजाय एक महंगा विकल्प बन सकती है.

अगला सैन्य संकट ही इसकी असली परीक्षा होगा. पाकिस्तान के सामने अब सवाल केवल यह नहीं है कि वह चीन से कितने हथियार खरीद सकता है. असली सवाल यह है कि क्या ये हथियार आपस में तालमेल के साथ काम कर सकते हैं. क्या वे लगातार होने वाले हमलों के बावजूद टिक पाएंगे? और क्या युद्ध की वास्तविक परिस्थितियों में भी वे उतने ही प्रभावी साबित होंगे, जितना उनकी तकनीकी विशेषताओं में दावा किया जाता है?

भारत के लिए भी सबक साफ है. आधुनिक युद्ध में सैन्य विश्वसनीयता का फैसला आखिरकार हथियारों के ब्रोशर में किए गए दावों से नहीं बल्कि वास्तविक परिस्थितियों में उनके प्रदर्शन से होता है.

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