मौसम का पुराना पैटर्न इस बार यूरोप के लिए ज्यादा घातक कैसे हो गया?

मौसम का जाना-पहचाना पैटर्न अब बदली हुई जलवायु में ज्यादा खतरनाक असर दिखा रहा है जिससे यूरोप रिकॉर्ड गर्मी की चपेट में है

No alcohol, schools shut: France tightens curbs as extreme heat grips Europe
यूरोप के कई देशों में इस बार गर्मी के नए रिकॉर्ड बने

यूरोप इस समय शुरुआती गर्मियों में आई अब तक की सबसे मारक हीटवेव (लू) में से एक का सामना कर रहा है. 21 से 27 जून के बीच तापमान सामान्य से 5°C से 12°C तक अधिक रहा और फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, पोलैंड, हंगरी, स्लोवाकिया और ब्रिटेन में गर्मी के पुराने रिकॉर्ड टूट गए.

फ्रांस में जून का अब तक का सबसे गर्म दिन दर्ज किया गया, जहां तापमान 43.3°C तक पहुंच गया. जर्मनी में पहली बार तापमान 41°C के पार गया, जबकि ब्रिटेन ने जून का नया रिकॉर्ड 37.7°C दर्ज किया. इस हीटवेव की सबसे चिंताजनक बात यह रही कि रातें भी असामान्य रूप से गर्म रहीं, जिससे लोगों को राहत नहीं मिली और अस्पतालों, परिवहन नेटवर्क तथा बिजली व्यवस्था पर भारी दबाव पड़ा.

इस भीषण गर्मी के पीछे एक जाना-पहचाना मौसम पैटर्न था- हीट डोम. यह एक लंबे समय तक बने रहने वाले उच्च वायुदाब क्षेत्र के कारण बनता है. हीट डोम वातावरण पर एक ढक्कन की तरह काम करता है जो गर्म हवा को जमीन के पास फंसा देता है और ठंडी हवा, बादलों तथा बारिश को रोक देता है. जब यह फंसी हुई हवा नीचे की ओर दबती है तो वह और गर्म होती जाती है, जिससे लगातार कई दिनों तक तापमान बढ़ता रहता है.

यूरोप के मौसम में इस तरह के वायुमंडलीय पैटर्न पहले भी देखे जाते रहे हैं. लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि अब बदलाव उस जलवायु में आया है जिसमें ये घटनाएं हो रही हैं.

क्लाइमामीटर समूह के एक ताजा विश्लेषण के अनुसार, जून 2026 में पश्चिमी यूरोप में आई हीटवेव जैसी परिस्थितियां करीब 30 साल पहले की तुलना में अब 2.5°C तक ज्यादा गर्म हैं. वहीं 50 साल पहले की तुलना में ये लगभग 3.5°C ज्यादा गर्म हो चुकी हैं. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसे मौसम पैटर्न अब ज्यादा लंबे समय तक बने रहने लगे हैं जिससे गर्मी जमा होती रहती है और सामान्य गर्म दौर रिकॉर्ड तोड़ने वाली आपदा में बदल जाता है.
दूसरे शब्दों में, जलवायु परिवर्तन ने हीट डोम को बनाया नहीं है बल्कि उसकी तीव्रता को कई गुना बढ़ा दिया है.

फ्रांस के नेशनल सेंटर फॉर साइंटिफिक रिसर्च (CNRS) और पियरे-सिमोन लाप्लास इंस्टीट्यूट (IPSL) के जलवायु वैज्ञानिक मार्को जैंकी कहते हैं, “हीट डोम स्थिर रहने वाले उच्च वायुदाब वाले मौसम पैटर्न हैं. ये हमेशा से महाद्वीप पर बनते रहे हैं. बदलाव उस मूल तापमान में आया है जिस पर ये काम करते हैं. वही मौसम प्रणाली, जो पहले गर्म लेकिन संभालने योग्य स्थिति पैदा करती थी, अब रिकॉर्ड तोड़ तापमान ला रही है क्योंकि मानव गतिविधियों से बढ़े जलवायु परिवर्तन ने वातावरण को ज्यादा गर्म बना दिया है.”

इस गर्मी का असर केवल तापमान तक सीमित नहीं रहा. क्लाइमामीटर के अनुमान के अनुसार, इस एक सप्ताह की घटना के दौरान करीब 32.7 करोड़ लोग और 15.6 ट्रिलियन डॉलर मूल्य की आर्थिक गतिविधियां ऐसे तापमान के संपर्क में आईं, जिसकी तीव्रता जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ी थी.

और भी चिंताजनक बात यह रही कि प्रभावित आबादी में से 81 प्रतिशत और प्रभावित आर्थिक परिसंपत्तियों में से 86 प्रतिशत अध्ययन की सबसे ऊंची ‘अत्यधिक जोखिम’ श्रेणी में शामिल थे. हालांकि अध्ययन स्पष्ट करता है कि ये आंकड़े जोखिम के एक्सपोजर को ही दिखाते हैं, वास्तविक नुकसान या मौतों का आंकड़ा नहीं.

ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ लीसेस्टर में स्टेटिस्टिकल मैकेनिक्स (साख्यकीय यांत्रिकी) के प्रोफेसर वैलेरियो लुकारिनी कहते हैं, “जून 2026 की हीटवेव एक बार फिर दिखाती है कि यूरोप जलवायु परिवर्तन के ऐसे प्रभावों से निपटने के लिए किस हद तक तैयार नहीं है. आने वाले दशकों या सदियों की गर्मियों में शायद यह सबसे ठंडी गर्मी साबित हो (भविष्य में तापमान और बढ़ सकता है). गर्मी से जुड़ा जोखिम सबसे कमजोर आबादी को असमान रूप से प्रभावित करता है.”

वैज्ञानिकों के लिए इस हीटवेव का समय भी चिंता का विषय रहा. आमतौर पर इस तरह के मौसम पैटर्न गर्मियों के आखिरी हिस्से में सबसे ज्यादा गर्मी से जुड़े होते हैं, लेकिन इस बार यह घटना जून में ही आ गई. इससे संकेत मिलता है कि यूरोप में गर्म मौसम का दौर अब पहले शुरू हो रहा है और ज्यादा लंबे समय तक बना रह रहा है.

शहरों पर इसका असर सबसे ज्यादा महसूस किया जा रहा है. अध्ययन के अनुसार, दशकों पहले आई ऐसी ही घटनाओं की तुलना में अब इस तरह की हीटवेव के दौरान तापमान टूलूज शहर में करीब 2.2°C, जबकि पेरिस और लंदन में लगभग 1.5°C ज्यादा गर्म हो चुका है.

जैसे-जैसे वैश्विक तापमान बढ़ता जा रहा है, यूरोप की इस ताजा हीटवेव का संदेश साफ है- मौसम का पैटर्न भले ही पुराना हो, लेकिन जिस जलवायु में यह हो रहा है वह पूरी तरह बदल चुकी है.

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