NASA का सबसे अलग मिशन, गिरते सैटेलाइट को बचाएगा रोबोट!
NASA के ‘स्विफ्ट बूस्ट मिशन’ के तहत एक रोबोटिक सर्विसिंग यान स्विफ्ट ऑब्जर्वेटरी को पकड़कर ऊंची कक्षा में पहुंचाएगा ताकि वह पृथ्वी के वायुमंडल में गिरने से बच सके

2004 में लॉन्च किया गया ‘स्विफ्ट गामा-रे ऑब्जर्वेटरी’ अपने साथ तीन टेलीस्कोप लेकर गया था. यह अपनी तरह का पहला अंतरिक्ष यान था. इसे गामा-रे विस्फोटों का अध्ययन करने के लिए बनाया गया था. ये ब्रह्मांड के सबसे शक्तिशाली विस्फोट होते हैं. ये विशाल तारों की मौत के कारण होते हैं और नए ब्लैक होल के जन्म का संकेत देते हैं.
पिछले दो दशकों में इसने, जैसा कि अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA कहती है, "हमारे सौर मंडल के धूमकेतुओं से लेकर दूरस्थ आकाशगंगाओं में ब्लैक होल की गतिविधियों तक" हर तरह के अध्ययन में योगदान दिया है. 2018 में इसके पहले प्रमुख खोजकर्ता के सम्मान में इसका नाम बदलकर ‘नील गहरल्स स्विफ्ट ऑब्जर्वेटरी’ रखा गया.
अब स्विफ्ट को बचाने का मिशन चल रहा है. यह अपने लो अर्थ ऑर्बिट से धीरे-धीरे नीचे आ रहा है और पृथ्वी के वायुमंडल की ओर खिंच रहा है. इसकी वजह 2024 में सूर्य की गतिविधियों के चरम पर पहुंचने से पैदा हुआ तीव्र अंतरिक्ष मौसम है. इससे वायुमंडलीय प्रतिरोध बढ़ गया है. लेकिन सैटेलाइट को वायुमंडल में दोबारा प्रवेश कर जलने देने के बजाय NASA अब उसे ऊंची कक्षा में वापस ले जाने के ‘रेस्क्यू’ मिशन पर है. इससे उसकी उम्र भी बढ़ जाएगी.
आमतौर पर सैटेलाइट की दिशा बदलने के लिए उसके भीतर लगे इंजन चलाए जाते हैं. इससे उसे नई कक्षा में पहुंचाया जा सकता है. लेकिन मूल रूप से केवल दो साल के मिशन के लिए बनाए गए स्विफ्ट में प्रोपल्शन सिस्टम नहीं है. इसलिए NASA ने अमेरिकी स्टार्टअप कैटलिस्ट स्पेस को LINK नाम का एक रोबोटिक सर्विसिंग अंतरिक्ष यान बनाने का ठेका दिया. यह फिलहाल पृथ्वी से 300 किलोमीटर ऊपर चक्कर लगा रहे 1,470 किलोग्राम वजनी स्विफ्ट को पकड़कर उसकी मूल 600 किलोमीटर ऊंची कक्षा में पहुंचाएगा.
30 जून की तय लॉन्च तारीख खराब मौसम के कारण दो बार टाल दी गई. अब एजेंसी 2 जुलाई को लॉन्च की कोशिश कर रही है. योजना के मुताबिक दक्षिण प्रशांत महासागर में मार्शल द्वीपसमूह से उड़ान भरने वाला नॉर्थ्रॉप ग्रुम्मन स्टारगेजर विमान करीब 40,000 फीट की ऊंचाई पर हवा में ही पेगासस XL रॉकेट को छोड़ेगा. यह रॉकेट LINK को तय कक्षा तक पहुंचाएगा.
अंतरिक्ष एजेंसी ने कहा, "NASA चाहता तो स्विफ्ट को वायुमंडल में दोबारा प्रवेश करने दे सकता था. लेकिन इस स्थिति ने भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों के लिए एक अहम क्षमता का प्रदर्शन करने का अवसर दिया. यह साहसिक तरीका स्विफ्ट के वैज्ञानिक मिशन की अवधि भी बढ़ाएगा. साथ ही इसकी अनूठी क्षमताओं वाले नए ऑब्जर्वेटरी को बनाने की तुलना में कम खर्चीला भी होगा."
यह पहली बार होगा जब कोई व्यावसायिक रोबोटिक अंतरिक्ष यान किसी सरकारी सैटेलाइट को अंतरिक्ष में पकड़कर उसकी सर्विसिंग करेगा. यह सैटेलाइट मूल रूप से अंतरिक्ष में सर्विसिंग के लिए डिजाइन नहीं किया गया था. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इसमें कई बड़ी चुनौतियां हैं. अंतरिक्ष में एक अंतरिक्ष यान का दूसरे अंतरिक्ष यान से जाकर जुड़ना कोई नई बात नहीं है. यह तकनीक दशकों से इस्तेमाल हो रही है. लेकिन इस मिशन में सबसे बड़ी चुनौती कक्षा में घूम रही स्विफ्ट वेधशाला के बेहद करीब पहुंचकर उसे रोबोटिक भुजाओं से पकड़ना है.
दरअसल, 1960 के दशक के मध्य में शुरू हुए NASA के जेमिनी प्रयोगों ने कक्षा में रेंडेजवस (करीब पहुंचने की तकनीक) और डॉकिंग तकनीक (अंतरिक्ष में सैटेलाइटों का जुड़ना) की नींव रखी थी. इसके बाद अपोलो मिशनों के तहत इंसानों को चांद पर उतारा गया. 1993 में स्पेस शटल एंडेवर के जरिए हबल स्पेस टेलीस्कोप की मरम्मत के लिए पहला सर्विसिंग मिशन लॉन्च किया गया. इसने ‘सैटेलाइट सर्विसिंग’ के नए दौर की शुरुआत की. 1993 से 2009 के बीच NASA ने हबल स्पेस टेलीस्कोप के लिए पांच सफल सर्विसिंग मिशन भेजे.
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के यू. आर. राव सैटेलाइट सेंटर की एसोसिएट डायरेक्टर (प्रोजेक्ट्स) निगार शाजी बताती हैं कि जिन पुराने सैटेलाइट के उपकरण ठीक हैं, उनमें ईंधन भरने और उन्हें फिर से ऊर्जा देने पर दुनिया भर में काम चल रहा है. शाजी कहती हैं, "दुनियाभर में ऐसी तकनीकों पर काम हो रहा है जिनसे दूसरे अंतरिक्ष यानों के जरिए किसी सैटेलाइट से जुड़कर उसमें ईंधन पहुंचाया जा सके ताकि वह ज्यादा समय तक काम करता रहे. अंतरिक्ष उद्योग अब इसके आर्थिक पहलू पर भी ध्यान दे रहा है. इसलिए लागत घटाने और सैटेलाइट को बचाने के लिए कई तकनीकों पर विचार किया जा रहा है."
इसी तरह अंतरिक्ष मलबे से निपटने के लिए भी कई तकनीकें विकसित की जा रही हैं. स्विफ्ट बूस्ट मिशन के मामले में NASA इसे समय के खिलाफ दौड़ बता रहा है क्योंकि अंतरिक्ष यान की कक्षा लगातार नीचे आ रही है. इस प्रक्रिया को धीमा करने और वायुमंडलीय प्रतिरोध कम करने के लिए इस साल की शुरुआत में उसके टेलीस्कोप का संचालन रोक दिया गया था.
LINK के कक्षा में पहुंचने के बाद कई हफ्तों तक उसका कमीशनिंग चरण चलेगा. इसके बाद वह अपनी तीन रोबोटिक भुजाओं की मदद से स्विफ्ट पर ऐसे स्थानों की पहचान करेगा जहां वह खुद को जोड़ सके. स्विफ्ट को ऊपर उठाने की प्रक्रिया में कुछ महीने लगने की उम्मीद है. यह काम पूरा होने के बाद LINK उससे अलग हो जाएगा और पृथ्वी के वायुमंडल में दोबारा प्रवेश कर जाएगा.